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मिट्टी और ख़ूनः लू शुन का क्रांतिकारी साहित्य, उनकी मृत्यु के नब्बे वर्ष बाद

लू शुन के अंतिम दशक के राजनीतिक निबंधों-भाषणों में भाषा, निराशा, अंतर्राष्ट्रीयतावाद और सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक आधार पर उनके विचारों को हम फिर से समझते हैं।

सुनिए ‘Pioneers Who Open the Road’ (1934)। यह सुन यू की फिल्म ‘द बिग रोड’ का गीत है। नी एर ने इसकी धुन तैयार की थी और सुन शियी ने इसके बोल लिखे थे। 1930 के दशक में उभरे शंघाई के वामपंथी सिनेमा में ‘द बिग रोड’ को मील का पत्थर माना जाता है।

मैं हांग कांग से बीजिंग जा रहे विमान में बैठी, आधुनिक चीनी साहित्य के जन्मदाता माने जाने वाले लू शुन के भाषणों को एक बार फिर पढ़ रही थी। ये भाषण उन्होंने हांग कांग में पूरी एक सदी पहले दिए थे। ऐसा कहा जाता है कि 1927 के आस-पास लू शुन ने गल्प को अलविदा करते हुए वामपंथ की ओर विचारधारात्मक मोड़ लिया। उन्होंने ज़्यादा-से-ज़्यादा ज़ावन  यानी छोटे, आलोचनात्मक निबंध लिखे। इनके ज़रिए उन्होंने अपने दौर के राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष को आपस में जोड़ने, चीनी जनता को जगाने, और एक ऐसे राष्ट्र की आवाज़ बनने की कोशिश की जो अर्द्ध-साम्राज्यवादी और अर्द्ध-सामंती परिस्थितियों में जी रहा था। 1936 में लू शुन के निधन के 90 साल पूरे होने के अवसर पर, यह कला बुलेटिन उनके जीवन के अंतिम दशक में लिखे गए कुछ ज़ावेन (राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखे गए आलोचनात्मक निबंधों) पर फिर से नज़र डालता है।

‘बेज़ुबान चीन’ लू शुन का ऐसा ही भाषण है जो उन्होंने 18 फ़रवरी 1927 को हांग कांग के चीनी YMCA में दिया था। लू शुन ने शास्त्रीय चीनी भाषा के बनिस्बत बाएहुआ  या स्थानीय लिखित चीनी भाषा पर ज़ोर दिया। उन्होंने ‘सिर्फ़ प्राचीन और चुके हुए विचारों को व्यक्त करने में सक्षम’ भाषा के प्रयोग की आलोचना की। एक ऐसा समाज जहाँ निरक्षरता फैली हुई हो, वहाँ शास्त्रीय चीनी भाषा और रोज़मर्रा की भाषा के बीच का अंतर ने अधिकांश जनता और लिखित भाषा के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया। इसके साथ ही शास्त्रीय भाषा भी जनता के विचारों, भावनाओं और संघर्षों को व्यक्त कर पाने में सक्षम नहीं रही थी। इसलिए लू शुन ने युवाओं का आह्वान किया कि ‘चीन को एक ऐसे चीन में बदल दें जिसके पास अपनी आवाज़ हो’। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सिर्फ़ ऐसा करके ही वे ‘विश्व में दूसरों के साथ रह सकते हैं’। लू शुन के लिए यह तलाश एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीयवादी संघर्ष की खोज भी थी, जिसमें चीन की मुक्ति उपनिवेशवाद का दंश झेल रही अन्य जनता से अटूट रूप से जुड़ी थी। उन्होंने सवाल किया ‘क्या हमने मिस्र की आवाज़ सुनी है? क्या हमने वियतनाम या कोरिया की आवाज़ सुनी? टैगोर के अलावा भारत में क्या कोई और बोलने वाला है?’

