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केरल का सहकारिता आंदोलन

शक्तिशाली जन आंदोलनों और वाम सरकारों के समर्थन से, केरल का सहकारी आंदोलन हजारों संस्थाओं में फला। ये सभी संस्थाएँ पूंजीवाद से परे एक संभावित भविष्य की प्रयोगशालाएँ हैं।

अभिनव वी.के. सतीश (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), केरल की सहकारी समितियो के श्रमिक, 2025

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ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान और यूएल ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी रिसर्च सेंटर का साझा अध्ययन

इस अध्ययन के चित्र यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स (YSA) के सदस्यों द्वारा बनाए गए हैं। 2020 से यह समूह पूरे भारत के कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों को एकजुट कर रहा है जो अपनेअपने क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय हैं। इस अध्ययन के लिए चित्र बनाने वाले YSA के अधिकांश सदस्य केरल से हैं और वहीं रहते हैं, जहाँ ये सहकारी समितियाँ/संस्थाएँ दैनिक के जीवन का हिस्सा हैं। ये चित्र इस अध्ययन के शोधकर्ताओं द्वारा अपने क्षेत्र भ्रमण के दौरान ली गई तस्वीरों पर आधारित हैं।

आशिक़ अली तुप्पिलिक्काट SAFAR फ़ाउंडेशन के सहसंस्थापक और निदेशक हैं, यह पश्चिम बंगाल स्थित एक क्रियात्मक अनुसंधान केंद्र है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे, जहाँ से उन्होंने राजनीति विज्ञान में एमफिल के दौरान सहकारी समितियों या संस्थाओं पर शोध किया। फ़िलहाल वे कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो से पीएचडी कर रहे हैं और STREET Lab में शोधकार्य कर रहे हैं। उनका शोध प्रतिरोध की सामाजिकप्रौद्योगिकी डिज़ाइन पर केंद्रित है, जिसके अंतर्गत वे प्रौद्योगिकी और श्रमिक/सामाजिक आंदोलनों के आपसी जुड़ाव का अध्ययन कर रहे हैं।

अश्वथी रेबेका असोक एक विकास अर्थशास्त्री और क़ानून स्नातक हैं, अंतःविषयक, प्रमाण आधारित और नीतिगत रिसर्च में इनकी विशेषज्ञता है। पिछले नौ वर्षों में अश्वथी ने केरल की विकास यात्रा का गहन अध्ययन किया है जिसमें आर्थिक समावेशन, ग़रीबी, जेंडर, प्रवासन, श्रम और विकेंद्रीकरण जैसे कई विषय शामिल हैं। वे भारत के कई विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति में सक्रिय रही हैं।

नजीब वीआर कोझिकोड स्थित यूएल रिसर्च सेंटर में समाज वैज्ञानिक और शोध संयोजक हैं। यहाँ वे सहकारी विकास, सामाजिक परिवर्तन और ज्ञान प्रणालियों के अंत:विषयक विचारों का एकीकरण करते हैं। वे केरल राज्य योजना बोर्ड के 14वीं पंचवर्षीय योजना के उपसमूह के सदस्य भी हैं और शैक्षणिक प्रसार, पाठ्यक्रम विकास और जन छात्रवृत्ति में सक्रिय योगदान देते हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है और केरल काउन्सिल फ़ॉर हिस्टॉरिकल रीसर्च की रिवाइज़ पीएचडी फेलोशिप भी हासिल की है।

विजू कृष्णन अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के महासचिव और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं। एआईकेएस के नेता के तौर पर उन्होंने 2021-2022 तक दिल्ली में चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बनने से पहले वे बंगलुरु स्थित सेंट जोसेफ़ कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक रहे। 1998-1999 में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। विजू एक फ़ोटोग्राफ़र भी हैं जो श्रमिक वर्ग के दैनिक जीवन के चित्र कैमरे में क़ैद करते हैं।

निधीश जे विल्लाट अखिल भारतीय किसान सभा की केंद्रीय किसान कमेटी के सदस्य हैं और पी सुंदरैया ट्रस्ट के शोध संयोजक, जो एक शोध संस्थान है जो कृषि संबंधी विषयों और आंदोलनों पर केंद्रित अध्ययन करता है। निधीश मज़दूरकिसान एकता का अध्ययन करने और उसे मज़बूत बनाने के लिए समर्पित हैं, विशेष रूप से उसकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था और दर्शन को ध्यान में रखकर। वे कृषक और औद्योगिक वर्ग संघर्षों, पूंजीवाद के तहत ‘प्रतिस्पर्धा’, राजनीतिक पारिस्थितिकी और हिंदुत्व जैसे विषयों पर लिखते रहे हैं।

नीतीश नारायणन आंदोलनों के शोधकर्ता और लेखक हैं, जो ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के साथ जुड़े हैं। वे सहकारी संस्थाओं सहित श्रमिक वर्ग के आंदोलनों के इतिहास का अध्ययन करते हैं। इससे पूर्व वे स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के उपाध्यक्ष रहे हैं तथा इसकी पत्रिका स्टूडेंट स्ट्रगल के सम्पादक भी। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। उन्होंने अंग्रेज़ी और मलयालम में कई किताबें लिखीं हैं, जिनमें शामिल है The 1921 Rebellion in Malabar. A Collection of Communist Writings, (संपादनः विजय प्रसाद) और If Humanity Is A Country: Cuban Days.

सर्गा टी.के. अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्रोफेसर हैं। उनका शोध शहरी गतिशीलता, श्रम प्रवासन और निर्माण सहकारी समितियों जैसे विषयों से जुड़ा है, जिसमें यह अध्ययन किया जाता है कि काम और आवागमन किस प्रकार शहरी परिदृश्य को आकार देते हैं। इससे पहले वे केरल के कन्नूर विश्वविद्यालय में पढ़ाती थीं।

सुबिन डेन्निस एक अर्थशास्त्री और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में एक शोधकर्ता हैं। इससे पहले वे न्यूज़क्लिक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल में संवाददाता के तौर पर कार्यरत थे। वे छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे और स्टूडेंट फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया की दिल्ली इकाई के उपाध्यक्ष भी रहे। अर्थव्यवस्था और राजनीतिक विषयों पर लिखे सुबिन के अंग्रेज़ी और मलयालम लेख कई पत्रिकाओं और वेबसाइटों में छपते रहते हैं। वर्तमान में वे केरल में रह रहे हैं।


विजय प्रशाद ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के निदेशक हैं। उन्होंने चालीस से ज़्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें शामिल हैः The Darker Nations: A People’s History of the Third World, The Poorer Nations: A Possible History of Global South, और How the International Monetary Fund Suffocates Africa(Grieve Chelwa के साथ)। विजय LeftWord Books (नई दिल्ली), Inkani Books (जोहैनेस्बर्ग) और La Trocha (सैंटीआगो) में संपादक हैं।

भूमिका: साम्यवाद के भीतर छिपी संभावनाएँ

लेकिन श्रम की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की, संपत्ति की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर एक और भारी जीत अभी बाक़ी थी। हम बात कर रहे हैं सहकारी आंदोलन की, ख़ासतौर से सहकारी कारख़ानों की जो कुछ साहसी ‘मज़दूरों’ ने अपने बलबूते स्थापित किए थे। इन महान सामाजिक प्रयोगों बारे में जितना कहा जाए कम है। इन्होंने हमें कोरे तर्कों से नहीं बल्कि कार्यों से दिखाया है कि मालिकों के वर्ग द्वारा कामगारों के वर्ग को काम पर लगाए बिना भी आधुनिक विज्ञान के आधार पर विशाल स्तर पर उत्पादन किया जा सकता है; कि सफलता के लिए ज़रूरी नहीं कि श्रम के साधनों पर एकाधिकार स्थापित कर उन्हें श्रमिक पर प्रभुत्व और जबरन वसूली का साधन बनाया जाए; दास श्रम की तरह, किसानबंधुआ श्रम की तरह, मज़दूरी पर आधारित श्रम भी केवल एक अस्थायी और निम्न अवस्था है, जो अंततः मिलकर किए जाने वाले श्रम के सामने समाप्त हो जाने के लिए अभिशप्त है—एक ऐसा श्रम जो स्वेच्छा से, तत्पर बुद्धि से और प्रसन्न हृदय से अपना काम करता है।i

अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ का अध्यक्षीय भाषण, 1864, कार्ल मार्क्स

दुख इस दुनिया को घेरता जा रहा है। करोड़ों लोग ग़रीबी की ग़र्त में जीने को मजबूर हैं। पूंजीवादी विस्तारवाद से पैदा हुआ जलवायु संकट धरती पर जीवन की संभावना के सामने प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है। दुनियाभर में युद्धों की वीभत्सता के कई रूप दिखाई दे रहे हैं, जिनमें शामिल है इज़राइल द्वारा ग़ज़ा में फ़िलिस्तीनियों का जनसंहार। इंसान की लिप्सा के कारण फैली भुखमरी ने पूरी आबादी को अपनी चपेट में लिया हुआ है। मानो प्रलय के ज्ञात रूप काफ़ी नहीं थे इसलिए वह नया रूप धरकर इंसानी जीवन की सभी संभावनाओं को कुचलने के लिए आया है।

यह सब मिलकर इस भावना को जन्म देता है कि इस भयावहता के अलावा कुछ भी संभव नहीं है, कि कोई विकल्प सोचा ही नहीं जा सकता। जब मज़बूत और जुझारू लोग, जैसा कि वे अनिवार्य रूप से करते हैं, एक बेहतर भविष्य के बारे में सोचने का साहस करते हैं, तो सत्ता में बैठे लोग उनका उपहास करते हैं और उन्हें कुचल देने की कोशिश करते हैं। शक्तिशाली और संपन्न वर्ग के लिए यही बेहतर है कि किसी भी विकल्प को पनपने ही न दिया जाए। क्योंकि उम्मीद की एक चिंगारी ही इस खोखले दावे को भस्म कर देने लिए काफ़ी है कि इतिहास का अंत हो चुका है।

ऐसी ही एक चिंगारी है केरल (साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला राज्य) जिसका समाजवादी संरचना का ख़ूबसूरत इतिहास है। 1947 में भारत की आज़ादी के दस साल बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने केरल के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की। शुरू से ही केरल की वामपंथी सरकार ने प्राचीन सामाजिक ऊँचनीच और रिवाजों को ख़त्म करने का एजेंडा अपनाया और सामाजिक संसाधनों (गुणवत्तापूर्व सरकारी स्कूल, स्वास्थ्य व्यवस्था और यातायात आदि सहित) को आम जनता की पहुँच के दायरे में लाने की कोशिश की तथा साथ ही मज़दूरों के यूनियन और सहकारी संस्थाएँ बनाने के अधिकारों की रक्षा करके श्रमिकवर्ग तथा किसानों की ताक़त की नींव तैयार की। हालाँकि दिल्ली में बैठी भारत सरकार ने असंवैधानिक रूप से 1959 में केरल की सरकार को बरख़ास्त कर दिया, लेकिन इस सरकार का तैयार किया गया एजेंडा कमोबेश जारी रहा। इसके बाद कुछकुछ अंतराल पर वाम सरकार की केरल में वापसी होती रही (1967–1969, 1969–1977, 1980–1982, 1987–1991, 1996–2001, 2006–2011और 2016–अब तक), हर बार इसने विकेंद्रीकरण के एजेंडे का विस्तार किया, जनता की सक्रियता को प्रोत्साहित किया और सामाजिक लोकतांत्रिक राज्य संस्थानों के आधार का निर्माण किया।ii बीचबीच में जब दक्षिणपंथ सत्ता में आया तब भी वाम सरकारों द्वारा शुरू की गई गतिशीलता को रोक नहीं पाया। इसी पृष्ठभूमि में केरल में सहकारी आंदोलन का विकास हुआ।

पूंजीवादी व्यवस्था के आलोचक अमूमन इसके उन विकल्पों की भी आलोचना करते हैं जो इसी व्यवस्था के दायरों में तैयार किए जाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ये संस्थान पूंजीवादी ताक़त में क़ैद रहते हैं। लेकिन यह सहकारी संस्थाओं का ग़लत विश्लेषण है। ये संस्थाएँ तो दरअसल जीवन और काम के तमाम विचारों को पनपने का मौक़ा देती हैं और प्रेरणा तथा उम्मीद की एक किरण हैं, ये हमें एक झलक देती हैं कि जब पूंजीवाद ख़त्म हो जाएगा तो मानवता क्या कुछ कर सकती है। सहकारी संस्थाएँ श्रमिक वर्ग और किसानों के लिए स्कूल बनाती हैं, जहाँ वे सीख पाते हैं कि विभिन्न आर्थिक आधारों पर सामाजिक संबंध कैसे स्थापित किए जाते हैं। कैपिटल के तीसरे खंड में मार्क्स लिखते हैं:

श्रमिकों के सहकारी कारख़ाने पुराने पेड़ों पर नयी कोपलों का प्रतीक हैं, यद्यपि वे स्वाभाविक तौर पर, और अनिवार्यत:, अपने वास्तविक संगठन में प्रचलित व्यवस्था की ख़ामियों को दोहराते हैं। लेकिन पूंजी और श्रम के बीच का विरोध इनके भीतर दूर हो जाता है—यदि शुरुआत में केवल इस रूप में ही सही कि संयुक्त श्रमिक स्वयं अपने ‘पूंजीपति’ बन जाते हैं, अर्थात् वे उत्पादन के साधनों का उपयोग अपने ही श्रम के रोज़गार के लिए करने में सक्षम हो जाते हैं। ये इस बात को दिखाती हैं कि जब उत्पादन की भौतिक शक्तियों और उससे मेल खाती सामाजिक उत्पादन की रूपरेखाएँ एक निश्चित स्तर तक विकसित हो जाती हैं, तो किस प्रकार एक नई उत्पादनपद्धति स्वाभाविक रूप से पुरानी पद्धति से उभरती है।iii

यहाँ मार्क्स ने जो विछिपी संभावनाएँ</h2>चार प्रस्तुत किए हैं वे बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। सहकारी संस्थाएँ या समितियाँ न तो मूल्य के पूंजीवादी नियम से अनिवार्य तौर से बंधी हैं और न ही इससे पूरी तरह आज़ाद। जैसा कि वे लिखते हैं कि ये एक वैकल्पिक प्रणाली की ‘कोपलें’ हैं जिसके ज़रिए श्रमिक वर्ग यह सीख पाता है कि पूंजीवादी प्रबंधन के निरस्त होने पर चीज़ें कैसे चलाई जाएँ। 1871 के पेरिस कम्यून के दौरान मज़दूरों के यूटोपिया का निर्माण होते देख मार्क्स बहुत गर्व महसूस कर रहे थे, उन्होंने देखा कि कम्यून वालों ने श्रमिकों की सहकारी संस्थाएँ या समितियाँ बनाईं और साथ ही एक नया समाज गढ़ने के अन्य साधन भी, और यह सब लुई नेपोलियन तृतीय के दूसरे साम्राज्य (1852-1870) के तख़्तापलट की ख़ुशी के बीच हुआ।iv मार्क्स लिखते हैं कि फ़्रांस के दूसरे गृह युद्ध में भविष्य में बनने वाले मज़दूरों के राज्य के ‘स्वरूप के तौर पर’ कम्यून ‘की खोज अंतत:’ हुई। इसी लेख में मार्क्स ने सहकारी संस्थाओं या समितियों के बारे में लिखा था:

अगर हम चाहते हैं कि सहकारी उत्पादन केवल एक ढोंग और जंजाल बनकर न रह जाए; अगर इसे पूंजीवादी प्रणाली को हटाना है; अगर हम चाहते हैं कि सहकारी समितियाँ एक साझा कार्यक्रम के आधार पर राष्ट्रीय उत्पादन को विनियमित करें, ताकि वे इसे अपने नियंत्रण में लें और निरंतर जारी अराजकता तथा समयसमय पर आने वाले उतारचढ़ाव जैसे पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली द्वारा पनपी घातक स्थितियों को समाप्त कर दें – तो यह कम्युनिज़म नहीं तो क्या है, एक ऐसा कम्युनिज़म जो ‘मुमकिन’ है।v

