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भारतीय अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल का दौर

तीन दशकों के उदारीकरण ने भारत के औद्योगीकरण का सपना तोड़ा; सेवा क्षेत्र रोज़गार और समृद्धि का विकल्प नहीं।

D96_Cover_Web2. Gigi Scaria, Someone Left a Horse on the Shore, 2007.

इस डोसियर में भारतीय कलाकार गिगी स्कारिया की कलाकृतियाँ प्रस्तुत की गई हैं। उन्होंने चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी, इंस्टॉलेशन आर्ट, मूर्तिकला और वीडियो के ज़रिए भारत के शहरी और ग्रामीण जीवन के बदलावों तथा देश के विभिन्न सामाजिक समूहों पर पड़ने वाले उनके प्रभावों को अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत मूर्तियाँ और इंस्टॉलेशन भारत के लोगों के जीवंत अनुभवों का स्मारक हैं— विरोधाभासों, बढ़ती असमानताओं और अविकास से जन्मी अधूरी आकांक्षाओं के बीच।


गिगी स्कारिया, व्हील, 2009

भूमिका

दुनिया की आर्थिक व्यवस्था लगातार बदल रही है और भूमंडलीकरण एक लंबे संकट से गुज़र रहा है। नब्बे के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) की अगुआई में पश्चिमी पूंजी ने व्यापार में उदारीकरण और वैश्विक आपूर्ति शृंखला को बढ़ावा दिया, इसने वैश्विक दक्षिण और उत्तर के बीच श्रम की लागत के अंतर का बेजा फ़ायदा उठाया। आज ट्रम्प के नेतृत्व में वर्चस्ववादी यूएस अपनी ही प्रसारित इन प्रक्रियाओं को कमज़ोर कर रहा है ताकि भूमंडलीकरण के अनचाहे परिणामों को पलटा जा सके: ये परिणाम हैं यूएस का आर्थिक पतन और वैश्विक दक्षिण की एक उभरती हुई ताक़त का प्रौद्योगिकी विकास।

हालाँकि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था नया आकार ले रही है, लेकिन इसके बीच भारतीय अर्थव्यवस्था उदारीकरण की पैंतीस सालों की जकड़न में क़ैद है। इसकी संरचनात्मक समस्याएँ हैं जिनकी जड़ गहरी असमानताओं में है और जो उदारवादी नीतियों से और भी बढ़ गई हैं। इन समस्याओं ने एक व्यापक, तकनीकी रूप से विकसित घरेलू औद्योगिक ढाँचा तैयार नहीं होने दिया। भारतीय उद्योगों की इस ख़राब हालत के कारण देश के श्रमबल का बड़ा हिस्सा इनसे बाहर है और रोज़ी-रोटी कमाने भर के लिए असुरक्षित, कम आय, कम उत्पादकता वाले काम करने को मजबूर है। नतीजतन देश की ज़्यादातर आबादी ग़रीबी में जीने को मजबूर है, जबकि अधिकारिक दावे किए जा रहे हैं कि इसमें भारी गिरावट आ रही है जो कि जबरन गढ़े गए आँकड़ों के सहारे टिके हैं।1

उद्योगों के निरंतर अल्पविकास, ख़ासतौर से विनिर्माण क्षेत्र में, का कारण भारत के भूमंडलीकरण से रिश्ते में छिपा है। उदारीकरण का वादा था कि वह भारत की छिपी निहित संभवनाओं को आज़ाद कर सकता है, लेकिन इसने एक ऐसा रुझान तैयार किया जिसके केंद्र में विऔद्योगीकरण, संगठित रोज़गार को ख़त्म करना, उत्पादक क्षमता को कमज़ोर करना और सामाजिक असमानताओं को बढ़ाना है।

नरेंद्र मोदी सरकार की हिंदुत्व की राजनीति भारत के ‘विश्वगुरु’ होने का डंका पीट रही है, लेकिन इसके ऊँची विकास दर के दावे विवादास्पद आँकड़ों पर टिके हैं। जब सरकार से इसके बारे में सवाल किए जाएँ तो जवाब में गोलमोल बातें और दूसरों पर आरोप लगा दिए जाते हैं। 2014 में जब से मोदी सत्ता में आए हैं तब से उनकी राजनीतिक रणनीति रही है कि ख़राब हालात के लिए विपक्ष और पिछली सरकारों को दोषी क़रार दिया जाए। और उनके प्रधानमंत्री पद पर रहने के एक दशक बाद भी यही रणनीति जारी है। इसमें कोई दोराय नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा ख़स्ता हालत का कारण हैं नब्बे के दशक की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा लागू नवउदारवादी नीतियाँ, जिन्हें बाद की सब सरकारों ने भी अपनाया, इनमें मोदी-नीत भाजपा सरकार भी शामिल है जो इन नीतियों की सबसे कट्टर समर्थक है। 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने लंबे शासनकाल में मोदी ने भारतीय और विदेशी पूंजी की नज़र में अपनी नवउदारवादी छवि को और भी चमकाया।

लेकिन वे जिस आक्रामकता से इन्हीं नीतियों के और भी भयानक रूप को लागू कर रहे हैं उनकी वजह से समस्याएँ और बढ़ गई हैं, असमानता की खाई गहरी होती जा रही है और संकट बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद से उन्होंने कई नई नीतियों की घोषणा की जैसे मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिज़ाइन इन इंडिया और डिज़ाइन फ़ॉर द वर्ल्ड। इन नई पहलों का काम था कि ये विश्व बाज़ार के लिए भारत में डिज़ाइन और विनिर्माण के क्षेत्र में विदेशी पूंजी लाएँ, भारतीय स्टार्टअपों को नए तकनीकी क्षेत्रों में काम करने और वैश्विक स्तर के हिसाब से भारतीय श्रमबल के कौशल का विकास करें – ये सब काम भारतीय विनिर्माण में फिर से जान फूँकने के लिए किया जाना था लेकिन पश्चिमी बाज़ारों की ज़रूरतों के हिसाब से। सच्चाई यह है कि ये सब क़दम विनिर्माण को मज़बूत करने या विऔद्योगिकरण को पलटने में असफल रहे हैं। इनमें से अधिकतर सिर्फ़ कॉर्पोरेटों को सब्सिडी और करों में छूट देने का ही काम करते हैं, इस उम्मीद में कि इससे अपने आप ही औद्योगिक विस्तार हो जाएगा, ज़ाहिर है इसके नतीजे काफ़ी ख़राब रहे।

इसी तर्ज़ पर जो एक क़दम उठाया गया था, जिसका काफ़ी प्रचार किया गया, वह है उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना। यह चौदह उद्योगों के लिए बनाई गई जिनमें से इलेक्ट्रॉनिक्स सबसे आगे रहा, इस क्षेत्र की भारतीय और विदेशी कंपनियों को उत्पादन के लिए सरकार ने सबसे ज़्यादा सब्सिडी दी। लेकिन यह योजना मुख्य रूप से आयातित घटकों की असेंबलिंग के लिए ही सब्सिडी देती है, इससे न तो भारत में बहुत अधिक धन आता है है और न ही तकनीकी क्षमता। भारत में बने स्मार्टफ़ोनों जैसे सामान में अधिकतर मूल्य वृद्धि विदेशों में ही होती है जबकि इन सब्सिडियों का बोझ आख़िरकार सार्वजनिक निवेश और सरकार के सामाजिक ख़र्च में कटौती के ज़रिए जनता को ही उठाना पड़ता है। भारतीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों के विकास में जो संरचनात्मक रुकावटें हैं उन्हें कॉर्पोरेटों को सब्सिडी देकर या बेतहाशा विदेशी निवेश से हटाया नहीं जा सकता; बल्कि ये नीतियाँ उसी संरचनात्मक बदहाली को फिर से स्थापित करती है जो भारत को आज़ादी के समय विरासत में मिली थी, जो उदारीकरण के बाद कई गुना बढ़ गई।


गहन असमानताएँ: आज़ादी के बाद औद्योगीकरण की रुकावटें

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो प्रौद्योगिकी और औद्योगिक आत्मनिर्भरता को बेहद अहम माना गया – सिर्फ़ इसलिए नहीं कि राजनीतिक आज़ादी बरक़रार रखी जा सके और पश्चिम के साथ औपनिवेशिक आर्थिक संबंधों को बदला जा सके, इसलिए भी कि बेरोज़गार खेत मज़दूरों को उद्योगों में लाकर उनका जीवन स्तर बढ़ाया जा सके। पंचवर्षीय योजनाओं के ज़रिए भारत ने औद्योगीकरण के एक तेज़ रफ़्तार कार्यक्रम की अपनी यात्रा शुरू की, यह कार्यक्रम सरकारी बड़े उद्योगों के विकास के इर्द-गिर्द चला। इस दौरान निजी पूंजी ने राज्य द्वारा निर्मित इस आधार से उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन किया। नतीजतन, आज़ादी के बाद के लगभग पंद्रह साल (लगभग 1947-1962) में सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व में अभूतपूर्व औद्योगीकरण का दौर देखा, जिसमें जीडीपी का 7% से 15.9% हिस्सा विनिर्माण का था – इसके बाद औद्योगीकरण का यह स्तर नहीं देखा गया।2 लेकिन जल्दी ही औद्योगीकरण की प्रक्रिया का सामना हुआ भारतीय समाज की गहन कृषि संबंधी और वर्गीय असमानताओं से।

