फ़िदेल x 100: विचारों और भावनाओं के संघर्ष की एक सदी
OSPAAAL से लेकर फ़िदेल x 100 तक, क्यूबा की क्रांतिकारी संस्कृति राजनीतिक चेतना का निर्माण, ऐतिहासिक स्मृति सहेजने और सीमाओं के पार एकजुटता का निर्माण करती रही है।
सुनिए कार्लोस पुएब्ला ‘Y en eso llegó Fidel’ (और फिर, फ़िदेल आए, 1959), इसे लैटिन अमेरिकी जोशीली गुआराचा लय में गाया गया। जिसने इस गीत को क्रांतिकारी क्यूबा से पूरे लैटिन अमेरिका के यूनियन हॉलों, कैंटीना (सराय), राजनीतिक स्कूलों और स्वतंत्रता आंदोलनों तक पहुँचाया।
हवाना, अगस्त 2026
6 से 9 अगस्त तक 180 से अधिक प्रतिनिधि हवाना विश्वविद्यालय में अल्बा मूविमिएंतोस की चौथी महाद्वीपीय असेंबली के लिए इकट्ठा हुए। ये प्रतिनिधि 27 देशों के 130 से ज़्यादा संगठनों से आए थे। यह असेंबली समाजवादी, साम्राज्यवाद-विरोधी, और महाद्वीपीय एकजुटता के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द चल रहे लोकप्रिय आंदोलनों की अभिव्यक्ति के लिए एक मंच प्रस्तुत करती है। इस असेंबली के सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत फ़िदेल x 100 के नाम से एक प्रदर्शनी के रूप में फ़िदेल कास्त्रो की जन्मशताब्दी मनाई गई। इस प्रदर्शनी में 32 देशों के 100 से अधिक संस्कृतिकर्मियों के 200 से अधिक पोस्टर शामिल हैं।
बाएँ: अभिनव (भारत, यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स/ट्राईकॉन्टिनेंटल); दाएँ: डैनिएला रुगेरी (अर्जेंटीना, ट्राईकॉन्टिनेंटल)
यह प्रदर्शनी अंतर्राष्ट्रीय पीपल्स असेंबली, अल्बा मूविमिएंतोस, Utopix, यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स, पैन अफ्रीकनिज्म टुडे, और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के खुले आह्वान से आयोजित की गई। इसमें शामिल कलाकृतियों में शैली, तकनीक, भाषा और राजनीतिक परंपरा से जुड़ी जो विविधता दिखाई दी, उसमें फ़िदेल की विरासत का अंतर्राष्ट्रीय विस्तार साफ़ दिखाई देता है। यह प्रदर्शनी सिर्फ़ फ़िदेल की जन्मशताब्दी की यादगार के तौर पर नहीं मनाई गई। बल्कि इसके ज़रिए संघर्ष के औज़ारों के रूप में फ़िदेल के विचारों को फिर से हासिल करने का प्रयास किया गया। फ़िदेल के ये वही विचार हैं जिन्होंने क्रांति को संभव बनाया था और उसे आज भी बरकरार रखा हुआ है।
इस प्रदर्शनी में शामिल सभी कलाकृतियाँ यहाँ से डाउनलोड की जा सकती हैं, दुनियाभर में संगठन इन्हें छपवा सकते हैं, इनकी प्रदर्शनी लगा सकते हैं, इनका अध्ययन कर सकते हैं। दशकों पहले जैसे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ एकजुटता संगठन (OSPAAAL) की पत्रिका ट्राईकॉन्टिनेंटल में पोस्टर छपा करते थे और दूरदराज़ तक पहुँचते थे, वैसे ही ये पोस्टर भी ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों तक पहुँचाए जाने के लिए बनाए गए हैं। इन्हें राजनीतिक स्कूलों की सभाओं से लेकर यूनियन के दफ़्तरों तक, क्लासरूम से लेकर आंदोलनों के मुख्यालयों और मोहल्लों की दीवारों तक पहुँचना चाहिए। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि इन्हें आप अपने तरीक़े से ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों तक पहुँचाएँ।