केरल के सहकारी आंदोलन पर यह दस्तावेज़ ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की समाजवादी संरचनाओं पर शोध की एक श्रृंखला का हिस्सा है। यह एक ऐसे कम्युनिज़म के बारे में है जो मुमकिन है, हमारे दौर में ही दिखाई दे रही एक आने वाले समाज की संभावनाओं के बारे में। केरल के सहकारी संस्थानों पर यह शोध एक शानदार उद्यम का ईमानदार मूल्यांकन है जो दिखाता है कि ये छोटे विशिष्ट समूहों के तौर पर ही सफल नहीं हुए बल्कि ऐसे बड़े उपक्रम में तब्दील हुए जो स्थानीय सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बन गए। आज केरल में पंजीकृत 16,429 सहकारी समितियाँ हैं (इनमें से 12,278 सक्रिय हैं, 3,354 निष्क्रिय और 797 परिसमापन प्रक्रिया में हैं)vi सहकारी समितियाँ कई क्षेत्रों में काम करती हैं, इसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और वितरण से लेकर कृषि उत्पादन और भवन निर्माण आदि भी शामिल है। कुडुम्बश्री सबसे बड़ी सहकारी समिति है (हालाँकि यह पूर्णत: एक सहकारी समिति के रूप में पंजीकृत नहीं)। इसके 48 लाख सदस्य हैं और सभी महिलाएँ हैं। केरल की चार में से एक महिला इस सहकारी समिति की सदस्य है। कई सहकारी समितियाँ या संस्थाएँ लोकोपकारी संस्थाओं और ट्रस्ट के रूप में भी पंजीकृत हैं जैसे ब्रह्मगिरी डेवलपमेंट सोसाइटी जो कृषि विकास का काम करती है और जनता चेरिटबल सोसाइटी, जो दूध उत्पादन करने वाली एक प्रमुख संस्था है। अधिकतर सक्रिय सहकारी संस्थाओं की राज्य के अन्य भागों में भी शाखाएँ हैं।

ज़ाहिर है कि इनकी कुछ चुनौतियाँ और विरोधाभास हैं जिन पर स्पष्टता से बात की गई है: सहकारी समितियों की संभावनाओं को बढ़ाचढ़ाकर नहीं बताया गया है, क्योंकि वे भी एक ऐसी दुनिया में बचे रहने का संघर्ष कर रही हैं जहाँ मूल्य का पूंजीवादी नियम ही सर्वोपरि है। साथ ही केरल की जनता के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में इन संस्थाओं के अहम योगदान को कम करके भी नहीं आंका गया है। ये सहकारी समितियाँ सिर्फ़ आशा की किरण नहीं हैं: बल्कि ये एक ख़ाका है कि दुनियाभर में पूंजीवादी व्यवस्था के दायरों में भी एक न्यायसंगत भविष्य की नींव कैसे तैयार की जा सकती है।

केरल की सहकारी समितियाँ/संस्थाएँ

1943 में अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) का सातवाँ अधिवेशन पंजाब के भकना कलाँ में हुआ, इसमें शामिल प्रतिनिधियों ने कई मुद्दे उठाए जिनमें सहकारी समितियों की चर्चा भी शामिल थी। यहाँ पारित प्रस्तावों में से एक में एआईकेएस ने यह मत दिया कि सहकारी समितियाँ किसानों को पूंजीवाद और साम्राज्यवादी कृषि प्रणाली के ‘संकट और अपमान’ के विरुद्ध उनकी लड़ाई में मदद कर सकती हैं, और साथ ही उन्हें आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्वतंत्रता’ हासिल करने में भी सहायता दे सकती हैं। अधिवेशन में चर्चा के दौरान कम्युनिस्ट नेता ईएमएस नंबूदिरिप्पाड (1909-1998), जिन्हें ईएमएस भी कहा जाता है, ने ‘संगठन – मशीन नहीं’ नाम से एक नोट लिखा। इस नोट में ईएमएस ने इस बात की ओर इशारा किया कि ‘अमूर्त राजनीति’ से परे जाने वाले एक जुझारू संगठन के बिना इन प्रस्तावों का कोई मतलब नहीं होगा। किसानों और खेत मज़दूरों को सहकारी समितियों का निर्माण करना होगा जिससे कि लोकतांत्रिक क्रांति का विस्तार हो और ग्रामीण मज़दूरों में आत्मविश्वास पैदा हो।vii

अक्टूबर 1956 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने केरल के त्रिसूर में एक मीटिंग की, जिसमें मुख्यतः सहकारी समितियों पर चर्चा की गई। इस मीटिंग की अध्यक्षता प्रोफ़ेसर जोसेफ़ मुंडस्सेरी ने की जो आगे चलकर केरल में ईएमएस सरकार (1957-1959) में पहले शिक्षा और सहकारिता मंत्री बने। इस मीटिंग में फ़ैसला लिया गया कि सहकारी समितियों को सामंती वर्ग का ‘बहीखाता’ नहीं बनने दिया जाएगा, बल्कि श्रमिक वर्ग ख़ुद इन्हें बनाएगा और लोकतंत्र तथा समाजवाद के निर्माण में इन सहकारी समितियों व संस्थाओं की भूमिका के विषय पर राजनीतिक शिक्षा भी दी जाएगी। पार्टी के नेताओं ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कम्युनिस्टों और मज़दूरों द्वारा नियंत्रित सफल ग्रामीण ऋण संस्थाओं और सहकारी बैंकों की बहुत ज़रूरत है जिससे कि महाजनों के शिकंजे को तोड़ा जा सके, कृषि उत्पादन को बेहतर किया जा सके और किसानों तथा खेत मज़दूरों के जीवन में सुधार लाया जा सके। इसी वैचारिक स्पष्टता के साथ केरल की सहकारी समितियाँ दुनिया भर के लोकतांत्रिक श्रमिकों के नेतृत्व वाली सहकारी संरचना के लिए उम्मीद की किरण के रूप में उभरी हैं।

इस शोध में केरल की सहकारी समितियों या संस्थाओं के संक्षिप्त ब्यौरे वाले लेख दिए गए हैं। इन्हें लिखा है उन विशेषज्ञों और नेताओं ने जिन्होंने इन सहकारी समितियों के साथ क़रीबी से काम किया है ताकि वे इन्हें समझा पाएँ और इनका विश्लेषण भी कर पाएँ। इन लेखों में जो आँकड़ें दिए गए हैं वे सहकारी समितियों/संस्थाओं और सरकारी दस्तावेज़ों से जुटाए गए हैं। इस काम में हमारी मदद करने के लिए हम यूएल रिसर्च सेंटर का आभार व्यक्त करते हैं।

इन लेखों में कुछ ज़रूरी तथ्य सामने आए हैं:

  1. केरल में सहकारी क्षेत्र इतना विकसित इसलिए हो पाया क्योंकि यहाँ सामाजिक सुधार का लंबा इतिहास है जिसने सहयोग के लिए ज़रूरी सामाजिक आधार का निर्माण किया। जब सोवियत संघ की ख़बरें केरल तक पहुँची तो सामाजिक सुधार और जाति विरोधी आंदोलनों में शामिल जनता ने वहाँ सामाजिक और आर्थिक संबंधों के पुनर्निर्माण की कोशिशों के प्रति उत्सुकता ज़ाहिर की। इसी उत्सुकता ने सोवियत संघ की सहकारी समितियों/संस्थाओं के अध्ययन को बढ़ावा दिया और ये अध्ययन उस दौर के सामाजिक सुधार तथा जाति विरोधी आंदोलनों की जनसभाओं में प्रस्तुत किए गए।

  2. केरल में सहकारी क्षेत्र के विकास के पीछे का मुख्य कारण यहाँ के वर्ग संघर्ष की जीवंतता है। यहाँ संगठित किसानों और मज़दूरों ने समाज सुधार आंदोलन को मजबूर किया कि वह जाति व्यवस्था, ज़मींदारी प्रथा और उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्षों को एकजुट करे। इन्हीं संघर्षों में किसान आंदोलन ने – मुख्यतः उत्तर केरल में – अत्यंत ग़रीब किसानों की मदद के लिए किसानों की सहकारी समितियाँ बनाने का काम शुरू किया। इन सहकारी समितियों की शुरुआत से ज़मींदारी प्रथा का शिकंजा कुछ ढीला पड़ा क्योंकि अब वे न तो किसानों को मनमाने ब्याज पर ऋण दे सकते थे और न ही उनकी ज़रूरत की चीज़ों के इकलौते विक्रेता रह गए थे। उनकी आँखों के सामने किसानों की सहकारी समितियों ने जनता का मनोबल बढ़ाने का काम किया। किसानों की सहकारी समितियों की सफलता ने राज्य के दूसरे भागों में भी ऐसी ही समितियों को जन्म दिया और यहाँ भी वे जन आंदोलनों के संगठनों के बलबूते खड़ी हुईं।

  3. केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार (1957-1959) को समाज सुधार आंदोलनों से भारी समर्थन मिला और यह पिछले दशकों के वर्ग संघर्ष तथा सहकारी आंदोलन की सफलता की नींव पर खड़ी थी। इसलिए इस कम्युनिस्ट सरकार ने केरल की सामाजिक संपदा का इस्तेमाल राज्यभर में और भी सहकारी समितियों/संस्थाओं के विकास के लिए किया। सरकार ने नारियल के छिलके, हथकरघा और ताड़ी के लिए सहकारी समितियों की स्थापना की जिससे अर्थव्यवस्था के इन क्षेत्रों का विकास हो सके और मज़दूरों के काम की परिस्थितियाँ तथा मज़दूरी बेहतर हो सके।

  4. सहकारी समितियों/संस्थाओं की स्थापना पर इसलिए भी ज़ोर दिया गया ताकि व्यापक स्तर पर रोज़गार और उच्च वेतन सुनिश्चित किया जा सके, साथहीसाथ तमाम उद्यमों की बढ़ती कार्यकुशलता तथा उत्पादकता का मतलब था कि ये सहकारी समितियाँ निजी क्षेत्र से भी मुक़ाबला कर सकती थीं।

  5. शोषित जातियों के नेताओं को सहकारी प्रणाली ने काफ़ी आकर्षित किया, उन्होंने इसे अपनी आज़ादी और मुक्ति को साकार करने के एक ज़रिए के तौर पर देखा। उदाहरण के लिए, दिसंबर 1929 में चेरमार समाजम सम्मेलन में संगठन के अध्यक्ष चाजन ने वहाँ मौजूद पुलया समुदाय के दो हज़ार सदस्यों से कहा कि ये सहकारी समितियाँ और इनके शैक्षणिक कार्यक्रम तथा शराबविरोधी अभियान उनके अपने संघर्ष के लिए बेहद अहम हैं।viii

  6. सहकारी समितियों में दी जाने वाली राजनीतिक शिक्षा ने इसके सदस्यों को यह समझने में मदद की कि वे किस चीज़ (समाजवाद) का निर्माण कर रहे हैं और यह किस तरह उस सब से अलग – और बेहतर – है जिसका निर्माण निजी क्षेत्र ने किया है (पूंजीवाद)

  7. सहकारी वित्तीय संस्थाओं के फैले हुई जाल के बिना यह पूरा क्षेत्र ही वित्तीय संसाधनों के लिए तरसता रह जाता। यह व्यवस्था भी समयसमय पर वामपंथ के सत्ता में आने पर निर्भर थी जिसने केरल के ऋण बाज़ार में बड़े पैमाने पर निजीकरण को रोका।

  8. सहकारी समितियों के लोकतांत्रिक ढाँचे और इनके सदस्यों के नवाचार ने इन्हें अपने काम में विविधता लाने और बदलते समय के अनुरूप ढलने का मौक़ा दिया। उदाहरण के लिए, जब तंबाकू सेवन की आदतों में बदलाव आने लगे तो दिनेश बीड़ी वर्कर्स सेंट्रल कोऑपरेटिव सोसाइटी ने खाद्य उत्पादन का काम करना शुरू कर दिया।

  9. केरल के सहकारी आंदोलन का एक प्रमुख तत्त्व यह है कि यह सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्ध है, यह इस बात पर ज़ोर देता है कि सहकारी संरचना का इस्तेमाल करके पितृसत्ता (महिलाओं की सहकारी समितियों के ज़रिए), जातिगत ऊँचनीच (शोषित जातियों की सहकारी समितियों के ज़रिए), आदिवासियों समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव (अनुसूचित जनजातियों की सहकारी समितियों के ज़रिए) तथा ट्रांसजेंडर समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव (ट्रांसजेंडर समुदाय की सहकारी समितियों के ज़रिए) से उबरा जा सकता है। साथ ही विकलांग जनता के लिए समानता के भाव को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

यह शोध दिखाता है कि ये सहकारी संस्थाएँ कैसे एक ऐसी आर्थिक प्रणाली के सामाजिक स्वरूप को बढ़ावा देने में सफल हुईं हैं जो पूंजीवादी दबावों का एक विकल्प देती है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा के उस प्रतिगामी स्वरूप में मज़दूरों की आजीविका की ही सबसे पहले बलि चढ़ती है जबकि मुनाफ़े को ईश्वर की जगह स्थापित कर दिया जाता है। केरल की सहकारी समितियों ने इस विचार को उलट दिया है, इसके केंद्र में श्रमिक वर्ग की ज़रूरतें और गरिमा है।

वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), ऊरालुंगल कोऑपरेटिव के कर्मचारी, 2025.

सह्या चाय सहकारी संस्था

निधीश जे विल्लाट और विजू कृष्णन

दिसंबर 2022 में हुए अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के 35वें सम्मेलन में भाग लेने वाले हर प्रतिनिधि के हाथ में सह्या चाय के एक पैकेट के साथ केरल के मशहूर मसाले इत्यादि थे। इसके महीनों बाद सम्मेलन में लिए गए फ़ैसलों के बारे में रिपोर्ट देने के लिए असम दौरे पर एक प्रतिनिधि ने चाय के ब्रांड पर गौर किया। स्थानीय प्रतिनिधियों ने इसके बारे में पूछा और दावा किया कि यह तो दुनिया भर में मशहूर असम की चाय से भी बेहतर है। उनके इस सवाल ने हमें इस ब्रांड और इसके पीछे के एकजुट प्रयास के बारे में और जानने के लिए प्रेरित किया।

5 मई 1875 को विल्हेम ब्रेक के नाम एक ख़त में कार्ल मार्क्स लिखते हैं, ‘वास्तविक प्रयास का हर एक क़दम दर्जनों कार्यक्रमों से ज़्यादा ज़रूरी है’।ix केरल के इडुक्की ज़िले के थंकमणि की पहाड़ियों में स्थित सह्या चाय सहकारी कारख़ाने की कहानी बताती है कि समाजवाद की ‘वास्तविक प्रक्रिया’ का क्या महत्त्व है। 2017 में शुरू हुए इस कारख़ाने की स्थापना थंकमणि सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड (स्थापना 1966) द्वारा की गई। यह सहकारी बैंक कामाक्षी ग्राम पंचायत में है, यहाँ अधिकतर लघु चाय उत्पादक रहते हैं, इस बैंक के 15,000 सदस्य हैं, जिनमें से ज़्यादातर छोटे किसान और मज़दूर हैं। थंकमणि सहकारी चाय कारख़ाने में ज़्यादातर काली, हरी और कई मिश्रित चायपत्तियों का उत्पादन होता है।

सहकारी बैंक और चायपत्ती कारख़ाने को केरल के कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले सहकारी आंदोलन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखासमझा जाना चाहिए।x रूस में 1917 में हुई अक्टूबर क्रांति का केरल के प्रगतिशील आंदोलनों पर बहुत प्रभाव पड़ा और राष्ट्रीय आंदोलन में इनकी दिशा को इसने काफ़ी प्रभावित किया। 1934 में इन आंदोलनों के सबसे मज़बूत हिस्सों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। पाँच साल बाद इस पार्टी की केरल इकाई ने ख़ुद को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की केरल इकाई में बदल लिया, इसी ने आगे चलकर इस क्षेत्र में एआईकेएस और अन्य कई मज़दूर संगठन बनाए। इसी पृष्ठभूमि के साथ इस दौर में एआईकेएस और अन्य प्रगतिशील ताक़तें सहकारी आंदोलन में दाखिल हुईं तथा 1930 और 1940 के दशक में जो वर्ग संघर्ष उफ़ान पर था उससे सहकारी आंदोलन को अलग रखने की ब्रिटिश रणनीति का सामना किया। मसलन, ईएमएस बताते हैं कि पीपल्स वॉर (1941-1945) [फ़ासीवादी जर्मनी और सैन्यवादी जापान के विरुद्ध जनयुद्ध] के दौरान कम्युनिस्टों ने साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार को मजबूर किया कि वह ज़मींदारों से अनाज ले और राशन की दुकानों के ज़रिए जनता में बाँटे, यही प्रणाली आगे चलकर उत्पादकों और उपभोक्ताओं की सहकारी समितियों के रूप में विकसित हुईं।xi केरल में कम्युनिस्टों ने सहकारी समितियों को वर्ग संघर्ष के विस्तार के रूप में देखा, यह रोचडेल आदर्शोंxii से निकले सहकारी समितियों के परोपकारी उपनिवेशवादी विचार से अलग था जो 1844 से सहकारी समितियों के प्राथमिक दिशानिर्देश के तौर पर स्थापित था।xiii

