Skip to main content

ताइवान में यूएस वैचारिक नियंत्रण का बोझ

बारहवाँ एशिया न्यूज़लेटर

1979 में यूएस के आख़िरी सिपाही के ताइवान से चले जाने के बावजूद इस पर वॉशिंगटन की पकड़ ढीली नहीं हुई — बस नियंत्रण की सूरत बदल गई, बैरकों और जंगी जहाज़ों की बजाए शिक्षा संस्थाओं, समाचार दफ़्तरों और एक पीढ़ी के वैचारिक निर्माण के ज़रिए यह काम पूरा हुआ।

Chen Chieh-jen (Taiwan, China), Factory, 2003.

प्रिय साथियो,

दुनिया में हर जगह संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के सैन्य अड्डे हैं। लगभग अस्सी देशों/क्षेत्रों में इसके 750––800 सैन्य अड्डे हैं। ताइवान (चीन) इन अनेकों क्षेत्रों में से एक है। ताइवान का यूएस सैन्य अड्डा 1979 में औपचारिक रूप से बंद हो गया था, हालाँकि हथियारों की बिक्री लगातार जारी रही है। लेकिन जिस मुद्दे पर बात कम होती वह है ‘वैचारिक नियंत्रण’। ताइवान में यूएस ने सिर्फ़ सैन्य अड्डे नहीं बनाए थे, बल्कि वैचारिक दबदबे का एक व्यवस्थित तंत्र भी खड़ा किया था, जो सैन्य ढाँचे से ज़्यादा टिकाऊ साबित हुआ है। फ़ौज के चले जाने से यूएस नियंत्रण का अंत नहीं हुआ।

ताइवान चीन का हिस्सा है। पिछले हिमयुग में ये दोनों भू-भाग एक पुल से जुड़े हुए थे; क़रीब दस हज़ार साल पहले जब समुद्र का स्तर बढ़ा, तो इनके बीच जलडमरूमध्य बन गया। ताइवान के मूल निवासी ज़्यादातर मुख्य भूमि से हैं। सोंग, युआन, मिंग और छिंग राजवंशों के दौरान 900 सालों तक मुख्य भूमि से हान समुदाय का प्रवास जारी रहा। आज ताइवान की आबादी में क़रीब 95% हान समुदाय के लोग हैं। मेरे अपने पूर्वज ग्वांगदोंग के थे, जो लगभग तीन सौ साल पहले यहाँ आए थे। 1684 में ताइवान चीन के फ़ूजियान प्रांत का हिस्सा था; लेकिन 1885 से यह चीन का एक अलग प्रांत बन गया था।

चीन और ताइवान के बीच इस लंबे जुड़ाव को तीन बार साम्राज्यवादी आक्रमण और ताइवान पर क़ब्ज़े का सामना करना पड़ा: पहला, डच उपनिवेशीकरण 1624 से 1662 (जो 38 साल चला); दूसरा, जापानी उपनिवेशीकरण 1895 से 1945 (जो 50 साल चला); और तीसरा 1950 से अब तक जारी यूएस का सैन्य एवं वैचारिक नियंत्रण, जो कि उपनिवेशीकरण का एक ऐसा रूप है जो दशकों से चला आ रहा है और जिसका कोई अंत नहीं दिखता।

ली शी-चियाओ (ताइवान, चीन), बाज़ार का दरवाज़ा (Entrance of a Market), 1945.

चीनी गृहयुद्ध में यूएस का दख़ल

1945 में जब विश्व फ़ासीवाद-विरोधी युद्ध ख़त्म हुआ तो ताइवान फिर मुख्य भूमि से जुड़ गया। लेकिन यह व्यवस्था कुछ ही समय टिक पाई। 1945 से 1950 के बीच यूएस साम्राज्यवाद की चीन के गृहयुद्ध में दख़ल रही और कोमिंतांग (केएमटी) को सैन्य, आर्थिक तथा दूसरे तरीक़ों से यूएस का समर्थन मिला। 1949 में केएमटी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) से हार गई और ताइवान चली गई। तब से ताइवान जलडमरूमध्य उथल-पुथल में है।