फ़िदेल x 100 एक बहुत बड़े इतिहास का हिस्सा है। क्यूबाई क्रांति ने संस्कृति को राजनीति से कमतर नहीं माना था, और न ही इसे महज़ क्रांतिकारी उपलब्धि की सजावट के सामान के तौर पर देखा। इसने तो सांस्कृतिक काम को क्रांति के निर्माण खंड के तौर पर देखा और समझा। इसे राजनीतिक चेतना गढ़ने, तकनीकी तथा कलात्मक क्षमता के विकास, सामूहिक स्मृति को बरकरार रखने और इस छोटे से द्वीप राष्ट्र से बाहर अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का विस्तार करने के उपकरण के रूप में देखा गया।
हवाना, ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन के साठ साल बाद
उस परंपरा को अपनी सबसे स्पष्ट संस्थागत अभिव्यक्ति जनवरी 1966 में मिली, जब हवाना ने पहला ट्राईकॉन्टिनेंटल सम्मेलन आयोजित किया। अफ्रीका, एशिया, और लैटिन अमेरिका भर के राष्ट्रमुक्ति आंदोलनों, क्रांतिकारी सरकारों, कम्युनिस्ट पार्टियों और लोकप्रिय संगठनों के 500 से अधिक प्रतिनिधि उपनिवेशवाद, पूँजीवाद और युद्ध के खिलाफ एक साझा साम्राज्यवाद-विरोधी रणनीति बनाने के लिए एकत्रित हुए।
बाएँ: ईयन मैचेट (यूएस, सॉर्ड्ज़ इंटू प्लाउशेर्ज़ पीस सेंटर एंड गैलरी); दाएँ: इग्नासीओ अंद्रेस पार्डो वैस्केज़ (चिली, Utopix and Quinmantú)
इस सम्मेलन से ही बीसवीं सदी में क्रांतिकारी अंतर्राष्ट्रीयतावाद के सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों में से एक OSPAAAL की शुरुआत हुई। अपनी पत्रिकाओं, एकजुटता अभियानों, शैक्षणिक कार्यों, और ख़ासतौर से पोस्टर बनाने के ज़रिए OSPAAAL ने तीनों महाद्वीपों में चल रहे संघर्षों के लिए एक साझी राजनीतिक भाषा तैयार करने में मदद की।
तीन दशकों में इस संगठन ने साठ से ज़्यादा देशों में लगभग 90 लाख पोस्टर वितरित किए, इनमें से कई ट्राईकॉन्टिनेंटल पत्रिका में हुआ करते थे। यह पत्रिका और इसमें शामिल पोस्टर दुनिया के उन कोनों तक पहुँचे जहाँ राजनयिक नहीं पहुँच पाए थे। ऐसा करके इन्होंने वियतनाम, फ़िलिस्तीन, अंगोला, मोज़ाम्बिक, पोर्टो रिको, दक्षिण अफ़्रीका, चिली, और दर्जनों अन्य देशों की संघर्षरत जनता एक-दूसरे को जान पाई, और इससे साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ एक साझा प्रतिरोध खड़ा करने का काम किया गया।
इन पोस्टरों को बनाने वाले कई ग्राफ़िक डिज़ाइनरों ने यह कला क्रांति से पहले हवाना की विज्ञापन एजेंसियों में सीखी थी। 1959 के बाद उन्होंने अपनी इसी कला को साम्राज्य के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया। टाइपोग्राफ़ी, फ़ोटोग्राफ़ी, रंग, मांटाज़ आदि जैसी दृश्य तकनीकें किसी ज़माने में वस्तुओं को बेचने के लिए प्रयोग में लाई जाती थीं। उन्हें अब अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता तैयार करने, साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों को तमाम भाषाओं के लिए सुगम बनाने और एक ऐसी क्रांतिकारी दृश्य भाषा गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा था जो सरहदों के पार पहुँच सके।
जैसा कि क्यूबाई डिज़ाइनर फ़ीलिक्स बेल्ट्रान ने बाद में कहा, ‘पोस्टर उन देशों में भी जा सकते थे जहाँ लोगों को क्रांति की बात रखने की मनाही थी’।