1943 में एआईकेएस के सातवें अधिवेशन में पारित सहकारी समितियों से जुड़े प्रस्ताव से ही तय हो चुका था कि साम्राज्यवाद का विरोध करने वाले एक मज़बूत श्रमिक वर्ग का संगठन तैयार करने और सहकारी समितियों के निर्माण में द्वंद्वात्मक संबंध है। इस प्रस्ताव में एआईकेएस के काडर का आह्वान किया गया कि वे किसानों के आर्थिक और सामाजिक दमन से लड़ने की रणनीति के तौर पर सहकारिता की दिशा में कदम उठाएँ। इस प्रस्ताव में पेश विचारों में और ख़ासतौर से ईएमएस का ‘संगठन – मशीन नहीं’ शीर्षक वाले नोट में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि सहकारी समितियाँ कहीं ‘अमूर्त राजनीति’ में फँस न जाएँ इसलिए एक सशक्त वर्गीय संगठन की ज़रूरत है। इसके साथ ही इन दस्तावेज़ों ने सहकारी समितियों के निर्माण के विषय में होने वाली आगामी चर्चाओं के लिए महत्त्वपूर्ण ख़ाका भी प्रदान किया।

जब तक कम्युनिस्ट और सहकारी आंदोलन के नेता अक्टूबर 1956 में त्रिस्सूर में इकट्ठा हुए तब तक ध्यान 1943 में रखी गई सैद्धांतिक नींव से केरल में इस नींव को अमल में लाने की व्यावहारिक चुनौतियों पर जा चुका था।xiv मीटिंग में शामिल लोगों ने केरल में सहकारी समितियों की गतिविधियों का जायज़ा लिया और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बुर्जुआ जमींदारी व्यवस्था के भ्रम की आलोचना की, जिसका मानना था कि सिर्फ सहकारी समितियों की स्थापना से ही समाजवाद आ जाएगा। मीटिंग में मौजूद लोगों ने कहा कि कम्युनिस्टों को सहकारी समितियों के गठन के काम में सचेत होकर शामिल होना होगा और इनमें तथा अन्य जन संगठनों में बड़ी संख्या में कामकाजी लोगों को जोड़ना होगा ताकि इस प्रक्रिया में उन्हें राजनीतिक शिक्षा देना सुनिश्चित किया जा सके। सफल सहकारी ग्रामीण ऋण समितियों और बैंकों का उल्लेख किया गया जिन्होंने महाजनों के शिकंजे को तोड़ा था और कृषि उत्पादन को बेहतर करके किसानों और खेत मज़दूरों की आय बढ़ाई थी। इन सहकारी समितियों को असफल समितियों से अलग करने वाली बात यह थी कि कम्युनिस्टों ने यह सुनिश्चित किया कि ये उन प्रतिक्रियावादियों द्वारा हथिया न ली जाएँ जो ग्रामीण सत्ता के पुराने रूपों को बनाए रखने की कोशिश करते थे।

छोटे चाय बागान मालिकों का उदय

1990 के दशक के अंत में चाय उद्योग में एकाधिकार पूंजी (मोनोपोली कैपिटल) के लाभ के जुनून से प्रेरित एक व्यापक पुनर्गठन हुआ जिसके तहत विलय और अधिग्रहण किए गए और ब्रांड निर्माण पर आक्रामक रूप से ज़ोर दिया गया। यूनिलीवर और टाटा जैसी बड़ी कंपनियों—जिन्हें बिग टी के नाम से जाना जाता है—ने कृषि उत्पादन से सीधे संबंध तोड़ लिए और चाय एस्टेट के स्वामित्व और प्रबंधन से अपना निवेश हटा लिया। उदाहरण के लिए, मार्च 2000 में टाटा ने टेटली ग्रुप, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चाय निर्माता और वितरक कंपनी, को £271 मिलियन में अधिग्रहित कर लिया।xv टाटा और यूनिलीवर दोनों, जो दुनिया की सबसे बड़ी चाय कंपनी है, ने विभिन्न स्वाद और मूल्य सीमा वाली नई ब्रांडेड चाय—जिसमें क्रश, टियर एंड कर्ल (CTC) के साथसाथ मिश्रित चाय उत्पाद भी शामिल हैं—बनाने और उनकी मार्केटिंग करना शुरू किया।

यह परिवर्तन चाय उगाने और प्रॉसेस करने वाले चाय एस्टेटों में वित्तीय संकट के साथ आया था, जिनका प्रबंधन काफी हद तक गैरएकाधिकार पूंजी द्वारा किया जाता है। अधिकांश एस्टेट छोटी फर्मों को बेच दिए गए, लेकिन एकाधिकार कंपनियों ने अनुबंधात्मक खंडों के माध्यम से अपनी आपूर्ति सुरक्षित कर ली जिससे उन तक पर्याप्त अनप्रासेस्ड चाय पहुँचने की गारंटी बनी रही। जैसा कि प्रोफेसर नताली लैंगफोर्ड ने देखा, उद्योग ऊर्ध्वाधर एकीकरणसे मूल्य श्रृंखलाओं की ओर शिफ़्ट हो गया, जिसमें फर्मों ने कम मूल्य वर्धन करने वाली गतिविधियों को आउटसोर्स करके अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को बढ़ाने की कोशिश की।xvi व्यवहार में बिग टी ने कृषि उत्पादन और एस्टेट प्रबंधन को श्रृंखला की सबसे परेशानी वाली कड़ी माना क्योंकि वे श्रम और पर्यावरण कानून द्वारा भारी रूप से विनियमित थे, और वर्ग संघर्ष से बचने के लिए कंपनियों ने इन क्षेत्रों से अपने आप को दूर रखना चाहा। इसके बजाय उन्होंने उच्च मूल्य वर्धित गतिविधियों जैसे मिश्रण, पैकिंग, ब्रांडिंग, वितरण और बिक्री पर नियंत्रण मज़बूत किया। इस बीच छोटे चाय बागान मालिक चाय पत्तियों के मुख्य उत्पादक के रूप में उभरे: उनकी भागीदारी 1991 में 7% से बढ़कर 2022 में 52% हो गई और अनुमान है कि 2030 तक यह 70% तक पहुँच जाएगी।

सह्या चाय सहकारी संस्था फ़ैक्ट्री के गठन से पहले इडुक्की क्षेत्र के लगभग 3,500 छोटे चाय बागान मालिक टाटा और एवीटी बेवरेजेज (दक्षिण भारत की एक प्रमुख चाय कंपनी) जैसी एकाधिकार फर्मों द्वारा चलाए जा रहे एक तंत्र के चंगुल में फँसकर काम कर रहे थे। ये बड़ी कंपनियाँ किसानों और एजेंटों‘ (बिचौलिये जो अक्सर फ़ैक्ट्रियों की ओर से ख़रीदार के रूप में काम करते हैं, आमतौर पर छोटे किसानों से चाय की पत्तियाँ तोड़ने पर कमीशन लेते हैं) दोनों से एक मनमानी दर और अपमानजनक नियमों व शर्तोंपर ग्रीन लीफ (ताज़ी तोड़ी गई अनप्रासेस्ड चाय पत्तियां) खरीदती थीं, ऐसा किसानों के एक समूह ने हमें बताया। कई किसानों ने हमारे साथ ऐसी कहानियाँ साझा कीं कि अगर वे उचित मूल्य के लिए मोलभाव करते तो कंपनियाँ बहाने बनाकर उनकी ग्रीन लीफ लेने से मना कर देतीं, और किसानों को जो पत्तियाँ दूर से लेकर आते थे, उन्हें फेंकने या खाद के रूप में उपयोग करने के लिए मजबूर कर दिया। निराश किसानों के अपने ठुकराए हुए माल के साथ ट्रैक्टर पर घर लौटने के दृश्य आम थे। सुनियोजित तरीक़े से माल लेने से मना करने का यह तरीक़ा इसलिए अपनाया गया कि एक आज्ञाकारी किसान वर्ग बनाया जा सके जो कम क़ीमत पर अपनी फसलें कंपनियों को बेचने का आदी हो जाए। पूरा तंत्र बड़ी कंपनियों के लिए अत्यंत अनुकूल था।

सफल सहकारी कार्रवाई की अनुपस्थिति में व्यापारिक एजेंट आमतौर पर पूरे भारत में छोटे बागान मालिकों से ग्रीन लीफ के प्रति किलो 15%–20% का कमीशन वसूलते हैं। इसका एक बड़ा हिस्सा बॉट लीफ टी फ़ैक्ट्रियों को बेचा जाता है जो ख़ुद की उगाई पत्तियों के बजाय ख़रीदी गई पत्तियों से चाय प्रॉसेस करती हैं। एक और हिस्सा कभीकभी बड़े बागानों के स्वामित्व वाली चाय एस्टेट फ़ैक्ट्रियों को बेचा जाता है। व्यापारिक एजेंट पत्तियों की गुणवत्ता और मूल्य का मूल्यांकन उनकी फाइन लीफ काउंट‘ (नई, कोमल पत्तियों और कलियों का अनुपात, जो चाय की समग्र गुणवत्ता निर्धारित करता है) के आधार पर बहुत व्यक्तिपरक तरीके से करते हैं, जिससे छोटे किसानों के हितों से समझौता होता है।xvii

बॉट लीफ टी फैक्ट्रियाँ आमतौर पर अपनी प्रासेस्ड चाय नीलामी करके बेचती हैं। चूंकि प्रक्रिया बिग टी कंपनियों (प्राथमिक खरीदार) द्वारा नियंत्रित होती है, चाय कम कीमतों पर बेची जाती है।xviii भारत में पूरी नीलामी व्यवस्था इस तरह से बनाई गई है कि नवशास्त्रीय अर्थशास्त्र की मूल अभिधारणा कि आपूर्ति और मांग की अंत:क्रिया कीमतों को निर्धारित करती है एक मज़ाक प्रतीत होती है। दूसरी ओर एस्टेट फैक्ट्रियाँ आम तौर पर अपनी प्रासेस्ड चाय का केवल आधा हिस्सा नीलामी में बेचती हैं, जैसा कि 1983 के टी मार्केटिंग कंट्रोल ऑर्डर (जो स्वयं 1953 के टी एक्ट के तहत है) में दिए गए नियमों के तहत अनिवार्य है, और दूसरा आधा हिस्सा अधिक लाभदायक निजी चैनलों के माध्यम से बेचती हैं।

नीलामी में भाग लेने वालों में प्रमुख चाय पैकिंग कंपनियाँ, व्यापारिक एजेंट और अन्य अग्रणी पैकेट चाय ब्रांड शामिल होते हैं। चूंकि ये कंपनियाँ फिर चाय को मिश्रित करने, छाँटने, श्रेणीबद्ध करने और पैक करने जैसी मूल्य वर्धित प्रक्रियाएं करती हैं, इससे पहले कि इसे उपभोक्ताओं को वितरित किया जाए, छोटे चाय बागान मालिक, जो मूल्य श्रृंखला के निचले सिरे पर हैं, चाय पर उपभोक्ता ख़र्च का एक असंगत रूप से कम हिस्सा प्राप्त करते हैं लगभग 15%। दूसरी ओर, चाय पैकिंग कंपनियाँ, जो ज़्यादातर बड़ी एकाधिकार कंपनियाँ हैं, चाय पर उपभोक्ता ख़र्च का 50% प्राप्त करती हैं। इसीलिए छोटे चाय बागान मालिकों के लिए मूल्य श्रृंखला में ऊपर चढ़ना और बेहतर कीमतें पाने के लिए सीधे बाज़ार तक पहुँच प्राप्त करना अनिवार्य है।xix इसीलिए सह्या चाय सहकारी संस्था बिग टी के क्षेत्र में प्रवेश करने का साहसिक क़दम उठाने की कोशिश कर रही है।

सहकारी चाय

किसानों के सामने आने वाली कठिन परिस्थितियों ने ही एआईकेएस सदस्यों को 2017 में सह्या चाय सहकारी संस्था का गठन करने के लिए प्रेरित किया। प्रतिदिन 15,000 किलो ग्रीन लीफ प्रासेस करने के लिए डिज़ाइन की गई, सह्या चाय सहकारी संस्था 150 से अधिक श्रमिकों के लिए रोज़गार पैदा करती है, जिनमें से अधिकांश कृषि श्रमिक वर्ग और किसान वर्ग से हैं, साथ ही यह छोटे चाय बागान मालिकों से किसानों के हितों की रक्षा भी करती है। जब हमने सितंबर 2023 में सहकारी फ़ैक्ट्री और उसके कैचमेंट क्षेत्र का दौरा किया, तो हमारा ध्यान छोटे चाय बागान मालिकों में दिखने वाले आत्मविश्वास ने खींचा।

इस सहकारी संस्था के पहले तीन वर्ष, 2017 से 2020, चुनौतीपूर्ण थे: न केवल उसे 12% ब्याज पर लिए गए बड़े ऋण का भुगतान शुरू करना था, बल्कि इसने कई चुनौतियाँ भी सही, जैसे 2018 की केरल बाढ़ और कोविड-19 महामारी (2020–2023)। इन सभी वित्तीय चुनौतियों के बावजूद यह सहकारी संस्था ग्रीन लीफ की ख़रीद करने और किसानों को 12 रुपये प्रति किलो (कॉर्पोरेट दर 7 रुपये प्रति किलो से कहीं अधिक) का भुगतान करने में सक्षम थी। सहकारी संस्था द्वारा दी जाने वाली स्थिर क़ीमतों ने कॉर्पोरेट चाय आपूर्तिकर्ताओं को मजबूर किया कि वे छोटे चाय बागान मालिकों को ऊँची दरें दें।

सहकारी संस्था के नेतृत्व ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार के तरीक़ों पर विचारविमर्श करने के लिए किसानों और श्रमिकों को इकट्ठा किया। चूंकि बिग टी कंपनियाँ अपने पैकेज्ड चाय उत्पादों के साथ बाज़ार पर हावी थीं, उन्होंने अपनी मार्केटिंग रणनीति में सुधार करने और बाज़ार में पैठ बनाने का अभियान शुरू करने का फैसला किया। केएस चित्रा, एक लोकप्रिय गायिका जिन्हें केरल की कोकिलाके नाम से जाना जाता है, सह्या चाय सहकारी संस्था की ब्रांड एम्बेसडर बनीं और अपने काम के लिए कोई भुगतान लेने से इनकार करते हुए इसके ब्रांड को लोकप्रिय बनाने में मदद की। बाज़ार में अपनी उपस्थिति मज़बूत करने के लिए सहकारी संस्था ने केरल की सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जैसे सप्लाईको (केरल राज्य नागरिक आपूर्ति निगम) और कंज्यूमरफेड (केरल राज्य सहकारी उपभोक्ता महासंघ), के साथसाथ पुलिस कैंटीन को सामान उपलब्ध कराने वाली प्रणाली का भी उपयोग किया।

इस सहकारी चाय संस्था को राज्य से अन्य प्रकार का समर्थन भी प्राप्त हुआ, जैसे 2020–2021 में जब केरल की राज्य सरकार ने महामारी के दौरान वितरित खाद्य किट के लिए सह्या चाय ख़रीदी। इन रचनात्मक मार्केटिंग तंत्रों और राज्य सहायता के परिणामस्वरूप, इस सहकारी संस्था ने अपने चौथे वर्ष (2020–2021) में लाभ कमाया और ग्रीन लीफ के लिए 18 रुपये प्रति किलो का भुगतान करना शुरू किया और कमाए मुनाफ़े को पत्तियाँ देने वाले किसानों को प्रोत्साहन के रूप में वितरित किया। इसने एक ऐतिहासिक मिसाल कायम की: पहली बार, किसानों को उनके योगदान का न्यायसंगत पारिश्रमिक मिला।

वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), उदयपुरम कोऑपरेटिव के कर्मचारी, 2025.

ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी

नजीब वीआर

1925 में, दक्षिणपश्चिम भारत में साम्यवादी आंदोलन के मज़बूत होने से पहले, समाज सुधारक वयलेरी कुन्हिकन्नन गुरुक्कल, जिन्हें श्री वाग्भडानंद गुरु (1885–1939) के नाम से भी जाना जाता है, के अनुयायियों ने निर्माण श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए ऊरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी (यूएलसीसीएस) की स्थापना की। आज, यूएलसीसीएस एशिया की सबसे बड़ी श्रमिक सहकारी संस्था है। 2021 की वर्ल्ड कोऑपरेटिव मॉनिटर सूची में उद्योग और बुनियादी सेवाओं से जुड़े सहकारी संस्थानों में इसे दूसरे स्थान पर रखा गया। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की भारत में रेज़िडेंट कोऑर्डिनेटर लिसे ग्रांडे, इसे एक मॉडल सहकारी संस्थान कहती हैं, जिसकी सफलता ‘दुनिया के लिए प्रेरणादायक है’।xx मज़दूरों के एक समूह से उत्पन्न होकर, उत्तरी केरल के मालाबार के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित यूएलसीसीएस आज सड़कों, पुलों, इमारतों और सॉफ़्टवेयर प्रणालियों का निर्माण करती है। सामाजिक सद्भाव और समावेशन के साथसाथ श्रमिकों के बीच सहयोग के प्रति इसकी प्रतिबद्धता ने इसे सामाजिक सेवाओं के उन क्षेत्रों में सफल बनाया है जो अक्सर सहकारी संस्थाओं के लिए चुनौतीपूर्ण होती हैं।

यूएलसीसीएस की स्थापना उस समय हुई, जब रोज़ीरोज़गार पाना बहुत कठिन था और जाति तथा वर्ग के भेदभाव पहले से भी अधिक कठोर थे। 1917 में श्री वाग्भडानंद गुरु के अनुयायियों ने ‘आत्म विद्या संघम’ की स्थापना की। इसके सदस्यों ने 1922 में यूनाइटेड क्रेडिट कोऑपरेटिव की स्थापना की, ताकि यदि उनमें से किसी को ऋण बाज़ार में — जो प्रभावशाली जातियों द्वारा नियंत्रित था — भेदभाव के कारण आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़े, तो वे एकदूसरे की सहायता कर सकें। उन्होंने अपने बच्चों के लिए एक विद्यालय स्थापित किया, जिन्हें क्षेत्र की प्रमुख जातियों द्वारा शिक्षा से वंचित किया गया था। वाग्भडानंद की सलाह पर उन्होंने 1924 में दैनिक वेतनभोगी मज़दूरों की सहायता के लिए एक संगठन बनाने का निर्णय लिया, ताकि उच्च जातियों द्वारा लगाए गए उन श्रम प्रतिबंधों को दरकिनार किया जा सके, जो जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई को रोकने के लिए लगाए गए थे।

इसके बाद, 13 फरवरी 1925 को मज़दूरों ने ‘ऊरालुंगल लेबरर्स म्यूचुअल ऐड एंड कॉपरेटिव सोसाइटी (अब यूएलसीसीएस) की स्थापना की। धीरेधीरे, अधिक से अधिक मज़दूर यूएलसीसीएस से जुड़ते गए, और आज यह केरल के कोनेकोने में फैल चुकी है।

अपने शुरुआती वर्षों में, यूएलसीसीएस शायद ही कभी ठेके हासिल कर पाती थी, और जब ठेके मिलते भी थे, तो टेंडर की राशि बहुत ही कम तय की जाती थी। प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए, यूएलसीसीएस निजी ठेकेदारों की तुलना में 27.5% कम बोली लगाती थी। इससे कुछ ठेके तो मिल जाते थे, लेकिन लाभ बहुत ही कम होता था। सड़क निर्माण और बड़े प्रोजेक्ट्स के अनुभव की कमी के कारण कई समस्याएँ भी आईं। फिर भी इस सहकारी संस्था ने छोटे स्थानीय सरकारी ठेकों और अपने अपेक्षाकृत संपन्न सदस्यों से प्राप्त अल्पकालिक ऋणों के बूते ख़ुद को संभाले रखा। यूएलसीसीएस को ग्रामीण मालाबार में प्रचलित माइक्रोफाइनेंस के परंपरागत तरीक़ों जैसे ‘पयट्ट’ और ‘कुरिक्कल्याणम’xxi से भी आर्थिक सहायता मिली।

समय के साथ, यूएलसीसीएस के मज़दूरों ने अपने कौशल में सुधार किया और व्यापार में दक्षता हासिल की। दक्षता और काम की गुणवत्ता बढ़ने से बड़े और लाभदायक ठेके मिलने लगे। उनके कामकाज की नैतिकता ने केरल के निर्माण उद्योग में उत्कृष्टता की एक नई संस्कृति विकसित की। 1940 के दशक तक, यूएलसीसीएस को मालाबार कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक से धन मिलने लगा और जनता द्वारा यूएलसीसीएस योजनाओं में फिक्स्ड डिपॉज़िट भी जमा किए जाने लगे।

पिछली एक सदी में, यूएलसीसीएस एक ऐसे समूह से विकसित हुई, जिसकी प्रारंभिक पूंजी केवल 0.37 रुपये (1925 में 0.13 डॉलर) थी, और 2023 में इसकी वार्षिक आय 25 अरब रुपये (30 करोड़ डॉलर) पहुँच गई। इसमें 18,000 मजदूर हैं, जिनमें 1,000 से अधिक इंजीनियर और 1,200 तकनीशियन शामिल हैं। यह सहकारी संस्था न केवल अपने श्रमिकों और समुदाय के कल्याण को आगे बढ़ाती है — और संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों में से 13 को पूरा करती है — बल्कि उचित लागत पर उच्च गुणवत्ता और समय पर काम पूरा करना भी सुनिश्चित करती है। इन कारकों, और यूएलसीसीएस की आधुनिक निर्माण तकनीकों के साथ, यह निजी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर पाती है और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा केरल सरकार के बड़े ठेके हासिल करती है। अब तक यूएलसीसीएस 7,500 से अधिक प्रमुख परियोजनाएँ पूरी कर चुकी है और वर्तमान में 6.5 अरब रुपये मूल्य की 500 परियोजनाओं पर कार्य कर रही है। सहकारी मॉडल के कारण, यह अपने श्रमिकों को निजी और सरकारी क्षेत्रों से भी बेहतर वेतन देती है।

श्रमिकों की आकांक्षाओं के अनुसार आगे बढ़ने की अपनी प्रतिबद्धता के तहत, यूएलसीसीएस ज्ञानआधारित अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में भी प्रवेश कर चुकी है, जैसे सॉफ्टवेयर विकास। अब यह निर्माण श्रमिकों का सहकारी समूह ही नहीं रह गई है, बल्कि आगे बढ़कर शहरों और कार्यक्षेत्रों की चुनौतियों को पूरा करने वाले कई क्षेत्रों में काम कर रही है। इसने इन क्षेत्रों में क़दम बढ़ाए हैं:

  1. यूएल साइबरपार्क, कोझिकोड— भारत के सहकारी क्षेत्र का पहला साइबरपार्क, और केंद्र सरकार के तटीय आर्थिक क्षेत्रों का हिस्सा।

  2. यूएल टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस— यूएल साइबरपार्क में स्थित एक नेक्स्ट जेनरेशन डिजिटल सॉल्यूशन कंपनी।

  3. इंरीगल में कला और शिल्प ग्राम सर्गालया; केरल कला एवं शिल्प ग्राम(कोवलम)। ये कला और शिल्प गाँव यूएलसीसीएस द्वारा केरल सरकार की ओर से संचालित किए जाते हैं और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों के लिए हस्तशिल्प उत्पादन में कारीगरों की सहायता करते हैं।

  4. यूएल हाउसिंग— सहकारी संस्था की निर्माण विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए यूएलस्पेसयूएस ब्रांड के तहत आवासीय परियोजनाएँ। पहली इमारत ‘वन एंथम’ यूएल साइबरपार्क में स्थित है।

  5. मैटर लैब— उच्चतकनीकी मैटर मटेरियल टेस्टिंग एंड रिसर्च लेबोरेटरी, जिसकी स्थापना 2021 में टिकाऊ निर्माण सामग्री विकसित और परीक्षण करने के लिए की गई।

  6. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफ्रास्ट्रक्चर एंड कंस्ट्रक्शन— यूएलसीसीएस केरल सरकार की ओर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से इसका प्रबंधन करती है।

  7. यूएल एजुकेशन— विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से छात्रों के कौशल का विकास:

    1. मदप्पल्ली अकादमिक प्रोजेक्ट

    2. वाग्भडानंद शिक्षा परियोजना

    3. छात्रों के लिए स्कॉलास्टिक एक्सीलेंस प्रोग्राम

    4. यूएस स्पेस क्लब (नवोदित अंतरिक्ष यात्रियों के लिए)

    5. यूएलसीसीएस सेंचुरी एल स्कूल — मुट्टुंगल में स्थित निम्न प्राथमिक विद्यालय जो केजी से 4वीं कक्षा तक की शिक्षा प्रदान करता है।

  8. यूएलसीसीएस चैरिटेबल एंड वेलफेयर फाउंडेशन (यूएल केयर) — इसकी तीन प्रमुख पहलकदमियाँ हैं:

    1. स्पेशल चाइल्ड के लिए प्रशांति स्कूल

    2. बौद्धिक रूप से दिव्यांग वयस्कों के लिए नायनार सदनम व्यावसायिक प्रशिक्षण व प्लेसमेंट संस्थान

    3. मडित्तट्टु जेरिएट्रिक (वृद्धावस्था संबंधी चिकित्सा) सेंटर

  9. यूएल इनसाइट — एक प्रबंधन सलाहकार फर्म, जिसे इंसाइट एडवाइजरी एंड कंसल्टिंग इंडिया के साथ मिलकर चलाया जाता है।

एक श्रमिक सहकारी संस्था होने के नाते, यूएलसीसीएस ग़ैरश्रमिकों को सदस्य बनने की अनुमति नहीं देती। इसका बोर्ड — जिसे श्रमिकों द्वारा चुना जाता है और जो उनका प्रतिनिधित्व करता है — तेरह निदेशकों से बना है। प्रत्येक निदेशक के पास निर्माण उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में तीस से पैंतीस वर्षों का अनुभव है। प्रत्येक कार्यस्थल, जिसमें परियोजना प्रबंधन भी शामिल है, की निगरानी एक बोर्ड सदस्य द्वारा की जाती है, जो प्रत्येक दिन के अंत में कार्य का मूल्यांकन करते हैं।

नवीन एस. (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), दिनेश कोऑपरेटिव के दर्ज़ी, 2025.

केरल में सहकारी ऋण संस्थाएँ

अश्वथी रेबेका असोक

सहकारी ऋण संस्थाएँ— जिनमें सदस्यों का समान स्वामित्व होता है और जो ग्रामीण तथा हाशिए के लोगों को सस्ता ऋण व वित्तीय सेवाएँ प्रदान करती हैं — केरल में 1956 में राज्य के गठन से पहले ही स्थापित हो चुकी थीं। ये मुख्य रूप से छोटे किसानों और श्रमिकों की मदद करती हैं, ख़ासकर वहाँ जहाँ निजी वाणिज्यिक बैंक मौजूद नहीं होते या अपर्याप्त होते हैं। केरल में, इन संस्थाओं ने भूमि सुधार के लाभार्थियों को सहारा देने और भूमि स्वामित्व को फिर से जड़ जमाने से रोकने में ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, तिरुवनंतपुरम सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक की स्थापना 1915 में उस इलाक़े में उभर रहे सहकारी क्षेत्र को वित्त उपलब्ध कराने के लिए की गई थी। बाद में, उत्तरी मालाबार क्षेत्र और कोचीन में भी इसी तरह की सहकारी ऋण संस्थाएँ स्थापित की गईं। 1956 में, तिरुवनंतपुरम सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक को केरल स्टेट कोऑपरेटिव बैंक में बदल दिया गया, जिसने नए राज्य की सहकारी ऋण संस्थाओं को आधार प्रदान किया। आज, केरल में 4,146 सहकारी ऋण संस्थाएँ हैं, जो राज्य की कुल क़र्ज़ देने वाली संस्थाओं का एकतिहाई से भी अधिक हिस्सा हैं।xxii इन संस्थाओं ने विशेष रूप से ग्रामीण केरल में लोगों को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

उदाहरण के लिए, जब कम्युनिस्ट मंत्रालय ने 1957 में भूमि सुधार शुरू किए, तो भूमि प्राप्त करने वाले छोटे किसानों को खेती शुरू करने के लिए पूंजी की आवश्यकता थी, लेकिन निजी क्षेत्र से पर्याप्त मात्रा में ऋण उपलब्ध नहीं था। सहकारी ऋण संस्थाओं ने आगे आकर आवश्यक पूंजी प्रदान की, जिससे किसानों को साहूकारों और सामंती वर्ग से उधार लेने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यदि ये संस्थाएँ मौजूद न होतीं, तो केरल में वितरित की गई भूमि का एक बड़ा हिस्सा बंधक के रूप में पुनः सामंती वर्ग और साहूकारों के पास चला गया होता।

हालाँकि ग्रामीण केरल में निजी वाणिज्यिक बैंकिंग का विस्तार हुआ है, फिर भी सहकारी ऋण संस्थाएँ एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की कवरेज के मामले में केरल भारत का पाँचवाँ सर्वश्रेष्ठ राज्य है, फिर भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इन शाखाओं के फैलाव में बड़ा अंतर है। भारतीय रिज़र्व बैंक के 2024 के आँकड़ों के अनुसार केवल 5.3% शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, जबकि 22.5% शहरी क्षेत्रों में और 72.2% अर्धशहरी क्षेत्रों में हैं।xxiii यदि सहकारी ऋण संस्थानों को भी शामिल कर लिया जाए, तो राज्य में 25% बैंक शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

सहकारी ऋण संस्थाओं की संरचना

केरल का सहकारी ऋण क्षेत्र दो समानांतर प्रणालियों पर आधारित है:

  1. अल्पकालिक सहकारी संस्थाएँ, जो कृषि के लिए मौसमी कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान करती हैं।

  2. दीर्घकालिक सहकारी संस्थाएँ, जो ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और कृषि विकास के लिए निवेश ऋण प्रदान करती हैं।

प्रत्येक प्रणाली की अपनी संस्थागत संरचना है, जिसमें गाँव, ज़िला और राज्य स्तर पर बैंक शामिल हैं।

अल्पकालिक सहकारी संस्थाएँ काफ़ी पुराने समय से तीनस्तरीय संरचना के माध्यम से संचालित होती रही हैं—गाँव स्तर पर प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ (पीएसीएस), ज़िला स्तर पर ज़िला सहकारी बैंक, और राज्य स्तर पर केरल स्टेट कोऑपरेटिव बैंक। 2019 में, इस संरचना को सरल बनाने के मक़सद से इसे द्विस्तरीय रूप दिया गया और ज़िला व राज्य स्तरीय बैंकों को मिलाकर एक इकाई के रूप में केरल बैंक बना दिया गया। इस सरल संरचना से पूरी प्रणाली का एकीकरण बढ़ा और अल्पकालिक सहकारिता की कार्यक्षमता में वृद्धि हुई। इस तरह एक पिरामिड तैयार हुआआधार के रूप में पीएसीएस और शीर्ष पर केरल बैंक।

दीर्घकालिक सहकारी संस्थाओं की एक अलग संरचना है, जिसकी अगुआई राज्य स्तर पर केरल स्टेट कोऑपरेटिव एग्रीकल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक करता है, तथा ज़िला और ब्लॉक स्तरों पर प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक इसका सहयोग करते हैं।

पीएसीएस, अल्पकालिक सहकारी संस्थाओं की बुनियाद हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘सोसाइटी’ कहा जाता है। केरल के हर गाँव में कम से कम एक पीएसीएस होती है। ये ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे सुलभ और सुपरिचित वित्तीय संस्थाएँ हैं। ये राज्य के व्यापक सहकारिता आंदोलन की आधारशिला हैं। 2022 में 3.03 करोड़ सदस्यों के साथ, केरल की पीएसीएस पूरे भारत में सबसे अधिक सदस्यता रखती हैं — पश्चिम बंगाल की तुलना में दोगुने से भी अधिक।xxiv

