अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में शंघाई सहयोग संगठन की भूमिका
इस सम्मेलन के सभी सदस्य देशों ने एक स्वर से ईरान पर हमले की निंदा की, उन मुल्कों ने भी जिनके अमेरिका से बेहतर रिश्ते रहे हैं।
शंघाई सहयोग सगंठन (एससीओ) का 26वाँ शिखर सम्मेलन 31 अगस्त से 1 सितंबर 2026 तक बिश्केक, किर्गिस्तान में आयोजित किया गया। इस वर्ष इसकी थीम थी- ‘एससीओ के 25 वर्ष सतत शांति, विकास और समृद्धि की ओर साथ-साथ।’ इस संगठन के सदस्य देश हैं- भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ईरान, बेलारूस (2024 में नवीनतम शामिल हुआ देश)। इस संगठन की स्थापना 2001 में मूल रूप से 6 देशों रूस, चीन, कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान द्वारा की गई थी, बाद में अन्य देश इसमें शामिल हुए। वास्तव में इस संगठन की स्थापना में चीन की अहम भूमिका रही है। इस संगठन का निर्माण मूलतः रूस के उन स्वतंत्र गणराज्यों को लेकर बनाया गया था, जो कभी भूतपूर्व सोवियत संघ के भी हिस्से रहे हैं। आज यह अन्य देशों को मिलाकर एक बड़ा और प्रभावशाली मंच बन गया। किर्गिस्तान में हाल में हुए इस एससीओ समिट ने पहली बार सारी दुनिया का ध्यान खींचा,क्योंकि दुनिया का वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहा है, विशेष रूप से दक्षिण पूर्व एशिया में यह बदलाव बहुत तेज़ है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला तथा वहाँ मिली अमेरिका की असफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि खाड़ी के अरब देशों-विशेष रूप से सऊदी अरब, क़तर, यूएई को अब केवल अमेरिकी संरक्षण में सुरक्षा नहीं मिल सकती। इसका कारण यह है कि ईरान ने इन देशों में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों पर बड़े हमले किए, इस कारण इन देशों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा तथा इन देशों का यह भ्रम टूटा कि अमेरिका उन्हें सैनिक सुरक्षा दे सकता है, इसलिए इस क्षेत्र में नए-नए सैनिक गठबंधन बन रहे हैं। अभी हाल में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच सऊदी अरब के मक्का में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें कहा गया कि इनमें से किसी एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा।
भविष्य में इसमें अन्य देशों के शामिल होने की भी संभावना है। बांग्लादेश और ईरान तक के शामिल होने की उम्मीद है। वास्तव में इस सम्मेलन को इस बार इसी परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जा रहा है। यूरेशियन टाइम्स ने अपने विश्लेषण में कहा है कि यह महत्त्वपूर्ण शिखर सम्मेलन था, क्योंकि इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे वैश्विक नेताओं ने भाग लिया, हालाँकि चीन और पाकिस्तान की वज़ह से भारत की असली परीक्षा शुरू हो सकती है, क्योंकि अगले साल यह समिट पाकिस्तान में होगा।
वास्तव में दुनिया भर में चीन एक बड़ी राजनैतिक,आर्थिक और सैनिक ताक़त के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है, कि चीन कुछ ही वर्षों में अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा तथा सैन्य दृष्टि से भी चीन अमेरिका को बड़ी चुनौती देने की स्थिति में आ जाएगा। यही कारण है कि एससीओ में चीन का काफ़ी दबदबा है, जो संगठन के नाम से ही पता चल जाता है, इसका मुख्यालय चीन के शहर शंघाई में है। इस संगठन में चीन की भूमिका बहुत अहम है, जिससे वह संगठन के एजेंडे और दूसरे ज़रूरी पहलुओं पर असर डाल सकता है। चीन अब मध्य एशियाई देशों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। ये देश सोवियत संघ का हिस्सा थे और दशकों तक मास्को के प्रभाव में रहे।
इस सम्मेलन में एक ख़ास बात यह देखने को मिली कि भारत सहित सभी सदस्य देशों ने ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों की निंदा की, हालाँकि इसमें सीधे-सीधे अमेरिका का नाम नहीं लिया गया, लेकिन इसमें ईरान की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही गई। यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें शामिल अधिकतर देशों के अमेरिका से गहरे आर्थिक और रणनैतिक संबंध हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि समूचे मध्य एशिया में अमेरिका का दबदबा घट रहा है और चीन का वर्चस्व बढ़ रहा है।
एससीओ समिट कई वजहों से भारत के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। भारत ने आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाया और आतंकवाद के पूरे इको सिस्टम को ख़त्म करने पर ज़ोर दिया। इन जैसे हर सम्मेलनों में, जिसमें पाकिस्तान की भी भागीदारी रहती है, पाकिस्तान एक ओर तो भारत में अल्पसंख्यकों के दमन की बात उठाता है, दूसरी ओर भारत पर भी आरोप लगाता है कि वह उसके देश में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। निश्चित रूप से भारत दुनिया भर के लिए एक बड़ा बाज़ार है। यही बड़ा बाज़ार दुनिया भर के आकर्षण का केंद्र है, सभी इसमें निवेश करके मुनाफ़ा कमाना चाहते हैं। भारत रणनीतिक रूप से अभी भी इसका पूरी तरह फ़ायदा नहीं उठा पा रहा है। इसका ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाने की नीति पर विचार करना चाहिए।
ब्रिक्स-क्वार्ड जैसे संगठनों में भी भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। क्वार्ड देशों में भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह संगठन भी अमेरिका द्वारा चीन की बढ़ती ताकत को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका द्वारा बनाया गया था, परन्तु अब इन जैसे संगठनों की प्रासंगिकता तेज़ी से घट रही है। अमेरिका ने ख़ुद ही चीन को दुनिया में दूसरे नंबर की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया है। भारत की चुनौती है कि वह अमेरिकापरस्त की छवि से बाहर निकले। उसकी मुस्लिमविरोधी छवि भी बनाने की कोशिशें चल रही है, जिसकी काट ढूँढनी होगी तभी एससीओ जैसे संगठनों में हम और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संगठन अपनी मुख्य प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहे। मध्य एशिया के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव रूस के साथ गहरे होते रिश्ते, ईरान के साथ संबंध और चीन के साथ बेहतर होते संबंध उसके लिए अवसर की तरह हैं।
बिश्केक समिट ने दिखाया कि एससीओ एक अहम मंच बना हुआ है, ख़ासकर ऐसे समय में,जब दुनिया का भू-राजनीतिक माहौल तेजी से अनिश्चित होता जा रहा है। भारत के लिए यह बात अहम होगी कि वह इस मंच का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों को मज़बूत करने के लिए करे और साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा और मज़बूती के मुद्दे एजेंडे के केंद्र में रहें।
स्वदेश कुमार सिन्हा |