संयुक्त राष्ट्र को पूरी दुनिया के लिए काम करना होगा
आख़िर क्यों अधिकांश दुनिया को दरकिनार करके वीटो अधिकार वाले पाँच देश पूरी मानवता के लिए युद्ध और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों पर अकेले निर्णय लेते हैं।
परिंदों और पशुओं का सम्मेलन, रणबीर कलेका (भारत), 2010
प्यारे दोस्तो,
जिस दौर में युद्ध और जनसंहार जारी हों, जब ग़ज़ा और सूडान जैसे शब्द अपने आप में त्रासदियों के पर्याय में बदल गए हों, यह सवाल करना बेहद आसान है कि क्या संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की आवश्यकता ख़त्म हो गई है या क्या इसमें सुधार संभव है। लेकिन इससे बेहतर सवाल यह होगा: कैसा सुधार या किसके लिए?
यूएन चार्टर (1945) वादा करता है कि राष्ट्र अपने मतभेद शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाएँगे, एक दूसरे को धमकी नहीं देंगे एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बलप्रयोग नहीं करेंगे, और साझा समस्याओं पर सहयोग करेंगे। शक्तिशाली देशों द्वारा इन सबका उल्लंघन किया जाता है, इसलिए यूएन चार्टर की रक्षा और उसे लागू किया जाना चाहिए न कि उसे दरकिनार कर दिया जाना चाहिए। आख़िरकार, दुनिया का हर देश यूएन चार्टर का भागीदार है और इसलिए इसके नियमों का पालन करना उनका फ़र्ज़ है।
यूएन को कम-से-कम तीन अलग-अलग इकाइयों के रूप में समझा जा सकता है।
पहली और सबसे सार्वजनिक यूएन इकाई है सुरक्षा परिषद्, जो यूएन की कार्यकारी के तौर पर स्थापित हो गई है। यूएन सुरक्षा परिषद् (यूएनएससी) में पंद्रह राष्ट्र होते हैं, पाँच स्थाई सदस्य (पी5: चीन, फ़्रांस, रूस, यूनाइटेड किंग्डम और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका), इनके अलावा अन्य सदस्य यूएन महासभा से दो साल के लिए चुने जाते हैं। यूएनएससी के फ़ैसलों में पी5 के पास वीटो शक्ति होती है, जिससे वे हर उस फ़ैसले को रोक सकते हैं जो उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध है। अस्थाई सदस्यता नियत क्षेत्रीय आधार पर आबंटित होती है: तीन अफ्रीकी राष्ट्र; एशिया-प्रशांत क्षेत्र, लैटिन अमेरिका/करिबियन, और पश्चिमी यूरोप से दो-दो सदस्य, और पश्चिमी यूरोप से एक राष्ट्र। अब तक की परंपरा रही है कि एशिया या अफ़्रीका के लिए तय सीटों में से (बारी-बारी) एक अरब राष्ट्र को दी जाती है।
यूएनएससी यूएन महासभा का प्रतिनिधित्व करती है जिसके 193 सदस्य ऐसे प्रस्ताव पारित करते हैं जिनसे दुनिया की राय तय होती है। लेकिन शीत युद्ध के अंत के बाद से ही इन प्रस्तावों को अमूमन अनदेखा किया जाता रहा है। यूएनएससी और महासभा के आपसी संबंध तल्ख़ हैं, क्योंकि सुरक्षा परिषद ख़ुद को एक स्वतंत्र इकाई समझती है जो ख़ुद नीतियाँ तैयार कर सकती है। जबकि अधिकांश दुनिया यूएन महासभा को सच्चे लोकतांत्रिक संस्थान के साकार रूप के तौर पर देखती है। यूएन महासभा के प्रस्ताव यूएनएससी के लिए क़ानूनन बाध्यकारी नहीं हैं।
दूसरी इकाई है यूएन की अनेक एजेंसियाँ, जिनमें से हर एक की स्थापना आधुनिक दौर के किसी ख़ास संकट से निपटने के लिए हुई है: इनमें हैं संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), जो बच्चों के अधिकारों की पैरवी करता है; संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को), जो दुनिया की तमाम संस्कृतियों में आपसी सम्मान की भावना का प्रचार करता है, आदि। तीसरी इकाई बनती है यूएन के कर्मचारियों और दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय लोक सेवा अधिकारियों से, जिनका नेतृत्व महासचिव करते हैं।