यह विशाल सदस्यता आधार पीएसीएस को 1.217 अरब रुपये की जमा राशि जुटाने में सक्षम बनाता है, जो पूरे भारत की पीएसीएस की कुल जमा राशि का दोतिहाई से अधिक है।xxv वाणिज्यिक बैंकों से ऋण न ले पाने वाले ग़रीब और हाशिए के लोगों को वित्तीय मदद पहुँचाने में पीएसीएस की अहम भूमिका को, केरल में हुए कई ज़मीनी अध्ययनों ने भी रेखांकित किया है।xxvi इन अध्ययनों से पता चलता है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूह पीएसीएस को अपनी ‘मित्रवत पड़ोसी संस्था’ मानते हैं और वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में इन्हें अधिक सुलभ पाते हैं। ग्रामीण केरल के 50% निम्नआय वाले परिवार सहकारी क्षेत्र से ऋण लेते हैं, जबकि केवल 25% वाणिज्यिक बैंकों से उधार लेते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत ग़रीब परिवारों की पीएसीएस पर निर्भरता अन्य सामाजिकआर्थिक श्रेणियों के लोगों की तुलना में अधिक पाई गई है। अध्ययनों में इन ग़रीबों और वाणिज्यिक बैंकों के बीच मौजूद अनेक बाधाओं की भी चर्चा की गई है।

इन वित्तीय सहकारी समितियों की कुछ विशिष्टताएँ इन्हें हाशिए पर रहने वाली आबादी के लिए आसानी से सुलभ बनाती हैं जैसे ग्राहकों, कर्मचारियों और निदेशक मंडल के सदस्यों का आपसी परिचय तथा स्थानीय क्षेत्र में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को सदस्यता प्राप्त करने का अधिकार। दूसरी तरफ़ जटिल फॉर्म, पेचीदा प्रक्रियाएँ, और यहाँ तक कि वाणिज्यिक बैंक कर्मचारियों का पहनावा और उनका परिष्कृत व्यवहार अक्सर ग़रीबों में वाणिज्यिक बैंकों के प्रति ‘परायेपन’ की भावना पैदा करता है।

केरल में सहकारी ऋण समितियों की वह क्षमता, जिसके माध्यम से वे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को साहूकारों के चंगुल और शोषण से मुक्त कर सकती हैं, पलक्कड़ जिले में स्थित मन्नारक्काड ग्रामीण सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड की कहानी से ज़ाहिर होती है।

मन्नारक्काड ग्रामीण सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड (एमआरएससीबी)

एमआरएससीबी ने 1989 में केवल 305 सदस्यों और 30,000 रुपये की अंश पूंजी (शेयर कैपिटल) के साथ शुरुआत की। पिछले तीन दशकों में इसने ज़बरदस्त प्रगति की और आज इसमें 16,000 से अधिक सदस्य हैं, 4 करोड़ रुपये की अंश पूंजी है, और 7.5 अरब रुपये का वार्षिक कारोबार है। 1994 से अब तक इसने कुल 2.7 अरब रुपये की जमा पूंजी जुटाई है, 2.5 अरब क़र्ज़ प्रदान किया और लगातार लाभ कमा रहा है। यह अपने सदस्यों को 25% लाभांश देता है, जो केरल कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट द्वारा स्वीकृत अधिकतम दर है।

2018 में, बैंक ने मुट्टुत्ते मुल्ला (आपके आँगन में चमेली) नामक एक माइक्रोफाइनेंस योजना शुरू की, जो बैंक के पास रहने वाले ग़रीब ग्रामीणों के लिए बनाई गई थी, ताकि उन्हें अवैध साहूकारों और निजी माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से बचाया जा सके, जो अत्यधिक ब्याज दरें वसूलती हैं। इस योजना के तहत, व्यक्ति को रियायती दर पर बैंक से ऋण मिलता है, जिससे वह साहूकारों से लिए पुराने क़र्ज़ों को चुकता कर सकता है। इस योजना को कुडुम्बश्री नेबरहुड समूहों के सहयोग से लागू किया गया है, जिन्हें ज़रूरतमंदों की पहचान करने, ऋण वितरित करने, और उधारकर्ताओं से उनके घरघर जाकर साप्ताहिक किस्तें एकत्र करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। इस योजना की सफलता को देखते हुए, केरल सरकार ने इसे राज्य स्तर पर अपनाया और पीएसीएस के माध्यम से पूरे राज्य में लागू करने का निर्णय लिया।

पल्लियाक्कल सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (पीएससीबी)

पल्लियाक्कल सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (पीएससीबी) की स्थापना 1943 में एर्नाकुलम ज़िले के एझिक्करा ग्राम पंचायत में की गई थी। मुख्यतः एक कृषि प्रधान गाँव, एझिक्करा अपनी पोक्कालि चावल (इसकी खेती खारे पानी में होती है) की खेती और मत्स्य पालन के लिए जाना जाता है, जो स्थानीय समुदाय के आय के प्रमुख स्रोत हैं। अपने शुरुआती दशकों में, पीएससीबी ने पारंपरिक बैंकिंग गतिविधियाँ, जैसे ऋण देना और जमा स्वीकार करना, चलाईं। हालांकि, समय के साथ इसका वित्तीय प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा और ऋण वसूली दर अत्यंत कम थी।

साल 2000 में, इसके निदेशक मंडल ने बैंक के कामकाज का गहन विश्लेषण किया और पाया कि इस इलाक़े के कृषि क्षेत्र में कम लाभप्रदता और रोज़गार के अवसरों में कमी, उधारकर्ताओं द्वारा कम पुनर्भुगतान के प्रमुख कारण थे। बैंक ने यह महसूस किया कि अपनी वित्तीय स्थिरता में सुधार के लिए स्थानीय समुदाय की आय बढ़ाना आवश्यक है।

इस बात को ध्यान में रखते हुए पीएससीबी ने अपने क्षेत्र के किसानों के सामने मौजूद कृषि संकट का समाधान करने का निर्णय लिया। बैंक ने अपने सदस्यों और स्थानीय समुदाय से परामर्श किया और खाद्य उत्पादन में स्थानीय आत्मनिर्भरता प्राप्त करने, स्थानीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए एक रणनीतिक योजना तैयार की

पीएससीबी के तहत सात क्षेत्रों में पारस्परिक सहायता समूह (म्युचुअल ऐड ग्रुप्स) बनाए गए। ये क्षेत्र थे:

पोक्कालि चावल की खेती, बागवानी, पुष्पकृषि, दुग्ध उत्पादन, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन और औषधीय पौधों की खेती। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए पीएससीबी ने इन सामुदायिक किसान समूहों को नियमित रूप से प्रशिक्षण, सुलभ ऋण (कम ब्याज या आसानी से उपलब्ध होने वाला ऋण) उपलब्ध कराया। इसके साथ ही उसने खेती के लिए बीजखाद जैसी आवश्यक वस्तुओं के आपूर्तिकर्ताओं और उत्पादों को बेचने के लिए बाज़ार से किसानों को जोड़ने का काम किया।

बैंक ने किसानों को अपने कृषि अधिकारी के माध्यम से लगातार कृषि परामर्श, वित्तीय सहायता और नई कृषि तकनीकें भी प्रदान कीं। इसके अलावा, बैंक ने उत्पादों की ख़रीद और विपणन की सुविधाएँ उपलब्ध कराईं और जैविक बीज, जैविक खाद और कृषि उपकरण के लिए अपना ख़ुद का वितरण केंद्र स्थापित किया। पीएससीबी ने कृषि मज़दूरों को संगठित करके ‘ग्रीन आर्मी’ नाम की एक सेवा शुरू की, जिसके माध्यम से किसानों को पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध कराए जाते थे। बैंक ने पोक्कालि उत्पादों के प्रसंस्करण में सुधार के लिए एक पोक्कालि राइस मिल भी स्थापित की। इसके साथ ही, बैंक ने ऐसे बाज़ार लगाए जहाँ किसानों से ख़रीदे गए फल, सब्ज़ियाँ, दूध और अंडे केरल में मिलने वाली सबसे ऊँची कीमतों पर बेचे जाते थे।

क्षेत्र के भूस्वामियों ने बैंक को खेती के लिए अपनी ज़मीन उपलब्ध कराकर इन पहलक़दमियों को बढ़ावा दिया। वर्तमान में, स्थानीय क्षेत्र के हज़ार से अधिक परिवार बैंक द्वारा शुरू की गई गतिविधियों में शामिल हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में बैंक के समन्वित प्रयास और उपलब्धियाँ व्यापक रूप से सराही जा रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, बैंक ने सहकारी क्षेत्र में अपने प्रदर्शन के लिए कई पुरस्कार जीते हैं। राज्य के 2020 के बजट में, उस समय के केरल के वित्त मंत्री डॉ. टी. एम. थॉमस आइज़क ने ‘वर्चुअल केरल फ़ूड प्लैटफ़ॉर्म’ बनाने की घोषणा की, जो किसानों से सीधे कृषि उत्पाद ख़रीदकर उन्हें उपभोक्ताओं तक पहुँचाता है। इससे न केवल स्वास्थ्यवर्धक खाद्य उत्पाद उपलब्ध होते हैं, बल्कि बिचौलियों के हटने से किसानों को बेहतर लाभ मिलता है। क्षेत्र में पीएससीबी के हस्तक्षेप को मान्यता देते हुए, इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए बैंक का चयन किया गया।

सहकारिता का विकास

केरल के व्यापक सहकारी ऋण नेटवर्क को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास को बढ़ावा देने में अपनी उपलब्धियों के लिए अंतरराष्ट्रीय सराहना प्राप्त हुई है। व्यावसायिक बैंकों की कठोर और जटिल प्रक्रियाओं से मुक्त, ये ‘जनता के बैंक’ कई सरकारी कार्यक्रमों को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में ‘केयर होम परियोजना’ शामिल है, जिसके तहत 2018 की बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित और बेहतर घर बनाए गए, साथ ही विभिन्न सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाएँ भी शामिल हैं।

इसके अलावा, ये ज़मीनी स्तर की ऋण संस्थाएँ 2018 की भीषण बाढ़ और कोविड-19 महामारी से राज्य को उबारने में अहम साबित हुईं, क्योंकि इन्होंने केरल के लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान की। विकास की लंबी अवधि की प्रक्रिया और अल्पकालिक राहत की आवश्यकता — इन दोनों के बीच, इन संस्थाओं ने स्वयं को केरल की प्रगति के लिए अपरिहार्य साबित किया है।

कादम्बरी (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), दिनेश बीड़ी मज़दूरों के रीड-अलाउड प्रोग्राम, 2025.

केरल दिनेश बीड़ी के मज़दूरों की केंद्रीय सहकारी समिति

नीतीश नारायणन
आशिक़ अली तुप्पिलिक्काट

केरल दिनेश बीड़ी के मज़दूरों की केंद्रीय सहकारी समिति (दिनेश बीड़ी) का पंजीकरण राज्य सहकारी संस्थाओं के रजिस्ट्रार के यहाँ 15 फ़रवरी 1969 को किया गया था। शुरुआत में इस सहकारी संस्था ने एक केंद्रीय सोसाइटी और बीड़ी बनाने वाली बीस प्राथमिक उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कीं। यह सहकारी संस्था मज़दूरों के लंबे संघर्षों के बाद बनी थी। इन मज़दूरों के काम के हालात में सुधार की माँगों के लिए कम्युनिस्ट नेताओं ने भी संघर्ष किया था। कम्युनिस्ट नेता ए.के. गोपालन के प्रयासों से भारतीय संसद ने बीड़ी और सिगार मज़दूर (रोज़गार की शर्तें) अधिनियम 1966 में पारित किया। इस अधिनियम ने बीड़ी मज़दूरों के लिए उचित मज़दूरी तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रावधान करके बीड़ी मज़दूरों के कल्याण को कुछ हद तक सुनिश्चित किया। इसके क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ी गई। मज़दूर आंदोलन और इस कानून के पारित होने से मिली प्रेरणा ने तीन साल बाद दिनेश बीड़ी के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1967 में केरल के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्टों को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। नवनियुक्त मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदिरिप्पाड ने बीड़ी और सिगार मज़दूर अधिनियम को लागू किया। निजी बीड़ी फ़ैक्ट्री मालिकों ने इस फ़ैसले का कड़ा विरोध किया। गणेश बीड़ी जैसी कुछ फ़ैक्ट्रियों के मालिकों ने तो अपनी फ़ैक्ट्रियों पर अचानक ताला लगा दिया। उन्होंने मज़दूरों से बातचीत के रास्ते बंद कर दिए क्योंकि वो चाहते थे कि सरकार अपने फ़ैसले को वापस ले। जब उत्तरी केरल के कन्नूर और कासरगोड ज़िलों में फ़ैक्ट्रियों की बंदी के सामाजिक प्रभाव की मार मज़दूरों पर पड़ने लगी तो ट्रेड यूनियनें और कम्युनिस्ट एकजुट होकर मज़दूरों के समर्थन में आए। कुछ समय बाद दिनेश बीड़ी के अध्यक्ष बनने वाले (1969–1996) जी.के. पणिक्कर ने लिखा, मज़दूरों को बीड़ी बनाने के अलावा कुछ नहीं आता था, और इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लिए रोज़गार खोजना एक दुष्कर काम था। उन्होंने आगे लिखा, ‘पूरे ज़िले की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी।’xxvii इस चुनौती भरे दौर में संगठित मज़दूरों ने बीड़ी उत्पादन के लिए एक सहकारी संस्था बनाने का निर्णय लिया।

मज़दूरों की सहकारी संस्था का गठन न केवल फ़ैक्ट्री बंद होने से पैदा हुए संकट का समाधान बना और पूंजी के पलायन का जवाब सिद्ध हुआ, बल्कि यह श्रम की गरिमा और सामूहिक कार्रवाई की भावना का भी प्रतीक था। संयुक्त मोर्चे का नेतृत्व करने वाले और सहकारी संस्था की स्थापना में अहम भूमिका निभाने वाले के.पी. सहदेवन कहते हैं: ‘दिनेश बीड़ी का उद्भव उतना आसान नहीं था जितना लोगों को लगता है। यह मज़दूर वर्ग के अनवरत संघर्ष और उस दौर की व्यापक लड़ाकू भावना का परिणाम था।’xxviii दिनेश बीड़ी बनाने का विचार भारतीय कॉफ़ी मज़दूरों की सहकारी समिति ( इंडियन कॉफी वर्कर्स कोऑपरेटिव सोसाइटी से प्रेरित था, जिसे 1958 में ए.के. गोपालन की पहल पर स्थापित किया गया था। भारतीय कॉफ़ी मज़दूरों की सहकारी समिति की स्थापना मज़दूरचालित योजनाओं की सफलता की एक मिसाल बनी। मज़दूरचालित योजनाओं की सफलता में यह विश्वास—और केरल की कम्युनिस्ट सरकार के समर्थन—ने लगभग एक दशक बाद बीड़ी मज़दूरों के इस विचार को हक़ीक़त में बदल दिया।

दिनेश बीड़ी के लिए पूंजी मज़दूरों से जुटाई गई। 1969 में इसके एक शेयर का मूल्य 20 रुपये रखा गया, लेकिन उस समय दैनिक मज़दूरी 3 रुपये से भी कम होने के कारण अधिकतर मज़दूर यह राशि दे पाने में असमर्थ थे। इस समस्या को हल करने के लिए राज्य सरकार ने प्रत्येक संभावित मज़दूरस्वामी को 19 रुपये का ऋण प्रदान किया। मज़दूरों ने यह ऋण अपनी मज़दूरी से किस्तों में चुकाया। हालाँकि बेरोज़गार हुए सभी 12,000 मज़दूरों को शुरूआत में इस परियोजना के तहत रोज़गार नहीं दिया जा सका। पहलेपहल 3,000 मज़दूरों को, और एक महीने के भीतर ही अन्य 1,000 मज़दूरों को इसमें शामिल किया गया। कुल एकतिहाई बेरोज़गार बीड़ी मज़दूर सहकारी संस्था में शामिल हुए। उत्तरी मालाबार के वर्गसचेत बीड़ी मज़दूरों ने स्पष्ट कर दिया कि सहकारी संस्था में मज़दूरस्वामी के रूप में शामिल होने वालों और दूसरे मज़दूरों के बीच किसी प्रकार का विभाजन स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने सभी मज़दूरों—चाहे सहकारी संस्था में कार्यरत हों या नहीं—को सहकारी संस्था के संचालन और उसके सिद्धांतों के बारे में शिक्षित किया।

