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	<title>हिंदी बुलेटिन Archives - Tricontinental: Institute for Social Research | ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान</title>
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	<description>international, movement-driven institution focused on stimulating intellectual debate that serves people’s aspirations.</description>
	<lastBuildDate>Wed, 30 Sep 2026 06:47:41 +0000</lastBuildDate>
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		<title>विभाजन की त्रासदी और हिंदी सिनेमा (भाग-2)</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/vibhajan-aur-hindi-cinema-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[जवरीमल्ल पारख ]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Sep 2026 06:47:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सांप्रदायिक-फासीवादी सत्ता के दबाव के कारण एक बार फिर विभाजन और भारत-पाकिस्तान संबंधों को नए नज़रिए से देखने का सिलसिला शुरू हुआ है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>1980 के दशक में हिंदुत्व की अवधारणा की विजय के साथ धार्मिक राष्ट्रवाद लौट आया था। इस पुनरुत्थान का कारण वे ऐतिहासिक ताक़तें थीं, जो एक दूसरे के आगे पीछे और साथ-साथ सक्रिय थीं। जब 1990 के दशक के मध्य में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार सत्ता में आयी तब उसने आर्थिक उदारीकरण की उन्हीं नीतियों को अपनाया जो कांग्रेस सरकारें लागू कर रही थीं। कांग्रेस पार्टी की तरह एनडीए सरकार ने भी अभिजात वर्गों के हितों को ही पोषित करने का काम किया और आम जनता को इस या उस विचारधारात्मक भुलावे में फँसाये रखा। इसमें मुख्य हथियार बनी हिंदुत्व की विचारधारा। हिंदुत्व के अनुरूप राष्ट्रवाद को नये साँचे में ढालने के लिए इतिहास के एक नये संस्करण की ज़रूरत थी। इसलिए एनडीए सरकार के समय भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय इतिहास के पुनर्लेखन का सुव्यवस्थित कार्यक्रम चलाया। इतिहासकारों और उनके काम को यह कहकर हमले का निशाना बनाया गया कि उन्होंने अतीत को ‘विकृत’ किया है। इस दौर में बनायी गयी फ़िल्में बिल्कुल भिन्न तरह का मक़सद पूरा कर रही थी। गदरः एक प्रेमकथा (2001) और एल. ओ. सी. (2003) में अन्य का चित्रण गुस्से और घृणा के साथ किया गया है जिससे कि हिंसक प्रतिशोध लिए जाने की ज़रूरत है।</p>
<p>पिंजर (2003) में स्व और अन्य के बीच की भिन्नता को बनाए रखना मुश्किल दिखायी देता है। ट्रेन टु पाकिस्तान (1997) और अर्थः 1947 (1999) में विभाजन के दौर की स्मृतियों, उस दौर के जख़्मों को जीवित करने का प्रयास किया गया है। नसीम (1995) और ज़ुबैदा (2001) जटिल फ्लैशबैक या सामयिक रिसाव पर बल देने वाले गुंथे हुए आख्यान के जरिए जख़्मी व्यक्तिपरकताओं को पकड़ती हैं। विभाजन से उत्पन्न शोक के प्रति ये भिन्न-भिन्न नज़रिए भारत में समुदाय के भविष्य के लिए भिन्न-भिन्न आशयों के साथ ऐतिहासिक चेतना के भिन्न-भिन्न रूपों को प्रोत्साहित करते हैं।</p>
<p>इसी माहौल में प्रदर्शित फ़िल्म ग़दरः एक प्रेमकथा विभाजन की कहानी को पेश करती है जिसमें एक जाट सिख तारा सिंह अपनी मुस्लिम पत्नी सकीना को उसके पिता के चंगुल से छुड़ाने के लिए पाकिस्तान जाता है और वहाँ की सत्ता और फ़ौज से मुक़ाबला कर अपनी पत्नी को वापस हिंदुस्तान ले आता है। यह फ़िल्म इस लोकप्रिय भारतीय दृष्टिकोण का प्रचार करती है कि पाकिस्तान मुसलमानों द्वारा अपने लिए अलग राज्य की माँग का नतीजा है जिसका निहितार्थ यह है कि हिंदू और सिख नेताओं और उनके राजनीतिक आकलन की इस विभाजन में कोई भूमिका नहीं है। ग़दर की तरह बॉर्डर और एल. ओ. सी. भी सैन्य राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती हैं, जबकि 2000 में प्रदर्शित फ़िल्में हे राम, मिशन कश्मीर और फ़िज़ा राष्ट्रवाद में निहित अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं। ये फ़िल्में आजादी के तीन दशक बाद देश में हिंदू-मुस्लिम संबंधों में बढ़ रहे तनाव की कहानियाँ कहती हैं। जहाँ हे राम गांधी की हत्या की हिंदू राष्ट्रवादियों की कोशिशों पर है और जिसे बाबरी मस्जिद और उसके बाद हुए दंगों से जोड़ा गया है तो फ़िजा़ मुसलमानों में बढ़ रही असुरक्षा को विषय बनाती है। इस हालात पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म सईद अख्तर मिर्ज़ा की नसीम है। यह विभाजन पर बनी फ़िल्म नहीं है बल्कि यह उन सामाजिक और राजनीतिक हालात के बारे में है जिनसे भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को रोज़ टकराना होता है। ये हालात अचानक पैदा नहीं हुए हैं। 1947 के बाद से ही इसके पदचिह्नों को देखा जा सकता है। यह फ़िल्म एक मुस्लिम परिवार के उन दिनों की कहानी है जब 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी थी। इस परिवार में तीन पीढ़ियाँ एक साथ रहती हैं। दादा जान जिसकी भूमिका उर्दू के प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी ने निभायी थी और उनकी पोती नसीम जिसका अपने दादा से ख़ास लगाव है। दादा जान की मौत उसी 6 दिसंबर 1992 की सुबह में होती है जिस दिन बाबरी मस्जिद संघ परिवार द्वारा ध्वस्त कर दी गयी थी। रमजान का महीना है लेकिन पूरे माहौल में तनाव भरा है। दादा जान जो एक प्रगतिशील मुसलमान हैं अपने पोते मुश्ताक और उसके दोस्त ज़फ़र को समझाने में नाकामयाब हैं। दंगों में मुसलमान ही क्यों मारा जाता है, का जवाब देते हुए जब दादा जान कहते हैं कि मुसलमान नहीं ग़रीब मारा जाता है तो ज़फ़र उनकी बात का जवाब देते हुए कहता है कि आज़ादी के बाद से मुसलमानों को साज़िशी तरीक़े से ग़रीब बनाये रखा गया है।</p>
<div id="attachment_170408" class="wp-caption aligncenter"><img fetchpriority="high" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-170408" class="size-full wp-image-170408" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-30-at-12.05.50-PM.png" alt="" width="444" height="331" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-30-at-12.05.50-PM.png 444w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-30-at-12.05.50-PM-300x224.png 300w" sizes="(max-width: 444px) 100vw, 444px"><p id="caption-attachment-170408" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>कृष्ण खन्ना, पलायन, 2007</small></p></div>
<p>बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के दिन दादा जान की मृत्यु जैसे भारत में धर्मनिरपेक्ष राजनीति की समाप्ति की सूचक प्रतीत होती है और उस वामपंथी राजनीति की भी जो वर्गीय असमानताओं को प्रमुखता से सामने लाती है न कि धार्मिक भिन्नताओं को। नसीम के दादा कई रूपों में गरम हवा के युवा सिकंदर हैं जिन्होंने इस उम्मीद में भारत में रहने का निश्चय किया था कि वे अपने वामपंथी साथियों के सच्चे समुदाय के बीच रहते हुए वर्ग उत्पीड़न और धार्मिक कट्टरता से लड़ सकेंगे। दोनों फ़िल्मों में अंतरपाठीय संबंध वामपंथी कवि कैफ़ी आज़मी की दादा की भूमिका में उपस्थिति है। कैफ़ी आज़मी ने ही गरम हवा की पटकथा लिखी थी। एक साथ विचार करने पर, 1973 और 1995 की दोनों फ़िल्में मुस्लिम-भारतीय आत्म-चेतना का गहन मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करती हैं जो खोते जाने और टूटी-फूटी ज़िंदगी की असंगत माँगों से नष्ट हो चुकी है। पहली नज़र में देखने पर फ़िल्म यह कहती प्रतीत होती है कि इस व्यक्तिपरकता में निहित तंतु खो गया है जो अधिक सौहार्दपूर्ण राष्ट्रीय भविष्य के स्वप्न को समर्थ करता। लेकिन ऐसा नहीं है। नसीम में दादा जान की मृत्यु का अर्थ यह नहीं है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति हमेशा के लिए ख़त्म हो चुकी है। मृत्यु या विलोपन का अर्थ पूर्णतः उन्मूलन नहीं है। कुछ निशान पीछे छूट जाते हैं। हमारी चेतना में वे घर किये रहते हैं और हमें बार-बार याद दिलाते हैं। प्रत्येक नुक़सान की यह स्थायी ताक़त है- एक रचनात्मक संभावना जो हमारे हृदय में बनी रहती है। अगर आज भारत में धर्मनिरपेक्षता की मौत हो चुकी है, तो, इसका यूटोपियाई आयाम हमारी स्मृतियों में बचा रहता है।</p>
<p>भूमंडलीकरण के इन तीन दशकों में संघ परिवार ने सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की जिस विचारधारा को बढ़ावा दिया है, इतिहास और परंपरा का जिस तरह सांप्रदायिक विकृतीकरण किया है, उसका गहरा असर अब हिंदी फ़िल्मों पर भी दिखने लगा है। बाजीराव मस्तानी, पद्मावत, तान्हाजी, पानीपत, केसरी, सम्राट पृथ्वीराज, छावा आदि कई फ़िल्में बनी हैं जिनमें इतिहास के विकृतीकरण और सांप्रदायिकीकरण को देखा जा सकता है। नरेंद्र मोदी के शासनकाल में सिनेमा के माध्यम से इतिहास का ही सांप्रदायिकीकरण नहीं हो रहा है वरन हमारे अपने समय की घटनाओं को भी सांप्रदायिक नज़रिए से पेश किया जा रहा है। 1966 में पाकिस्तान और भारत के बीच ताशकंद में समझौता हुआ था और समझौते के बाद दुर्भाग्य से तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की ह्रदयाघात से मृत्यु हो गयी थी, उस समय संघ परिवार ने जिस तरह की अफ़वाहें फैलायी थीं, उन्हीं अफ़वाहों को सच मानकर दि ताशकंद फाइल्स फ़िल्म बनायी गयी। यह और बात है कि जनता ने इस फ़िल्म को पूरी तरह से ठुकरा दिया। लेकिन कश्मीर में पंडितों के पलायन को लेकर बनायी गयी दि कश्मीर फाइल्स जनता को दिग्भ्रमित करने में काफ़ी हद तक कामयाब रही है। सिनेमा द्वारा सांप्रदायिकता का ज़हर किस तरह फैलाया जा सकता है, इसका सबसे भयावह उदाहरण यह फ़िल्म है जिसने सिनेमा के पर्दे पर मुस्लिम समुदाय को खलनायक की तरह पेश किया और 1990 में कश्मीर से पंडितों के पलायन के लिए पूरी तरह से उन्हें ज़िम्मेदार ठहराया और इस तथ्य को पूरी तरह से छोड़ दिया गया कि कश्मीर में आतंकवाद और भारतीय सेना की कार्रवाइयों का सबसे ज़्यादा शिकार वहाँ के मुसलमान ही हुए हैं।</p>