संरचना, अनुपम सूद (भारत), अज्ञात तिथि
सुधार के लिए एशियाई माँग
साफ़ है कि संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में कई स्तरों पर अवरोध है। सुरक्षा परिषद के तीन सदस्य (फ़्रांस, यूनाइटेड किंग्डम, और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) वैश्विक उत्तर का हिस्सा हैं। वे यूएन की राजनीतिक इकाई की शर्तें इसलिए तय कर पाते हैं क्योंकि यूएन की राजनीतिक व्यवस्था में उनका विचारधारात्मक और संस्थागत वर्चस्व है। युद्धों, प्रतिबंधों और शांति बनाए रखने से जुड़े फ़ैसले एक ऐसी संरचना के भीतर लिए जाते हैं जिसमें अधिकांश मानवता को उन चंद शक्तियों से अनुमति लेनी पड़ती है। क्योंकि एक बहुत छोटे से गुट में इन चंद ताक़तों की जगह सुरक्षित है।
यूएन सुरक्षा परिषद में न अफ़्रीका या लैटिन अमेरिका के लिए कोई स्थाई जगह है और न ही भारत के लिए जो अब दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है। लेकिन यहाँ फ़्रांस और यूनाइटेड किंग्डम जैसी दो भूतपूर्व औपनिवेशिक ताक़तों के लिए पक्की जगह है जबकि इनका दुनिया में अब प्रभाव भी घट रहा है।
एशिया की स्थिति यूएन में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इस क्षेत्र में दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा रहता है, परमाणु शक्तियाँ हैं, छोटे टापू राष्ट्र भी हैं और ऐसे देश भी जो टकराव और जलवायु संकट झेल रहे हैं। इसके बावजूद ‘एशिया’ की कोई एक भू-राजनीतिक आवाज़ नहीं है, क्योंकि दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया और पश्चिमी एशिया के हित अलग-अलग हैं। इसलिए भारत जैसे ही किसी एक और राष्ट्र को सुरक्षा परिषद में स्थाई जगह दे देने से इन तमाम समाजों की आवाज़ों का सुना जाना सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इसलिए सुधारों को दीर्घकालिक और निर्वाचित प्रतिनिधित्व का विस्तार करना चाहिए और परिषद के विचार-विमर्श को उन लोगों के लिए खोलना चाहिए जो उसके कार्यों के परिणामों के साथ जी रहे हैं। चीन और भारत दो बड़े राष्ट्र हैं और वे बेशक एशिया का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन अगर भारत भी चीन की तरह सुरक्षा परिषद का एक स्थाई सदस्य बन जाए, तो इन्हें भविष्य में एक एशियाई संघ की संभावना पर विचार करना चाहिए जिससे एक महाद्वीपीय मत का निर्माण हो सके और ये दोनों सिर्फ़ अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक़ काम न करें।
किसी ज़रूरी मुद्दे के सुरक्षा परिषद में जाने से पहले यूएन महासभा के मतों की भी पड़ताल की जानी चाहिए। सुरक्षा परिषद को कोई भी फ़ैसला लेने से पहले दुनिया की इस संसद यानी एक अपेक्षाकृत बड़ी संस्था से सलाह लेनी चाहिए। वरना, उसके फ़ैसले दुनिया की अधिकांश जनता को अनदेखा करेंगे। इस जनता के पास न सुरक्षा परिषद तक पहुँच है और न ही उसकी वीटो शक्ति। जब संयुक्त राष्ट्र महासभा का बहुमत फ़िलिस्तीन पर इज़राइल के अवैध कब्ज़े और औपनिवेशीकरण को समाप्त करने या क्यूबा पर अमेरिकी अवैध घेराबंदी को समाप्त करने के पक्ष में मतदान करता है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को उस राय के अनुसार कार्य करना चाहिए; वरना यह अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र का मज़ाक़ बनाना है। किसी भी संयुक्त राष्ट्र सुधार के केंद्र में यही विचार होना चाहिए।