दिनेश बीड़ी की राह स्थापना के बाद से ही चुनौतियों से भरी रही। उदाहरण के लिए, उसे पुराने निजी ब्रांडों के प्रति निष्ठावान ग्राहकों के बीच अपनी पहचान बनानी थी। शुरुआती दिनों में पर्याप्त मात्रा में बिक्री न हो पाने के कारण दिनेश बीड़ी के पास बीड़ी के पैकेटों का अंबार लग गया। ऐसा लगने लगा था कि मज़दूरों द्वारा उच्च गुणवत्ता वाली बीड़ी बनाने के प्रयासों के बावजूद यह नया उपक्रम डूब जाएगा। इस स्थिति में मज़दूरों ने आपस में विचारविमर्श करके एक व्यापक जनअभियान चलाने और हर दुकान पर जाकर दिनेश बीड़ी को बेचने का अनुरोध करने का निर्णय लिया। यह अभियान रंग लाया और समय के साथ दिनेश बीड़ी केरल के मज़दूरों और किसानों का पसंदीदा ब्रांड बन गई। कुछ ही सालों में दिनेश बीड़ी भारत के सबसे लोकप्रिय बीड़ी ब्रांडों में से एक और दक्षिण भारत की सबसे बड़ी निर्माता बन गई। 1969 में 3,000 मज़दूरों के साथ शुरू हुई यह सहकारी संस्था 1980 के दशक तक 42,000 मज़दूरों को रोजगार देने लगी, और एशिया की सबसे बड़ी मज़दूर सहकारी संस्थाओं की सूची में शामिल हो गई। इसके परिणामस्वरूप, यह निजी क्षेत्र की तुलना में अपने लिए बेहतर मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम हो पाई।

हालाँकि, एक सहकारी संस्था का उद्देश्य केवल पूंजीवादी व्यवस्था में टिके रहना नहीं होता है। अपनी लोकतांत्रिक संरचना के ज़रिए मज़दूरों के सामाजिक नज़रिये का विस्तार करना भी इसका एक जरूरी उद्देश्य होता है। दिनेश बीड़ी के मज़दूरस्वामियों ने एक गरिमापूर्ण कार्यसंस्कृति का विकास किया और निजी ठेका प्रणाली को समाप्त किया। निजी ठेका प्रणाली द्वारा स्थापित मज़दूर अधिकारों का उल्लंघन करना 1950 और 1960 के दशकों के आंदोलनों का एक प्रमुख मुद्दा था। दिनेश बीड़ी अपने मज़दूरों को सवैतनिक अवकाश, बोनस और शोकअवकाश जैसे लाभ प्रदान करने वाली शुरुआती संस्थाओं में से एक थी। दिनेश बीड़ी ने कार्यस्थल पर ट्रेड यूनियनवाद और राजनीतिक चर्चा को प्रोत्साहित किया। इसके साथ ही रचना पाठ के आयोजन किए जिसमें कोई मज़दूर किसी साहित्यिक कृति के कुछ अंश या समसामयिक विषय के आलेख पढ़ता था और बाक़ी मज़दूर सुनते थे। इसने गाँवों में कला और खेल क्लब भी स्थापित किए ताकि मज़दूरों, उनके परिवारों और सारे समुदाय के लिए आवश्यक अवकाश और सहभागिता के अवसर उपलब्ध हो सकें। इन सुधारों का बीड़ी उद्योग पर गहरा प्रभाव पड़ा, और कुछ सुधारों को तो निजी कंपनियों ने भी अपनाया। दिनेश बीड़ी मज़दूर एकता, प्रतिरोध और गरिमा का प्रतीक बन गई।

1990 के दशक में बीड़ी उद्योग में आए संकट ने दिनेश बीड़ी के अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल दिया। यह संकट कई कारणों से पैदा हुआ था—निजी क्षेत्र में नए बीड़ी निर्माता प्रवेश कर रहे थे जो मज़दूरों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी से कम मेहनताना देते थे और दुकानदारों को ज़्यादा मुनाफ़ा देते थे; युवा उपभोक्ताओं का रुझान बीड़ी से सिगरेट की तरफ बढ़ रहा था; और सरकार की तंबाकूविरोधी मुहिम तेज़ हो गई थी। तंबाकू के स्वास्थ्यसंबंधी ख़तरों के प्रति जनता की बढ़ती जागरूकता के कारण सरकार के तंबाकूविरोधी अभियान प्रभावी होते गए और दिनेश बीड़ी ने इन सरकारी अभियानों का समर्थन किया। बीड़ी की माँग में सालदरसाल गिरावट आने लगी। इन बदलावों की वजह से इस सहकारी संस्था ने 1993 के बाद नए मज़दूर रखना बंद कर दिया। दिनेश बीड़ी के मज़दूरों के काम के घंटे कम कर दिए गए, और बहुत सारे मज़दूर सहकारी संस्था छोड़कर दूसरे रोज़गारों की तलाश में निकल पड़े।

इस परिस्थिति में, दिनेश बीड़ी के मज़दूरमालिकों ने सहकारी संस्था को बचाने के लिए उत्पादन में विविधता लाने पर विचारविमर्श शुरू किया। इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए केरल की उद्योग मंत्री—और कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रमुख हस्ती—सुशीला गोपालन ने 30 अगस्त 1996 को एक राज्यस्तरीय कार्यशाला आयोजित की जिसमें कई वैज्ञानिकों ने सहकारी संस्था के मज़दूरमालिकों को अपने सुझाव दिए। इसके फलस्वरूप दिनेश बीड़ी ने नारियल दूध (1997) और करी पाउडर (1998) जैसे नए उत्पादों को बनाना शुरू किया। 1990 के दशक के अंत में दिनेश बीड़ी ने पाँच नए उपक्रमों की शुरुआत की:

  1. दिनेश फूड्सः यह मसाला पाउडर, नारियल का दूध, वर्जिन नारियल तेल, नारियल दूध आइसक्रीम, फ्रूट स्क्वैश, फ्रूट जैम, शरबत और अचार का निर्माण और खुदरा बिक्री करता है। इनमें अधिकतर पदों पर पूर्व बीड़ी श्रमिकों को रोज़गार दिया जाता है। कन्नूर ज़िले में इसकी चार विनिर्माण इकाइयाँ हैं, जो अपने श्रमिकों का सालभर रोजगार सुनिश्चित करती हैं।

  2. कैफ़े दिनेशः यह कन्नूर, पय्यनूर, पिनारायि और तलशेरि में सहकारी रेस्तरां और कैटरिंग सेवाएँ संचालित करता है। दिनेश फूड्स के उत्पाद इन आउटलेट्स पर उपलब्ध हैं।

  3. दिनेश इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सिस्टम्स (डीआईटीएस) इसकी स्थापना 1999 में हुई। यह केरल के सहकारी क्षेत्र, विशेष रूप से सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को आईटी सहायता प्रदान करता है। 2001 में, इसने कन्नूर में दिनेश सॉफ़्टवेयर पार्क की स्थापना की।

  4. दिनेश ऑडिटोरियमः कन्नूर में स्थित, 1,000 लोगों की क्षमता वाले एक बड़े हॉल को किराए पर उपलब्ध कराया जाता है, जिसका उपयोग सम्मेलन और विवाह समारोहों के लिए किया जा सकता है।

  5. दिनेश अपैरलः इसकी स्थापना 2007 में कन्नूर और कासरगोड में हुई। यह स्थानीय और निर्यात बाज़ारों के लिए कपड़े बनाता है यह 400 से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है।

केरल दिनेश (जिस नाम से यह 2000 के दशक की शुरुआत में मशहूर हुआ) ने अपने कामों में विविधता लाकर तरक्की की और एक हानिकारक उत्पाद पर निर्भरता कम की। लोकतांत्रिक तरीक़े से फ़ैसले लेने और श्रमिकों के हितों को महत्त्व देने से एक ऐसा सहकारी तंत्र बना, जो आज भी दुनिया भर के श्रमिकों को प्रेरित करता है।

वंशिका बब्बर (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), दिनेश फ़ूड्स, 2025.

एक छोटेसे गाँव ने बनाया मज़दूरों का अपना सहकारी संगठन

सर्गा टी. के.

केरल के उत्तरी कासरगोड ज़िले के एक दूरदराज़ हिस्से में स्थित कोडोम बेलूर ग्राम पंचायत लंबे समय तक सामंती ज़मींदारी व्यवस्था से उपजी गहरी सामाजिक–आर्थिक विषमताओं से प्रभावित रही। 1956 में केरल राज्य के गठन के बाद लागू की गई भूमि सुधार नीतियों और खाड़ी देशों में मज़दूरी करने गए प्रवासी मज़दूरों की आमदनी से पैदा हुए नव संपन्न वर्ग ने इस क्षेत्र की भौतिक परिस्थितियों का तानाबाना रचा। इसके बाद भी इस क्षेत्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूमि सुधार के लाभ और प्रवासी रोज़गार से मिलने वाली आमदनी से महरूम रहा। इनको बेरोज़गारी, सामाजिक हाशियाकरण, और सार्वजनिक परियोजनाओं में फैला भ्रष्टाचार ही नसीब हुआ। निर्माण मज़दूरों को अक्सर उनका उचित मेहनताना नहीं दिया जाता था, जबकि ठेकेदार बिना काम पूरा किए सार्वजनिक धन हड़प लेते थे।

निर्माण सेक्टर पूरी तरह माँग आधारित होता है। बुनियादी ढांचे की ज़रूरत आर्थिक विकास के स्तर पर निर्भर करती है। भौतिक ढांचे की गुणवत्ता में भी क्षेत्रीय असमानता पाई जाती है। यह जरूरी नहीं कि जहाँ मज़दूर मौजूद हों वहीं निर्माण कार्य की ज़रूरत पड़ेगी। निर्माण कार्य में आवश्यक मज़दूरों की मात्रा भी बदलती रहती है। मज़दूर निर्माण कार्य की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। आवश्यक श्रम तथा पूंजी की मात्रा भी प्रत्येक परियोजना की आकार और लागत पर निर्भर करती है।

निर्माण की हर अवस्था में अलग प्रकार के कौशल की आवश्यकता होती है और इसी के अनुसार नए मज़दूर बुलाए जाते हैं, जिससे पूरी निर्माण प्रक्रिया के दौरान पूंजी निवेशकों का पलड़ा भारी रहता है। बड़ी परियोजनाओं में उपठेकों की अनेक परतें मज़दूरों के लिए शोषणकारी अवस्था पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाती है। कुल मिलाकर, निर्माण सेक्टर की संरचनात्मक प्रकृति मज़दूरों के शोषण के लिए उर्वर परिस्थितियाँ तैयार करती है।

1996 में केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार ने विकेंद्रीकृत नियोजन (Decentralised Planning) के लिए जन अभियान की शुरुआत की। इसके माध्यम से राज्य के लोगों की समस्याओं और विकास की अव्यक्त संभावनाओं पर चर्चा में बड़ी संख्या में लोगों को शामिल किया गया। इन प्रयासों से प्रेरित होकर कोडोम बेलूर के लोगों ने शोषणकारी निर्माण कंपनियों के ख़िलाफ़ संगठित होना शुरू किया और अपने इलाक़े में निजी ठेकेदारों द्वारा कराए जा रहे सार्वजनिक कार्यों का बहिष्कार कर दिया। उन्होंने सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं को स्वतंत्र रूप से संभालने के लिए एक कारवाई दल का गठन किया। लेकिन तकनीकी पिछड़ापन, सीमित पूंजी, निजी बिल्डरों के दबाव और भ्रष्ट अधिकारियों—विशेषकर लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों—की वजह से इन परियोजनाओं के ऊपर जनता का नियंत्रण स्थापित करने के उनके प्रयासों को गहरा धक्का लगा।

1997 में कोडोम बेलूर के एक स्थानीय निर्वाचित नेता और पंचायत स्थायी समिति के अध्यक्ष ए.सी. मैथ्यू ने इस कारवाई दल के सदस्यों को संगठित होकर होसदुर्ग श्रम अनुबंध सहकारी समिति (Hosdurg Labour Contract Cooperative Society) बनाने के लिए प्रेरित किया। इस समिति का उद्देश्य अपने सदस्यों की कुशल श्रमशक्ति को एकबद्ध करना और उनकी निजी बचत से पूंजी जुटाकर सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बोली लगाना था। 2004 में इस समिति का नाम बदलकर उदयपुरम श्रम अनुबंध सहकारी समिति कर दिया गया। 221 सदस्यों के साथ शुरू हुई इस संस्था में वर्तमान में 2,981 सदस्य हैं। इसमें 235 स्थाई ‘क्लास ए’ सदस्य हैं जिनको दीर्घकालिक भागीदारी और पूर्ण मतदान का अधिकार मिला हुआ है। करीब एकचौथाई ‘क्लास ए’ सदस्य अनुसूचित जनजाति समुदाय से हैं। उदयपुरम समिति को केरल लोक निर्माण विभाग, स्थानीय स्वशासी संस्थाओं और अन्य सरकारी विभागों से निर्माण कार्यों के ठेके मिलते हैं। यह संस्था अपने सदस्यों द्वारा चलाई जाती है और वही इसके मालिक हैं। इसे राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, ज़िला सहकारी बैंकों (अब केरल बैंक), तथा केरल वित्तीय निगम से वित्तीय सहायता मिलती है।

सहकारी संस्था का मॉडल पारस्परिक सहयोग की भावना पर आधारित होता है और अपने सदस्यों के जीवनस्तर को बेहतर बनाना इसका मुख्य उद्देश्य होता है। उदयपुरम समिति के गठन से पहले ज्यादातर निर्माण कार्य निजी बिल्डरों द्वारा किया जाता था। उदयपुरम समिति मज़दूरों के लिए वेतन शोषण और निजी ठेकेदारों पर निर्भरता से मुक्ति का रास्ता बनी।

उदयपुरम समिति को मिलने वाले काम में इज़ाफ़ा होने के साथ सदस्यों की सामाजिक–आर्थिक परिस्थितियों में धीरेधीरे सुधार आना शुरू हुआ। 2011 के बाद से समिति ने बड़े स्तर की निर्माण परियोजनाओं को लेना शुरू कर दिया। इसके साथ ही इसने कृषि तथा अन्य उद्योगों में भी कदम रखा ताकि विकास को स्थिर किया जा सके और उपलब्ध मानव संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया जा सके। उत्पादक रोज़गार के अवसर पैदा करके यह समिति क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विकास का एक प्रमुख इंजन बन गई है।

जुनैना मोहम्मद (यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स), कुडुम्बश्री, 2025.

कुडुम्बश्री

सुबिन डेन्निस

कुडुम्बश्री का विशाल आकार उसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक है। केरल की लगभग एकतिहाई वयस्क महिलाएँ (कुल 48 लाख महिलाएँ) कुडुम्बश्री की सदस्य हैं। xxix कुडुम्बश्री (मलयालम में कुडुम्बश्री का अर्थ है ‘परिवार की समृद्धि’) की शुरुआत मई 1998 में महिलाओं में ग़रीबी उन्मूलन के लिए एक राजकीय पहल के रूप में हुई थी। समय के साथ अब यह केरल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में एक रूपांतरकारी शक्ति का रूप ले चुकी है। वी.के. रामाचंद्रन के के अनुसार, यह ‘एक आंदोलन भी है और एक सरकारी कार्यक्रम भी है।’ आज कुडुम्बश्री छोटे स्तर के वित्त (Microfinance) और सामूहिक खेती से लेकर परिधान निर्माण और रेस्टोरेंट चलाने जैसी विविध गतिविधियों में संलग्न है। केरल के समाज में इसकी उपस्थिति सर्वव्यापी हो चुकी है।

केरल में सहकारी संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले कानूनों के दायरे में नहीं आने के बाद भी यह सहकारिता की भावना से ओतप्रोत है। कुडुम्बश्री समुदाय नेटवर्क की मूल इकाइयाँ उसके सदस्यों द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चलाई और नियंत्रित की जाती हैं, और यह ‘एक सदस्य, एक वोट’ के सिद्धांत पर आधारित होता है।xxx इस सामुदायिक नेटवर्क की संरचना तीन स्तरों वाली है:

  1. पहला स्तर है पड़ोस समूह या Neighbourhood Group (NHG) (मलयालम में अयलक्कूट्टम), जिसमें दस से बीस सदस्य शामिल होते हैं। पड़ोस की सभी वयस्क महिलाएँ सदस्यता की पात्र होती हैं। आर्थिक तथा सामाजिक रूप से वंचित तबक़ों की महिलाओं को कुडुम्बश्री में शामिल करने पर विशेष बल दिया जाता है।

  2. दूसरा स्तर है क्षेत्रीय विकास समित या Area Development Society (ADS), जो संबंधित स्थानीय स्वशासी संस्था (LSGI—पंचायत या नगर पालिका जैसी स्थानीय सरकार) के एक वार्ड में मौजूद सभी NHG को संघबद्ध करके बनाई जाती है।

  3. तीसरा स्तर है सामुदायिक विकास समिति (Area Development Society, CDS), जो स्थानीय स्वशासी संस्था में मौजूद सभी ADS को संघबद्ध करके गठित की जाती है।