अधिकांश भूमि का स्वामित्व एक छोटे-से ग्रामीण अभिजात वर्ग के पास था जबकि जनता का बड़ा हिस्सा भूमिहीन था और रोज़मर्रा की ज़रूरतों तक के लिए जूझ रहा था। समतामूलक भूमि सुधारों के अभाव में व्यापक ग़रीबी ने घरेलू माँग को कमज़ोर कर एक अंदरूनी रुकावट खड़ी की जिसकी वजह से भारतीय उद्योग निरंतर विकास के लिए ज़रूरी स्तर हासिल नहीं कर पाए। इसी दौर में अभिजात वर्ग के पश्चिमी ढर्रे के उपभोग के आयात केंद्रित तरीक़े ने विदेशी मुद्रा की कमी पैदा कर विकास को विदेशी जकड़न में भी डाल दिया।

भारत ने आयात को कम करने के लिए औद्योगीकरण की जो नीति अपनाई, वह भले ही वह व्यापक और गतिशील औद्योगिक क्षेत्र का निर्माण न कर पाई हो, लेकिन इसने देश के कुछ चुनिंदा बड़े व्यावसायिक घरानों वाले पूंजीपति वर्ग को ज़रूर मज़बूत किया। इन घरानों ने अपनी मौजूदगी को प्रभावी बनाया और राज्य की नीतियों पर असर डालने की अपनी क्षमता बढ़ाई।

एक तरफ़ दबदबे वाले भूस्वामी और पूंजीपति थे और दूसरी तरफ़ ग़रीब जनता, भूमिहीन मज़दूर और औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वालों का छोटा सा वर्ग, राज्य ने इस दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। सत्ताधारियों ने ऐसी नीतियों से किनारा किया जो अभिजात वर्ग के हितों के ख़िलाफ़ थीं – जैसे सही अर्थों में कृषि सुधार या संपत्तिधारी वर्गों पर पर्याप्त कर लगाना। इसका नतीजा हुआ कि राज्य द्वारा किया जा रहा औद्योगीकरण, प्रगतिशील कराधान (मोटे तौर पर, आय के आधार पर कर लगाना) की बजाय राजकोषीय घाटे पर निर्भर हो गया। विस्तारवादी राजकोषीय नीति (आर्थिक प्रगति के लिए सरकार द्वारा खर्च में बढ़ोतरी और करों में कटौती) के हर दौर ने ज़्यादा से ज़्यादा अधिशेष बड़े बुर्जुआ तक पहुँचाकर असमानताओं को और बढ़ाया। संचय की उनकी लालसा तो बढ़ती गई लेकिन संकीर्ण घरेलू बाज़ार ने उनकी संचय की संभावना को सीमित रखा। इसलिए भारतीय बुर्जुआ वर्ग के हाथों में पहुँचे निवेश करने योग्य अधिशेष का काफ़ी बड़ा हिस्सा औद्योगिक विस्तार की बजाय अन्य जगहों पर लगाया गया।

नतीजतन, औद्योगीकरण की प्रक्रिया अस्थिर और रुक-रुक कर आगे बढ़ी, कयोंकि राज्य द्वारा समन्वित विस्तार का हर प्रयास जल्दी ही उन्हीं संरचनात्मक बाधाओं से टकराता रहा। ये अनसुलझी बाधाएँ गंभीर भुगतान संतुलन संकट में बदल गईं, इसके साथ भारत ने एक प्रमुख व्यापारिक एवं वित्तीय सहयोगी यानी सोवियत रूस को भी खो दिया (रूबल-रुपए व्यापार ने भारत को वैश्विक मुद्रा में आए झटकों से बचाए रखा था)। अंतत: इस सबके चलते भारत 1991 में नवउदारवादी मोड़ पर निहत्था खड़ा हो गया, एक ऐसी व्यवस्था जो ब्रेटन वुड्ज़ संस्थानों (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक) द्वारा संचालित थी।

उदारीकरण के बाद

1991 में भारत ने औपचारिक तौर पर अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण कर दिया, लेकिन इसने औद्योगिक विकास के सामने खड़ी रुकावटों को दूर करने के कोई ख़ास प्रयास नहीं किए। बल्कि इसने भारतीय बुर्जुआ के लिए पूंजी संचय का काम आसान कर दिया और पहले आयात नियंत्रण के ज़रिए अभिजात वर्ग के उपभोग पर जो कुछ नियंत्रण किया गया था उसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया। यह सब एक मजबूत घरेलू विनिर्माण आधार विकसित करने की कठिनाइयों के बिना हासिल किया गया।

भारत की अपनी क्षमता भले ही गिरती गई लेकिन भारतीय अभिजात वर्ग विदेशों में बनी उपभोग की चीज़ों का मज़ा उठाता रहा और एक अल्पविकसित देश में रहते हुए भी दुनिया की बेहतरीन जीवनशैली का लुत्फ़ लेता रहा। इस प्रक्रिया ने भारतीय पूंजी का तेज़ रफ़्तार और अबाधित संचय होने दिया, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर अतिक्रमण के ज़रिए हो, घरेलू बाज़ार के आयात पर ज़ोर देने वाले उत्पादन में विस्तार के माध्यम से या छोटे उत्पादकों, व्यापारियों और लघु उद्योगपतियों को ख़त्म करके।

गिगी स्कारिया, अनटाइटल्ड, 2020

भारतीय नवउदारवाद के चार सिद्धांत

भारत में नवउदारवाद चार सिद्धांतों पर आधारित है, जिनसे सीधे तौर पर भारतीय विनिर्माण कमज़ोर हुआ है: व्यापार बाधाओं को हटाने का सिद्धांत; निजीकरण को बढ़ावा देने और सार्वजनिक क्षेत्र को कमज़ोर करने का सिद्धांत; सार्वजनिक ख़र्च में कटौती का सिद्धांत; और अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का सिद्धांत, जिसके तहत उत्पादक पूंजी (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, या एफडीआई) तथा वित्तीय पूंजी (पोर्टफोलियो निवेश) दोनों के लिए रास्ता बनाया गया। इनसे निकली नीतियों ने मिलकर एक ऐसा पैटर्न रचा है, जहाँ विकास, ऋण और विदेशी वित्तीय प्रवाह पर निर्भर है, न कि औद्योगीकरण और स्वायत्त तकनीकी विकास पर।

व्यापार उदारीकरण

भारत ने अपनी टैरिफ बाधाओं को 1990 के दशक की शुरुआत में हटाना शुरू किया, जिसके कारण साल 1995 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत को सदस्यता मिली। कृषि उत्पादों पर टैरिफ में बड़ी कटौती के चलते, शुरू के सालों में ही गहरा कृषि संकट पैदा हो गया, जिसके ख़िलाफ राजनीतिक विरोध भी बढ़ा।3 इसके कारण 1996 के बाद से कृषि क्षेत्र में टैरिफ कटौती को रोकना पड़ा। लेकिन, विनिर्माण क्षेत्र में उदारीकरण जारी रहा।

साल 2000 के बाद के दौर में, भारत ने आयात-निर्यात पर लगी पाबंदियाँ और तेज़ी से घटानी शुरू कर दीं।4 विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र के अनुरूप चलने के लिए, जिस पर अमेरिका और यूरोपीय संघ लगातार दबाव डाल रहे थे, भारत को वे आख़िरी संरक्षात्मक दीवारें भी गिरानी पड़ीं जो देश के छोटे व मझोले उद्योगों को सस्ते विदेशी माल से बचा रही थीं।

‘मुक्त’ व्यापार को औद्योगिक विकास से ऊपर रखने के फ़ैसले ने घरेलू विनिर्माण को नुकसान पहुँचाया, खास तौर पर उन क्षेत्रों में जो मशीनें (पूंजीगत वस्तुएँ) और उत्पादन की बुनियादी सामग्री (मध्यवर्ती वस्तुएँ) बनाते हैं। औसत आयात शुल्क तो कम किए ही गए थे, लेकिन मशीनों और बुनियादी सामग्रियों पर लगने वाला शुल्क, सीधे इस्तेमाल होने वाली तैयार वस्तुओं (उपभोक्ता वस्तुओं) के मुक़ाबले काफ़ी कम था। इसका मतलब यह हुआ कि टैरिफ व्यवस्था ने भारत में उपभोक्ता वस्तुएँ (तैयार सामान) बनाने वाली कंपनियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से एक सीमित सुरक्षा (‘ढाल’) दी, लेकिन वे भारतीय कंपनियाँ जो वो मशीनें या कच्चा माल बनाती थीं जिनसे ये तैयार सामान बनते हैं, उनके पास कोई ऐसी सुरक्षा नहीं थी। उन्हें सीधे सस्ते आयातों से मुक़ाबला करना पड़ा।