इसलिए पोस्टर उस दौर में संप्रेषण (communication) के माध्यम भर नहीं रह गए थे। घेरेबंदी और राजनयिक अलगाव की स्थितियों में, पोस्टर अंतर्राष्ट्रीय संगठन का एक उपकरण बन गए थे। सिनेमेटोग्राफ़िक आर्ट और इंडस्ट्री के क्यूबन संस्थान (Instituto Cubano del Arte e Industria Cinematográficos, ICAIC) की क्रांतिकारी फ़िल्में, कासा दे लास अमेरिकास के संपादकीय कार्य, और क्रांति के दशकों बाद तक बनते रहे अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ OSPAAAL ने मिलकर सांस्कृतिक बुनियादी ढाँचे का एक बड़ा हिस्सा तैयार किया जिसके ज़रिए क्यूबा ने अपने क्रांतिकारी प्रोजेक्ट को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दिया।
क्रांति केवल संस्कृति और विचारों से जन्म लेती है
बीसवीं सदी के अंत तक, क्यूबाई क्रांति ने उस सबका सामना किया जो कइयों के मुताबिक़ उसके लिए अंतिम परीक्षा थी। सोवियत संघ के विघटन ने इस द्वीप राष्ट्र को एक विशेष काल (Special Period) में धकेल दिया, जबकि वॉशिंगटन ने यह सोचते हुए क्यूबा की घेरेबंदी और सख़्त कर दी कि समाजवाद आख़िर आर्थिक अलगाव के सामने धराशायी हो जाएगा। पूरी दुनिया में, नवउदारवाद की जीत पर राजनीति विज्ञानी फ़्रैन्सिस फुकूयामा के शब्दों में ‘इतिहास के अंत’ की घोषणा कर दी गई, और क्यूबा को उस अतीत की एक छाया भर मान लिया गया जो आज नहीं तो कल ग़ायब हो जाने वाली थी।
इस ऐतिहासिक दौर में ही, वेनेज़ुएला केंद्रीय विश्वविद्यालय के आऊला माग्ना (मुख्य भवन) में 3 फ़रवरी 1999 को अपने वक्तव्य में फ़िदेल ने एक बार फिर उस सिद्धांत की ओर रुख़ किया जिसने क्रांति के शुरुआती दौर से ही अपनी ख़ास जगह बनाई हुई थी। यह था ‘Una revolución solo puede ser hija de la cultura y las ideas’ (क्रांति केवल संस्कृति और विचारों से ही जन्म लेती है)।
बाएँ: इंग्रिड नेवेस (ब्राज़ील, ट्राईकॉन्टिनेंटल); दाएँ: इज़ाबेल मोलिन (ब्राज़ील, एमएसटी)
यह संस्कृति की अमूर्त रक्षा नहीं थी, न ही भौतिक परिवर्तन के ऊपर विचारों की लड़ाई को तरजीह देने का आह्वान था। यह तो इस बात को फिर से स्वीकार करना था कि क्रांतियों को ख़ुद-ब-ख़ुद क्रांतिकारी लोग विरासत में नहीं मिल जाते, इनमें वे सांस्कृतिक और बौद्धिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं जो क्रांति को बरकरार रखने में ज़रूरी होते हैं। बल्कि क्रांतियों को ऐसे लोग तैयार करने पड़ते हैं। राजनीतिक चेतना, तकनीकी क्षमता, सामूहिक अनुशासन और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता किसी आर्थिक बदलाव से अचानक नहीं बन जाते। इन्हें पीढ़ियों तक सचेत रूप से संगठित, गढ़ना और पुनरुत्पादित करना पड़ता है।
1961 का राष्ट्रीय साक्षरता अभियान, 1961 (Campaña Nacional de Alfabetización) क्रांति के इसी सिद्धांत का शुरुआती साकार रूप था। कोनराडो बेनिटेज़ ब्रिगेड (Conrado Benítez Brigades) के 1,00,000 से अधिक युवा ब्रिगेडिस्टा (कार्यकर्ता) एक राष्ट्रव्यापी साक्षरता सेना के हिस्से के रूप में ग्रामीण इलाकों में गए। अभियान के अंत तक, 7,00,000 से अधिक वयस्कों को पढ़ना-लिखना सिखाया जा चुका था, जिससे क्यूबा में निरक्षरता 3.9% तक कम हो गई। फिर भी साक्षरता केवल एक परिणाम थी। जिन्होंने पढ़ाया, वे उन लोगों के साथ-साथ बदल गए, जिन्होंने सीखा – उन्होंने ग्रामीण गरीबी को प्रत्यक्ष रूप से देखा और क्यूबाई समाज के पुनर्निर्माण में सीधे भाग लिया। शिक्षा केवल ज्ञान का हस्तांतरण नहीं रही; बल्कि एक नए क्रांतिकारी विषय का निर्माण बन गई।