कुडुम्बश्री के इस सामुदायिक नेटवर्क को एक सरकारी संरचना—कुडुम्बश्री मिशन (औपचारिक नाम: राज्य ग़रीबी उन्मूलन मिशन)—का सहयोग प्राप्त है। मिशन का संचालन एक अधिशासी निकाय (governing body) द्वारा किया जाता है जिसकी अध्यक्षता राज्य के स्थानीय स्वशासन मंत्री करते हैं; इसकी कार्यकारी समिति की अध्यक्षता स्थानीय स्वशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव करते हैं; और एक सरकारी अधिकारी इसके कार्यकारी निदेशक के रूप में काम करता है। केरल के प्रत्येक ज़िले के लिए एक कुडुम्बश्री मिशन है। राज्य मिशन के अंतर्गत केरल में कुल चौदह ज़िला कुडुम्बश्री मिशन कार्यरत हैं।

उद्भव

पहले किए गए समुदायआधारित विकास के स्थानीय प्रयोगों ने कुडुम्बश्री के लिए आधारशिला का काम किया।xxxi ऐसा ही एक प्रयोग 1991 में आलप्पुझा नगर में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा शुरू किया गया सामुदायिक पोषण कार्यक्रम (Community-Based Nutrition Programme) था। इसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य तथा पोषण की स्थिति में सुधार लाना था। इस कार्यक्रम के तहत तीन स्तरों पर महिलाओं की सामुदायिक विकास समितियाँ बनाई गईं: NHG, ADS और CDS। इसी प्रकार की एक और परियोजना 1994 से मलप्पुरम ज़िले में लागू की गई थी। यह शुरू में पाँचस्तरीय संरचना (NHG, ADS, CDS, ब्लॉकस्तरीय CDS और ज़िलास्तरीय CDS) पर आधारित थी, जिसे बाद में आलप्पुझा की तरह तीनस्तरीय संरचना में बदल दिया गया। ग़रीब महिला सदस्यों की बचतों को इकट्ठा करके उनको ऋण प्रदान करने वाली ऋण और बचत समितियाँ इस सामुदायिक संगठन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गईं।

1990 के दशक के शुरुआती दौर में केरल शास्त्र साहित्य परिषद (Kerala Forum for Science Literature, या KSSP, केरल का सबसे बड़ा जन विज्ञान आंदोलन) स्थानीय विकास के लिए नियोजन के सहभागी मॉडल पर नए प्रयोग कर रहा था। इन प्रयोगों का एक हिस्सा था पड़ोस समूह (NHG) का निर्माण, जिनकी भागीदारी स्थानीय स्तर पर संसाधन के चिह्नीकरण और योजनाओं के निर्माण में होती थी। इनमें से सबसे उल्लेखनीय प्रयास 1993 में कन्नूर ज़िले के कल्लियाशेरि ग्राम पंचायत में हुआ, जहाँ KSSP ने लगभग दो सौ पड़ोस समूह (NHG) गठित किए।

1996 में केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सत्ता में आया और उसी वर्ष विकेंद्रीकृत योजना के लिए जन अभियान की शुरुआत की। इस अभियान के तहत स्थानीय सरकारों को अधिक वित्तीय संसाधन और अधिकार सौंपे गए, और विकेंद्रीकृत योजना प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए NHG का गठन किया गया।xxxii इस अभियान के तहत राज्य सरकार ने स्थानीय सरकारों के लिए अपनी वार्षिक योजना निधि का कम से कम 10% हिस्सा महिलाओं के सामाजिक उन्नयन से संबंधित परियोजनाओं के लिए अलग रखना अनिवार्य कर दिया।

इन सभी प्रक्रियाओं और प्रयोगों ने मिलकर कुडुम्बश्री को गढ़ा।

1997 में एक विशेष सरकारी टास्क फ़ोर्स ने राज्य ग़रीबी उन्मूलन मिशन (कुडुम्बश्री मिशन) के गठन की अनुशंसा की। 1997–1998 के केरल राज्य बजट में इसकी घोषणा की गई। 17 मई 1998 को इसका विधिवत उद्घाटन किया गया। इसका उद्देश्य स्थानीय सरकारों के नेतृत्व में संगठित सामुदायिक कार्रवाई के माध्यम से ग़रीबी का उन्मूलन करना था।xxxiii

आज के समय में कुडुम्बश्री के प्रमुख कामों में छोटे स्तर का ऋृण, आमदनी प्रदान करने वाली कृषि और सूक्ष्म उद्यमों जैसी आर्थिक गतिविधियाँ, तथा स्थानीय सरकारों की विभिन्न कल्याण और विकास कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी शामिल है।

कुडुम्बश्री की सभी सदस्याएँ इसकी बचत और ऋण कार्यक्रम (thrift and credit programme) का हिस्सा होती हैं। कुडुम्बश्री के पड़ोस समूह (NHG) सप्ताह में एक बार मिलते हैं और छोटीछोटी रकम बचत के रूप में जमा करते हैं। इसी जमापूंजी का उपयोग बाद में ज़रूरतमंद सदस्याओं को छोटे ऋण देने के लिए किया जाता है। अधिकांश पड़ोस समूह बैंकों से भी जुड़े होते हैं। बैंक इन समूहों को ऋण प्रदान करते हैं। समूह इन राशियों का इस्तेमाल सामूहिक खेती या छोटे उद्यम जैसी अपनी आजीविका चलाने वाली गतिविधियों में करते हैं।xxxiv

सामूहिक खेती

कुडुम्बश्री की सबसे उल्लेखनीय पहलों में से एक है सामूहिक खेती।xxxv खेती में रुचि रखने वाली चार से दस NHG सदस्याओं को मिलाकर संयुक्त देयता समूह (Joint Liability Groups) बनाए जाते हैं, जिन्हें संघ कृषि (सामूहिक खेती) समूह कहा जाता है। ये समूह अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में खेती के लिए उपयुक्त भूमि (अक्सर परती पड़ी ज़मीन) की पहचान करते हैं। पंचायत और कुडुम्बश्री ज़िला मिशन की सहायता से भूमि मालिकों से यह जमीन पट्टे पर लेकर खेती की जाती है। समूह की सदस्याएँ अपनी निजी ज़मीनों पर भी सामूहिक खेती करती हैं। सक्रिय संघ कृषि समूह बैंकों से जुड़े होते हैं, जो उन्हें ब्याज पर सब्सिडी के साथ ऋण देते हैं। कुडुम्बश्री मिशन भी इन समूहों को कृषि मशीनरी, बीज, उर्वरक और कीटनाशक रियायती दरों पर मुहैया कराता है। राज्य का कृषि विभाग समयसमय पर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। केंद्र सरकार की कई योजनाओं का धन भी सामूहिक खेती की सहायता करने के लिए दिया जाता है। संघ कृषि समूहों की दस हज़ार कुशल महिला किसानों को मास्टर फ़ार्मर के रूप में नामित किया गया है। ये विशेषज्ञ के रूप में कार्य करती हैं और अन्य महिला किसानों को प्रशिक्षण देती हैं।

केरल में कुडुम्बश्री कृषि संघ समूहों से जुड़ी महिला किसानों की संख्या 30 जून 2025 तक 4,39,255 पहुँच गई है। कुल 96,177 कृषि संघ समूह हैं जो 21,457 हेक्टेयर भूमि पर खेती कर रहे हैं।xxxvi ये मुख्यतः धान, सब्जियाँ, केले और कंदीय फसलें उगाते हैं। इन फसलों का पहले महिला किसानों के परिवारों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाता है, और बचा हुआ हिस्सा गाँव के बाज़ारों में बेचा जाता है। कुडुम्बश्री की सामूहिक खेती से सदस्य परिवारों की खाद्यसुरक्षा बेहतर हुई है, और उनकी आमदनी तथा जीवनस्तर में उल्लेखनीय सुधार आया है।

स्थानीय सरकारें

केरल में विकेंद्रीकृत योजना के अंतर्गत स्थानीय सरकारों की विकास पहलों में कुडुम्बश्री की सामुदायिक नेटवर्क संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जहाँ स्थानीय सरकारें आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, और ग़रीबी उन्मूलन से जुड़ी योजनाओं को बनाने और उन्हें लागू करने के लिए ज़िम्मेदार होती हैं, वहीं कुडुम्बश्री का मूल मिशन भी ग़रीबी उन्मूलन ही है।xxxvii एक साझा लक्ष्य होने की वजह से शुरू से ही कुडुम्बश्री के NHG, ADS और CDS स्थानीय सरकारों के साथ मिलकर काम करते रहे हैं।

कुडुम्बश्री राज्य सरकार की कई ग़रीबी उन्मूलन योजनाओं और विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की प्रमुख एजेंसी है। उदाहरण के लिए, राज्य में अत्यधिक ग़रीबी को समाप्त करने के उद्देश्य से शुरू किए गए बेसहारा मुक्त केरल‘(Destitute-Free Kerala) कार्यक्रम का क्रियान्वयन कुडुम्बश्री द्वारा किया जाता है। इस कार्यक्रम के लाभार्थियों की पहचान कुडुम्बश्री की सदस्याएँ ही करती हैं। यह कार्यक्रम चिह्नित बेसहारा लोगों को भोजन, चिकित्साउपचार, कपड़े, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्कूली शिक्षा, ज़मीन, और आवास उपलब्ध कराता है।xxxviii

नियोजन प्रक्रिया के अंतर्गत केरल की स्थानीय सरकारें स्वास्थ्य, शिक्षा, ग़रीबी उन्मूलन, महिला एवं बाल विकास, और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रमुख सेक्टरों के लिए कार्यकारी समूह (working group) बनाती हैं और हर कार्यकारी समूह में कम से कम एक कुडुम्बश्री CDS सदस्य को शामिल किया जाना अनिवार्य होता है।xxxix इन कार्यकारी समूहों का काम मौजूदा संसाधनों का सर्वेक्षण करना, स्थानीय परिस्थितियों का विश्लेषण करना, विकास के अवसरों को खोजना, और लोगों की ज़रूरतों की पहचान करना होता है। इसके अलावा, लोगों की विकाससंबंधी आवश्यकताओं का मूल्यांकन वार्डस्तरीय बैठकों—ग्राम पंचायतों में ग्राम सभा और नगर क्षेत्रों में वार्ड सभा—में किया जाता है। इन सभाओं में कुडुम्बश्री सदस्याएँ सबसे ज्यादा सक्रिय होती हैं और सभाओं को जीवंत बनाए रखने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है।

केरल की वामपंथी सरकार ने फरवरी 2020 में घोषणा की कि राज्य सरकार कुडुम्बश्री द्वारा संचालित एक हज़ार रेस्टोरेंट खोलेगी जहाँ रियायती दर पर भोजन उपलब्ध कराया जाएगा।xl उसी साल कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान कुडुम्बश्री ने इन रेस्टोरेंटों की स्थापना शुरू की और इन्हें ‘जनता का रेस्टोरेंट’ नाम दिया। लॉकडाउन के दौरान कुडुम्बश्री ने स्थानीय सरकारों और कर्मचारी यूनियनों के साथ मिलकर राज्य भर में सामुदायिक रसोई चलाई। एक मार्च 2025 तक केरल में कुल 1,198 जनता के रेस्टोरेंट सक्रिय थे, जिन्हें 5,104 कुडुम्बश्री सदस्याएँ चला रही थीं।xli

सूक्ष्म उद्यम (Microenterprises)

कुडुम्बश्री इकाइयों द्वारा स्थापित सूक्ष्म उद्यम विविध सेक्टरों में काम कर रहे हैं। इनमें पैकेज्ड खाद्य पदार्थ, कपड़े, सैनिटरी नैपकिन, छतरी, थैले, मिट्टी के बर्तन, फ़र्श की चटाई, साबुन और अन्य घरेलू उपयोग की चीजों का उत्पादन शामिल है। कुडुम्बश्री राज्य के विभिन्न ज़िलों के आदिवासी किसानों द्वारा उगाए गए कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग और उन्हें बाज़ार में लाने का काम भी करती है ताकि उन्हें बेहतर क़ीमत मिल सके। इसके अलावा, होम शॉप नेटवर्क, जो कुडुम्बश्री के सूक्ष्म उद्यमों के उत्पादों को सीधा घरों तक पहुँचाता है, राज्य के सभी चौदह ज़िलों में स्थापित हो चुका है। कुडुम्बश्री की कई सारी इकाइयाँ पशुपालन, मुर्गी पालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों में भी संलग्न हैं।

कुडुम्बश्री की इकाइयाँ राज्य भर में रेस्टोरेंट और कैंटीन चलाती हैं; रेलवे स्टेशनों पर पार्किंग का प्रबंधन करती हैं; नारियल तेल, काजू और इमली का प्रसंस्करण करती हैं; तथा खानेपीने का सामान, अचार और पप्पडम (दाल से बनी पतली और कुरकुरी खाद्य सामग्री) बनाती हैं। इनके अलावा ये इकाइयाँ फ़िटनेस सेंटर, महिला छात्रावास, बच्चों के लिए डेकेयर केंद्र, ड्राइविंग स्कूल, नारियल के रेशा की इकाइयाँ, किताब बाइंडिंग इकाइयाँ, प्रिंटिंग सेंटर, मेडिकल लैब, सिलाई इकाइयाँ, और सुपरमार्केट भी संचालित करती हैं। कुछ इकाइयाँ LED बल्ब और इलेक्ट्रॉनिक सामानों का उत्पादन भी करती हैं।

कुडुम्बश्री में निर्माण सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं की टीमें भी हैं। इनमें पर्यवेक्षक, राजमिस्त्री, प्लंबर और बिजली मिस्त्री जैसे सारे पेशे महिलाएँ संभालती हैं। इन सभी को कुडुम्बश्री मिशन ने विभिन्न एजेंसियों के सहयोग से प्रशिक्षण प्रदान किया है। इसके अलावा कुडुम्बश्री हरित कर्म सेना (Green Task Force) भी चलाती है, जो घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से प्लास्टिक कचरा एकत्रित करती है, उसे पुनर्चक्रण करने वाली इकाइयों तक पहुँचाती है, और घरेलू जैव अपशिष्ट के निदान में सहायता प्रदान करती है। अमृतम न्यूट्रीमिक्स—जो छह महीने से तीन वर्ष तक के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों में दिया जाने वाला अनाजआधारित पौष्टिक मिश्रण है—का उत्पादन भी राज्य में 241 कुडुम्बश्री इकाइयों द्वारा किया जाता है।xlii

1 मार्च 2025 तक केरल में कुल 157,097 कुडुम्बश्री सूक्ष्म उद्यम सक्रिय थे, जिन्हें 318,265 कुडुम्बश्री सदस्याएँ चला रही थीं।xliii इनमें से 69,484 उद्यम उत्पादन सेक्टर में, 49,381 सेवा क्षेत्र में, और 35,646 व्यापार क्षेत्र में संचालित हो रहे थे।xliv

प्रभाव

कुडुम्बश्री की वजह से उसकी सदस्याओं के जीवन में भारी परिवर्तन आया है। इसने महिलाओं को अपने जीवनस्तर को सुधारने, घर के बाहर निकलकर आमदनी वाले काम करने, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़ाने, तथा सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मज़बूत करने में मदद की है। स्थानीय सरकारों की गतिविधियों और नेतृत्व संरचनाओं में भी कुडुम्बश्री सदस्याओं की सक्रिय भागीदारी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

लॉरी बेकर सेंटर फ़ॉर हैबिटैट स्टडीज़, तिरुवनंतपुरम, (LBC सर्वेक्षण) द्वारा 2015 में केरल में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 54.1 प्रतिशत कुडुम्बश्री सदस्याएँ किसी न किसी प्रकार की आमदनी प्रदान करने वाली आर्थिक गतिविधि में लगी हुई थीं।xlv यह अनुपात राज्य की वयस्क महिलाओं की कार्यभागीदारी दर (26.3%) से लगभग दोगुना था। सर्वे में यह भी पाया गया कि कुडुम्बश्री से जुड़ने से पहले 66.1% महिलाएँ केवल घरेलू कार्यों में लगी थीं और घर के बाहर न तो किसी आमदनी देने वाली गतिविधि में संलग्न थीं और न ही पढ़ाई कर रही थीं। कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद ऐसी महिलाओं का अनुपात घटकर 37% रह गया।xlvi