1950 में कोरियाई युद्ध छिड़ गया। जनवादी गणराज्य चीन (पीआरसी) के प्रभाव को रोकने के लिए यूएस ने ताइवान को अपनी घेराबंदी रणनीति में शामिल कर लिया। ताइवान को यूएस-नीत सुदूर पूर्व कम्युनिस्ट तथा चीन विरोधी शीतयुद्ध का अग्रिम हिस्सा बनाया गया। ताइवान, दक्षिण कोरिया, हांगकांग और सिंगापुर वे ‘चार एशियाई टाइगर’ थे जिन्हें मुख्य भूमि चीन के पूर्वी तट पर एक घेराबंदी चेन की तरह इस्तेमाल किया गया। शीतयुद्ध के दौरान यूएस ने ताइवान में एक सैन्य अड्डा बनाया। 1950 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमन ने सातवें बेड़े को ताइवान जलडमरूमध्य में भेजा था। 1954 में यूएस और केएमटी अधिकारियों ने एक परस्पर रक्षा संधि पर दस्तख़त किए। यह चीन के आंतरिक मामलों में यूएस का सीधा दख़ल था। यूएस ने आर्थिक सहायता और वैचारिक नियंत्रण से ताइवान पर अपना दबदबा जमाया।

यूएस के समर्थन से केएमटी ने 1949 से 1987 तक ताइवान में मार्शल लॉ लागू रखा। इस दौर को ‘वाइट टेरर/ श्वेत आतंक’ के नाम से जाना जाता है। केएमटी के दमनकारी शासन के ख़िलाफ़ ताइवान के लोग खड़े हो गए तो यूएस-समर्थित ख़ुफ़िया एजेंसियों ने लोगों का दमन शुरू कर दिया: गिरफ़्तारी, पूछताछ, झूठे आरोप व मुक़दमे, क़ैद और फाँसी आदि सब तरीक़े अपनाए गए। इस दमन में मारे गए लोगों का एक सामूहिक क़ब्रिस्तान है; इनमें से बहुतों की पहचान तक नहीं हुई है, वे बस ज़मीन में दफ़ना दिए गए।

वैचारिक नियंत्रण कई तरह से काम करता है। यूएस ने ताइवान में शिक्षा व्यवस्था, मीडिया और दूसरे माध्यमों से एक व्यवस्थित प्रचार तंत्र खड़ा किया, और दूसरी तरफ़ ऐसी नीतियाँ बनाईं जिनके तहत नौजवानों को विदेश — ज़्यादातर यूएस — में पढ़ने भेजा गया। यूएस-परस्त अभिजात वर्ग को फ़ेलोशिप, फ़ाउंडेशन तथा एशिया फ़ाउंडेशन या हवाई के ईस्ट-वेस्ट सेंटर जैसी संस्थाओं के ज़रिये वैचारिक रूप से तैयार किया गया। काफ़ी बाद में ख़ुलासा हुआ कि एशिया फ़ाउंडेशन को पूरे एशिया में गुप्त वैचारिक अभियान चलाने के व्यापक कार्यक्रम के तहत सीआईए से फंड मिलता था। यह बात यूएस विदेश विभाग ने 1967 में सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया था।

मैं ख़ुद इस व्यवस्था का एक उदाहरण हूँ: मैं ईस्ट-वेस्ट सेंटर की फ़ेलो रही हूँ। इस वैचारिक नियंत्रण के मुख्य विषय हैं: कम्युनिज़्म का विरोध, उदारवाद, आधुनिकीकरण सिद्धांत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ‘सार्वभौमिक मूल्य’ के रूप में पेश करना, मानवाधिकार, पश्चिमी लोकतंत्र, तथा चीन-विरोधी, यूएस-परस्त भावना को बढ़ावा देना। नतीजतन, ताइवान की मुख्यधारा विचारधारा आज यूएस-परस्त, कम्युनिस्ट-विरोधी और चीन-विरोधी है।

हुआंग रोंग-कान (ताइवान, चीन), भयावह तलाशी (The Horrible Inspection), 1947.