<p>फ़िल्म दि केरला स्टोरी (2023) दि कश्मीर फाइल्स से एक क़दम आगे कही जा सकती है, जो पूरी तरह से एक ऐसे मुद्दे पर बनायी गयी है, जो आरएसएस और उससे संबद्ध संगठनों द्वारा प्रचारित किया गया है। वह मुद्दा है- लव जिहाद। फ़िल्म का दावा है कि केरल राज्य से 32000 हिंदू लड़कियों का ब्रेनवॉश करके और मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसाकर उन्हें शादी करने के लिए मजबूर किया गया, उनका धर्म परिवर्तन किया गया और बाद में उनके कथित पतियों के साथ सीरिया, यमन आदि इस्लामी देशों में आईएसआईएस जैसे आतंकवादी संगठनों में यौन दासी के रूप में भेज दिया गया। इन बत्तीस हज़ार औरतों का आज कुछ भी पता नहीं है। उनके साथ क्या हुआ कोई नहीं जानता। जब बत्तीस हज़ार की संख्या को कोर्ट में चुनौती दी गयी तो फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक ने बताया कि यह सरकारी आँकड़ा है लेकिन तब यह स्पष्ट किया गया कि केरल सरकार ने कभी भी यह आँकड़ा नहीं पेश किया केवल पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने वे आँकड़े ज़रूर पेश किये थे जिसमें हिंदू, मुसलमान और ईसाई धर्मावलंबियों ने अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अंगीकार कर लिया था और वह संख्या दो-ढाई हज़ार से ज़्यादा नहीं थी। उस समय मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि इनमें से कोई भी जबरन धर्मपरिवर्तन का मामला नहीं था। फ़िल्मकार ने जब कोई प्रमाण पेश नहीं किया तो कोर्ट के आदेश पर 32000 के इस आँकड़े को हटा दिया गया और इस संख्या को घटाकर केवल तीन कर दिया गया। जिन तीन लड़कियों की कहानी फ़िल्म में कही गयी है उसके बारे में फ़िल्मकार का दावा है कि ये सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। पिछले 12 सालों में ऐसी कई प्रोपेगेंडा फिल्में बनी हैं जिनमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर या पूरी तरह झूठ का सहारा लेकर मुसलमानों के विरुद्ध घृणा का प्रचार किया गया है। हालाँकि ज़्यादातर फिल्मों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है लेकिन दि केरला स्टोरी, उरी : दि सर्जिकल स्ट्राइक, आर्टिकल 370, छावा, धुरंधर जैसी कई फिल्में कामयाब भी हुई हैं। इस तरह की प्रोपेगेंडा फिल्में हिंदी सिनेमा का कभी आदर्श नहीं रही हैं।</p>
<div id="attachment_170416" class="wp-caption aligncenter"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-170416" class="size-full wp-image-170416" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-30-at-12.13.02-PM.png" alt="" width="517" height="378" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-30-at-12.13.02-PM.png 517w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-30-at-12.13.02-PM-300x219.png 300w" sizes="(max-width: 517px) 100vw, 517px"><p id="caption-attachment-170416" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>जोगेन चौधरी, सियालदह रेलवे स्टेशन में रेफ़्यूजी, 1958</small></p></div>
<p>हमारे देश की हज़ारों साल की साझा संस्कृति की विरासत, संविधान प्रदत्त लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और हर तरह के भेदभाव को समाप्त कर एक समतावादी-न्यायपूर्ण समाज बनाने के हमारे लक्ष्य को ख़त्म करना इतना आसान नहीं है। हिंदी सिनेमा में जो वैचारिक विचलन नज़र आ रहा है, उसका मुख्य कारण सांप्रदायिक फासीवादी राजसत्ता का दबाव है। इस दबाव ने एक बार फिर न केवल विभाजन को बल्कि भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों को नए नज़रिए से देखने पर ज़ोर दिया है। मौजूद राजसत्ता के पक्ष में प्रचार के लिए बनाई जाने वाली फिल्मों के विपरीत लगातार ऐसी फिल्में भी बनती रही हैं जो हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान के बीच नफ़रत की बजाय आपसी भाईचारे और सौहार्द की बात करती हैं। वीर जारा, पीके, इक्कीस जैसी कई फिल्मों में पाकिस्तान को शत्रु देश के रूप में पेश नहीं किया गया है बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच मौजूद सौहार्द और भाईचारे पर बल दिया गया है। अभी हाल में प्रदर्शित मैं वापस आऊँगा और बँटवारा 1947 भारत के विभाजन को सांप्रदायिक नज़रिए से नहीं बल्कि पारस्परिक प्रेम और मानवीय सौहार्द के रूप में प्रस्तुत करती हैं।</p>
<p>हिंदी फ़िल्मकार इम्तियाज अली की फ़िल्म मैं वापस आऊँगा (2026) में विभाजन की कहानी स्मृतियों के रूप में सामने आती है। फिल्म के नायक हैं- 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह), जो मृत्यु शैय्या पर हैं और डिमेंसिया और अल्जाइमर के मरीज़ हैं। वर्तमान और अतीत दोनों उनके अंदर गड्डमड्ड हो गए हैं। वे अपनी जन्मभूमि सरगोधा जाना चाहते हैं। उनके सामने 1947 से पहले की कहानी के पन्ने एक-एक कर सामने आने लगते हैं। अपने बचपन की घटनाएँ याद आती हैं, अपनी प्रेमिका याद आती है। उन्हें देखने के लिए उनका पोता निर्वैर सिंह (दिलजीत दोसाँझ) लंदन से आता है। उसे जब पता चलता है कि उसके दादा ईशर सिंह अपनी जन्मभूमि सरगोधा और अपने बचपन की प्रेमिका की याद में परेशान हैं, तो वह पाकिस्तान चला जाता है। उसकी कोशिश है कि वह विडियो कॉल के ज़रिए ही अपने दादा को उनके बचपन की प्रेमिका से बात करवा दे। लेकिन वहाँ जाकर पता चलता है कि उनकी प्रेमिका अब नहीं रही। अतीत की स्मृतियों के रूप में कई प्रसंग बार-बार इस बात को रेखांकित करते हैं कि विभाजन लोगों पर थोपा गया है। एक दृश्य में कीनु (ईशर सिंह के पुकार का नाम) यह कहते हुए सड़क पर बैठ जाता है कि ‘मैंने तो नहीं कहा था देश का बँटवारा करने को। मैं तो नहीं जाता यहाँ से’। विभाजन पर पहले बनी अधिकतर फ़िल्मों से यह इस अर्थ में भिन्न है कि यह संभवतः पहली फ़िल्म है जो विभाजन की विभीषिका को एक ऐसे ट्रॉमा के रूप में पेश करती है जिससे बाद की पीढ़ियों के लिए मुक्त होना आसान नहीं है। यह उस अतीत को ऐसी स्मृतियों के रूप में पेश करती है जिसके परिप्रेक्ष्य में हम अपने वर्तमान को देख और समझ सकते हैं। यह फ़िल्म वर्तमान में चलती है लेकिन स्मृति के रूप में विभाजन बार-बार आता है। विभाजन और विस्थापन का अतीत और वर्तमान दोनों एक-दूसरे में इस कदर घुल-मिल जाते हैं कि जब फ़िल्म समाप्त होती है तो ऐसा लगता है कि विस्थापन की त्रासदी समाप्त नहीं हुई है बल्कि इसके घाव देश की सीमाओं को लाँघते हुए कैंसर की तरह दुनिया के हर हिस्से में पहुँच चुके हैं क्योंकि न फासीवाद समाप्त हुआ है और न ही साम्राज्यवाद। अतीत में बहुत दूर न भी जाएँ तो भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से युद्ध, नरसंहार और निरंतर चलने वाला विस्थापन पिछले 80 साल के इतिहास की सबसे भयावह सचाई है।</p>
<p>बँटवारा 1947 हिंदी के प्रख्यात नाटककार असग़र वजाहत के लोकप्रिय नाटक ‘जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ’ पर आधारित राजकुमार संतोषी की फिल्म है। फ़िल्म में सिकंदर मिर्जा का परिवार विभाजन के समय भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने पर मजबूर होता है। उसे लाहौर में जो घर अलॉट होता है, उसमें एक हिंदू महिला (माई) रह रही होती है। मिर्जा के कहने के बावजूद वह अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं होती। पहले तो मिर्जा के परिवार और माई में तनाव पैदा होता है। शहर के और लोग भी उसे निकालने की कोशिश करते हैं, उसकी हत्या तक की साज़िश होती है लेकिन मिर्जा का परिवार इसे मंज़ूर नहीं करता और माई को अपना लेता है, वह उनके साथ रहने लगती है। जब माई की मृत्यु हो जाती है तो मिर्जा का परिवार, मस्जिद के मौलवी और मोहल्ले के लोग मिलकर उसका हिंदू रीति से अंतिम संस्कार करते हैं। नाटक की तरह फिल्म का संदेश भी बहुत स्पष्ट है– हिंदुओं और मुसलमानों के बीच उस सौहार्द को जगाना जो उनके बीच सैकड़ों सालों से साथ-साथ रहने के कारण पहले से उनके दिलों में कायम था। माई सिकंदर के परिवार को मुसलमान की तरह नहीं देखती बल्कि अपने देश और ज़मीन से उखड़े हुए ऐसे बेघर लोगों की तरह देखती है जिन्हें मदद की ज़रूरत है। उसकी यह भावना धीरे-धीरे सिकंदर के परिवार को ही नहीं पूरे मोहल्ले के लोगों को उसकी ओर खींचने लगती है। एक बार माई घर छोड़कर जाने लगती है तो मोहल्ले के लोग उसे वापस ले आते हैं। फ़िल्म मिर्जा की बेटी तनु द्वारा पूछे गए सवाल का बहुत माकूल जवाब देती है कि जब हम और माई साथ-साथ रह सकते हैं तो हिंदू और मुसलमान साथ-साथ क्यों नहीं रह सकते।</p>
<p>मैं वापस आऊँगा से बँटवारा 1947 की तुलना उचित नहीं है लेकिन यह फिल्म विभाजन की विभीषिका को दिखाते हुए भी किसी समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं करती जैसा कि ग़दर जैसी कुछ फिल्में करती रही हैं। लेकिन फिल्म की सीमा यह है कि वह उन सांप्रदायिक राजनीतिक संगठनों की ओर भी उँगली नहीं उठाती जिस पर नाटक में सवाल उठाया गया है।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>जवरीमल्ल पारख </strong></p><p>सिनेमा पर नियमित लिखने वाले जाने-माने लेखक</p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>विभाजन की त्रासदी और हिंदी सिनेमा (भाग-1)</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/vibhajan-aur-hindi-cinema-1/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[जवरीमल्ल पारख ]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 29 Sep 2026 08:25:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विभाजन की टीस आज भी भारतीय समाज में बनी हुई है। इसलिए कला-साहित्य में यह विषय बार-बार लौटता है। पढ़िए विभाजन पर सिनेमाई नज़रिए का विश्लेषण।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>विभाजन की त्रासदी पर हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, अंग्रेजी और कई दूसरी भाषाओं में कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास और नाटक लिखे गए। कई भुक्तभोगियों ने संस्मरण लिखे, तो विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों ने विभाजन की त्रासदी की तरह-तरह से व्याख्या की और यह आज भी जारी है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि विभाजन को लेकर कोई महत्त्वपूर्ण हिंदी फ़िल्म आज़ादी के लगभग 25 साल बाद तक नहीं बनी। 1973 में एम. एस. सथ्यु के निर्देशन में गरम हवा विभाजन पर बनी पहली गंभीर फ़िल्म थी। उसके लगभग पंद्रह साल बाद 1987 में गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन के लिए भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ पर इसी नाम से धारावाहिक का निर्माण किया, जो बाद में फ़िल्म के रूप में भी प्रदर्शित हुई। तमस का निर्माण एक ऐसे दौर में हुआ था जब भारत में एक बार फिर से सांप्रदायिक ताक़तों का उभार होने लगा था। रामजन्म भूमि आंदोलन के नाम पर देश भर में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें की जाने लगीं। थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद सांप्रदायिक दंगे होने लगे।</p>