नई टैरिफ व्यवस्था से टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण करने वाली घरेलू और विदेशी फर्मों को लाभ हुआ। ऐतिहासिक रूप से घरेलू बाज़ार के लिए उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करने वाली बड़ी भारतीय कंपनियों ने घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को विकसित करने के बजाय सस्ती मशीनरी और मध्यवर्ती वस्तुओं को आयात करने का रास्ता चुना। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तो भारत को मुख्य रूप से एक असेंबली बेस के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय विनिर्माण की प्रक्रिया आयातों पर कहीं अधिक निर्भर हो गई।5 उदाहरण के लिए, फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में, सक्रिय औषधीय घटक (एपीआई) के उत्पादन में भारत काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर था। लेकिन उदारीकरण के बाद भारत फार्मास्यूटिकल इंटरमीडिएट्स (दवाएँ बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री) के आयात पर निर्भर हो गया। भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग अब 70% एपीआई चीन से आयात करता है, कुछ दवाएँ, जैसे पेनिसिलिन, पूरी तरह से चीनी आयात पर निर्भर हैं।6

आयात पर भारी निर्भरता ने पूंजीगत और मध्यवर्ती वस्तुओं के घरेलू उत्पादन को कमज़ोर किया।7 घरेलू पूंजीगत वस्तु उद्योग तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देता है, इसके कमज़ोर होने के साथ-साथ भारतीय उद्योग की तकनीकी क्षमताएँ भी सीमित होती गईं। और सीमित तकनीकी क्षमताओं के चलते देश का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में लगातार कमज़ोर होता गया।

सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण

1991 के बाद सार्वजनिक क्षेत्र को आक्रामक निजीकरण और लगातार उपेक्षा से व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया गया, जिसका विनिर्माण पर भी असर हुआ। भारत का पूंजीगत वस्तु उद्योग, सार्वजनिक उद्यमों का बड़ा हिस्सा था, विद्युत मशीनरी, मशीन टूल्स, प्रक्रिया संयंत्र उपकरण, अर्थ-मूविंग उपकरण और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन करता था। व्यापार उदारीकरण और राज्य की अनदेखी के बीच यह क्षेत्र तबाह हो गया। इन भारी उद्योगों को घटक आपूर्ति करने वाले सहायक छोटे और मंझोले उद्यम भी आयात प्रतिस्पर्धा और संस्थागत समर्थन ख़त्म होने के कारण कमज़ोर होते गए।

आज उद्योग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्रीय स्थान रखता है। ऐसे में 1990 के दशक में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की दुर्दशा, सार्वजनिक क्षेत्र की अनदेखी और व्यापार उदारीकरण से हुए संयुक्त नुक़सान का एक प्रमाण है।

1970 के दशक में, भारत ने सार्वजनिक कंपनियों के ज़रिए घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर उद्योग बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम उठाए थे। इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने परमाणु और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए स्वदेशी नियंत्रण प्रणालियाँ विकसित कीं। अस्सी के दशक में सरकार ने सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (एससीएल) और हिंदुस्तान कंप्यूटर्स लिमिटेड स्थापित किए ताकि देश सेमीकंडक्टर, एकीकृत सर्किट और कंप्यूटिंग क्षमताएँ विकसित की जाएँ। भारत ने एससीएल की स्थापना 1984 में की थी। ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) इसके तीन साल बाद शुरू हुई थी, लेकिन आज वैश्विक सेमीकंडक्टर बाज़ार में उसकी बादशाहत है।

उदारीकरण के बाद सरकार ने अपने इन प्रयासों को त्याग दिया। टैरिफ सुरक्षा हटाने तथा राज्य का समर्थन वापस लेने के साथ ही देश का उभरता इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र तबाह हो गया। भारत ने 1997 में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सूचना प्रौद्योगिकी समझौते (आईटीए) पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत कई इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं पर टैरिफ हटाए गए और मज़बूत स्थानीय उद्योग खड़े करने के लिए आवश्यक नीतिगत गुंजाइश भी ख़त्म हो गई। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में विनिर्माण क्षमताओं में निवेश करने के बजाय, बाद की सभी सरकारों ने निर्यातोन्मुख मॉडल को बढ़ावा दिया। यानी विनिर्माण (चीज़ें बनाना) के बजाय सिर्फ पश्चिमी कंपनियों के लिए निम्न व मध्यम स्किल वाली आईटी और बैक-ऑफिस सेवाओं के निर्यात पर ज़ोर दिया गया। इस तरह इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में लॉन्ग-टर्म तकनीकी विकास रुक गया, जिसके परिणाम चौंकाने वाले हैं: आज, भारत अपने 80% आईटी हार्डवेयर, 70% इलेक्ट्रॉनिक्स घटक (जिसमें से 62% चीन से) और 90% दूरसंचार उपकरण आयात करता है।8 यहाँ तक कि घरेलू स्तर पर असेंबल किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स भी आयातित घटकों पर निर्भर हैं, जिनमें स्थानीय मूल्यवर्धन बहुत कम होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के बर्बाद होने के बाद आज भारत काफ़ी हद तक तकनीकी रूप से दूसरों पर निर्भर है।9

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के साथ जो कुछ किया गया, वही दूसरे क्षेत्रों में दोहराया गया है – सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में पूंजीगत वस्तुओं और भारी उद्योगों की या तो उपेक्षा की है या उन्हें बेच दिया है। इन क्षेत्रों में बड़े भारतीय निवेशक पैसा लगाने से बचते हैं, जबकि तकनीकी विकास के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

गिगी स्कारिया, पोस्ट लैंड, 2008

सार्वजनिक ख़र्च में कटौती

नवउदारवादी दौर में अपनाई गई सार्वजनिक ख़र्च में कटौती की नीति विकास की कच्ची नींव से लेकर कमज़ोर उत्पादन तक, भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का एक प्रमुख कारण है। भारत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और उससे जुड़े निवेश प्रवाह के लिए इतना मोहताज हो गया कि सरकारें इस बात से डरने लगीं कि देश में बुनियादी ढाँचे या उद्योगों पर ख़र्च बढ़ाने की स्थिति में विदेशी निवेशक अपना पैसा वापस लेकर चले न जाएं। 2003 में, अंतरराष्ट्रीय वित्त जगत को ख़ुश करने के लिए, भारत ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) लागू किया, जिसके बाद राजकोषीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) की सीमा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3% पर तय कर दी गई।10 हालाँकि इस नियम को अक्सर तोड़ा जाता रहा है, पर फिर भी यह सीमा एक आधार बिंदु बन गई, जिसे घरेलू उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र या कृषि के समर्थन में सार्वजनिक ख़र्च रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। इस दौर में एक के बाद एक सरकार लगातार मुनाफ़ा कमा रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों से अपना हिस्सा निजी कंपनियों को बेचती रही है और अपना निवेश योग्य फंड भी बजट के ख़र्चों को पूरा करने में झोंक रही है। जबकि कॉर्पोरेट मुनाफे पर टैक्स लगातार कम किए गए हैं। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के पास विस्तार और तकनीकी के आधुनिकीकरण के लिए फंड लगतार कम होता गया है। एक तरफ़ भारत की बड़ी प्राइवेट कंपनियों ने लगतार मुनाफ़ा कमाने के बावजूद शोध एवं विकास (आरएंडडी) में निवेश करने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है, दूसरी तरफ़ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को ऐसा करने के साधनों से ही वंचित कर दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र आयातित तकनीकों पर निर्भर है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)

1991 में उदारीकरण के बाद से, भारत सरकारों ने उद्योग और वित्त, दोनों क्षेत्रों में विदेशी पूंजी के लिए रुकावटों को लगतार ख़त्म किया है। आज, जुआ, परमाणु ऊर्जा और रेलवे जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर – जहाँ भारतीय निजी फ़र्में भी प्रतिबंधित हैं –लगभग हर क्षेत्र में, अक्सर 100% विदेशी स्वामित्व, के साथ एफडीआई हो सकता है। भारत ने पूंजी खाते (कैपिटल अकाउंट) पर प्रतिबंधों को भी ढीला किया है, जिससे अल्पकालिक सट्टा वित्त (स्पेक्युलेटिव फाइनेंस) की आवक बढ़ी है। आधिकारिक आँकड़े दिखाते हैं कि साल 2000 के बाद से कुल विदेशी निवेश प्रवाह में औसतन लगभग 30% अस्थिर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के रूप में आया है। यहाँ तक कि जिसे एफडीआई के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, उसमें भी एक बड़ा हिस्सा सट्टा पूंजी का है। क्योंकि भारत में साल 2000 के बाद से एफडीआई की नई परिभाषा में किसी भारतीय कंपनी में 10% से अधिक की इक्विटी हिस्सेदारी वाले पोर्टफोलियो होल्डिंग्स भी शामिल हैं।11