यही सिद्धांत क्रांति के प्रकाशकों और पत्रिकाओं, फिल्म संस्थानों, कला विद्यालयों, वैज्ञानिक केंद्रों, चिकित्सा प्रशिक्षण कार्यक्रमों, और अफ्रीका, एशिया, तथा लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ शैक्षिक आदान-प्रदान को आकार देता था। उन सभी ने मिलकर सांस्कृतिक बुनियादी ढाँचा बनाया, जिसके माध्यम से क्रांति न केवल अपनी रक्षा करना चाहती थी; बल्कि अपना पुनरुत्पादन करना और व्यापक साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष में योगदान करना चाहती थी।
हवाना की सांस्कृतिक कांग्रेस, 1968
जनवरी 1968 में आठ दिनों तक, होटल हबाना लिब्रे में सत्तर से अधिक देशों के लगभग 500 प्रतिभागी हवाना की सांस्कृतिक कांग्रेस के लिए इकट्ठा हुए। इस कांग्रेस को अक्सर लेखकों और कलाकारों की एक बैठक के रूप में याद किया जाता है; लेकिन इससे इसके विस्तार की संभावना का सही आँकलन नहीं लग सकता। प्रतिभागियों में उपन्यासकार, कवि, अर्थशास्त्री, चिकित्सक, वैज्ञानिक, वास्तुकार, फिल्म निर्माता, प्रकाशक, शिक्षाविद्, समाजशास्त्री, आलोचक, सांस्कृतिक प्रशासक और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के जुझारू कार्यकर्ता शामिल थे। निर्भरता सिद्धांतकारों और चित्रकारों ने एक कमीशन में एक साथ काम किया; शिक्षक गुरिल्लाओं के साथ काम कर रहे थे; नए-नए स्वतंत्र राज्यों के प्रतिनिधि उन आयोजकों से मिले, जो औपनिवेशिक शासन के तहत गुप्त रूप से काम कर रहे थे। प्रतिनिधिमंडलों में वियतनाम के लोकतांत्रिक गणराज्य और दक्षिण वियतनामी मुक्ति आंदोलन के प्रतिभागी शामिल थे; साथ ही गिनी-बिसाऊ, अंगोला, और केप वर्डे के मुक्ति संघर्षों के प्रतिनिधि – पूरे लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, यूरोप, और उत्तरी अमेरिका के प्रतिनिधि। वे पृथक राष्ट्रीय संस्कृतियों के प्रतिनिधियों के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा साम्राज्यवाद-विरोधी परियोजना के प्रतिभागियों के रूप में मिले। यह कांग्रेस क्यूबाई क्रांति की संस्कृति की विस्तृत समझ को प्रतिबिंबित करती थी –जिसे केवल कलात्मक उत्पादन के रूप में नहीं; बल्कि संपूर्ण क्षेत्र के रूप में देख़ा गया, जिसके माध्यम से समाज ज्ञान, मूल्यों, संस्थाओं, तकनीकी क्षमताओं, और राजनीतिक चेतना का उत्पादन करते हैं।
बाएँ: काएल अबेल्लो (वेनेज़ुएला, Utopix/ट्राईकॉन्टिनेंटल; दाएँ: ओल्फ़र (पेरू, Utopix)
इस कांग्रेस ने निम्न तीन अंतरसंबंधित विचारों को आगे बढ़ाया।
पहले का संबंध बौद्धिक श्रम की भूमिका से था। क्रांतिकारी संघर्ष के लिए सिर्फ़ सहानुभूतिपूर्ण कलात्मक प्रतिनिधित्व काफ़ी नहीं है। लेखकों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शिक्षकों, अर्थशास्त्रियों, फिल्म निर्माताओं, प्रकाशकों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं आदि सभी के पास ज्ञान के विशिष्ट रूप थे। ये या तो साम्राज्यवादी प्रभुत्व को पुनरुत्पादित कर सकते थे या मुक्ति के लिए संगठित किए जा सकते थे। उनका काम क्रांति को बाहर से देखना नहीं था; बल्कि अपने कार्य को राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवादी निर्माण की सामूहिक परियोजना के भीतर लाना था।