<p>अयोध्या में बनी 400 साल पुरानी बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद सांप्रदायिक दंगों का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। अब होने वाले दंगे आमतौर पर एकतरफ़ा होते थे और मुसलमानों को ही जान-माल का ज़्यादा नुक़सान झेलना पड़ता था। 1992-93 में मुंबई में और 2002 में गुजरात में हुए दंगे दरअसल मुसलमानों के विरुद्ध वैसे ही जनसंहार थे, जैसे 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और दूसरे शहरों में सिख समुदाय के विरुद्ध हुआ जनसंहार था। इन्हीं दशकों में पहले पंजाब में और बाद में कश्मीर में आतंकवाद के फैलाव ने स्थितियों को बद से बदतर बना दिया।</p>
<p>भारतीय सिनेमा आरंभ से ही मिलीजुली संस्कृति का वाहक रहा है। हिंदुस्तानी सिनेमा ने एक लंबे समय से इस उपमहाद्वीप के लोगों की सामूहिक चेतना को संबोधित करते हुए उनके मनबहलाव की ज़रूरतों को पूरा किया है। लोकप्रिय कला बने रहने के लिए यह ज़रूरी है कि सिनेमा उन संकीर्णताओं से ऊपर उठा रहे जिन्हें राजनीति से प्रेरित निहित स्वार्थ लोगों पर थोपते रहते हैं। सिनेमा को इन संकीर्णताओं से लड़ते हुए अपने अस्तित्व को बनाए रखना होता है और अपना विकास भी करना होता है। भारतीय सिनेमा ने इस लड़ाई को निरंतर जारी रखा है। यह समाज परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई नहीं है लेकिन यह भारतीय समाज को टूटने से बचाने और उसे अपने सांस्कृतिक और सामाजिक विशिष्टताओं के साथ बनाए रखने की लड़ाई ज़रूर है। 1947 का विभाजन उसके इस अभियान पर पहला बड़ा आघात था और दूसरा आघात हुआ जब रामजन्मभूमि आंदोलन चलाया गया जिसकी परिणति छह दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस में हुई और तीसरा आघात आरएसएस के राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी का केंद्र की सत्ता पर लगातार तीन चुनाव जीतकर आसीन होना है। पिछले 12 सालों में वर्तमान सत्ता ने ऐसे फिल्मकारों को प्रोत्साहित किया जिन्होंने अपनी फिल्मों के द्वारा मुख्य रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के विरुद्ध सांप्रदायिक नफ़रत और घृणा को फैलाने का काम किया।</p>
<p>नब्बे के दशक में सांप्रदायिकता के उग्र होते जाने ने फिल्मकारों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे विभाजन के त्रासद अतीत को देखने, जाँचने और समझने का प्रयास करें। इस दौर में कई ऐसी फिल्में बनीं जिनमें या तो विभाजन और उस दौर के हालात को केंद्र में रखा गया था या फिर मौजूदा हालात से विभाजन के समय को जोड़कर देखा गया था। गरम हवा और तमस के बाद ट्रेन टू पाकिस्तान (1997), अर्थ 1947 (1999), हे राम! (2000), गदर : एक प्रेमकथा (2001), और पिंजर (2003), में मुख्य कथा विभाजन के इर्दगिर्द निर्मित हुई है, तो गांधी (1984), मम्मो (1994), नसीम (1995), ज़ुबैदा (2001) में विभाजन संदर्भ के रूप में आता है। इसके अतिरिक्त ऐसी बहुत सी फिल्में इस दौर में बनीं जिनमें सांप्रदायिक दंगे, आतंकवाद, कश्मीर, हिंदू-मुस्लिम और भारत-पाकिस्तान संबंधों को कथा का विषय बनाया गया था।</p>
<div id="attachment_170260" class="wp-caption aligncenter"><img decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-170260" class="size-full wp-image-170260" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-28-at-10.10.52-PM.png" alt="" width="1016" height="339" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-28-at-10.10.52-PM.png 1016w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-28-at-10.10.52-PM-300x100.png 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-28-at-10.10.52-PM-768x256.png 768w" sizes="(max-width: 1016px) 100vw, 1016px"><p id="caption-attachment-170260" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>निलिम शेख़, Carrying Home (घर को ले जाते हुए), 2001</small></p></div>
<p>विभाजन के आघात से उबरना आसान नहीं होता। हालाँकि अनुभवों को एक निश्चित आकार लेने में समय लगता है। उनको याद करना कोई समस्या नहीं है क्योंकि उन्हें भूला नहीं जा सकता। इसके विपरीत वे असंबद्ध और अबोधगम्य रूप में निरंतर दिमाग में छाये रहते हैं। विभाजन की हिंसा से बचे लोगों के बयानों से जहाँ एक ओर संवेदनशून्यता प्रकट होती है तो दूसरी ओर उन बातों पर यकीन करने का जी नहीं करता। क्या यह सब कुछ सच हो सकता है? अपनी अबोधगम्यता में ये अनुभव आघात की विशिष्टताओं को प्रकट करते हैं। इन बयानों में विभाजन की उथल-पुथल ऐसे रूप में सामने आती है मानो कुछ समय के लिए सभी लोग उन्मादग्रस्त हो गये हों। तर्क ने मनुष्य का साथ छोड़ दिया हो और वह हिंसक, विचारशून्य और वहशी बन गए हों।</p>
<p>गरम हवा वित्त निगम द्वारा प्रायोजित और अनुदान प्राप्त फ़िल्म थी जिसे आरंभ में सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और फ़िल्म मुश्किल से 1973 में प्रदर्शित हो पायी। आख़िर में फ़िल्म को उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रपति स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। गरम हवा समानांतर सिनेमा की एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म मानी गई। विभाजन पर बनी अन्य फिल्मों से तुलना करने पर गरम हवा अधिक सचेत और औपचारिक मेलोड्रामेटिक मोड की फिल्म है, जो एकता और अलगाव के बीच के टकराव में बीच-बचाव करती है। जब सलीम मिर्ज़ा के बड़े भाई हलीम मिर्ज़ा अपने परिवार के साथ आगरा छोड़कर पाकिस्तान जा रहे होते हैं तो कैमरा दरवाजे पर लगे ताले के क्लोजअप से शुरू होता है, फिर धीरे-धीरे स्टेशन से बाहर निकलती ट्रेन की आवाज़ और उसके बाद ड्योढ़ी में बैठी सलीम मिर्ज़ा की बेटी अमीना अपने होने वाले पति कासिम के लिए स्वेटर बुनती हुई दिखाई देती है। उसे अब भी उम्मीद बनी हुई है लेकिन जब कासिम भी पाकिस्तान चला जाता है तो वह टूट सी जाती है और उसी ड्योढ़ी में वह उदास बैठी दिखाई देती है। तेजी से गूँजती ट्रेन की सीटी की आवाज सुनाई देती है और क्लोजअप में उसका स्तब्ध चेहरा दिखाई देता है। इस समय, जब ट्रेन के स्टेशन से बाहर निकलने की आवाज़ सुनाई देती है, तो कैमरा और धीमी रफ़्तार से अमीना के चेहरे की तरफ़ बढ़ने लगता है और उसकी खाली-खाली आँखों के बिल्कुल नज़दीक जाकर ठहर जाता है। जब-जब सलीम मिर्ज़ा स्टेशन से लौटते हैं तो उनका उदास चेहरा तांगे के शेड के सम्मुख दिखाई देता है। बलराज साहनी जिन्होंने सलीम मिर्ज़ा की भूमिका निभाई है, स्वयं विभाजन से विस्थापित व्यक्ति थे। उनसे बेहतर ढंग से कौन समझ सकता है कि विभाजन की पीड़ा क्या होती है, अपनी ज़मीन से उखड़ने का क्या मतलब होता है। यह ऐसी वेदना थी, जिसे न रोकर और न ही चीखकर व्यक्त किया जा सकता था। जिस वेदना भरी आत्मविच्छिन्नता से मिर्ज़ा सलीम को गुजरना पड़ता है, बलराज साहनी उसे जीवंत कर देते हैं। मिर्ज़ा सलीम के माध्यम से बलराज साहनी उस पात्र को ही नहीं जीते, स्वयं अपने अतीत को भी जी रहे होते हैं।</p>
<p>आजादी के पचीस साल बाद निर्मित गरम हवा स्वाभाविक राष्ट्रवादी लोकाचार (इथॉस) की वैधता के सामूहिक पुनर्मूल्यांकन में सहभागी बनती है। गरम हवा हालाँकि विभाजन के बाद के भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को चित्रित करती है इसके बावजूद फ़िल्म इस बात पर बल भी देती है कि देश को संकीर्णतावादी विभाजनों से ऊपर उठकर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक न्याय को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।</p>
<div id="attachment_155966" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-155966" class="size-full wp-image-155966" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Paritosh-Sen-India-Refugees-1946.jpg" alt="" width="481" height="570" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Paritosh-Sen-India-Refugees-1946.jpg 481w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Paritosh-Sen-India-Refugees-1946-253x300.jpg 253w" sizes="auto, (max-width: 481px) 100vw, 481px"><p id="caption-attachment-155966" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>परितोष सेन, रेफ़्यूजी, 1946</small></p></div>
<p>विभाजन के चार दशक बाद, सरकारी टेलीविजन चैनल ‘दूरदर्शन’ पर पाँच घंटे लंबा लघु धारावाहिक तमस का प्रदर्शन हुआ जिसने एक बार फिर से विभाजन से जुड़े जख़्मों को घर-घर तक पहुँचा दिया। भीष्म साहनी ने अपना यह उपन्यास 1971 में लिखना शुरू किया था, जब गृहयुद्ध के कारण बांग्लादेश का जन्म हुआ और दक्षिण एशिया में एक बार फिर भू-राजनीतिक विभाजन हुआ था। उपन्यास को साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया था। उपन्यास में विभाजन से जुड़ी मारकाट की भयावहता को शक्तिशाली ढंग से संप्रेषित किया गया है, लेकिन लेखक अपने को निर्लिप्त रखने और विश्लेषण करने में कामयाब रहा है। तमस भीष्म साहनी के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है लेकिन इसमें उन्हीं की दो कहानियों ‘सरदारनी’ और ‘ज़हूर बख़्श’ को भी शामिल किया गया है। भीष्म साहनी ने इस बात का उत्तर देते हुए कि तमस क्यों और अभी क्यों, कहा कि धारावाहिक बनाने वालों का उद्देश्य पुराने जख़्मों को कुरेदना नहीं है और न ही सुषुप्त विद्वेष को जगाना है। न ही विभाजन के समय हुई मारकाट के लिए किसी विशेष समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराना है। इसके विपरीत, विभाजन की ओर ले जाने वाली सांप्रदायिक ताक़तों को, जो अब भी समकालीन भारत में सक्रिय हैं, सामने लाना और उनकी करतूतों के प्रति लोगों को सावधान करना है। भीष्म साहनी और गोविंद निहलानी दोनों का विभाजन से सीधा संबंध था। भीष्म साहनी विभाजन से पहले रावलपिंडी में रहते थे और गोविंद निहलानी ने लिखा था, ‘भय, आतंक और ख़ून-खराबे की पहली यादें इसी दौर की हैं’। निहलानी की रुचि विभाजन के नज़रिए से समकालीन स्थितियों के विश्लेषण की थी। भीष्म साहनी की ही बात को दोहराते हुए उन्होंने कहा था कि ‘जो सांप्रदायिक तत्त्व विभाजन के लिए ज़िम्मेदार थे वे आज भी सक्रिय हैं और उनका तौर तरीक़ा भी वही है। इसलिए इन सांप्रदायिक तत्त्वों की भूमिका पर एक फिल्म की ज़रूरत मैं समझता हूँ। विभाजन एक अच्छी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है’।</p>