निराशा के विरुद्ध

दरांती की धार तेज़ करना, केथे कोलविट्ज़, 1905

इसके अगले ही दिन, यानी 19 फ़रवरी को लू शुन ने हांग कांग YMCA में एक और भाषण दिया। इस बार भी वे इसी प्रश्न पर लौटे कि चीन की नई आवाज़ का निर्माण कैसे किया जा सकता है। ‘द ओल्ड ट्यून्ज़ आर फ़िनिश्ड’ शीर्षक निबंध में लू शुन क्रांतिकारी रूस की ओर देखते हैं, तब तक रूस की समाजवादी क्रांति को एक दशक गुज़र चुका था। लू शुन ने इसे एक मार्गदर्शक मशाल के तौर पर देखा, एक ऐसे समाज के रूप में जहाँ एक नई आवाज़ उभरी थी और पुराने बातों का सिलसिला ख़त्म हो चुका था। लू शुन के लिए, यह प्रक्रिया न तो अलगाव में हो सकती थी और न ही इसका चरित्र व्यक्तिवादी था। एक व्यक्ति की जागृति दूसरों की जागृति बन सकती थी, यानी व्यक्तिवादी परिवर्तन को एक व्यापक सामूहिक जागृति से जोड़ा जा सकता है।

साल 1927 चीन के लिए काफ़ी उथल-पुथल भरा रहा। 1911 की क्रांति ने दो हज़ार सालों की राजशाहियों के शासन का अंत किया था और गणराज्य की स्थापना की थी। लेकिन यह गणराज्य अब तक वॉरलॉर्ड के शासन, सामंती दमन और विदेशी साम्राज्यवादी प्रभुत्व से उबर पाने में विफल रहा था। कॉमिन्टर्न के समर्थन से, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) और राष्ट्रवादी कुओमिन्तांग (केएमटी) ने फ़र्स्ट यूनाइटेड फ़्रंट बनाया था। यह क्षेत्रीय सामंतों को हराने और चीन को एकजुट करने के उद्देश्य से बना एक अल्पकालिक गठबंधन था। इसके एक सबसे ज़रूरी सैन्य संस्थानों में से एक थी व्हाम्पोआ सैन्य अकादमी, जिसका गठन सोवियत की सहायता से हुआ था। इस अकादमी में राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट काडर दोनों को एक साथ प्रशिक्षण दिया जाता था। इसके पहले कमांडेंट थे च्यांग काई-शेक और राजनीतिक विभाग के निर्देशक थे झोउ एनलाई। 8 अप्रैल 1927 को इस अकादमी ने लू शुन को ‘क्रांति के दौर में साहित्य’ विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया। बीजिंग में क्रांतिकारी छात्रों के उत्पीड़न पर खेद प्रकट करते हुए लू शुन ने कहा ‘साहित्य, ओ साहित्य तुम एक सरासर बेकार चीज़ हो। तुम्हारे बारे में सिर्फ़ शक्तिहीन लोग बात करते हैं; जिसके पास भी असली ताक़त है वह तुम्हारे बारे में बात करने की सोचता भी नहीं, वह सिर्फ़ लोगों की हत्या करता है। शोषित लोग जो थोड़ा-बहुत बोलते या लिखते हैं मारे जाएँगे’।

बुनकरों का जुलूस, ‘बुनकरों का विद्रोह‘ शृंखला से, केथे कोलविट्ज़, 1893–1897

उस वक़्त चीन की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लू शुन ने एक गंभीर सवाल किया: ‘तब इस साहित्य का लोगों के लिए क्या मूल्य है?’ इसके बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा, इसे उन्होंने ‘निराशा के प्रतिरोध’ का अपना निजी दर्शन बनाया। इसी साल प्रकाशित गद्यात्मक कविताओं के अपने संग्रह जंगली घास  में उन्होंने आशा और निराशा को सामान्य विलोम शब्दों के तौर पर नहीं समझा बल्कि एक ऐसे भ्रम के रूप में व्यक्त किया जो क्रियाशीलता को पंगु बना सकता है। एक खोए हुए अतीत में गुम हो जाने या एक भविष्य के वादे में स्थगित हो जाने के बीच उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हम संघर्ष और रचनाशीलता के ज़रिए वर्तमान से जूझें।