आधिकारिक तौर पर विदेशी निवेश को औद्योगीकरण, तकनीकी उन्नयन और निर्यात वृद्धि तेज़ करने के साधन के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन ये वादे काफ़ी हद तक अधूरे रहे हैं। व्यवहार में, विदेशी पूंजी ने मुख्य रूप से उदारीकरण के बाद के विकास के आयात-गहन पैटर्न को बढ़ावा दिया है, जिससे घरेलू उद्योग लगतार कमज़ोर हुए।

व्यापार बाधाएँ हटाने की नीति के साथ बहुत कम नियम या दिशा-निर्देश जोड़े गए। उदाहरण के लिए, भारत सरकार ने यह सुनिश्चित नहीं किया कि घरेलू फर्मों में एफडीआई के साथ तकनीकी हस्तांतरण, स्थानीय सोर्सिंग और डाउनस्ट्रीम औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया जाए, घरेलू आरएंडडी में निवेश हो, या रॉयल्टी के प्रत्यावर्तन (विदेश भेजने) पर कोई सीमा हो। ऐसे दिशा-निर्देश लागू करने के अधूरे प्रयास भी विदेशी पूंजी के दबाव में ही छोड़ दिए गए।

कुल मिलाकर, एफडीआई ने भारतीय उद्योग में तकनीकी प्रगति में बहुत कम योगदान दिया है, और विदेशी फर्मों ने देश के भीतर बहुत कम आरएंडडी सुविधाएँ स्थापित की हैं। उनका उत्पादन भारी मात्रा में आयात पर निर्भर रहा है। भारत में काम करने वाली विदेशी स्वामित्व वाली फर्मों का आयात उनके निर्यात से अधिक है, जिससे घरेलू औद्योगिक संबंध कमज़ोर हुए हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में विऔद्योगीकरण (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन) की प्रक्रिया को बल मिला है।

विदेशी निवेश ने जो लाभ के वादे किए थे, वे तो पूरे नहीं हुए, लेकिन उससे आई विदेशी मुद्रा की बाढ़ ने भारतीय बैंकिंग तंत्र में इतनी नकदी भर दी कि बैंकों पर ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गईं और उन्हें कर्ज़ बाँटने के नए-नए रास्ते तलाशने पड़े। इसका नतीजा यह हुआ कि विकास का एक ऐसा मॉडल बन गया जो कर्ज़ और आयात पर टिका है। अमीर तबक़े द्वारा संचालित खपत से चलने वाले इस मॉडल में पूंजी सिर्फ़ कुछ घरेलू एकाधिकारी समूहों के हाथों में केंद्रित हो गई है। और इस सब का नुक़सान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को उठाना पड़ा है।

साथ ही, विदेशी निवेश ने बाहरी बोझ को लगातार बढ़ाया है। क्योंकि विदेशी फर्मों ने जितना निर्यात किया उससे अधिक आयात किया और रॉयल्टी भुगतान और मुनाफ़ा प्रत्यावर्तन (रिपैट्रिएशन) के ज़रिए बढ़ती रक़म विदेशों में भेजी है। साल 2024 में, हर 100 डॉलर के विदेशी निवेश (एफडीआई और एफपीआई मिलाकर) में से 50 डॉलर विदेशी निवेशक अपना मुनाफ़ा और ब्याज वसूल कर वापस ले गए। जो मुनाफ़ा फिर से भारत में लगाया गया (रिइन्वेस्टमेंट) – जो नई विदेशी मुद्रा नहीं लाता – उसे छोड़ दें तो हालत और भी चौंकाने वाली है: हर 100 डॉलर की शुद्ध आवक पर 66 डॉलर बाहर भेज दिए गए। हाल के वर्षों में, इस तरह के आय आउटफ्लो अक्सर कुल चालू खाता घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) से ज़्यादा रहे हैं। 2024 में जितनी निवेश आय बाहर भेजी गई, वह भारत के व्यापार घाटे से तीन गुना ज्यादा थी। जैसे-जैसे मुनाफ़ा-ब्याज का विदेश जाना बढ़ेगा, भारत का बाहरी खाता (एक्सटर्नल अकाउंट) और नाजुक होता जाएगा, जो आने वाले वर्षों में भुगतान संतुलन के गहरे संकट की ज़मीन तैयार कर रहा है। ऐसे भविष्य की एक झलक 2023 में देखने को मिली, जब भारत की अर्थव्यवस्था से विदेशी निवेश आवक के हर 100 डॉलर के बदले 116 डॉलर निवेश आय के रूप में बाहर भेजे गए।12

विदेशी पूंजी की आवक से पैदा हुई तरलता (बैंकों में पैसा) ने कर्ज़-आधारित, आयात-केंद्रित विकास और बड़े व्यापार घाटे को हवा दी। इन घाटों ने बदले में और अधिक विदेशी आवक को ज़रूरी बना दिया, जिसने विदेशी मुद्रा के रिसाव को गहरा किया। इस तरह भारत के भुगतान संतुलन को संभालने के लिए बाहरी वित्तीय प्रवाह पर निर्भरता का एक चक्रव्यूह बन गया है जो लगातार गहराता जा रहा है।

एक ऐसा विकास मॉडल, जहाँ औद्योगिक विकास ‘संयोग’ है

भारत की नवउदारवादी दिशा और उसके चार मुख्य सिद्धांतों के कारण, औद्योगिक विकास, विकास मॉडल का केंद्रीय लक्ष्य न होकर एक संयोग बनकर रह गया है। सरकारें कभी भी ठोस औद्योगिक नियोजन पर नहीं चलीं, बल्कि उन्होंने विकास का इंजन बैंक कर्ज़ (और सेवा निर्यात) को बनाया – ताकि मांग बढ़े और औद्योगिक ढाँचे के लिए पैसा मिले। इसके विपरीत, 1947 से 1991 तक, भारत में संस्थागत कर्ज़ ज़्यादातर आर्थिक नियोजन के दायरे में कृषि, उद्योग और व्यापार क्षेत्र में दिया जाता था। उपभोक्ता कर्ज़ की भूमिका बहुत कम थी।

1991 के बाद से, उपभोक्ता कर्ज़ लगातार बढ़ा है। बैंकिंग क्षेत्र, ख़ासकर निजी बैंक, लगातार कर्ज़ देने को होम लोन, वाहन लोन, टिकाऊ उपभोक्ता सामान और क्रेडिट कार्ड्स की ओर मोड़ रहे हैं। बैंक कर्ज़ में व्यक्तिगत ऋण की हिस्सेदारी 1990 में 9.4% से बढ़कर 2005 में 25.2% हो गई थी, और 2024 में यह 32.4% तक पहुँच गई है।13

आज घर और कार ख़रीदने के लिए लिया जाने वाला कर्ज़ विकास का एक बड़ा चालक बन गया है। आवास ऋण के विस्तार से जीडीपी में निर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़ी है।

इसी तरह, ऑटोमोबाइल के लिए बढ़ती कर्ज़ देने की प्रवृत्ति ने विनिर्माण क्षेत्र में कार उद्योग को अतिशय महत्त्व दिया और परिवहन व्यवस्था को गाड़ियों का गुलाम बना दिया, जिससे देश के बुनियादी ढाँचे की मुश्किलें और बढ़ीं हैं।

वाहन ऋण और ऑटोमोबाइल उत्पादन में बड़े पूंजीपतियों की मौजूदगी ने सरकार के रुख को निजी परिवहन और सड़क निर्माण के पक्ष में और झुका दिया। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा नेट्वर्क है, जो जल्द ही अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा।14 भारत का भूभाग चीन के मुकाबले एक-तिहाई है, फिर भी भारत का सड़क नेटवर्क चीन से 20 लाख किलोमीटर ज़्यादा लंबा है। पिछले एक दशक में ख़ासकर हाइवे और एक्सप्रेसवे का निर्माण तेज़ी से हुआ है। पर इस विस्तार की एक बड़ी समस्या है, ज़मीन अधिग्रहण की चुनौतियाँ। जनसंख्या घनत्व अधिक होने और कृषि पर गहरी निर्भरता के कारण ज़मीन अधिग्रहण राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सामाजिक रूप से विघटनकारी हो जाता है। किसान, जिनके लिए ज़मीनी संपत्ति ही सब कुछ है, अक्सर विस्थापन का विरोध करते हैं। नतीजतन, ज़मीन अधिग्रहण धीमा, महँगा और अक्सर विवादित रहता है – इससे भारत की सड़क-केंद्रित लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में रुकावटें आती हैं।.