<p>धारावाहिक में नत्थू और उसके जैसे साधारण लोग जो विभाजन के बवंडर के बीच फँस गए हैं, उनका चित्रण बहुत विस्तार से किया गया है। वे ऐसी अभागी कठपुतलियाँ हैं, जिनके कार्य स्वयं उनकी इच्छा से नहीं किए गए हैं। यहाँ विभाजन प्राकृतिक आपदा जैसी ताक़त के साथ तबाही मचाता है। प्रचलित एकता और साझापन जो आम आदमी के रोज़मर्रा के जीवन की पहचान है, के बावजूद अव्यवस्था फैल जाती है। विभाजन और राष्ट्र का जन्म दोनों अपरिहार्य के रूप में प्रस्तुत होते हैं। ‘बाँटो और राज करो’ की ब्रिटिश नीति महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर आश्रित विशाल दस्तावेज़ीकरण और व्याख्याओं का विषय रही है। विभिन्न धार्मिक समुदायों की चिंताओं के साथ अनेक तरीक़ों से खिलवाड़ करना और उनके बीच अविश्वास भड़काना इस नीति का मुख्य आधार रहा है। हालाँकि सांप्रदायिकता और संभावित बँटवारे को सिर्फ़ ब्रिटिश चालों से नहीं समझा जा सकता। तमस में जो रणनीति अपनाई गई है, वह बहुत सीधी है। असहाय जनता और राजनीतिज्ञों, धार्मिक नेताओं और संपत्तिशाली वर्गों, बिचौलिए जिनके पास इतिहास को आकार देने की ताक़त हैं, के बीच तीखा अंतर किया गया है। जिस व्यक्ति ने सुअर को मारा है और अनजाने में दंगे भड़काता है, दरअसल कुटिल षड्यंत्रकारियों के हाथ की कठपुतली के रूप में दर्शाया गया है और जो, जैसे-जैसे दहशत फैलती जाती है, किनारे खड़ा देखता रहता है। नत्थू को दोषमुक्त करने में, तमस आम आदमी को हर तरह की ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर देती है। इस बीच, ताक़तवरों को निर्दयी, अपने एजेंडे को चालाकी से आगे बढ़ाने वाले के रूप में चित्रित किया गया हैः वे सतर्कतापूर्वक देखते रहते हैं, अपनों के बीच तक़रार करते रहते हैं और आग में घी डालते रहते हैं। जब दंगे शांत हो जाते हैं, तो व्यापारी और भूस्वामी व्यापार के अवसरों और लोगों के बड़े पैमाने पर भाग खड़े होने से ज़मीन-जायदाद के मूल्य को लेकर विचार-विमर्श करने लगते हैं। वे लाशों पर मंडराने वाले गिद्धों से भिन्न नहीं हैं।</p>
<div id="attachment_170276" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-170276" class="size-full wp-image-170276" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-29-at-1.37.44-PM.png" alt="" width="344" height="460" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-29-at-1.37.44-PM.png 344w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/09/Screenshot-2026-09-29-at-1.37.44-PM-224x300.png 224w" sizes="auto, (max-width: 344px) 100vw, 344px"><p id="caption-attachment-170276" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>अर्पिता सिंह, Leaping Bridge (पुल लाँघते हुए), 2015</small></p></div>
<p>तमस विस्तार से इंसानी मूल्यों की रक्षा का प्रयत्न करता है जो कि लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है। राष्ट्रवादी इतिहास लेखन साहस, करुणा और आपसी भाईचारे का समर्थन करता है। यह धारावाहिक भी शौर्य की घटनाओं को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करता है जब लोग अपनी जान जोख़िम में डालकर दूसरे धर्म के लोगों की जान बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन घृणा और नफ़रत के भी ऐसे दृश्य हैं जिसे देखकर मानवता शर्मसार हो जाती है। इतनी नफ़रत, विध्वंसात्मक ऊर्जा सामान्य अपेक्षाओं को मिथ्या साबित कर देती है। यह मानवीय शिष्टाचार के विरुद्ध नज़र आता है। सामान्य दिखने वाले, एक दूसरे की फ़िक्र करने वाले कैसे अचानक पिशाच बन जाते हैं? धारावाहिक ऐसे सवाल उठाकर हमें जनता के बारे में यह समझ देता है कि लोग अनिवार्यतः समझदार और शांतिप्रिय होते हैं। वे सहअस्तित्व और साझेपन की लंबी परंपरा के द्वारा एक राष्ट्रीय समुदाय की पहचान देते हैं। इस दृष्टि से राष्ट्रीयता पहले से हमें बाँधे हुए है, एक पूर्वनियत सत्ता है, पहले से विद्यमान गर्भस्थ शिशु है जो अंग्रेजों के जाने के साथ ही पैदा होने का इंतज़ार कर रहा है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि धारावाहिक अपनी नाटकीय ऊर्जा नत्थू के अजन्मे बच्चे के आसन्न भाग्य से जोड़ता है और इस बच्चे का शरणार्थी शिविर में पैदा होना एक संप्रभु राज्य का जन्म लेना है।</p>
<p>हरनाम सिंह और बंतो नत्थू और कर्मो को सैयदपुर गाँव ले जाते हैं जहाँ उनकी बेटी जसबीर रहती है। वहाँ वे एक गुरुद्वारे में शरण लेते हैं। वहाँ वे भजन-कीर्तन सुनते हुए अपनी रात गुज़ारते हैं। जिस समय गुरुद्वारे से जसबीर कौर दूसरी औरतों का नेतृत्व करते हुए कुएँ में ख़ुदकुशी करने के लिए ले जाती है, वह उसके साहस और दृढ़निश्चय को उद्घाटित करता है। दोनों समुदायों के बीच समझौते की बातचीत नाकामयाब हो जाती है। छोटे ग्रंथी को बलवाइयों से बातचीत के लिए भेजा जाता है, लेकिन ग्रंथी और उसके साथ गया नत्थू मारे जाते हैं। सिखों और मुसलमानों के बीच का यह पूरा प्रसंग मध्ययुगीन युद्ध की याद दिलाता है। ख़ुद भीष्म साहनी ने गुरुद्वारे में मौजूद सिखों की मनःस्थिति को मध्ययुग की ही पुनरावृत्ति कहा है। गुरुद्वारे पर हमला करने के लिए आने वाले मुस्लिम दंगाइयों को ‘तुर्क’ आ गये हैं’ के रूप में संबोधित किया जाता है। जिस तरह मुग़लों के समय कुछ सिख गुरुओं को युद्ध करना पड़ा था, ठीक वही मानसिकता सिखों की भी बन जाती है और वे मुसलमान को मुसलमान के रूप में नहीं बल्कि तुर्क के रूप में देखने लगते हैं और ख़ुद को उन सैनिकों की तरह जिन्होंने सिख गुरुओं की तरफ से युद्ध में भाग लिया था। जसबीर कौर भी उसी मानसिकता से प्रेरित होकर सामूहिक आत्महत्या की ओर बढ़ती है। मुसलमान भी कुछ अलग ढंग से नहीं सोचते। तमस के स्त्री चरित्रों में दो अंतर्विरोधी विशिष्टताओं को चित्रित किया गया है।</p>
<p>एक ओर अपनी जान की बाजी लगाने के साहस के कारण उन्हें वीर नायिका की तरह पेश किया गया है, तो दूसरी ओर वे ‘अविवेकपूर्ण धार्मिक उन्माद’ द्वारा संचालित होती हैं। क्या कोई औरत वास्तव में अंतिम उपाय के तौर पर ज़िंदगी की बजाय मृत्यु को गले लगा लेगी, भले ही ज़िंदगी उतनी सम्मानजनक न हो। हरनाम सिंह भी बार-बार अपनी पत्नी को कहता है कि अगर दंगाई आएँगे तो वह पहले उसे मार देगा और फिर वह स्वयं मर जाएगा। इस पूरे मामले में स्त्री या तो उत्पीड़िता के रूप में सामने आती है या अपनी इज़्ज़त की रक्षा करने वाली शहीद की तरह। (क्रमशः)</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>जवरीमल्ल पारख </strong></p><p>सिनेमा पर नियमित लिखने वाले जाने-माने लेखक</p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में शंघाई सहयोग संगठन की भूमिका</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/sco-ki-bhumika/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[स्वदेश कुमार सिन्हा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Sep 2026 09:36:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इस सम्मेलन के सभी सदस्य देशों ने एक स्वर से ईरान पर हमले की निंदा की, उन मुल्कों ने भी जिनके अमेरिका से बेहतर रिश्ते रहे हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शंघाई सहयोग सगंठन (एससीओ) का 26‌वाँ शिखर सम्मेलन 31 अगस्त से 1 सितंबर 2026 तक बिश्केक, किर्गिस्तान में आयोजित किया गया।‌ इस वर्ष इसकी थीम थी- ‘एससीओ के 25‌ वर्ष सतत शांति, विकास और समृद्धि की ओर साथ-साथ।’ इस संगठन के सदस्य देश हैं- भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ईरान, बेलारूस (2024 में नवीनतम शामिल हुआ देश)। इस संगठन की स्थापना 2001 में मूल रूप से 6 देशों रूस, चीन, कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान द्वारा की गई थी, बाद में अन्य देश इसमें शामिल हुए। वास्तव में इस संगठन की स्थापना में चीन की अहम भूमिका रही है। इस संगठन का निर्माण मूलतः रूस के उन स्वतंत्र गणराज्यों को लेकर बनाया गया था, जो कभी भूतपूर्व सोवियत संघ के भी हिस्से रहे हैं। आज यह अन्य देशों को मिलाकर एक बड़ा और प्रभावशाली मंच बन गया। किर्गिस्तान में हाल में हुए इस एससीओ समिट ने पहली बार सारी दुनिया का ध्यान खींचा,क्योंकि दुनिया का वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहा है, विशेष रूप से दक्षिण पूर्व एशिया में यह बदलाव बहुत तेज़‍ है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला तथा वहाँ मिली अमेरिका की असफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि खाड़ी के अरब देशों-विशेष रूप से सऊदी अरब, क़तर, यूएई‌ को अब केवल अमेरिकी संरक्षण में सुरक्षा नहीं मिल सकती। इसका कारण यह है कि ईरान ने इन देशों में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों पर‌ बड़े हमले किए, इस कारण इन‌ देशों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा‌ तथा इन‌ देशों का यह भ्रम टूटा कि अमेरिका उन्हें सैनिक सुरक्षा दे सकता है, इसलिए इस क्षेत्र में नए-नए सैनिक गठबंधन बन रहे हैं।‌‌ अभी हाल में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच सऊदी अरब के मक्का में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें कहा गया कि इनमें से किसी एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा।</p>
<p>भविष्य में इसमें अन्य देशों के शामिल होने की भी संभावना है। बांग्लादेश और ईरान तक के शामिल होने की उम्मीद है। वास्तव में इस सम्मेलन को इस बार इसी परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जा रहा है। यूरेशियन टाइम्स ने अपने विश्लेषण में कहा है कि यह महत्त्वपूर्ण शिखर सम्मेलन था, क्योंकि इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और‌ भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे वैश्विक नेताओं ने भाग लिया, हालाँकि चीन और पाकिस्तान की वज़ह से भारत की असली परीक्षा शुरू हो सकती है, क्योंकि अगले साल यह समिट पाकिस्तान में होगा।</p>
<p>वास्तव में दुनिया भर में चीन एक बड़ी राजनैतिक,आर्थिक और सैनिक ताक़त के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है, कि चीन कुछ ही वर्षों में अमेरिका को पीछे छोड़कर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा तथा सैन्य दृष्टि से भी चीन अमेरिका को बड़ी चुनौती देने की स्थिति में आ जाएगा। यही कारण है कि एससीओ में चीन का काफ़ी दबदबा है, जो संगठन के नाम से ही पता चल जाता है, इसका मुख्यालय चीन के शहर शंघाई में है। इस संगठन में चीन की भूमिका बहुत अहम है, जिससे वह संगठन के एजेंडे और दूसरे ज़रूरी पहलुओं पर असर डाल सकता है। चीन अब मध्य एशियाई देशों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। ये देश सोवियत संघ का हिस्सा थे और दशकों तक मास्को के प्रभाव में रहे।</p>
<p>इस सम्मेलन में एक ख़ास बात यह देखने को मिली कि भारत सहित सभी सदस्य देशों ने ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों की निंदा की, हालाँकि इसमें सीधे-सीधे अमेरिका का नाम नहीं लिया गया, लेकिन इसमें ईरान की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही गई। यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें शामिल अधिकतर देशों के अमेरिका से गहरे आर्थिक और रणनैतिक संबंध हैं।‌ इससे यह भी सिद्ध होता है कि समूचे मध्य एशिया में अमेरिका का दबदबा घट रहा है और चीन का वर्चस्व बढ़ रहा है।‌</p>