जनवादी गणराज्य के साथ संबंध सामान्य होने के बाद भी यूएस का दख़ल जारी रही

1979 में जनवादी गणराज्य चीन और यूएस ने कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। इसकी शर्तें थीं कि यूएस ताइवान में केएमटी अधिकारियों से कूटनीतिक संबंध तोड़ेगा, अपनी फ़ौज वापस बुलाएगा (यह शर्त 1979 में पूरी हो गई) — और परस्पर रक्षा संधि ख़त्म करेगा, जो 1 जनवरी 1980 को रद्द हुई। लेकिन फ़ौज की वापसी के साथ नियंत्रण का अंत नहीं हुआ

1979 के बाद भी ताइवान पर यूएस का नियंत्रण नहीं रुका। यूएस कांग्रेस ने चीन को कूटनीतिक मान्यता देने के फ़ौरन बाद ताइवान रिलेशंज़ एक्ट पास कर दिया, जिसके तहत हथियारों की बिक्री जारी रही और अमेरिकन इंस्टीट्यूट इन ताइवान, वास्तविकता में यूएस दूतावास, स्थापित किया गया। इनके ज़रिये ग़ैर-आधिकारिक संबंध क़ायम रखे गए। बिना औपचारिक सैन्य अड्डे के भी हथियारों की बिक्री लगातार जारी रही। यूएस के प्रत्येक राष्ट्रपति ने ताइवान को हथियार बेचे।

केवल 2019 से अब तक यूएस अरबों डॉलर के हथियारों को मंज़ूरी दे चुका हैजिनमें M1A2 एब्रैम्स टैंक, हार्पून जहाज़-रोधी मिसाइलें, और HIMARS मोबाइल रॉकेट सिस्टम शामिल हैं। अक्टूबर 2021 में वॉल स्ट्रीट जर्नल  ने रिपोर्ट किया कि यूएस के स्पेशल ऑपरेशंज़ फ़ॉर्सेज़ एंड मरीन्स गुप्त तरीक़े से ताइवानी बलों को प्रशिक्षण दे रहे हैंयह औपचारिक अड्डे न होने के बावजूद गुप्त सैन्य मौजूदगी की ओर इशारा है। हालिया हथियार पैकेजों ने ताइवान पर यूएस हथियार ख़रीद का ख़र्चा उठाने की शर्त लगाई है। यह मुद्दा ताइवान में एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है।

वैचारिक नियंत्रण भी बिना रोक-टोक के जारी रहा। शैक्षिक व्यवस्था, मीडिया की विचारधारा, दशकों में निर्मित अभिजात वर्ग नेट्वर्क — सब 1979 के बाद भी बना रहा और आज भी क़ायम है।

यिन शिउ-झेन (चीन), पोर्टेबल सिटी, तिथि अज्ञात.

जनता का संघर्ष और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता

नियंत्रण के इन ढाँचों से परेशान ताइवान की जनता प्रतिरोध व संघर्ष कर रही है। लगभग पाँच दशकों से मैं भी एक ऐसे ही संघर्ष का हिस्सा रही हूँ: दिआओयूताई द्वीप समूह की सुरक्षा का आंदोलन। दिआओयूताई द्वीप समूह ताइवान (चीन) का हिस्सा हैं, लेकिन 1970 के दशक की शुरुआत में यूएस ने, यूएस-जापान कम्युनिस्ट-विरोधी गठबंधन को मज़बूत करने के लिए, दिआओयूताई द्वीप समूह का प्रशासनिक अधिकार जापान को सौंप दिया, क्योंकि ये द्वीप समूह विश्व फ़ासीवाद-विरोधी युद्ध के बाद से यूएस न्यास क्षेत्रों में आते थे। दिआओयूताई द्वीपों की सुरक्षा का आंदोलन इस हस्तांतरण के विरोध में शुरू हुआ और पाँच दशकों से जारी है।

इस दौरान जापानी साम्राज्यवाद ने — यूएस साम्राज्यवाद के समर्थन से — इन द्वीपों पर चीन की संप्रभुता पर लगातार अतिक्रमण किया है तथा ताइवान के मछुआरों का जीना मुहाल कर रखा है। मैं ताइवान में दिआओयूताई शिक्षा संघ की संस्थापक अध्यक्ष हूँ। हमारा काम है चीनी जनता को इस बारे में शिक्षित करना कि यूएस और जापान चीन की संप्रभुता का यह उल्लंघन कैसे जारी रखे हुए हैं।