दूसरी ओर, परिवहन व्यवस्था के ऑटोमोबाइल (जिसमें ट्रक भी शामिल हैं) पर निर्भर होने से ईंधन आयात बढ़ गया है। 40% से अधिक पेट्रोलियम उत्पाद सिर्फ परिवहन क्षेत्र द्वारा खपत किए जाते हैं।15 इससे व्यापार घाटा बढ़ा है और औद्योगीकरण में कोई योगदान नहीं मिला है।

ऑटोमोबाइल-सड़क विकास के रास्ते पर चलने से व्यापक विनिर्माण तंत्र कमज़ोर हुआ है। भारत की रसद लागत चीन से दो से तीन गुना अधिक है, जिसकी बड़ी वजह है रेलवे तंत्र में न के बराबर निवेश करने की प्रवृति। रेल परिवहन, जो कि सस्ता है, कम ज़मीन लेता है, ऊर्जा कुशल है और भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त है, को जानबूझकर नज़रंदाज़ कर सड़क परिवहन को तरजीह दी गई है।

रेलवे में कम निवेश का मतलब है रेल परिवहन की गुणवत्ता और गति का गिरना: भारत में पारंपरिक रेलगाड़ियों की औसत गति 43 किमी/घंटा है, जबकि चीन में यह 90 किमी/घंटा है। भारत में हाई-स्पीड रेल 180 किमी/घंटा की रफ्तार पा सकती है, जबकि चीन में हाई-स्पीड ट्रेनें 430 किमी/घंटा तक जाती हैं।

कर्ज़-आधारित, ऑटोमोबाइल-केंद्रित परिवहन प्रणाली से रसद की लागत बढ़ी है और परिवहन समय भी बढ़ा है, जिससे कुल मिलाकर उत्पादन लागत बढ़ी है। इस तरह व्यापार उदारीकरण के बीच भारतीय विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा लगातार कमज़ोर हुई है।

गिगी स्कारिया, हेज़िटेंट अटेम्प्ट, 2018

कर्ज़ से चलने वाले निवेश और बैड लोन (NPA)

भारत में नवउदारवादी विकास सिर्फ़ खपत से नहीं चला। 2004 से 2010 के बीच, जब देश में जीडीपी में बड़ी वृद्धि हुई, तब यह विस्तार सिर्फ खपत से ही नहीं, बल्कि बैंक कर्ज़ से चलने वाले निवेश से भी बना रहा, जो कि विदेशी पूंजी के आवक से पैदा हुई अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी) के चलते संभव हुआ। बैंकिंग प्रणाली में पैसे की बाढ़ आई, तो निजी बैंकों ने रिटेल कर्ज़ (व्यक्तिगत ऋण) बढ़ाए, और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स को अचल संपत्ति, बिजली तथा स्टील जैसी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भारी कर्ज़ दिए।

इससे निवेश-आधारित विकास को बल तो मिला, पर इस व्यवस्था ने एक गंभीर संकट भी पैदा किया। बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में निवेश का रिटर्न तुरंत नहीं मिलता, यानी बैंक ने लंबी अवधि की परियोजनाओं को कर्ज़ दिया, जबकि उन्हें अपने जमाकर्ताओं को कम समय में पैसा लौटाना होता है। इसके साथ ही कॉर्पोरेट को खुली छूट और ख़राब निगरानी ने इस मिसमैच के संकट को विनाशकारी बना दिया। वाणिज्यिक बैंक – जो ऐसी परियोजनाओं के मूल्यांकन और प्रबंधन के लिए तैयार नहीं थे (क्योंकि यह काम विकास बैंकों का होना चाहिए था) – सरकार के इशारे पर निजी स्वामित्व वाली बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को कर्ज़ देने लगे। नतीजा: गैर-निष्पादित आस्तियों (नॉन-परफोर्मिंग ऐसेट्स-एनपीए) का भारी ढेर लग गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए की कुल राशि का मूल्य 82.3 अरब डॉलर तक पहुँच गया। दूसरी ओर, इन कर्ज़ों से बनी भौतिक संपत्तियाँ (जैसे पावर प्लांट, स्टील प्लांट) एनपीए संकट के समाधान के नाम पर भारत के बड़े पूंजीपतियों के हाथों में न्यूनतम क़ीमत पर बेच दी गईं।16

इस अवधि में नवउदारवादी विकास नीति ने यह सुनिश्चित किया कि बाज़ार की अराजकता ही भारतीय विनिर्माण की दिशा और संरचना निर्धारित करे। घरेलू पूंजी हितों, बैंकिंग प्रणाली की कर्ज़ प्राथमिकताओं और अमीर तबके के खपत पैटर्नों के आपसी संबंध, तथा वैश्विक मुक्त व्यापार व अबाधित वित्तीय प्रवाह के माहौल ने भारतीय उद्योग की दिशा तय की है। आप इसे विकास कहेंगे या पतन, आप पर है।

व्यापार घाटा और विऔद्योगीकरण: एक ही सिक्के के दो पहलू

भारत, आयातित सामान, ईंधन और विदेशी धन पर बहुत अधिक निर्भर है। इसी कारण लगभग हर साल देश का चालू खाता घाटे में रहता है। केवल कोविड-19 के समय, जब दुनिया भर में व्यापार अचानक कम हो गया था, यह स्थिति कुछ समय के लिए बदली थी। आम तौर पर चालू खाता घाटा तभी कम होता है जब अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है।
1991 में भारत का वस्तु व्यापार घाटा सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) का 2% था, जो बढ़कर 7% हो गया और 2011 में 10% तक पहुँच गया।17 इस घाटे का लगभग आधा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों के कारण है। सेवाओं के निर्यात से होने वाली कमाई और विदेशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजे गए पैसे (रेमिटेंस) की वजह से ही चालू खाता घाटा इतना

विऔद्योगीकरण

लंबे समय तक भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर होने वाली चर्चाओं में ‘विऔद्योगीकरण’ शब्द का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के दौरान गैर-कृषि शिल्पों और पारंपरिक उद्योगों के पतन को बताने के लिए किया जाता रहा है। इस प्रक्रिया ने लाखों लोगों को उनके पारंपरिक काम-धंधों से अलग कर दिया और उन्हें ग़रीबी व भूख की ओर धकेल दिया।

स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद यह शब्द एक बार फिर प्रचलन में है—इस बार उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा को बताने के लिए। इसके प्रभाव पिछले एक दशक में साफ़ दिखाई देने लगे हैं। ऋण के सहारे तेज़ आर्थिक वृद्धि के दौर में जो औद्योगिक ह्रास छिपा हुआ था, वह हाल के वर्षों में पूरी तरह सामने आ गया है, ख़ासकर मोदी सरकार के कार्यकाल में।

जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 2008 में 18.9% से घटकर 2023 में 14.3% रह गई, जो भारत के औद्योगीकरण के शुरुआती दौर में, साठ से भी अधिक वर्ष पहले, देखे गए स्तर के बराबर है। नए आधार वर्ष के साथ जारी नई जीडीपी श्रृंखला में विनिर्माण उत्पादन के अधिक आकलन की संभावना को देखते हुए, वास्तविक हिस्सेदारी, आधिकारिक आँकड़ों से भी कम हो सकती है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) इस तस्वीर को और स्पष्ट करता है। आईआईपी के अनुसार, 2011–2012 से 2024–2025 के बीच विनिर्माण उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर केवल 3.3% रही, जबकि 2003–2004 से 2010–2011 के दौरान यह 10.1% थी। लंबे समय के परिप्रेक्ष्य में देखें तो विनिर्माण क्षेत्र में यह मंदी और भी स्पष्ट दिखाई देती है। 1981–1982 से 1989–1990 के बीच आईआईपी के विनिर्माण घटक की औसत वार्षिक वृद्धि दर 7.5% थी, 1991–1992 से 1996–1997 के बीच 8.0%, और 1997–1998 से 2002–2003 के बीच 5.4% रही।18 वास्तव में, 2011 के बाद से विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले तीन दशकों की किसी भी समान अवधि की तुलना में कम रही है। ऐसे में भारत में आगे और अधिक विऔद्योगीकरण का ख़तरा दिखाई देता है।

सेवा क्षेत्र: उद्योग का कमज़ोर विकल्प

पिछले पंद्रह वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र के तुलनात्मक पतन ने भारतीय अर्थव्यवस्था में गहरे संरचनात्मक असंतुलनों को और मज़बूत किया है। आज भारत की जीडीपी का अधिकांश हिस्सा सेवा क्षेत्र से आता है।

1947 के बाद, नवस्वतंत्र भारतीय गणराज्य ने एक ऐसे विकास मॉडल को अपनाया जिसका केंद्र एक मज़बूत औद्योगिक आधार का निर्माण था। 1951 में, पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत के समय, जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 12% थी, जबकि सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 36% थी। 1990 तक ये हिस्सेदारियाँ बढ़कर उद्योग के लिए 19% और सेवाओं के लिए 41% हो गईं। 1991 में औद्योगीकरण आधारित विकास मॉडल छोड़ दिया गया, जब भारत सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण—या अधिक सही शब्दों में नवउदारीकरण—करने और उसे अधिक सेवा-उन्मुख बनाने का निर्णय लिया। 1991 के बाद से विनिर्माण की हिस्सेदारी घटकर 14% रह गई, जबकि सेवाओं की हिस्सेदारी 2008 में बढ़कर 48% और 2024 में 55% हो गई। हालाँकि मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासन के दौरान भारतीय विनिर्माण की समस्याएँ और गहरी हुईं, लेकिन उसके कमज़ोर होने की शुरुआत 1991 में अपनाए गए नवउदारवादी रास्ते पर चलने वाली एक के बाद एक सरकारों के दौर में ही हो गई थी।