यह ज़रूरी नहीं कि क्रांतिकारी दौर क्रांतिकारी साहित्य की रचना करे। पीड़ा और अन्याय की निंदा करना और चश्मदीद बन जाना लू शुन के लिए नाकाफ़ी था; ज़रूरी यह था कि क्रांतिकारियों को और एक क्रांतिकारी कार्यक्रम के लिए तैयार किया जाए। अपने भाषण में उन्होंने कहा ‘क्रांतिकारी साहित्य की रचना तभी होगी जब क्रांतिकारी लिखना शुरू करेंगे’। ठीक इसी तरह किसानों और मज़दूरों के बारे में साहित्य रचना ही काफ़ी नहीं था। लू शुन का मत था कि सच्चे मायने में ‘जनता के साहित्य’ की संभावना के लिए ज़रूरी है ‘मज़दूरों और किसानों को सच में मुक्त होना’। ऐसी क्रांति शोषित वर्गों को मुक्ति दिलाने के साथ-साथ साहित्य को भी मुक्त करवा सकती है। एक ऐसा साहित्य जिसे लू शुन ने कहा कि ‘प्रतिरोध करना चाहता है, और प्रतिशोध लेना चाहता है’। सैन्य अकादमी में अपने भाषण का अंत उन्होंने साहित्य की शक्ति और सैन्य संघर्ष की शक्ति के फ़र्क़ के बारे में बात करते हुए किया। ‘जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं स्वाभाविक रूप से हथियारों की आवाज़ को तरजीह दूँगा। मुझे लगता है कि साहित्य की आवाज़ के मुक़ाबले हथियारों की आवाज़ ज़्यादा महीन होती है।’ इसके चार दिन बाद शंघाई में घटी घटनाओं ने इन शब्दों की गंभीर फ़ौरी ज़रूरत को उजागर किया।

कॉमरेडों के ख़ून से लिखा क्रांतिकारी साहित्य

विद्रोह, किसान युद्ध शृंखला से, केथे कोलविट्ज़ 1902

लू शुन के भाषण के महज़ चार दिन बाद, फ़र्स्ट यूनाइटेड फ़्रंट को पहला धोखा देते हुए च्यांग काई-शेक के केएमटी बलों और उनके सहयोगियों ने शंघाई में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले मज़दूरों की निर्मम हत्या कर दी। इसके बाद दो चीज़ों की शुरुआत हुई, पहली वाइट टेरर (श्वेत आतंक) नाम के एक कम्युनिस्ट-विरोधी दमन और दूसरी यूनाइटेड फ़्रंट का विघटन। जैसे-जैसे दमन का विस्तार हुआ, सीपीसी ने हथियारबंद विद्रोहों की एक शृंखला से इसका जवाब दिया, इसमें शामिल हैं नानचांग, हुनान-जियांग्शी सीमा पर, और गुआंगज़ौ में हुए विद्रोह। श्वेत आतंक के साथ-साथ इन विद्रोहों की नाकामी ने भी सीपीसी के कृषक क्रांति और ग्रामीण हथियारबंद संघर्ष की ओर रुख़ करने में मदद की। 7 अगस्त को हानको (अब वूहान का भाग) में गुप्त रूप से आपात सम्मेलन आयोजित हुआ, यहाँ सीपीसी ने वह प्रस्ताव पारित किया जिसे बाद में कृषक क्रांति और प्रतिक्रियावादी केएमटी के हथियारबंद प्रतिरोध की सामान्य जानकारी के तौर पर संक्षिप्त किया गया। इस सभा में कहे गए माओ के ये शब्द बाद में काफ़ी प्रसिद्ध हुए ‘राजनीतिक शक्ति बंदूक़ की नली से निकलती है’। इसके अगले महीने माओ के नेतृत्व में ऑटम हार्वेस्ट अपराइज़िंग हुआ, जिसमें शामिल ताक़तों ने फ़र्स्ट वर्कर्स और पेज़ंट्स रेवोल्यूशनरी आर्मी के पहले दस्ते का निर्माण किया, बाद में यह जिंगगांग पहाड़ों की ओर वापस लौट गए।