क्रांतिकारी शृंखला के पहाड़, एर्बोसिन मेल्डिबेकोव (कज़ाकिस्तान), 2014
सुधार के लिए गठबंधन
हर वर्ष सितंबर के पहले हफ़्ते में संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र न्यूयॉर्क में होता है और हर साल अमेरिका विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधियों को वीज़ा देने से मना करके यूएन का मज़ाक़ उड़ाता है। इस साल अमेरिका ने फ़िलिस्तीनी प्रतिनिधि मंडल को आने से रोका और यह भी तय किया कि ईरान का प्रतिनिधि मंडल छोटा होगा। बेहद शर्मनाक है कि अमेरिका और यूएन ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का स्वागत किया, एक ऐसा व्यक्ति जिसके ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का वॉरंट जारी है। जबकि इन अपराधों के पीड़ितों को वीज़ा नहीं दिया जा रहा।
संयुक्त राष्ट्र को मेज़बान देश के साथ हुए समझौते को लागू करवाना चाहिए और ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था विकसित करनी चाहिए कि जब समान भागीदारी में बाधा डाली जाए, तो उसकी प्रमुख बैठकें कहीं और आयोजित की जा सकें। संयुक्त राष्ट्र सप्ताह वैश्विक दक्षिण में कई स्थानों पर आयोजित किया जा सकता है, जैसे नैरोबी, केन्या, जिसे पहले ही दक्षिण में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के रूप में स्थापित किया जा चुका है, या दक्षिण के उन चार शहरों में से एक जो संयुक्त राष्ट्र के क्षेत्रीय आयोगों की मेज़बानी करते हैं – अदीस अबाबा, बैंकॉक, बेरूत, या सैंटियागो।
यदि अफ़्रीका या एशिया को संयुक्त राष्ट्र के लिए एक एजेंडा विकसित करने का अवसर मिलता, तो ये महाद्वीप ध्यान देने योग्य बातों को केवल मादक पदार्थों की तस्करी और हिंसक उग्रवाद का मुकाबला करने तक सीमित न रखते जो कि उत्तरी अमेरिका और यूरोप के लिए महत्त्वपूर्ण एजेंडा हैं। अफ़्रीका और एशिया हथियारों के व्यापार, मानव तस्करी के शिकार लोगों के शोषण, और अधिक न्यायसंगत वित्तीय संस्थानों जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के पास एक शस्त्र व्यापार संधि है जो हथियारों के हस्तांतरण के लिए मानक स्थापित करती है, और उसके पास एक संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ और अपराध कार्यालय है जो मानव तस्करी पर रिपोर्ट करता है। लेकिन इन साधनों को मज़बूत करने की आवश्यकता है, और इन्हें लागू करने को प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। एक संयुक्त राष्ट्र तंत्र उन पक्षों के हस्तांतरणों पर नज़र रख सकता है जिनके गंभीर दुर्व्यवहारों के विश्वसनीय सबूत मिलते हैं (जैसे फ़िलिस्तीन में इज़राइली जनसंहार), इसमें शामिल कॉर्पोरेट और राज्य आपूर्ति शृंखलाओं को प्रकाशित कर सकता है, और निर्णायक अधिकारियों के सामने साक्ष्य पेश किए जा सकते हैं। एंड्रयू फाइंस्टीन, रूथ रोहडे और जैक सिनामोन की नई पुस्तक, ‘मेकिंग अ किलिंग: हाउ द वेस्ट प्रॉफिट्स फ्रॉम स्लॉटर इन ग़ज़ा एंड यमन’ ( वर्सो बुक्स, 2026) को एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट होना चाहिए था जिससे कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते थे।