विनिर्माण के विपरीत—जो तकनीकी आधार को मज़बूत करता है और वास्तविक मज़दूरी में वृद्धि को सहारा देता है—सेवा क्षेत्र का विस्तार ज़रूरी नहीं कि ऐसा ही प्रभाव पैदा करे। एक मज़बूत विनिर्माण क्षेत्र परिवहन, दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सेवाओं की क्षमताओं को बढ़ा सकता है। लेकिन जब कमज़ोर औद्योगिक आधार के साथ सेवाएँ हावी हो जाती हैं, तो वे आयातित मशीनरी और विदेशी तकनीकों पर बहुत अधिक निर्भर हो जाती हैं, जैसा कि भारत के मामले में है।

भारत में सेवा क्षेत्र एक व्यापक श्रेणी है, जिसे आसानी से एक जैसा नहीं बताया जा सकता। फिर भी इसमें एक स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है। एक ओर ऐसी कई तरह की सेवाएँ हैं—स्वरूप में भिन्न, लेकिन अनौपचारिकता में समान—जो कम मज़दूरी, असुरक्षित और बड़े पैमाने पर अनियंत्रित रोज़गार प्रदान करती हैं तथा जिनकी उत्पादकता कम होती है। इन गतिविधियों में काम करने वाले श्रमिक अक्सर काम की उपलब्धता के अनुसार गाँव और शहर के बीच, तथा कृषि और सेवा क्षेत्रों के बीच आते-जाते रहते हैं। ये क्षेत्र वास्तव में कृषि से निकलने वाले अतिरिक्त श्रम के लिए शरणस्थल का काम करते हैं—ऐसा श्रम जो कृषि में रोज़गार के ठहराव के कारण बाहर धकेला गया है और जिसे विनिर्माण क्षेत्र, विशेषकर विऔद्योगीकरण की स्थिति में, बढ़ती श्रम शक्ति को समाहित करने में असमर्थ रहने के कारण सेवा क्षेत्र की ओर खींच लिया जाता है। वास्तव में, 2017–2018 के बाद से कुल रोज़गार में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी घटती गई है।

खुदरा व्यापार और परिवहन, ऐसे ही दो क्षेत्र हैं। लेकिन इन क्षेत्रों के भीतर भी रोज़गार का दायरा बहुत व्यापक है। उदाहरण के लिए, खुदरा व्यापार में छोटे दुकानदार, ठेला-पटरी वाले, फेरीवाले, किराना (पड़ोस की) दुकानों के कर्मचारी और थोक मंडियों में काम करने वाले सहायक शामिल होते हैं। वहीं परिवहन क्षेत्र में ऑटो और टैक्सी चालक, ट्रक चालक, बस कंडक्टर तथा माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कामगार शामिल होते हैं। कुल रोज़गार में खुदरा व्यापार की हिस्सेदारी 12.2% और परिवहन की लगभग 5.6% है, और ये दोनों जीडीपी में लगभग समान योगदान देते हैं।19

इन गतिविधियों को अक्सर ‘सेवा क्षेत्र’ के बजाय ‘असंगठित क्षेत्र’ का हिस्सा कहा जाता है। ‘सेवा क्षेत्र’ शब्द आमतौर पर आईटी, वित्त और अन्य आधुनिक सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो इस विभाजन का दूसरा पक्ष हैं। सेवा अर्थव्यवस्था के ये दोनों हिस्से पिछले साढ़े तीन दशकों में लगातार ऊँची वृद्धि दर दर्ज करते रहे हैं। आईटी और वित्त क्षेत्र, अत्यधिक पूंजी-प्रधान होने और सीमित रोज़गार देने के बावजूद, जीडीपी में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। 1990 के शुरुआती वर्षों में आईटी क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान नगण्य था (जीडीपी का लगभग 0.1%), और रोज़गार में इसकी हिस्सेदारी तो इससे भी कम थी। 2024 तक यह मुख्यतः निर्यातोन्मुख उद्योग तेज़ी से फैलकर जीडीपी का 7.5% हो गया, जबकि इसमें कुल श्रम शक्ति का केवल 1% ही कार्यरत है।20 वित्तीय सेवाओं का विकास भी इसी तरह हुआ—जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 1990 में 3% से बढ़कर 2004 में 6% हो गई, जबकि रोज़गार में इसकी हिस्सेदारी 1% से कम ही रही।21

आईटी और वित्तीय सेवा क्षेत्र मिलकर जीडीपी का 13.5% योगदान करते हैं, जो विनिर्माण क्षेत्र के योगदान के बराबर है, लेकिन रोज़गार में इनका योगदान 2% से भी कम है, जबकि विनिर्माण क्षेत्र 11.4% रोज़गार प्रदान करता है।22 ग़ैर-कृषि अर्थव्यवस्था में, विनिर्माण का हिस्सा जीडीपी का 17% और रोज़गार का 20% है, जबकि आईटी और वित्तीय सेवा क्षेत्र (जो दोनों ही अत्यधिक पूंजी-गहन हैं) ग़ैर-कृषि जीडीपी का 16.5% योगदान करते हैं, लेकिन रोज़गार में इनकी हिस्सेदारी केवल 3.5% है। इन दोनों क्षेत्रों द्वारा उत्पन्न उच्च-वेतन वाली नौकरियों की संख्या सीमित है और घरेलू अर्थव्यवस्था में इनके गुणक प्रभाव कमज़ोर हैं, क्योंकि श्रम बल के इस वर्ग की उपभोग प्रवृत्तियाँ आयात-प्रधान हैं।

यह अंतर दिखाता है कि भारत के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले क्षेत्र—आईटी और वित्त—बहुत कम लोगों को रोज़गार देते हैं। इससे यह भी साफ़ होता है कि जब विनिर्माण को नज़रअंदाज़ करके केवल हाई-टेक सेवा क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है, तो उसके नकारात्मक परिणाम होते हैं। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्त्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र में व्यापार को पूरी तरह खोल दिया है, ताकि आईटी जैसी सेवाएँ, जो ज़्यादातर अमेरिका और पश्चिमी देशों को निर्यात होती हैं, बढ़ सकें। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में उद्योग कमज़ोर हुए और आज भी लगभग आधा कार्यबल कृषि पर निर्भर है।

कृषि जीडीपी का केवल 18% योगदान करती है, लेकिन इसमें 46% लोग काम करते हैं। दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र जीडीपी के आधे से ज़्यादा हिस्से का योगदान करता है, फिर भी 2023–24 में उसने केवल 30% लोगों को ही रोज़गार दिया। विनिर्माण क्षेत्र, जिसे पहले कृषि से लोगों को बाहर लाने का ज़रिया माना गया था, अब जीडीपी का लगभग 14% ही योगदान करता है और सिर्फ़ 11% लोगों को रोज़गार देता है।23

गिगी स्कारिया, सेटलमेंट, 2010

भारत के नवउदारवादी विकास मॉडल के तहत, पश्चिमी बाज़ारों को कुशल श्रम और सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विनिर्माण क्षेत्र की बलि दी गई है। यह उम्मीद की गई कि इन निर्यातों से होने वाली कमाई बढ़ते आयात की भरपाई कर देगी और एक मज़बूत विनिर्माण क्षेत्र की कमी की क्षतिपूर्ति हो जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह हुआ कि भारत की दीर्घकालिक औद्योगिक और तकनीकी क्षमताओं को विदेशी मुद्रा के अस्थिर और बाहरी रूप से निर्भर स्रोतों के लिए त्याग दिया गया। अंततः इससे देश की आर्थिक और तकनीकी संप्रभुता कमज़ोर हुई, जबकि इसके लिए एक मजबूत विनिर्माण क्षेत्र अत्यंत आवश्यक है।

विऔद्योगीकरण के मानवीय प्रभाव

भारत की आबादी युवा है—जिसे अक्सर ‘जनसांख्यिकीय लाभ’ कहा जाता है—और यही एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के निर्माण तथा तकनीकी प्रगति के लाभों को व्यापक रूप से साझा करने का आधार बन सकता था। युवाओं का जीवन स्तर बेहतर होना चाहिए था और उन्हें सुरक्षित रोज़गार मिलना चाहिए था, ताकि वे काम, आराम और अवकाश के बीच संतुलित जीवन जी सकें। लेकिन भारत को एक बड़ी अर्थव्यवस्था बताने के तमाम दावों के बावजूद, यह अब भी एक अविकसित अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जहाँ श्रमिकों की आय का बड़ा हिस्सा भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर खर्च हो जाता है और जहाँ युवा असुरक्षित नौकरियों में काम कर रहे हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित है।