वाइट टेरर के बीच, लू शुन ने गुआंगज़ौ छोड़ दिया जहाँ वे सुन यात-सेन विश्वविद्यालय में डीन और चीनी भाषा और साहित्य विभाग के अध्यक्ष के पद पर थे। इसके बाद वे शंघाई में बस गए जहाँ उन्होंने अपने जीवन के बचे नौ वर्ष राजनीतिक सक्रियता और मार्क्सवादी तथा सोवियत साहित्यिक अवधारणा के व्यवस्थित अध्ययन में गुज़ारे। साल 1930 में लू शुन लीग ऑफ़ लेफ़्ट-विंग राइटर्स के संस्थापक सदस्य और महत्त्वपूर्ण हस्ती बन गए। ‘लीग ऑफ़ लेफ़्ट-विंग राइटर्स पर कुछ विचार’ नामक अपने भाषण में उन्होंने ‘सैलून-समाजवाद’ को लेकर चेतावनी दी, यानी असली सामाजिक संघर्ष से दूर सुरक्षित कमरों में बैठकर क्रांतिकारी बातें करना। उन्होंने लेखकों और कवियों से भरे सभागार में कहा कि यह काम ‘दर्दनाक है और इसमें गंदगी और खून का मिलना लाज़िमी है। यह कवियों की कल्पना जैसा दिलचस्प और आदर्शपूर्ण बिल्कुल नहीं है।’ लेखक से जिस काम की अपेक्षा की जाती है, वह मामूली और कठिन काम है—तोड़-फोड़ का नाटकीय काम नहीं, बल्कि समाज के निर्माण का धीमा और ऐसा श्रम, जिसके लिए न तो प्रशंसा मिलती है और न ही कोई आभार जताता है। लीग के गठन के एक साल के भीतर ही लू शुन की चेतावनी ने साकार रूप धारण कर लिया। 17 जनवरी 1931 को केएमटी पुलिस ने शंघाई अंतर्राष्ट्रीय सेटलमेंट में एक गुप्त सभा से कम्युनिस्ट संगठनकर्ताओं के एक समूह को गिरफ़्तार कर लिया। गिरफ़्तार होने वालों में लीग से जुड़े पाँच लेखक भी शामिल थे और 7 फ़रवरी को उन्हें चोरी-छिपे लोंगहुआ में मार दिया गया। इसके जवाब में लू शुन ने लिखा ‘चीनी सर्वहारा की क्रांति का पहला अध्याय… हमारे कॉमरेडों के ख़ून से लिखा गया है’।

करने दो उन्हें मुझसे नफ़रत

बेरोज़गारी, केथे कोलविट्ज़, 1909

अपने जीवन के अंतिम वर्ष, 1936 में, फेफड़ों की बीमारी से जूझते हुए भी लू शुन ने तीस से अधिक निबंध लिखे। इनका विषय ‘न्यू वुडकट मूवमेंट’ से लेकर लॉन्गहुआ में युवा लेखकों की हत्या और उस समय की साहित्यिक बहसों तक फैला था। ‘न्यू वुडकट मूवमेंट’ छापे की कला का एक ऐसा आंदोलन था, जो सामाजिक सरोकारों से जुड़ा था और जिसे शुरू करने तथा आगे बढ़ाने में लू शुन की अहम भूमिका थी। 5 सितंबर 1936 को लिखा गया लेख ‘मृत्यु’ इस अंतिम संग्रह का केंद्रीय लेख है। इस लेख की शुरुआत लू शुन की अपनी मृत्यु की बात से नहीं, बल्कि जर्मन समाजवादी प्रिंट-निर्माता केथे कोलविट्ज़ की मृत्यु से होती है। उनकी कलाकृतियों में युद्ध, गरीबी, मज़दूर वर्ग का संघर्ष और शोक जैसे विषयों को दिखाया गया था। इसी साल की शुरुआत में लू शुन ने केथे कोलविट्ज़ के चित्रों का संकलन तैयार किया था। इसमें उनके बनाए चित्रों की 21 प्रतिकृतियाँ थीं। यह पुस्तक जुलाई 1936 में शंघाई में प्रकाशित हुई। लू शुन ने अमेरिकी पत्रकार और कार्यकर्ता एग्नेस स्मेडली से इसकी भूमिका लिखने को कहा था। स्मेडली कोलविट्ज़ को व्यक्तिगत रूप से जानती थीं। अपनी भूमिका में स्मेडली ने कोलविट्ज़ के साथ हुई एक बातचीत का ज़िक्र किया। उन्होंने कोलविट्ज़ से पूछा था कि उनकी बाद की कलाकृतियों में मृत्यु का विषय बार-बार क्यों आने लगा है। कोलविट्ज़ ने जवाब दिया कि शायद इसकी वजह यह थी कि अब उनकी उम्र बढ़ रही थी।