इस काम का कोई भी हिस्सा अमूर्त नहीं है। जैसा कि ‘मेकिंग अ किलिंग’ दिखाती है, पश्चिम एशिया के संघर्षों में हस्तांतरित हथियार नागरिक पीड़ा को बहुत हद तक बढ़ा देते हैं। और यह सब उन बोर्डरूम और मंत्रालयों से बहुत दूर होता है, जहाँ इन बिक्रियों को मंज़ूरी दी जाती है। इस बीच, लोगों को ऑनलाइन घोटालों के ज़रिए तस्करी का शिकार बनाया जाता है और डरा-धमकाकर अपराध करने के लिए मजबूर किया गया है। जबकि पूरे क्षेत्र में प्रवासी श्रमिक ऐसे शोषण का सामना करते हैं जो कानूनी संरक्षण की तुलना में आसानी से सरहदें पार कर जाता है।
ऑपरेशन लैम सन 719, टिफ़नी चुंग (वियतनाम), 2018
संयुक्त राष्ट्र अगर तभी आवाज़ सुनता है, जब असुरक्षा की आँच अमीर देशों तक पहुँचती है, तो उसने सामूहिक सुरक्षा का अर्थ ही नहीं समझा है। उसे धन, हथियारों और मज़दूरों की आवाजाही के रास्तों का पता लगाना चाहिए। साथ ही, हिंसा और शोषण के शिकार लोगों को केवल आँकड़ों या अपराधियों के रूप में देखने के बजाय उनकी रक्षा करनी चाहिए और उन्हें आगे बढ़ने में मदद देनी चाहिए।
यूएन सुधारों के विषय में चलने वाली किसी भी बहस को स्थाई सदस्यता के उम्मीदवारों के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई से बचना होगा। भारत और ब्राज़ील जैसे देशों का एक ज़्यादा बड़ी भूमिका के लिए किया जाने वाला दावा बेशक दमदार है, लेकिन इसके साथ उन क्षेत्रों और राष्ट्रों के दावे भी मज़बूत हैं जिन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। लेकिन सुधार का मतलब पुराने विशेषाधिकारों की लिस्ट में नए विशेषाधिकार जोड़ देना नहीं हो सकता। एशिया के बड़े देशों को अपने प्रभाव का इस्तेमाल समान संप्रभुता और क्षेत्रीय समावेशन को मज़बूत बनाने में करना चाहिए, इनमें वे छोटे देश भी शामिल हैं जिनके हितों का प्रतिनिधित्व ये बड़े देश स्वतः नहीं करते। लंबे समय से चली आ रही अफ़्रीका की न्यायोचित प्रतिनिधित्व की माँग और लैटिन अमेरिका को स्थाई सदस्यता से बाहर रखा जाना, दोनों परिस्थितियाँ एक ही मत का हिस्सा है। सुधारों के लिए बनने वाले किसी भी गठबंधन को इन सभी क्षेत्रों तक पहुँचना होगा न कि इन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना।
हमें इस काम में आने वाली समस्याओं के बारे में भी ईमानदारी से बात करनी होगी। पी5 चार्टर में ऐसे बदलाव के प्रयासों को रोक सकते हैं जिनसे उनकी शक्ति कम होती हो और एक स्वतंत्र महासचिव उम्मीदवार के चुनाव को वीटो कर सकते हैं। लेकिन यह चार्टर एक ऐसी साझा भाषा भी है जिसके आधार पर बाक़ी दुनिया इन देशों के व्यवहार को तोल सकते हैं। इसलिए यूएन के लिए संघर्ष करना अब भी ज़रूरी है। फ़िलिस्तीन से प्रशांत महासागर तक, एशिया के लोगों को एक ऐसे संस्थान की ज़रूरत है जो क़ानूनों को समान रूप से लागू करने में, उनकी आवाज़ को बुलंद करने, और हिंसा से किसे फ़ायदा होता है इसकी पहचान करने में मदद करे। सुधारों का मक़सद एक और प्रभावी यूएन बनाना नहीं है; बल्कि इनका उद्देश्य है एक ऐसा यूएन जो उन लोगों के लिए काम करे जिनसे वह वादे तो करता आया है लेकिन बहुत लंबे समय से ये वादे अधूरे पड़े हैं।
स्नेह सहित,
विजय प्रसाद और करीम मकदीसी
लेखकद्वय ‘लैंड ऑफ ब्लू हेलमेट्स: द यूनाइटेड नेशंस इन द अरब वर्ल्ड‘ (यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, 2016) के संपादक हैं। करीम अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बेरूत में पढ़ाते हैं और विजय ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के कार्यकारी निदेशक हैं।