भारत अपने कार्यबल के युवाओं को ठहरे हुए वेतन वाली अस्थायी और समझौता-आधारित नौकरियों में खपा रहा है। कार्यशील आयु की आबादी पर निर्भर लोगों—यानी बच्चों और बुज़ुर्गों—का अनुपात तेज़ी से घटा है: यह 1966 में 83% से घटकर 2024 में 47% हो गया।24 इससे अत्यधिक ग़रीबी में कुछ कमी तो आई, लेकिन इसका प्रभाव सीमित रहा। अब, जब 2041 के बाद इस अनुपात के फिर से बढ़ने की उम्मीद है, तो भारत के संरचनात्मक रूपांतरण की गुंजाइश और सिमटती दिख रही है।25 औद्योगिक विकास—जिसे अतिरिक्त श्रम को समाहित करना था और उत्पादकता व तकनीकी प्रगति को आगे बढ़ाना था—मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल के भीतर एक ठहराव के बिंदु पर पहुँचता हुआ लग रहा है।

आगे का रास्ता

यदि भारत को वर्तमान अविकास के जाल से निर्णायक रूप से बाहर निकलना है, तो आर्थिक नीति के केंद्र में औद्योगिकीकरण को लाना अत्यंत आवश्यक है। इस पर बहुत कम मतभेद हैं। औद्योगिकीकरण का महत्त्व और सेवा-आधारित आर्थिक विस्तार की सीमाएँ अब भारत में नवउदारवाद के समर्थकों के भी सामने स्पष्ट होने लगी हैं। यह बात प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बार-बार उल्लेख में दिखाई देती है, भले ही उनकी सरकार अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में नवउदारवादी सिद्धांतों का कहीं अधिक उत्साह से पालन करती रही हो—जैसे सार्वजनिक क्षेत्र का परिसमापन, विदेशी पूंजी के लिए शेष बाधाओं को हटाना, ऑटोमोबाइल-आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना, और निवेश को प्रोत्साहित करने के नाम पर कॉर्पोरेट क्षेत्र को उदारतापूर्वक टैक्सों में छूट और सब्सिडी देना।

हालाँकि मोदी सरकार ने कुछ चुनिंदा विनिर्मित वस्तुओं पर सीमा शुल्क में सीमित वृद्धि की है, लेकिन व्यापार उदारीकरण का व्यापक ढाँचा अब भी कायम है। अपेक्षा के अनुरूप, इन उपायों से विनिर्माण के विस्तार के संदर्भ में कोई विशेष परिणाम नहीं निकले हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था का विऔद्योगीकरण मानो अपने तय रास्ते पर ही आगे बढ़ता दिख रहा है।

निस्संदेह भारत के औद्योगिक कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने के लिए वर्तमान आर्थिक नीति के बुनियादी तत्त्वों यानी नवउदारवादी सिद्धांतों से निर्णायक रूप से अलग होना आवश्यक है। लेकिन उदारीकरण के लंबे दौर ने ऐसी संरचनात्मक स्थितियाँ पैदा कर दी हैं, जिनके कारण नवउदारवाद से किसी भी तरह का विचलन एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बन गया है।

इस दौर ने पहले से मौजूद उन बाधाओं को और मज़बूत कर दिया—जिनकी चर्चा पहले की जा चुकी है—जो उदारीकरण से पहले भी औद्योगिकीकरण को सीमित करती थीं, और साथ ही जिसने विऔद्योगीकरण की प्रक्रिया को और गहरा किया। घरेलू बाज़ार को सीमित करने वाली असमानताएँ कई गुना बढ़ गई हैं, जबकि भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग का क़द असाधारण रूप से बढ़ा है—राज्य पर उसका प्रभाव, नीति को आकार देने की उसकी क्षमता और शक्ति सभी में भारी वृद्धि हुई है। यह वर्ग भारतीय स्वतंत्रता के बाद से आज अपने सबसे शक्तिशाली दौर में है। इस अवधि में इसने भारी संपत्ति अर्जित की, जबकि आबादी के बहुसंख्यक हिस्से को केवल सीमित लाभ ही मिल पाए।

ऑटोमोबाइल, पेट्रोकेमिकल्स, ऊर्जा, इस्पात और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में बड़े भारतीय कॉर्पोरेट समूहों के विशाल औद्योगिक परिसरों का निर्माण और संचालन बड़े पैमाने पर आयातित मशीनरी और तकनीक के सहारे किया गया, जिसका लाभ व्यापार उदारीकरण से मिला। इनके विस्तार के लिए सस्ती पूंजी उपलब्ध हुई, जो शेयर बाज़ार में ऊँचे मूल्यांकन के ज़रिये संभव हुई और भारतीय इक्विटी बाज़ारों में पोर्टफोलियो निवेश के बड़े प्रवाह से इसे लगातार सहारा मिला। भारत के बड़े पूंजीपतियों ने विदेशी पूंजी के साथ कामकाजी क़िस्म के संबंध बनाए, अपने तात्कालिक हितों की रक्षा के लिए किसी भी टकराहट को टालने की हरसंभव कोशिश की। ज़रूरत पड़ा तो कभी अड़े, कभी झुक गए। इस दौरान, जहाँ विदेशी कंपनियों ने कई प्रमुख क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र को पीछे धकेला और छोटे घरेलू उत्पादकों को हाशिये पर पहुँचा दिया, वहीं भारत के बड़े कॉर्पोरेट समूहों ने अपनी स्थिति बनाए रखी और उसे और मज़बूत किया। उन्होंने अपने विशाल आकार, वित्तीय शक्ति और राज्य की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता का उपयोग कर अपने वर्चस्व को और अधिक सुदृढ़ किया।

परिणामस्वरूप, वे दिन बीत गए जब इसने ज़मींदार वर्ग के साथ एक समान भागीदार के रूप में सौदेबाजी की। यद्यपि पूर्व जमींदार वर्ग आज ग्रामीण और शहरी, कृषि और ग़ैर-कृषि क्षेत्रों में बरक़रार है, फिर भी वह भारतीय अभिजात वर्ग का हिस्सा बना हुआ है और उसका भी वर्गीय हित वही है, जो बड़े पूंजीपतियों का है। राज्य की नीतियों की बागडोर अब शक्तिशाली पारिवारिक व्यापारिक घरानों से बने भारतीय बड़े पूंजीपति वर्ग के हाथों में कहीं अधिक मज़बूती से है, हालांकि मोदी सरकार के कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ किसान और ज़मींदार वर्गों के सफल विरोध जैसी छिटपुट घटनाएं भी हुई हैं।

आज, बड़े पूंजीपतियों का वर्ग ज़मींदार वर्ग के साथ कम और विदेशी पूंजी के साथ अधिक जुड़ा हुआ है। भारतीय पूंजीपति वर्ग और विदेशी – मुख्य रूप से पश्चिमी – पूंजी के गठजोड़ ने भारत की आर्थिक स्वतंत्रता के क्षरण को तेज़ कर दिया है और निवेश तथा राजनीतिक गठबंधन दोनों के लिए पश्चिम पर इसकी निर्भरता को गहरा कर दिया है।

अनुसंधान एवं विकास पर स्थानीय निवेश के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकसित करने में रुचि न रखने वाले ये व्यापारिक घराने विनिर्माण के नए क्षेत्रों में अपना विस्तार करने के लिए पश्चिमी देशों – विशेष रूप से अमेरिका – की पूंजी के साथ साझेदारी की तलाश कर रहे हैं। वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन से दूर करने के अमेरिकी सरकार के दृढ़ संकल्प से उत्पन्न अवसरों का लाभ उठाने की उम्मीद कर रहे हैं।

भारत के व्यापारिक घराने रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और भुगतान प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में पश्चिमी कंपनियों के साथ सहयोग करने का प्रयास कर रहे हैं।

इन योजनाओं के बावजूद, इस वर्ग के हित भारत के औद्योगीकरण के प्रतिकूल हैं। ट्रंप के शासनकाल में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं के दौरान हुए घटनाक्रम ने औद्योगिक विकास के लिए पश्चिम के साथ सहयोग पर निर्भरता की सीमाओं को उजागर कर दिया। भले ही अमेरिका के साथ कोई अनुकूल व्यापार समझौता हो जाए, परिणाम में शायद ही कोई बदलाव आएगा: यदि नवउदारवाद का पहला चरण विफल रहा है, तो इसका दूसरा चरण – ‘नवउदारवाद 2.0’ – भी उतना ही असफल होने की संभावना है। उदारीकरण से पहले के दौर में औद्योगीकरण को बाधित करने वाले कारणों – गहरी असमानता और जन क्रय शक्ति की कमी – की वजह से यह रणनीति सफल होने की संभावना नहीं है। उदारीकरण के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई है, और अब तो यह कई गुना अधिक व्यापक रूप से सामने आ रही है। आज असमानता इतनी चरम सीमा पर पहुँच गई है कि राष्ट्रीय औसत आय अर्जित करने के लिए किसी व्यक्ति का भारत के शीर्ष 11% आय वर्ग में होना आवश्यक है। दूसरे शब्दों में, 89% वयस्क इस राष्ट्रीय औसत से कम कमाते हैं। धन की असमानता और भी अधिक स्पष्ट है: शीर्ष 1% लोगों के पास कुल धन का 40.1% हिस्सा है – जो विश्व स्तर पर सबसे अधिक है। इस समूह के भीतर की असमानता और भी अधिक है, क्योंकि 2022 में केवल 162 व्यक्तियों के पास देश की 24.6% संपत्ति थी।26