<p>एससीओ समिट कई वजहों से भारत के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। भारत ने आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाया और आतंकवाद के पूरे इको सिस्टम को ख़त्म करने पर ज़ोर दिया। इन जैसे हर सम्मेलनों में, जिसमें पाकिस्तान की भी भागीदारी रहती है, पाकिस्तान एक ओर तो भारत में अल्पसंख्यकों के दमन की बात उठाता है, दूसरी ओर भारत पर भी आरोप लगाता है कि वह उसके देश में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। निश्चित रूप से भारत दुनिया भर के लिए एक बड़ा बाज़ार है। यही बड़ा बाज़ार दुनिया भर के आकर्षण का केंद्र है, सभी इसमें निवेश करके मुनाफ़ा कमाना चाहते हैं। भारत रणनीतिक रूप से अभी भी इसका पूरी तरह फ़ायदा नहीं उठा पा रहा है। इसका ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाने की नीति पर विचार करना चाहिए।</p>
<p>ब्रिक्स-क्वार्ड जैसे संगठनों में भी भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। क्वार्ड देशों में भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह संगठन भी अमेरिका द्वारा चीन की बढ़ती ताकत को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका द्वारा बनाया गया था, परन्तु अब इन जैसे संगठनों की प्रासंगिकता तेज़ी से घट रही है। अमेरिका ने ख़ुद ही चीन को दुनिया में दूसरे नंबर की आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया है। भारत की चुनौती है कि वह अमेरिकापरस्त की छवि से बाहर निकले। उसकी मुस्लिमविरोधी छवि भी बनाने की कोशिशें चल रही है, जिसकी काट ढूँढनी होगी तभी एससीओ जैसे संगठनों में हम और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p>भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संगठन अपनी मुख्य प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहे। मध्य एशिया के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव रूस के साथ गहरे होते रिश्ते‌, ईरान के साथ संबंध और चीन के साथ बेहतर होते संबंध उसके लिए अवसर की तरह हैं।</p>
<p>बिश्केक समिट ने दिखाया कि एससीओ एक अहम मंच बना हुआ है, ख़ासकर ऐसे समय में,जब दुनिया का भू-राजनीतिक माहौल तेजी से अनिश्चित होता जा रहा है। भारत के लिए यह बात अहम होगी कि वह इस मंच का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों को मज़बूत करने के लिए करे और साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सुरक्षा और मज़बूती के मुद्दे एजेंडे के केंद्र में रहें।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>स्वदेश कुमार सिन्हा</strong></p><p>स्वतंत्र पत्रकार</p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>घेरेबंदी के बीच भी अलग-थलग और अकेला नहीं है क्यूबा</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/gherebandi-ke-beech-bhi-alag-thalag-nahi-cuba/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Aug 2026 11:18:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[क्यूबा के लोगों ने धैर्य व इच्छाशक्ति बनाए रखी है और वे यूएस प्रतिबंधों का दृढ़ता के साथ सामना कर रहे हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><a href="https://thetricontinental.org/hi/asia/asia-se-door-raho-colombo-ghoshnapatra/">Hands Off Asia सम्मेलन</a> में ‘क्यूबा के मौजूदा हालात’ पर श्रीलंका में क्यूबा की राजदूत, पैट्रिशिया पेगो ग्वेरा, द्वारा दिए गए वक्तव्य का हिंदी रूपांतरण।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-large wp-image-152779" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05235-1.JPG-1024x683.jpeg" alt="" width="1024" height="683" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05235-1.JPG-1024x683.jpeg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05235-1.JPG-300x200.jpeg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05235-1.JPG-768x512.jpeg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05235-1.JPG-1536x1024.jpeg 1536w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05235-1.JPG-2048x1365.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"></p>
<p> </p>
<p>मैं इस मुद्दे पर अपनी बात क्यूबा से हर दिन मिलने वाली जानकारी के आधार पर रखूँगी। मैं इस समय श्रीलंका में हूँ, लेकिन मेरा परिवार क्यूबा में है, इसलिए आपको बता सकती हूँ कि अभी वहाँ क्या चल रहा है। इस समय हालात बेहद कठिन हैं, शायद क्यूबाई क्रांति के बाद से और 60 से ज़्यादा सालों से जारी यूएस नाकेबंदी में सबसे कठिन स्थितियों का सामना कर रहे हैं क्यूबा के लोग।</p>
<p>क्यूबा का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) दस साल पहले की तुलना में तेज़ी से नीचे जा रहा है। महँगाई बहुत पहले ही दो अंकों में पहुँच चुकी थी। अर्थशास्त्र के लिहाज से आप जानते हैं कि महँगाई की एक सीमा होती है। अगर यह एक अंक में है तो आप इसे प्रबंधित या नियंत्रित करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन जब यह दो अंकों में चली जाती है, तो अनियंत्रित हो जाती है। और क्यूबा में तो दिसंबर [2025] में ही महँगाई 15% छू चुकी थी। अब पहले से भी अधिक कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के लागू होने के साथ महंगाई और बढ़ी ही होगी। आवश्यक वस्तुओं के दाम —यानी भोजन और लोगों की अन्य दैनिक जरूरतों के दाम— इस महँगाई के कारण लगातार ऊँचे होते जा रहे हैं। यह एक डोमिनो प्रभाव की तरह है जहाँ एक समस्या दूसरी को जन्म देती है।</p>
<p>उदाहरण के लिए, इस समय क्यूबा में लोगों के बीच विनिमय दर (exchange rate) एक डॉलर या एक यूरो की विनिमय दर लगभग 500 [क्यूबन पेसो] हो सकती है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र का वेतन लगभग 3000 से 4000 [क्यूबन पेसो] के आसपास है, जिसे सरकार द्वारा कुछ हफ़्ते पहले ही बढ़ाया गया था। तो आप खुद हिसाब लगा सकते हैं कि मुद्रा के इस भारी अवमूल्यन में 4000-5000 के वेतन से क्या किया जा सकता है। आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी के कारण मुद्रा गिरती जा रही है। सड़कों पर भोजन मिलना/खरीदना मुश्किल हो गया है।</p>
<p>हम बहुत आभारी हैं क्योंकि हमें कई देशों, विशेष रूप से कई एशियाई देशों से सहायता मिल रही है। क्यूबा के लोग एशियाई देशों से मिले समर्थन को गहराई से महसूस करते हैं और इसकी बहुत सराहना करते हैं—हमारे एशियाई देशों के भाइयों, बहनों और कॉमरेडों के समर्थन की हम सराहना करते हैं। मैं यहाँ कोई ख़ास नाम नहीं लेना चाहती ताकि ग़लती से किसी का नाम छूटने पर कोई कूटनीतिक समस्या न हो, लेकिन हम हर प्रकार के समर्थन के लिए अत्यधिक कृतज्ञ हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-large wp-image-152803" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05625.JPG-1024x683.jpeg" alt="" width="1024" height="683" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05625.JPG-1024x683.jpeg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05625.JPG-300x200.jpeg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05625.JPG-768x512.jpeg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05625.JPG-1536x1024.jpeg 1536w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05625.JPG-2048x1365.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"></p>
<p>तेल नाकेबंदी हमारे दैनिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। सार्वजनिक परिवहन की हालत बहुत ख़राब है क्योंकि हमारे पास पर्याप्त बसें नहीं हैं। जिस किसी के पास निजी कार या टैक्सी है, उसे बहुत ऊँची कीमत पर ईंधन ख़रीदना पड़ता है। परिणामस्वरूप, लोगों को टैक्सी का किराया पिछले साल की तुलना में तीन, चार, या पाँच गुना अधिक चुकाना पड़ रहा है। इसके अलावा, दवाओं और चिकित्सा आपूर्ति की भी भारी कमी है।</p>
<p>जो लोग पहले कभी क्यूबा आ चुके हैं, वे आज वहाँ की फार्मेसियों को दवाओं से भरा हुआ नहीं पाएँगे। यूएस के प्रतिबंधों के कारण न केवल वे दवाएँ प्रभावित हैं जिन्हें हम विदेशों से ख़रीद सकते हैं, बल्कि वे दवाएँ भी प्रभावित हैं जिन्हें हम अपने मज़बूत फार्मास्यूटिकल और बायो-टेक्नोलॉजी उद्योग के जरिए ख़ुद बनाते हैं।</p>
<p>आपको शायद याद होगा कि जब कोविड आया था, तब विकासशील दुनिया के गिने-चुने देशों में क्यूबा एक ऐसा देश था, जो अपनी ख़ुद की वैक्सीन बनाने में सक्षम रहा। दुनिया के कई अन्य विकासशील देशों के विपरीत, क्यूबा ने अपनी आबादी को अपनी वैक्सीनों से बचाया और फिर कम विकसित देशों को सहायता के रूप में भी वैक्सीनें भेजी गईं। यह इस बात का उदाहरण है कि हमारा [फार्मास्यूटिकल] सेक्टर कितना मज़बूत है, लेकिन इसे बनाए रखने के लिए हमें बाहर से सामग्री की आवश्यकता है। यूएस वित्त मंत्रालय द्वारा दुनिया भर के बैंकों पर दबाव डाले जाने के कारण यह एक बहुपक्षीय प्रतिबंध बन चुका है।</p>
<p>इससे पहले यूरोपीय बैंक क्यूबा के साथ लेनदेन करने, पैसे भेजने या लेने, या मध्यस्थ बैंकों (intermediary banks) के रूप में काम करने में सक्षम थे। आज श्रीलंका जैसे मित्र देशों —जिससे क्यूबा के साथ घनिष्ठ और ऐतिहासिक संबंध रहे हैं— में भी यदि कोई [व्यक्ति/संगठन] बैंक में क्यूबा पैसे भेजने जाता है, तो बैंक इसके लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन समस्या यूरोप के मध्यस्थ बैंकों की है जो यूएस दंड के डर से इसे रोक देते हैं। यदि कोई मध्यस्थ बैंक मिल भी जाए, तो अमेरिकी विभाग द्वारा उस पर एक-दो मिलियन यूरो का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। यही कारण है कि व्यापारिक समुदाय और निवेशक क्यूबा के साथ कारोबार करने से कतराते हैं।</p>
<p>कनाडा, यूरोप और लैटिन अमेरिका से आने वाले पर्यटक क्यूबा की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा हैं। यूएस कानून के अनुसार वहाँ से पर्यटन के लिए यात्रा करना अवैध है—यह एक बड़ा विरोधाभास है कि लोकतंत्र का दावा करने वाला देश अपने नागरिकों को क्यूबा जाने से रोकता है और क्यूबा को एक आतंकवादी मुल्क बताता है।</p>