दूसरा विचार संगठनात्मक था। अप्रैल 1967 में बोलीविया में लड़ते हुए चे ग्वेरा ने अपने ‘ट्राईकॉन्टिनेंटल को संदेश’ में ‘दो, तीन, अनेक वियतनाम’ का आह्वान किया। ताकि साम्राज्यवाद को कई मोर्चों पर चुनौती दी जा सके। जनवरी 1968 में जब कांग्रेस हुई, तो चे को तीन महीने पहले ही बोलीविया में मार दिया जा चुका था। कांग्रेस का समापन करते हुए, फ़िदेल ने चे की उस रणनीति को एक अन्य क्षेत्र पर लागू किया और ‘संस्कृति के क्षेत्र में एक वियतनाम’ (un Vietnam en el terreno de la cultura) का आह्वान किया। साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष युद्धक्षेत्र या कारखाने तक सीमित नहीं रह सकता था। इसके लिए उन संस्थाओं की भी आवश्यकता थी, जो ज्ञान के उत्पादन, तस्वीरों के संचार, पश्चिमी वैज्ञानिक और तकनीकी प्राधिकार, प्रकाशन, शिक्षा, और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया को चुनौती दे सकें।
तीसरा विचार इतिहास के भूगोल को ही चुनौती देता था। क्यूबाई कवि और कासा दे लास अमेरिकास के बाद के अध्यक्ष, रॉबर्टो फर्नांडीज़ रेटामार ने ‘विकसित’ और ‘अविकसित’ देशों के बीच की परिचित विभाजन-रेखा को अस्वीकार कर दिया। इसकी बजाय उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आधुनिक दुनिया में दो तरह के देश हैं, एक वे जिन्हें अविकसित बनाया गया था और दूसरे वे जिन्होंने उन्हें अविकसित बनाया था। इसका निहितार्थ अर्थशास्त्र से परे था। यदि उपनिवेशवाद ने एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका को इतिहास की ‘परिधि’ (periphery) पर धकेल दिया था; तो तीसरी दुनिया में उभरते मुक्ति संघर्षों ने उस भूगोल को उलटना शुरू कर दिया था। ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रमुख इंजन अब साम्राज्यवादी महानगरों (imperial metropoles) में नहीं था। बल्कि यह उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, और पूँजीवादी वर्चस्व के खिलाफ लड़ने वाले लोगों में था। जैसा कि रेटामार ने बाद में अपने निबंध ‘कैलिबान’ (Calibán) में स्पष्ट किया – तीसरी दुनिया ही थी जो क्रांतिकारी संगम और इतिहास के केंद्र में खड़ी थी।
यह विरासत ट्राईकॉन्टिनेंटल के नवीनतम डोसियर का विषय है – ‘संस्कृति के क्षेत्र में एक वियतनाम: हवाना की सांस्कृतिक कांग्रेस, 1968’ (अगस्त 2026)। इसे यहाँ पढ़ा जा सकता है।
फ़िदेल x 100
फिदेल कास्त्रो की मृत्यु के लगभग एक दशक बाद, क्यूबाई क्रांति विशेष काल के बाद से अपने सबसे कठिन दौर में से एक का सामना कर रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) ने एक बार फिर आधुनिक इतिहास की सबसे लंबी आर्थिक घेरेबंदी को और सख़्त कर दिया है। क्यूबा का ‘आतंकवाद के राज्य-प्रायोजक’ सूची में लगातार बना रहना, द्वीप की अंतर्राष्ट्रीय वित्त और व्यापार तक पहुँच को और प्रतिबंधित करता है। इसके साथ ही वाशिंगटन ने द्वीप तक तेल पहुँचाने पर पूरी तरह घेरेबंदी लगाने के लिए कदम उठाए हैं। इसकी वजह से मार्च 2026 में पहुँचे एक रूसी टैंकर के अलावा यहाँ तेल नहीं पहुँच सका है। प्रतिबंधों के प्रभाव उस आर्थिक युद्ध के इच्छित परिणाम हैं, जिन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी को लगातार और तेज़ी से मुश्किल बनाने तथा क्रांति की सामाजिक नींव को कमज़ोर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