इस बातचीत ने लू शुन को मृत्यु और इसके प्रति चीनी रवैए के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया – मृत्युदंड का शांति से सामना करने वाले अभिशप्त किसान से लेकर अपेक्षाकृत संपन्न लोगों तक जो मृत्यु के बाद के जीवन के लिए तैयारियाँ करते हैं, अपने लिए दफ़नाए जाने की जगह और ताबूत चुनते हैं, नक़ली रुपए जलाते हैं (पूर्वजों को खुश करने का चीनी रिवाज), और अपने वंशजों पर भरोसा करते हैं कि उनकी मौत के बाद वे भी उनके लिए ऐसा ही करेंगे। ‘मृत्यु’ नाम के अपने निबंध में लू शुन ने सात निर्देश दिए, मानो वे अपनी वसीयत लिख रहे हों। पाँचवाँ निर्देश उनके बेटे के लिए था: अगर उसके पास कोई ख़ास प्रतिभा नहीं हो, तो उसे एक साधारण नौकरी तलाशनी चाहिए और ‘किसी भी परिस्थिति में उसे एक नक़ली लेखक या कलाकार नहीं बनना चाहिए’। सातवें निर्देश में उनके परिवार के लिए चेतावनी थी कि वे ऐसे लोगों से कोई रिश्ता न रखें जो बात तो सहिष्णुता और बदला न लेने की करते हैं लेकिन दूसरों को चोट पहुँचाते हैं। इसके बाद लू शुन इस निबंध के सबसे प्रसिद्ध वाक्य पर पहुँचते हैं: ‘मेरे बहुत से दुश्मन हैं, और अगर कोई आधुनिक व्यक्ति मुझसे पूछे कि इस पर मेरे क्या विचार हैं? कुछ सोचने के बाद मैंने निर्णय किया है: उन्हें मुझसे नफ़रत करते रहने दो। मैं भी उनमें से किसी एक को भी माफ़ नहीं करूँगा’। इस आर्ट बुलेटिन में शामिल किए गए कोलविट्ज़ प्रिंट लू शुन के अंतिम महीनों में तैयार किए गए संग्रह से लिए गए हैं।

प्रतिभा की माँग करने से ज़्यादा ज़रूरी है उसके विकास के लिए ज़मीन तैयार करना

यह लू शुन के निबंधों में से मेरा सबसे प्रिय है 1924 में लिखा यह निबंध बीजिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी से जुड़े एक मिडल स्कूल में पूर्व छात्रों के संगठन में दिए उनके एक लेक्चर पर आधारित है।  ‘प्रतिभाशालियों के जन्म से पहले’ नामक इस निबंध में वे मिट्टी के रूपक पर विचार करते हैं। मई चार मई आंदोलन (1919 में छात्र प्रदर्शनों से शुरू हुआ एक बड़ा साम्राज्यवाद-विरोधी और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन) के पाँच साल बाद भी चीन में सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव की माँगें जारी थीं। उस समय साहित्यिक हलकों में सबसे ज़ोरदार माँगों में से एक यह थी कि संस्कृति को बचाने के लिए कोई ‘महान प्रतिभा’ सामने आए। लू शुन का कहना था कि प्रतिभाशाली व्यक्ति घने जंगलों से अचानक नहीं निकल पड़ते; वे उस जनता के बीच से निकलते हैं जो उन्हें पालती-पोसती है, उस मिट्टी से उगते हैं जो उन्हें उगने देती है। इसके बावजूद वह समाज जो इन प्रतिभाशालियों की माँग करता है वही उस मिट्टी को बर्बाद कर रहा था जिससे वे उगेंगे। पुरातनपंथी, स्वदेशीवादी, और भाड़े के आलोचक कोमल अंकुरों को रौंदने के बाद एक फूल की माँग कर रहे थे। एक ऐसे चीन में जहाँ विनाशकारी आलोचक हावी थे, ‘इस तरह के वातावरण में जनसमूह धूल मात्र हैं, उपजाऊ मिट्टी नहीं।’ उन्होंने एक धैर्यपूर्ण निर्देश के साथ समापन किया: ‘प्रतिभा की माँग करने से ज़्यादा ज़रूरी है उसके विकास के लिए ज़मीन तैयार करना।’

लू शुन को मिट्टी में विलीन हुए नब्बे साल हो चुके हैं। उन्होंने जापानी फ़ासीवाद का सबसे बुरा दौर नहीं देखा जिसने 2.4 करोड़ चीनी जानें लीं, और न ही 1949 की कम्युनिस्ट विजय देखी। वह विजय जो चीनी क्रांति की मिट्टी से उगी थी। जैसा कि उन्होंने ‘प्रतिभाशालियों के जन्म से पहले’ के आख़िरी वाक्य में लिखा कि ‘अच्छी मिट्टी को जोतने के भी अपने फ़ायदे होते हैं। जब मिट्टी से कोई ख़ूबसूरत फूल उगता है तो लोग अपने आप ही उसकी प्रशंसा करते हैं, और मिट्टी ख़ुद भी इसकी प्रशंसा करने में आनंद पाती है’।  और यदि हम इस मिट्टी को गंभीरता से लें तो इसमें भी अपनी एक आत्मा, एक आवाज़ और नई धुन होगी।

स्नेह सहित,

टिंग्स चाक ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के कला और संस्कृति विभाग की सह-संयोजक हैं।