<p>आज कनाडाई पर्यटक पहले जितनी संख्या में नहीं आ रहे हैं, क्योंकि ईंधन की नाकेबंदी के चलते उनकी वापसी के समय विमानों में दोबारा ईंधन भराने की सुविधा क्यूबा में उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा, क्यूबा को लेकर भयानक दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है कि वहाँ होटलों में खाना नहीं है, बिजली नहीं है, और एयर कंडीशनर काम नहीं करते, जिसके कारण पर्यटक डोमिनिकन गणराज्य जैसे अन्य कैरिबियन देशों का रुख कर रहे हैं, जो कि बिल्कुल अनुचित है।</p>
<p>मेरे परिवार के अनुसार (मेरी बेटी हर दिन मुझसे बात करती है) शायद यह हमारे इतिहास का सबसे ख़राब दौर है। कल, जिस जगह हम रहते हैं, वहाँ 24 घंटों में से केवल कुछ ही घंटे बिजली थी। लोग बिना बिजली के सोते हैं, बिना बिजली के उठकर काम पर जाते हैं। परिवहन के साधन न होने पर लोग पैदल आना-जाना कर रहे हैं या साइकिल का उपयोग कर रहे हैं। जिन घरों में बिजली नहीं है, वहाँ रेफ्रिजरेटर न चलने के कारण फ्रोज़न फूड और अन्य खाद्य पदार्थों का टिकना असंभव हो रहा है।</p>
<p>जब मैं श्रीलंका में राजनीतिक समूहों से बात करती हूँ, तो हमेशा कहती हूँ कि क्यूबा के लोग जुझारू हैं। हम बहुत भाग्यशाली थे कि हमारे पास फिदेल कास्त्रो जैसे ऐतिहासिक नेता थे जो हमारी प्रेरणा बने। लेकिन अब राष्ट्रपति ट्रम्प के दूसरे शासन काल के साथ स्थिति और बदतर हो गई है—क्यूबा और वेनेजुएला पर हर दिन नए कार्यकारी आदेश और आर्थिक प्रतिबंध थोपे जा रहे हैं।</p>
<p>आज ही मैंने क्यूबा जाने वाले एक व्यक्ति को सलाह दी कि वह अपने साथ पर्याप्त नक़द ज़रूर रखे, क्योंकि वीजा/मास्टरकार्ड जैसे क्रेडिट या डेबिट कार्ड प्रतिबंधों के कारण वहाँ काम नहीं कर रहे हैं।</p>
<p>1959 से लेकर अब तक—चाहे वह कैनेडी के समय चीनी के कोटे को रद्द करना हो, पिग्स खाड़ी का आक्रमण हो, रोनाल्ड रीगन का कार्यकाल हो, बुश की नीतियाँ हों, या क्लिंटन के समय का हेल्म्स-बार्टन अधिनियम हो—हमने हर कठिनाई का सामना किया है। फ्लोरिडा की चुनावी राजनीति के कारण अमेरिकी कांग्रेस पर बने दबाव और मार्को रुबियो जैसे नेताओं की नीतियों के बावजूद क्यूबा के लोगों में गरिमा का बहुत गहरा भाव है और जीने की दृढ़ इच्छाशक्ति है।</p>
<p>क्यूबा का यह संघर्ष केवल क्यूबा के लिए नहीं, बल्कि श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और पूरे एशिया के लिए महत्त्वपूर्ण है। आज स्पष्ट है कि क्यूबा अकेला नहीं है; क्यूबा अकेला नहीं है, एशिया क्यूबा के साथ खड़ा है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-large wp-image-152795" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05702-1.JPG-1-1024x683.jpeg" alt="" width="1024" height="683" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05702-1.JPG-1-1024x683.jpeg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05702-1.JPG-1-300x200.jpeg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05702-1.JPG-1-768x512.jpeg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05702-1.JPG-1-1536x1024.jpeg 1536w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Copy-of-DSC05702-1.JPG-1-2048x1365.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"></p>
<p>&lt;फिदेल के 100वें जन्मदिवस पर आयोजित एक ऑनलाइन कला प्रदर्शनी Fidel 100 <a href="https://utopix.cc/pix/expo-fidel-x-100/">यहाँ</a> देखें&gt;</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>बुनियादी मुद्दों की अनदेखी का नतीजा है जेन-ज़ी आंदोलन</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/buniyadi-muddon-ki-andekhi-genz-aandolan/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[उमेश यादव]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Aug 2026 05:20:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जागरूक युवाओं ने सड़क पर उतरकर ज़ाहिर कर दिया कि संचार के साधन भले ही बदल जाएँ, किंतु जनता के बुनियादी मुद्दे हमेशा प्रासंगिक बने रहते हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">25 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">जुलाई को शिक्षा मंत्री को आख़िरकार इस्तीफ़ा देना ही पड़ा। हफ़्तों तक चले जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी के प्रदर्शन और उसके बढ़ते प्रभाव के दबाव में आकर सरकार ने ऐसा फ़ैसला लिया जिसे अभी तक असंभव माना जाता था। इस सरकार की छवि बातचीत को कमज़ोरी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">जवाबदेही को राजनीतिक कायरता</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">तथा सवालों को बग़ावत मानने वाली सरकार की बन चुकी है। विरोध</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">प्रदर्शन तो दूर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">राजनीतिक असहमति तथा आलोचना के दमन के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के लिए यह जानी जाती है। विरोधियों को बदनाम करने और उनके सवालों से ध्यान भटकाने के लिए मुख्यधारा के मीडिया को अनैतिक औज़ार की तरह उपयोग में लाया जाता है। इससे भी काम न बने तो उनका उत्पीड़न करने के लिए सरकार समर्थक दक्षिणपंथी तबक़े को बरगलाकर वो काम कराए जाते हैं जो सरकारी मशीनरी और मीडिया से भी न हो पाए। इस रवैये ने जनता के एक बड़े हिस्से का अदालतों तक में भरोसा हिलाकर रख दिया है। सरकार के निशाने पर आने के बाद शायद अदालत भी संवैधानिक अधिकारों की रखवाली नहीं कर सकती है—ऐसी आशंका बहुत सारे लोगों के मन में घर कर गई है। सर्वोच्च न्यायालय से निकले एक व्यक्तव्य का ही इस आंदोलन की चिंगारी बन जाना विधि</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष का एक सूचक है। चिंगारी एक वक्तव्य से फूटी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लेकिन आंदोलन को पैदा करने वाला आक्रोश बेहद पुराना था। सड़कों पर व्यक्त इस आक्रोश ने डर और निराशा के वातावरण को</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">कुछ समय के लिए ही सही</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लेकिन दूर तो किया है। और इसमें अहम है जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी की भूमिका। </span></span></span></span></p>
<div id="attachment_151801" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151801" class="size-large wp-image-151801" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/vikrant-bhise-are-we-the-people-865x1024.jpg" alt="" width="865" height="1024" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/vikrant-bhise-are-we-the-people-865x1024.jpg 865w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/vikrant-bhise-are-we-the-people-253x300.jpg 253w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/vikrant-bhise-are-we-the-people-768x909.jpg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/vikrant-bhise-are-we-the-people.jpg 1115w" sizes="auto, (max-width: 865px) 100vw, 865px"><p id="caption-attachment-151801" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>विक्रांत भिसे, <em>आर ‘वी’ द पीपुल 4</em>, 2025</small></p></div>
<p> </p>
<h2 style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>एक दिन का नहीं है आक्रोश </b></span></span></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">हालाँकि इनकी माँगों को विभिन्न तबक़ो से समर्थन मिला</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लेकिन जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी ही इस आंदोलन की धुरी रहा। जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी आखिरकार कौन हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">इसे लेकर एकमत राय नहीं है। ऐसा माना जाता है कि ये </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">1996 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">से </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">2012-2013 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">के मध्य पैदा हुए युवा हैं और संचार और सूचना क्रांति के दौरान बड़े हुए हैं। अपने से पहले की पीढ़ी से एक अलग माहौल में पले हैं। ये उस दौर में पैदा हुए जब भूमंडलीकरण अपने शीर्ष पर था। सिर्फ़ आर्थिक रूप से नहीं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">बल्कि सूचना और मोबाइल तकनीक में आए क्रांतिकारी बदलावों ने दुनिया को वास्तव में एक सूत्र में पिरो दिया। ये दुनियाभर में चल रहे घटनाक्रम से परिचित रहते हैं। यह वही दौर था जब भारत नवउदारवादी नीतियों की एक प्रयोगशाला बना। भारतीय राज्य एक स्वघोषित नवउदारवादी राज्य बन चुका था। आर्थिक विकास की परिकल्पना जन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">सरोकार अथवा जनता की माँग नहीं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">अपितु स्वतंत्र बाज़ारवाद की कट्टरता निर्धारित करने लगी। नवउदारवाद उम्मीदों का एक पिटारा लेकर आया—तीव्र आर्थिक संवृद्धि</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">रोज़गार सृजन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लोगों की आय में बढ़ोत्तरी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">निर्यात में बढ़ोत्तरी इत्यादि। यह पीढ़ी इन सुनहरे वायदों की लोरी सुनते हुए बड़ी हुई है। जब यह पीढ़ी स्कूल में थी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">तब </span></span><a href="https://presidentofindia.nic.in/dr-apj-abdul-kalam/book/2020-vision-new-millennium"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">विजन </span></span></u></span></a></span></span><a href="https://presidentofindia.nic.in/dr-apj-abdul-kalam/book/2020-vision-new-millennium"><span style="color: #000080;"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;"><u>2020</u></span></span></span></a> <span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">के बुख़ार की गिरफ़्त में पूरा देश था</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">जिसके तहत भारत को </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">2020 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">तक एक विकसित देश बन जाना था। भारत की सच्चाई को गुलाबी रंग में रंगने के लिए इंडिया शाइनिंग जैसे अभियान चलाए गए। लगभग हर चुनाव भारत की नियति बदलने वाला निर्णायक मोड़ लगता था। ख़ासकर </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">2014 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा और उसके समर्थकों ने इस तरह प्रचार किया मानो वे सत्ता में आते ही भ्रष्टाचार और कुशासन की सारी समस्याओं को चुटकी बजाते ही ख़त्म कर देंगे। भाजपा और मोदी के इंतज़ार में ही भारत अब तक विश्वगुरू और सुपरपावर देश नहीं बन पाया था। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">पिछले दशक में एक</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">एक वादे ने इनके सामने दम तोड़ा है। सबसे क्रूर विडंबना है उन लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों का अवसान जिनकी दुहाई देकर वर्तमान पार्टी सत्ता में आई। इन्होंने कोरोना काल में उच्च आर्थिक संवृद्धि दर के भीतर छुपी आर्थिक बदहाली को उजागर करते शहरों से पलायन करते मज़दूरों</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">इलाज के अभाव में दम तोड़ते लोगों को देखा है। इनमें से एक बड़ा वर्ग सरकार की प्रजा बनकर जी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">हुज़ूरी करने में विश्वास नहीं करता। इन्होंने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करके किसानों को सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर करते देखा है। इनके भीतर लोकतांत्रिक नागरिक की मज़बूत इछाशक्ति है। यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ व्याप्त असंतोष को आंदोलन तथा चुनावी हार में बदलने का भी यह साक्षी रहा है। </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">2014 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">के बाद किए तमाम वादे इसे याद हैं। इसे यह भी एहसास है कि झूठे वादे करना भारत की राजनीति का पुराना शगल है। इनका आक्रोश एक कथन मात्र का नतीजा नहीं है। इनका आंदोलन सालों की निराशा और ठोस बदलाव की तीव्र आकांक्षा से उपजा है। </span></span></span></span></p>
<h2 style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>डेमोग्राफ़िक डिविडेंड से डेमोग्राफ़िक लायबिलिटी तक </b></span></span></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">भारत के पास करीब दो दशक पहले एक अद्वितीय मौक़ा आया। इसने जनसंख्या की संरचना के ऐसे दौर में प्रवेश किया जो देशों को सिर्फ़ एक बार मिलता है। इस परिघटना को डेमोग्राफ़िक डिविडेंड के नाम से जानते हैं। इस दौरान कामकाज़ी उम्र के लोगों की संख्या निर्भर लोगों </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">(</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">बच्चों और बुज़ुर्गों</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">) </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">की तुलना में तीव्र गति से बढ़ती है। सही नीतियों और पर्याप्त अवसरों की बदौलत इस मौक़े का लाभ उठाकर तीव्र आर्थिक संवृद्धि हासिल की जा सकती है। लेकिन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">स्वास्थ्य और शिक्षा की जर्जर अवस्था</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">समुचित रोज़गार के अभाव और लचर प्रशासनिक ढाँचे ने इस अवसर को समस्या में तब्दील कर दिया है। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">भारत की कुल जनसंख्या में </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">65 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">प्रतिशत </span></span><a href="https://www.pib.gov.in/FactsheetDetails.aspx?Id=149107&amp;reg=48&amp;lang=2"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">हिस्सा</span></span></u></span></a> </span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">35 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">वर्ष से कम उम्र के लोगों का है। ये वो तबक़ा है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">जो या तो अपनी पढ़ाई</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लिखाई पूरी करके रोज़गार में संलग्न है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">रोज़गार के लिए प्रयासरत है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">अथवा शिक्षण संस्थानों </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">(</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">स्कूलों</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">कॉलेजों तथा कोचिंग संस्थानों</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">) </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">से बाहर निकलकर गरिमापूर्ण रोज़गार पाने की आशा रखता है। लेकिन हाल यह है कि युवाओं को रोज़गार नहीं मिल रहा है। स्थिति इतनी ख़राब है कि जबसे इम्प्लॉयमेंट</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">अनइम्प्लॉयमेंट सर्वे शुरू किए गए हैं—यानी </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">80 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">के दशक से—तब से युवाओं में वर्तमान स्तर की बेरोज़गारी कभी नहीं देखी गई है। यहाँ बेरोज़गारी स्तर का तात्पर्य लेबर फ़ोर्स के उस हिस्से से है जो काम खोज रहा है लेकिन उसे काम नहीं मिल पा रहा है। </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">15 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">से </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">35 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">वर्ष के बीच के युवाओं में </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">36 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">से </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">60 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">वर्ष के लोगों की तुलना में बेरोज़गारी कई गुना ज़्यादा है। </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">2023-24 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">में युवा बेरोज़गारी का स्तर </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">8 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">प्रतिशत जबकि ग़ैर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">युवा वर्ग के लिए यह मात्र </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">0.5 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">प्रतिशत था। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">युवा बेरोज़गारी को वर्तमान सरकार युवाओं के ही मत्थे मढ़ देती है। उसका </span></span><a href="https://www.ndtv.com/business-news/nirmala-sitharaman-says-biggest-challenge-before-indian-economy-is-employability-6844219"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">मानना</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;"> है कि बेरोज़गारी की वजह युवाओं में कौशल का अभाव है। रोगज़ार </span></span><a href="https://www.thehindu.com/news/national/karnataka/karnataka-minister-says-skill-gap-not-shortage-of-jobs-is-the-biggest-challenge-urges-youth-to-acquire-industry-skills/article71281908.ece"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">मौजूद</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;"> हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लेकिन उन्हें करने के लिए काबिल लोग नहीं मिल रहे हैं। हालाँकि किस सेक्टर में कुशल लोगों की कमी है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">किस तरह के कौशल के लोगों की कमी है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ये किसी को नहीं पता। ऐसे देश में जहाँ एक पद के लिए हज़ारों लोग प्रतिस्पर्धा करते हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">नौकरी की एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने के लिए लोग सालों तैयारी करते हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">; </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">वहाँ इस तरह का बयान यह दर्शाता है कि सरकारी नीति</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">निर्माता ज़मीनी हकीकत से कितनी दूर रहते हैं। </span></span></span></span></p>
<div id="attachment_151666" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151666" class="size-large wp-image-151666" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/youth_unempl_age_edu-1024x640.png" alt="" width="1024" height="640" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/youth_unempl_age_edu-1024x640.png 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/youth_unempl_age_edu-300x188.png 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/youth_unempl_age_edu-768x480.png 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/youth_unempl_age_edu-1536x960.png 1536w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/youth_unempl_age_edu-2048x1280.png 2048w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-151666" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>आँकड़ों का स्त्रोत: 2005-06 एवं 2011-12 के इंप्लॉयमेंट-अनइंप्लॉयमेंट सर्वे और 2017-18 एवं 2023-24 के पीएलएफ़एस सर्वे से लेखक की गणना</small></p></div>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">उपरोक्त ग्राफ़ पिछले दो दशकों के दौरान युवाओं में शैक्षिक अवस्था के अनुसार व्याप्त बेरोज़गारी की दर को दिखा रहा है। यह साफ़ है कि युवाओं में बेरोज़गारी की दर शैक्षिक अवस्था बढ़ने के साथ लगातार बढ़ रही है। यह ग्राफ़ सरकरी आँकड़ों पर आधारित है। यह ऐसे दावों के बिल्कुल उलट हैं जो कहते हैं कि बेरोज़गारी का कारण योग्यता का अभाव है। जबकि यह साफ़ है कि उच्च योग्यता वाले रोज़गार के सृजन का भारी अभाव है। बेरोज़गारी की ऊँची दर यह बता रही है कि उच्च कौशल होने के बावजूद समुचित स्तर का रोज़गार न होने की वजह से युवा रोज़गार की तलाश में अपना समय व्यतीत कर रहे हैं। निम्न कौशल के रोज़गार तो हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लेकिन उच्च कौशल वाली नौकरियाँ नहीं हैं। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक समस्याओं का हल निकालने की कोशिश करने के बजाए इसके लिए जनता को ही ज़िम्मेदार ठहराने की यह फ़ितरत नवउदारवाद के कट्टर बाज़ारवाद की ट्रेनिंग का नतीजा है। स्वतंत्र बाज़ार के नवउदारवादी पैरोकार यह मानते हैं कि सरकार को आर्थिक क्रियाकलापों में कोई दखल नहीं देनी चाहिए। व्यक्ति अपनी परिस्थिति और काबिलियत के अनुसार जो फ़ैसला लेता है वही सर्वश्रेष्ठ सामाजिक परिणाम में परिणत होता है। इस तरह का नज़रिया पहले तो संरचनात्मक और सामाजिक समस्याओं के लिए लोगों के व्यक्तिगत फ़ैसलों को ज़िम्मेदार ठहराता है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">और समाधान के लिए आवश्यक सामाजिक</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">/</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">राजनीतिक कदम भी उठाने नहीं देता। यही कारण है कि नवउदारवादी विचारधारा के कट्टर पैरोकारों की वर्तमान सरकार न तो युवा बेरोज़गारी जैसी संरचनात्मक समस्या को स्वीकार करने और न ही इसके समाधान के लिए कोई क़दम उठाने हेतु तैयार है। सरकारी अकर्मण्यता ने डेमोग्राफ़िक डिविडेंड के नायाब अवसर को एक ऐसे संकट में तब्दील कर दिया है जिसकी कीमत युवाओं की एक पूरी पीढ़ी चुका रही है। </span></span></span></span></p>