केरल विश्वविद्यालय की पीएचडी शोधार्धी अंबिका देवी आर. द्वारा 2008–2009 में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि कुडुम्बश्री ने लगभग 50% सदस्याओं को आमदनी प्रदान करने वाली गतिविधियों में शामिल होने में मदद की।xlvii इस सर्वेक्षण में सदस्याओं से पूछा गया कि उनकी आमदनी पर उनका नियंत्रण किस हद तक है—‘बहुत अधिक’, ‘कुछ हद तक’, या ‘कोई नियंत्रण नहीं’। 88.8% महिलाओं ने बताया कि कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद अपनी आमदनी पर उनका नियंत्रण ‘बहुत अधिक’ है। कुडुम्बश्री से नहीं जुड़ी महिलाओं में केवल 66.7% ने जवाब दिया कि अपनी आमदनी पर उनका नियंत्रण ‘बहुत अधिक’ है।xlviii तारामोल के.जी. ने अपने पीएचडी शोध के लिए एर्नाकुलम ज़िला में 2016 में एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद सदस्याओं की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।xlix

बेहतर आमदनी होने की वजह से कुडुम्बश्री सदस्याओं वाले परिवारों ने उपभोक्ता वस्तुओं और घरेलू संपत्तियों के अधिग्रहण में वृद्धि रिपोर्ट की है। 2015 के LBC सर्वेक्षण के अनुसार कुडुम्बश्री से जुड़ने से पहले जहाँ 22.9% प्रतिशत महिलाओं का परिवार कच्चे मकानों में रहता था, वहीं कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद यह अनुपात गिरकर मात्र 6.7% रह गया।l इस सर्वेक्षण में कुडुम्बश्री की सदस्याओं ने बताया कि बढ़ी हुई आमदनी ने उन्हें अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने, और अपने घरों की मरम्मत या नए घरों के निर्माण में मदद की।

कुडुम्बश्री से जुड़ी महिलाओं के एक बड़े हिस्से—अंबिका देवी के अध्ययन के अनुसार 27.4% और LBC सर्वे के अनुसार 36%—ने बताया कि कुडुम्बश्री से जुड़ने के बाद उनकी सार्वजनिक रूप से बोलने की क्षमता में सुधार हुआ है। LBC सर्वे में 38.4% महिलाओं ने बताया कि उनमें सरकारी कार्यालयों में जाकर सेवाएँ या सुविधाएँ माँगने की काबिलियत और आत्मविश्वास में निखार आया है।li कुडुम्बश्री से जुड़ने की वजह से सदस्याओं में बैठकों में भाग लेने, अपनी बात रखने, और स्थानीय शासन की गतिविधियों में शामिल होने का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। कुडुम्बश्री की सामूहिक गतिविधियों ने पारस्परिक सहयोग की भावना को मजबूत किया है और इसे व्यवहारिकता में उतारने में मदद की है।lii

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, केरल की स्थानीय सरकारों की गतिविधियों में कुडुम्बश्री सदस्याएँ एक सक्रिय भूमिका निभाती हैं। इसका सीधा असर स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में उनके प्रतिनिधित्व पर भी पड़ा है। 2020 के स्थानीय निकाय चुनावों में निर्वाचित 21,854 सदस्यों में से 7,058 सक्रिय कुडुम्बश्री सदस्याएँ थीं।liii

कुडुम्बश्री केरल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। इसने महिलाओं—विशेषकर आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित तबक़े से आने वाली महिलाओं—को अपने जीवनस्तर में सुधार लाने में मदद की है। कुडुम्बश्री ने परिवार के भीतर उनकी हैसियत को सुदृढ़ किया है और उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र, विशेषकर राजनीति में, अधिक प्रभावी ढंग से भाग लेने में सक्षम बनाया है। इन्हीं सब कारणों से इसे विश्व के ‘सबसे महत्वपूर्ण लैंगिक न्याय और ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में से एक’ बताया गया है।liv

संदर्भ

iKarl Marx, ‘Inaugural Address of the Working Men’s International Association’, London, 21 October 1864, https://www.marxists.org/archive/marx/works/1864/10/27.htm.

ii1964 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी दो राजनीतिक दलों में बँट गयी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई(एम) तथा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई)। केरल की सरकार का नेतृत्व सीपीआई(एम) ने किया है और इसमें सीपीआई तथा अन्य लोकतांत्रिक दल शामिल रहे हैं इन सरकारों के कार्यकाल कुछ इस प्रकार हैं: 1967–1969, 1980–1982, 1996–2001, 2006–2011 और 2016–वर्तमान। 1969 से 1977 के दौरान सीपीआई और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार के मुख्य घटक दल थे; सीपीआई(एम) प्रतिपक्ष में थी।

iiiKarl Marx, Capital. A Critique of Political Economy, vol. 3 (New Delhi: LeftWord Books, 2010), 440.

ivपेरिस कम्यून पर और जानकारी के लिए देखें: Tricontinental: Institute of Social Research, Paris Commune 150, (New Delhi: LeftWord, 2021), https://thetricontinental.org/text-paris-commune/.

vKarl Marx, ‘The Civil War in France’, in Collected Works, vol. 22 (Progress Publishers, 1986), 335.

vi‘Number Statement 2025’, Department of Cooperation, Government of Kerala, 31 March 2025, https://cooperation.kerala.gov.in/wp-content/uploads/2019/04/Number-statement-2025.pdf.

viiAshique Ali Thuppilikkat, ‘A Short History of the Cooperative Movement in Northern Malabar, Kerala’, Economic and Political Weekly 59, no. 30, 3 August 2024.

viiiMalayala Manorama, 29 December 1929.

ixKarl Marx, ‘Letter to Wilhelm Bracke’, in Marx/Engels Selected Works, vol. 3 (Moscow: Progress Publishers, 1970), 11.

xPyaralal Raghavan, ‘Growth and Performance of Cooperatives in Kerala: A Preliminary Analysis’, AK Gopalan Centre for Cooperative Enterprises and Alternative Politics, Kannur University, Kerala, 2019, https://papers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=4031735.

xiEMS Namboodiripad, With the Ploughshare and the Sickle: Kisan Sabha in the Campaign for More Food (Bombay: People’s Publishing House, 1943).

xiiरोचडेल इंग्लैंड का एक ऐतिहासिक शहर है। इसे सहकारी आंदोलन का जन्मस्थान माना जाता है। 1844 में कपड़ा उद्योग से जुड़े मज़दूरों ने मिलकर रोचडेल सोसाइटी ऑफ इक्विटेबल पायनियर्स के नाम से एक सहकारी संस्था की स्थापना की थी।

xiiiCamila Piñeiro Harnecker, Cooperatives and Socialism: A View from Cuba (New York: Springer, 2012).

xivE Gopalakrishna Menon, Cooperatives Movements and Communists (Ernakulam: Prabhat Book House, 1956).

xvFinancial Staff, ‘Tata Tea Pays £271m for Tetley’, The Guardian, 28 February 2000, https://www.theguardian.com/business/2000/feb/28/2.

xviNatalie J Langford, ‘From Global to Local Tea Markets: The Changing Political Economy of Tea Production within India’s Domestic Value Chain’, Development and Change 52, no. 6 (2021): 11.

xviiPolicy Report to Support Development of Small Tea Growers in India, Solidaridad Network Asia Limited, February 2023.

xviiiKingshuk Sarkar, ‘Trends and Price Formation Mechanism in Indian Tea Auctions’, NRPPD Discussion Paper 23 (2013), https://cds.edu/wp-content/uploads/2021/02/NRPPD23.pdf.

xixRoopak Goswami, ‘Small Tea Growers Report Looks at Farming Issues in India, Better Pricing Models, the Future of Tea’, World Tea News, 7 June 2023, https://www.worldteanews.com/origins/small-tea-growers-report-looks-farming-issues-india-better-pricing-models-future-tea.

xx‘Kozhikode ULCCS a Role Model for Labour Cooperatives, Says UN Official’, The Hindu, 19 September 2013, https://www.thehindu.com/news/cities/kozhikode/kozhikode-ulccs-a-role-model-for-labour-cooperatives-says-un-official/article5144802.ece.

xxiपयट्ट और कुरिक्कल्याणम मालाबार के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित ऐसी विधियाँ हैं जिनके माध्यम से लोग घर बनाने, शादियों के खर्च पूरे करने, अपने पुत्रों को खाड़ी देशों में रोज़गार के लिए भेजने, तथा अन्य वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने के लिए धन इकट्ठा करते हैं। जिस व्यक्ति को धन की आवश्यकता होती है वह एक कार्यक्रम आयोजित करता है जिसमें चाय और नाश्ता परोसा जाता है। इस कार्यक्रम में पधारने वाले सभी लोग आर्थिक योगदान देते हैं। बाद में इस कार्यक्रम का आयोजक दूसरे लोगों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में आर्थिक योगदान देता है। इस तरह पारस्परिक सहयोग से समुदाय के भीतर लोग अपनी वित्तीय ज़रूरतें पूरी करते हैं।

xxiiKerala State Planning Board, Economic Review 2024, Volume 2 (Thiruvananthapuram: Government of Kerala, January 2025), http://www.niyamasabha.org/codes/15kla/session_13/Economic%20Review/Economic%20Review_2024%20Eng_Vol%202.pdf.

xxiii‘Quarterly Statistics on Deposits and Credits of Scheduled Commercial Banks’, Reserve Bank of India, March 2024.

xxiv‘Performance of Primary Agricultural Credit Societies (April 1, 2022 to March 31, 2023)’, National Federation of State Cooperative Banks Ltd, 2023, https://nafscob.org/master/basic/images/fb749ee5ab92865a06a82bc450403466_1.pdf.

xxv‘Performance of Primary Agricultural Credit Societies (April 1, 2022 to March 31, 2023)’.

xxviSee: KK George et. al. and KUB Rao et. al., How the Poor Manage Their Finances: A Study of the Portfolio Choices of the Poor Households in Ernakulam District, Kerala (Reserve Bank of India and Centre for Socio-economic and Environmental Studies, 2013); Aswathi Rebecca Asok et. al., Indebtedness Among the Rural Poor in Kerala (Kochi: Centre for Socio-economic and Environmental Studies, 2020).

xxviiKerala Dinesh Beedi Golden Jubilee Souvenir, 2019, Kannur, Editor: Narayanan Kavubayi.

xxviiiKerala Dinesh Beedi Golden Jubilee Souvenir, 2019, Kannur, Editor: Narayanan Kavubayi.

xxix‘Data on Kudumbashree’, Kudumbashree, accessed 1 September 2025, https://kudumbashree.org/pages/518 (See the IBCB-Organisation tab); Technical Group on Population Projections, Census of India 2011: Population Projections for India and States, 2011–2036 (New Delhi: National Commission on Population, Ministry of Health and Family Welfare, July 2020).

xxx कुडुम्बश्री राज्य द्वारा शुरू किया गया एक कार्यक्रम है। समुदायआधारित नेटवर्क इसकी मूल संरचना में निहित है। यह सामुदायिक नेटवर्क, जिसे प्रायः ‘कुडुम्बश्री’ कहा जाता है, ‘एक सदस्य, एक वोट’ के सिद्धांत पर अपने सदस्यों द्वारा ही संचालित होता है। इसके विपरीत, निजी क्षेत्र की कंपनियों में शेयरधारकों के मतदान अधिकार उनके पास मौजूद शेयरों की संख्या के अनुपात में होते हैं। सहकारी संस्थाएँ निजीक्षेत्र के मॉडल से हटकर ‘एक सदस्य, एक वोट’ के सिद्धांत को अपनाती हैं। अंतरराष्ट्रीय सहकारी संघ (International Cooperative Alliance) के अनुसार, ‘सहकारी संस्थाएँ लोगों को लोकतांत्रिक और समान रूप से एक साथ लाती हैं। चाहे सदस्य ग्राहक हों, कर्मचारी हों, उपभोक्ता हों या निवासी हों, सहकारी संस्थाओं का संचालन “एक सदस्य, एक वोट” के नियम के अनुसार लोकतांत्रिक ढंग से किया जाता है। संस्था में लगाया गया पूंजी निवेश चाहे जितना भी हो, प्रत्येक सदस्य को समान मतदान अधिकार प्राप्त होता है।’ (‘What is a cooperative?’, International Cooperative Alliance, https://ica.coop/en/cooperatives/what-is-a-cooperative)

xxxi‘History and Evolution’, Kudumbashree, accessed 25 October 2022, https://kudumbashree.org/pages/178; Paloli Mohammed Kutty, ‘Kudumbashree: Sthree Shaaktheekaranathil Oru Nishabda Viplavam’ [Kudumbashree: A Silent Revolution in Women’s Empowerment], interview by K. P. Jayendran, Chintha Weekly, 15 July 2022.

xxxii1950 में भारत सरकार ने देश के विकास हेतु आर्थिक नियोजन की प्रक्रिया की अगुई करने के लिए योजना आयोग की स्थापना की थी। नवउदारवादी सुधारों के एजेंडे के तहत 2014 में केंद्र सरकार ने इसे भंग कर दिया। केरल का राज्य योजना आयोग आज भी सक्रिय है जो राज्यस्तर पर विकास की योजनाएँ तैयार करता है। विकेंद्रीकृत योजना के लिए जन योजना अभियान (People’s Plan Campaign) की शुरुआत के साथ राज्य सरकार से स्थानीय स्वशासी संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय संसाधन और अधिकार मिले, ताकि स्थानीय स्तर पर वो अपनी आवश्यकताओं के आधार पर खुद की विकास योजनाएँ बना सकें।

xxxiii‘Overview’, Kudumbashree, accessed 25 October 2022, https://www.kudumbashree.org/pages/7 (See the tab ‘The Mission Setting Up’).

xxxivKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability: A Study of the Impact of Kerala’s Kudumbashree System on Its Members and Their Families (Thiruvananthapuram: Laurie Baker Centre for Habitat Studies, October 2017), 5, 57.

xxxvBenny Kuruvilla, ‘Kerala’s Web of Cooperatives: Advancing the Solidarity Economy’, in Public Finance for the Future We Want, eds. Lavinia Steinfort and Satoko Kishimoto (Amsterdam: Transnational Institute, The Democracy Collaborative, Change Finance, Focus on the Global South, New Economics Foundation, Fairfin, MOBA Housing Network, and Tellus Institute, June 2019), https://longreads.tni.org/public-finance-chapter-4.

xxxvi‘Data on Kudumbashree’.

xxxviiManu Sankar (Programme Manager of Kudumbashree National Resource Organisation in Trivandrum), interviewed by Subin Dennis, 22 August 2022.

xxxviiiManu Sankar, interviewed by Subin Dennis.

xxxixManu Sankar, interviewed by Subin Dennis.

xlAzhar Moideen, ‘People’s Restaurants in Kerala Step in to Feed the Hungry’, NewsClick, 21 October 2021, https://www.newsclick.in/People-Restaurants-Kerala-Step-Feed-Hungry.

xli‘Data on Kudumbashree’, Kudumbashree, https://kudumbashree.org/pages/518 (See the NFL-ME tab and scroll down to find ‘Janakeeya Hotels’ [People’s Restaurants]). For further reading on Kerala’s response to the Covid-19 pandemic, see: Tricontinental: Institute for Social Research, CoronaShock and Socialism, Studies on CoronaShock, 8 July 2020, https://thetricontinental.org/studies-3-coronashock-and-socialism/.

xlii‘Data on Kudumbashree’ (See the NFL-ME tab in the web page).

xliii‘Data on Kudumbashree’ (See the NFL-ME tab in the web page).

xliv‘Data on Kudumbashree’ (See the NFL-ME tab in the web page).

xlvKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 99.

xlviKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 99.

xlviiAmbika Devi R, ‘A Study on Women Empowerment with Special Reference to Kudumbashree’ (PhD Thesis, Department of Commerce, University of Kerala, Thiruvananthapuram, 2010), 143.

xlviiiAmbika Devi R, ‘A Study on Women Empowerment with Special Reference to Kudumbashree’, 132.

xlixTaramol KG, ‘The Impact of Kudumbashree Projects in Ernakulam District with Special Reference to Their Role in the Eradication of Poverty and Unemployment’ (PhD Thesis, Research and Development Centre, Bharathiar University, Coimbatore, 2018), 178.

lKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability,175.

liAmbika Devi R, ‘A Study on Women Empowerment with Special Reference to Kudumbashree’, 201; KP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 195–196.

liiKP Kannan and G Raveendran, Poverty, Women and Capability, 206.

liii‘One-Third of Women Elected in Kerala Local Body Polls Are Active Kudumbashree Members’, NewsClick, 23 December 2020, https://www.newsclick.in/one-third-women-elected-kerala-local-body-polls-active-kudumbashree-members.

livP Sainath, ‘Kerala’s Women Farmers Rise above the Flood’, People’s Archive of Rural India, 24 September 2018, https://ruralindiaonline.org/en/articles/keralas-women-farmers-rise-above-the-flood/.