वो दिन बीत गए जब कृषि सुधार मात्र से ही व्यापक जनसमुदाय के हाथों में क्रय शक्ति देकर एक विशाल बाजार का निर्माण किया जा सकता था। हालांकि भूमि स्वामित्व में गंभीर असमानता आज भी एक वास्तविकता है, लेकिन जनसंख्या की भारी वृद्धि और भूमि के व्यापक विखंडन का अर्थ यह है कि कृषि सुधार में अभी भी गुंजाइश है, लेकिन यह अब भारत के श्रमशक्ति के हाथों में पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं करा सकता।

स्वतंत्रता के बाद का वह दौर बीत चुका है, जब भारतीय पूंजीपति वर्ग, श्रमिक वर्ग तथा किसान वर्ग राज्य-नेतृत्व वाले औद्योगिक एवं तकनीकी विकास में समान हित साझा करते थे। अब कोई साझा आधार नहीं बचा है। भारतीय पूंजीपति वर्ग, जो कभी अंतरराष्ट्रीय पूंजी से सावधान रहता था, अब उसके साथ साझेदारी की ओर बढ़ रहा है।

इसलिए, नवउदारवादी विचारधारा से हटकर भारतीय बाज़ार का विस्तार करने और असमानता को कम करने की दिशा में कोई भी बदलाव तभी संभव है जब मेहनतकश वर्ग देश के बड़े पूंजीपति वर्ग और उसके सहयोगियों के साथ, चाहे यह गठबंधन किसी भी रूप में हो, आमने-सामने हो। हालांकि, वर्तमान में अति-धार्मिकता के भ्रम और फासीवादी धार्मिक राजनीति की गिरफ्त में (जिसे वही बड़ा पूंजीपति वर्ग वित्तपोषित कर रहा है) भारतीय जनता को इस शक्तिशाली वर्ग का सामना करने से पहले लंबा रास्ता तय करना है।

फिर भी, वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में वर्तमान उथल-पुथल और इससे भारतीय पूंजी के लिए उत्पन्न अनिश्चितताएं, भारत में वामपंथियों के लिए अपनी राजनीतिक उपस्थिति को पुनर्जीवित करने और आर्थिक नीतिगत चर्चा को स्वायत्त राष्ट्रीय विकास की ओर मोड़ने के अवसर पैदा करती हैं।


गिगी स्कारिया, ह्यूमन पुल, 2018.

Notes

1 Misra, ‘ExplainSpeaking: The truth about poverty in India’.

2 a. अलग से उल्लिखित आँकड़ों को छोड़कर इस दस्तावेज़ में दिए गए सभी GDP आँकड़े—जिसमें क्षेत्रवार हिस्सेदारी भी शामिल है—लेखकों द्वारा भारत की राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (NAS) 2011–2012 श्रृंखला (वर्तमान कीमतों पर) और उससे संबंधित पिछली श्रृंखलाओं के आधार पर तैयार किए गए हैं। ये आँकड़े भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) से लिए गए हैं, जिन्हें 2 दिसंबर 2025 को https://esankhyiki.mospi.gov.in/catalogue-main/catalogue?page=0&product=NAS से प्राप्त किया गया।

3 1990 और 1996 के बीच, कृषि उत्पादों पर औसत टैरिफ 82% से घटकर 39% हो गया, जबकि विनिर्माण वस्तुओं पर टैरिफ 51% से घटकर 40% हो गया। S. Ramachandran Pillai, ‘Agrarian Crisis and the Way Out’, The Marxist 23, no. 3 (July–September 2007); Venkatesh Athreya, ‘The Current Agrarian Crisis in India: An Overview’, The Marxist 29, no. 3 (July–September 2013); and P. Sainath, Everybody Loves a Good Drought (New Delhi: Penguin, 1996).

4 सरकार ने विनिर्माण वस्तुओं पर टैरिफ 2000 में 33.2% से घटाकर 2008 में 9% कर दिया। Kumar, Ramaa Arun,, and Biswajit Dhar, Trade Liberalisation and Export Competitiveness of Indian Manufacturing Industries, Working Paper 230, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), October 2020.

5 उदाहरण के लिए, भारत के विनिर्माण निर्यात में आयात की तीव्रता 1993-1994 में 12.89% से बढ़कर 2003-2004 में 24.04% और 2013-2014 में 51% हो गई। Paul, Mahua, and Ramaa Arun Kumar, Import Intensity of India’s Manufactured Exports: An Industry-Level Analysis, Working Paper 220, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), February 2020.

6 ANI, ‘India to Boost Drug Ingredient Output’.

7 यह क्षरण औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में पूंजीगत वस्तुओं और मध्यवर्ती वस्तुओं के योगदान में आई गिरावट के रूप में दिखता है, जो 1993-1994 में 35.5% से घटकर 2011-2012 में 29.63% हो गया। Reserve Bank of India, Handbook of Statistics on the Indian Economy 2024–25 (Mumbai: Reserve Bank of India, 29 August 2025), Table 29: ‘Index Numbers of Industrial Production – Use-Based Classification’, https://www.rbi.org.in/Scripts/PublicationsView.aspx?id=23203.

8 IANS, ‘Centre Aims to Meet 70% of India’s IT Hardware Demand’; Mallick and Aryan, ‘India’s Electronic Industry Poised for Transformation’; Barik, ‘China Dominates Supply of Electronic Components’; Surajeet, ‘Over 90% of Telecom Gear in India’s Rs 50,000-Cr Market Is Imported’.

9 आज, भारतीय आईटी उद्योग की कुल आय का 79% हिस्सा निर्यात से आता है, जबकि यह क्षेत्र हार्डवेयर के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। Government of India, Ministry of Commerce and Industry, Department of Commerce, ‘Commerce and Industry Minister Holds Discussions with CEOs of Indian IT Companies; Urges Them to Explore New Markets, Government to Support Global Growth of India’s IT Industry: Piyush Goyal’, press release, New Delhi, 1 August 2019, https://www.commerce.gov.in/press-releases/commerce-industry-minister-holds-discussions-with-ceos-of-indian-it-companies-urges-them-to-explore-new-markets-government-to-support-global-growth-of-indias-it-industry-piyush-goyal/.

10 P. Chakraborty and L. Chakraborty, ‘New FRBM Framework’.

11 भारत द्वारा 10% मताधार अधिकार सीमा को अपनाने और इसके परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश के बीच आए धुंधलेपन पर, देखें Rao and Dhar, India’s FDI Inflows: Trends and Concepts; for the current official definition of FDI, see Government of India, ‘FAQs related to FDI Policy Section’.

12 Reserve Bank of India, Database on Indian Economy; authors’ calculations based on balance of payments data.

13 Mujumdar, ‘Transformation of the Banking System’; ANI, ‘Personal Loans and Services Sector Key Drivers of Credit Growth’.

14 IANS, ‘India’s National Highways Record 60% Growth in Last 10 Years’.

15 Government of India, ‘Diesel and Petrol Consumed by Transport Sector’.

16 Economic Times Bureau, ‘NPAs of 26 Banks Rise’.

17 Reserve Bank of India, Database on Indian Economy.

18 Reserve Bank of India, Handbook of Statistics on Indian Economy, 2024–25; Mazumdar, ‘Industrial Development in India under Liberalisation’.

19 Government of India, Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024, 15–16.

20 India Brand Equity Foundation, Electronic and Computer Software Industry.

21 बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में 20 लाख कर्मचारियों के ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ के आकलन को वित्तीय क्षेत्र के लिए प्रॉक्सी (अनुमानित आधार) के रूप में इस्तेमाल कर, एक उदार ऊपरी समायोजन के बाद भी, वित्तीय क्षेत्र में कुल रोजगार का आँकड़ा भारत के कार्यबल के 1% से काफी नीचे ही रहता है।  Krishna Kant, ‘BFSI on Hiring Sprint, IT Sector Stumbles in Headcount Marathon in FY24’, Business Standard, 4 September 2024, https://www.business-standard.com/industry/news/bfsi-on-hiring-sprint-it-sector-stumbles-in-headcount-marathon-in-fy24-124090401152_1.html.

22 रोज़गार हिस्सेदारी के आंकड़े लेखिका की स्वयं की गणना पर आधारित हैं, जो भारत सरकार के Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024 तथा ‘Number of employees in IT’ से प्राप्त क्षेत्रीय आंकड़ों पर निर्भर हैं।

23 Government of India, Annual Report, Periodic Labour Force Survey, July 2023–June 2024, 15–16; Government of India, Provisional Estimates of Annual National Income, 2024–25 and Quarterly GDP, Q4 2024–25; Government of India, Provisional Estimates of Annual GDP for 2024-25 and Quarterly Estimates of GDP, Q4 2024–25.

24 World Bank, ‘Age dependency ratio – India’.

25 Kapil, ‘India’s Growing and Aging Populations’.

26 Bharti, Chancel, Piketty, and Somanchi, Income and Wealth Inequality in India, 1922–2023, 1, 3, 44, 77.

Bibliography

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