आर्थिक युद्ध और विचारधारात्मक युद्ध हमेशा एकसाथ चले हैं। क्यूबा की घेरेबंदी सिर्फ़ इसे भौतिक रूप से ही जकड़ना नहीं चाहती बल्कि इसके क्रांतिकारी अनुभवों से नई पीढ़ियों और दुनिया के लोगों को भी दूर रखना चाहती है। इस रणनीति से क्रांति की रक्षा को महज़ आर्थिक प्रतिरोध तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। इसके लिए ज़रूरी है संस्कृति को लगातार संगठित करना, राजनीतिक शिक्षा, ऐतिहासिक स्मृति और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता। इस ऐतिहासिक क्षण में, फ़िदेल के विचारों को फैलाना सिर्फ़ उन्हें याद करना भर नहीं है बल्कि क्रांतिकारी प्रक्रिया की रक्षा करना भी है।
बाएँ: टिंग्स चक (चीन, ट्राईकॉन्टिनेंटल); वंशिका बब्बर (भारत, ट्राईकॉन्टिनेंटल/यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स)
यह प्रदर्शनी उस अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक मोर्चे की एक समकालीन अभिव्यक्ति है, जिसने लगभग छह दशक पहले हवाना में आकार लिया था। यह 100 से अधिक सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के काम को एक साथ लाई है। इन कार्यकर्ताओं में से कई जन-संगठनों के कार्यकर्ता हैं – भारत में यंग सोशलिस्ट आर्टिस्ट्स से लेकर ब्राज़ील में भूमिहीन मज़दूर आंदोलन (एमएसटी) तक और यूएस में पार्टी फ़ॉर सोशलिज़म एंड लिबरेशन तक।
ये पोस्टर फ़िदेल को अलग-अलग रूप में देखते हैं। कुछ उस युवा क्रांतिकारी की ओर लौटते हैं जिसने 1953 में मोंकाडा हमले के बाद ‘इतिहास मुझे निर्दोष ठहराएगा’ कहकर बचाव में अपना पक्ष रखा था। कुछ विचारों की लड़ाई, साक्षरता, कृषि-सुधार, चिकित्सा के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीयतावाद और साम्राज्यवाद-विरोधी अंतर्राष्ट्रीयतावाद की ओर देखते हैं। उनकी विविधता उन अनेक मोर्चों को प्रतिबिंबित करती है जिन पर फ़िदेल की विरासत वर्तमान संघर्षों से बात करती रहती है।
यह प्रदर्शनी अब तक अर्जेंटीना के मारिआतेगुई स्कूल (Mariátegui School), ब्राज़ील के एमएसटी कैम्पों, मैक्सिको में 26 जुलाई आंदोलन की स्मृति में होने वाली सभाओं, श्रीलंका में ‘हैंड्स ऑफ एशिया’ कार्यक्रमों और पाकिस्तान में राजनीतिक शिक्षा कार्यक्रमों में दिखाई जा चुकी है।
अभिलेखागार (archive) डाउनलोड कीजिए। पोस्टर छपाइए। इन्हें राजनीतिक स्कूलों, ट्रेड यूनियन कार्यालयों, सामुदायिक केंद्रों, पार्टी मुख्यालयों, पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों, आंदोलन स्थलों और मोहल्ला सभाओं तक पहुँचाइए। इनका उपयोग पढ़ाने, बहस करने, याद करने और – सबसे बढ़कर – संगठित करने के लिए कीजिए। आइए हम क्यूबाई क्रांति की छवियों और विचारों को कई गुना बढ़ाएँ। फ़िदेल की विरासत को आगे बढ़ाएँ, और ‘संस्कृति के क्षेत्र में एक वियतनाम’ बनाने के कार्य को जारी रखें। फ़िदेल के जन्म के एक सदी बाद यह काम अभी भी हमारे सामने है।
एकजुटता के साथ,
काएल अबेल्लो, Utopix art collective और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के कला और संस्कृति विभाग के सदस्य हैं।
टिंग्स चक, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के कला और संस्कृति विभाग की सह-संयोजक हैं।