इसी तरह का काम करती है चाइना वॉर ऑफ़ रेज़िस्टेंस अगेंस्ट जापान हिस्टोरिकल ट्रुथ प्रिज़र्वेशन सोसाइटी। जापान सरकार ने फ़ासीवाद-विरोधी विश्व युद्ध के दौरान चीन में किए अपने अत्याचारों को अभी तक स्वीकार नहीं किया है। जापानी आक्रमण ने क़रीब दो करोड़ चालीस लाख चीनी लोगों की जान ली, लेकिन जापान सरकार ने आज तक यह माना नहीं है कि चीन की जनता का उन्होंने कितना नुक़सान किया था। मार्च 2026 में उक्त सोसाइटी के क़रीब बीस सदस्य — जिनमें से एक मैं भी थी — जो जापानी आक्रमण के शिकार हुए थे, जापान गए ताकि वहाँ की सरकार से उसके युद्धकालीन अत्याचारों के लिए जवाबदेही माँगें।

ये प्रयास पूरे क्षेत्र में काम कर रहे व्यापक एकजुटता नेट्वर्कों से जुड़े हैं। मिसाल के तौर पर, ओकिनावा-ताइवान संवाद परियोजना के एक सदस्य दिआओयूताई शिक्षा संघ के निदेशक मंडल में है। इस तरह से ओकिनावा में यूएस सैन्य अड्डों के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष दिआओयूताई द्वीप समूह पर चीनी संप्रभुता के संरक्षण के संघर्ष से जुड़ा है। दुर्भाग्य से, जापान उलटी दिशा में जा रहा है। प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची की दक्षिणपंथी सरकार फ़ासीवाद-विरोधी विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से अपने देश में सबसे बड़े पैमाने पर पुनर्सैन्यीकरण कर रही है।

स्थानीय संघर्षों और स्थानीय विश्लेषणात्मक समझ को पूरे क्षेत्र में साझा करने से पता चलता है कि हमारे बीच कितनी समानताएँ हैं। लेकिन इससे गहरे वर्ग-विश्लेषण की भी ज़रूरत उभरती है। ईरान में, ताइवान में, और चीन में — साम्राज्यवाद अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करता है, और साम्राज्यवादी नेताओं के बयान अक्सर जनता के बयानों से एकदम उलट होते हैं। जब हमारी हिस्टोरिकल ट्रुथ प्रिज़र्वेशन सोसाइटी मार्च 2026 में टोक्यो गई, तो हमने सरकारी अधिकारियों और जापान के नागरिक आंदोलनों के कार्यकर्ताओं दोनों से बात की। अधिकारियों से जब हमने युद्धकालीन अत्याचारों की जवाबदेही माँगते हुए बात की तो कोई साझा समझ नहीं बनी। लेकिन नागरिक आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने हमारे साथ एकजुटता दिखाई।

मुझे हमेशा लगता था कि जापानी लोगों का नज़रिया उनकी सरकार के वैचारिक प्रचार से ढला होगा। लेकिन जापानी नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं से हमारी मुलाक़ात दिखाती है कि ऐसी एकजुटता न सिर्फ़ संभव है बल्कि ज़रूरी है — तब भी जब एक दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री बिल्कुल अलग सुर में बात करते हों। एक जैसे अनुभवों और वर्गों वाले देशों की जनता के बीच एकजुटता इन बंटवारों को कम करती है। हममें से हर एक अपने क्षेत्रों में बहुत बड़ा काम कर रहा है, लेकिन यह ज़रूरी है कि हम एक दूसरे से संपर्क बनाएँ।

 

शुभकामनाओं सहित

चेन मेई-शिया

 

चेन मेई-शिया दिआओयूताई शिक्षा संघ की संस्थापक अध्यक्ष और नेशनल चेंग कुंग विश्वविद्यालय, ताइवान, चीन, में जन-स्वास्थ्य विषय की एमेरिटा प्रोफ़ेसर हैं। वे पाँच दशक से ज़्यादा समय से संप्रभुता और यूएस तथा जापानी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ आंदोलनों में शामिल रही हैं।

नोट: लेखक के विचार निजी हैं और ज़रूरी नहीं कि ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च’ इनसे पूरी तरह सहमत हो।