<h2 style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था से अधर में भविष्य </b></span></span></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">सीमित नवसृजित रोज़गार के अवसर प्रधानत</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">: </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">निम्न वेतन वाले हैं। ख़ासकर निजी क्षेत्र अति निम्न वेतन देता है और सामाजिक सुरक्षा से मज़दूरों को वंचित रखता है। सरकारी नौकरियों के इर्द</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">गिर्द पनपी अरबों रुपये की कोचिंग इंडस्ट्री रोज़गार और शिक्षा के संकट के लक्षण मात्र हैं। समस्या की जड़ बदहाल शिक्षा व्यवस्था और रोज़गार का संकट है। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">निजी क्षेत्र के अति शोषणकारी रोज़गार से बचने के लिए युवा सरकारी नौकरियों को तरजीह देते हैं क्योंकि वहाँ निजी क्षेत्र की तुलना में भरण</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">पोषण लायक वेतन भी मिलता है तथा सामाजिक सुरक्षा भी। निजीकरण की वजह से सरकारी नौकरियों की संख्या भी उत्तरोत्तर कम होती जा रही है। यही कारण है कि शिक्षा हासिल करने मुख्य मकसद चुनिंदा सरकारी नौकरियों के लिए चुना जाना रह गया है। नौकरी की चाहत रखने वाले सैलाब की वजह से प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर और स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों की प्रदान की जाने वाली शिक्षा के बीच एक बड़ा फ़ासला पैदा हो गया है। इसी फ़ासले के बीच पनप रही और विशाल हो रही है कोचिंग इंडस्ट्री। कोचिंग इंडस्टी का मुख्य काम है परीक्षा पास करवाना। अगर वो परीक्षाएँ पास नहीं कराएँगे</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">अधिकाधिक लोगों का चयन नहीं कराएँगे</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">तो उनके ख़ुद के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। अत</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">: </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">चयनित लोगों की संख्या बढ़ाने के लिए वो कई बार अवैध रास्ते पर भी चलते हैं। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">पेपर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लीक ऐसा ही एक रास्ता है। इसकी पटकथा लीक होने की घटना के बहुत पहले ही लिखी जानी शुरू हो जाती है—जब शिक्षा स्कूलों और विश्वविद्यालयों से हटकर कोचिंग संस्थानों का व्यवसाय बन जाती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">; </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">उसका मक़सद लाखों लोगों से मुक़ाबला करके सिर्फ़ एक सीट हासिल करना मात्र रह जाता है। ऊपर से जब सरकार छात्रों की माँगों को नज़रअंदाज़ करके परीक्षा कराने से लेकर सवाल सेट करने तक के सारे काम का केंद्रीकरण करके उसे ठेका प्रथा के भरोसे छोड़े देती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">तब जाकर पेपर लीक होने की परिस्थितियाँ तैयार होती हैं। पेपर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">लीक रोज़गार और शिक्षा की खस्ताहाली</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">और सरकारी जवाबदेही के अभाव का ही एक लक्षण है। </span></span></span></span></p>
<h2 style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>सत्ता से खुलकर सवाल पूछने वाली पीढ़ी </b></span></span></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी एक चैतन्य पीढ़ी है। यह तकनीकी रूप से दक्ष है। डिजिटल माध्यमों से यह अपने लिए सामाजिक जगहें बनाती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">अपनी पीढ़ी के लोगों के संपर्क में रहती है। इनकी दुनिया इनके पास के भौतिक समाज तक सीमित नहीं है। यह पूरी दुनिया में चल रहे घटनाक्रम से वाकिफ़ रहती है। सोशल मीडिया के इस्तेमाल के मामले में यह अपने से पहली की उस पीढ़ी से भिन्न है जिसने सोशल मीडिया पर परोसी गई ग़लत जानकारियों और नफ़रत</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">भरे नैरेटिव को नतमस्तक होकर स्वीकार किया। ऐसा माना जाता है कि सोशल मीडिया का मैनेजमेंट करके भाजपा ने पूरे देश में अपने एजेंडे के लिए माहौल तैयार किया था। इसने अपनी आँखों के सामने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को दक्षिणपंथी सूचना सामग्री का उपभोक्ता बनते देखा है। उसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी लोकतांत्रिक लामबंदी और सरकार से जवाबदेही के लिए कर रहा है। यह अपने लिए एक बेहतर भविष्य चाहता है। उसका आंदोलन भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमज़ोरियों से पनपा है। यह अपने से पहले की पीढ़ी की तरह अपने भविष्य को कोरे वायदों और प्रशासनिक अक्षमता की वजह से जाया नहीं करना चाहता। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">यह भी सच है कि यह शिक्षा और रोज़गार के मूलभुत मुद्दों को अपने आंदोलन के दायरे में लाने से भी हिचक रहा है जो वर्तमान संकट की जड़ हैं। इन पर बात किए तथा इसके आधार पर आंदोलन एवं जनभावना तैयार किए बिना सार्थक बदलाव की उम्मीद करना जल्दबाज़ी होगी। उनके आंदोलन ने लोगों के ठोस मुद्दों की राजनीतिक प्रासंगिकता को फ़िर से रेखांकित किया है। पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा था कि आधारहीन नैरेटिव तथा सोशल मीडिया एवं टीवी मीडिया के मैनेजमेंट से राजनीतिक नैरेटिव सेट किए जा सकते हैं। जेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">ज़ी के आंदोलन ने इस मिथक को तोड़ा है और यह दर्शाया है कि संचार के साधन भले ही बदल जाएँ</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">किंतु जनता के बुनियादी मुद्दे हमेशा प्रासंगिक बने रहते हैं। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">उनका आंदोलन दशकों से विद्यमान रोजी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">रोटी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की अनदेखी का नतीजा है। ख़ासकर शिक्षा और रोज़गार का गहराता संकट</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">जो अब विस्फोटक रुप ले चुका है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">इसके पीछे की प्रमुख वजह है। वे बेहतर अवसर चाहते हैं। वे अपने जन्म से पहले से मौजूद समस्याओं का निराकरण चाहते हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: medium;">सार्थक बदलाव के दौर में जीना चाहते हैं। वे एक बेहतर समाज चाहते हैं। इसके लिए वे अपनी ज़िम्मेदारी सड़कों पर उतरकर निभा रहे हैं। एक लोकतांत्रिक देश के भविष्य के लिए यह अच्छी शुरुआत है। </span></span></span></span></p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>गाली देना बुरी बात है, मगर…</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/gali-dena-buri-baat-magar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Aug 2026 09:09:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[युवाओं की भाषा को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, ताकि व्यवस्था पर उठाए जा रहे जायज़ सवालों को दबाया जा सके।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत की युवा पीढ़ी ने देशभर में अपने भविष्य के लिए जो संघर्ष पिछले महीने किया और जिसके आगे के मंसूबे अभी तैयार हो रहे हैं, उसने कई तरह की बहसें चलाई हैं; कुछ पुरानी हैं जो एक मर्तबा फिर चल पड़ी हैं और कुछ नई। इस पूरे आंदोलन का एक गुणा-भाग यह है कि सत्ता पक्ष के पास से कोई ऐसा तुरुप का इक्का नहीं निकला जिससे छात्रों और युवाओं की गंभीर समस्याओं को भी ‘फ़िक्र’ की तरह ‘धुएँ’ में उड़ा दिया जाता। तो सरकारी घमण्ड कुछ चटखा ज़रूर, पर टूटा नहीं। अजी, वो घमण्ड ही क्या जो टूट जाए! इसलिए कटी हुई नाक पर से ध्यान हटाने के लिए मुँह पर पुती कालिख का ज़िक़्र शुरू कर दिया गया। जेन-ज़ी को धर पाने में जब केंद्र सरकार का कोई और हथकंडा कामयाब नहीं हुआ तो बात उनकी प्रतिरोध की ‘भाषा’ पर लाकर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने हिज्जे लगाना शुरू कर दिया।</p>
<p>पिछले कुछ दिनों में एक बहस खड़ी की गई कि जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री सहित सत्तापक्ष के अन्य नेताओं को गालियाँ दीं। क्या न्यूज़एंकर तो क्या भाजपा के नेता और क्या कुछ अभिनेता, सब ही ‘कल के आए’ इन छात्रों के संस्कारों का पोस्टमार्टम करने लगे। सबसे ज़्यादा छुरी चली लड़कियों के किरदार पर। ‘लड़कियाँ गाली कैसे दे सकती हैं!’ यहाँ बलाघात ‘गाली’ पर नहीं ‘लड़कियों’ पर। गाली से परेशानी नहीं; मतलब है, पर उतनी नहीं, जितनी लड़कियों के गाली देने से है। क्योंकि आरएसएस-भाजपा के ‘सनातन संस्कारों’ की गठरी का बोझ तो आख़िर लड़कियों की नाज़ुक गर्दन पर आना है। अगर ये गर्दन भी अकड़कर सिर उठा ले और अपने शोषक को गाली दे डाले तो बेचारे संस्कार कहाँ जाएँगे! तेल लेने? ख़ैर हम इनकी तरह जेंडर आधारित भेद-भाव नहीं करेंगे। हम अपनी चर्चा को गालियों तक ही रखेंगे, वे जिन होठों से निकली हैं उनकी देह और जीवन में घुसने की चेष्ठा नहीं करेंगे।</p>
<p>अब जिन्होंने मंटो और मासूम को न पढ़ा हो उन्हें गालियों का समाजशास्त्र समझाना टेढ़ी खीर है। उनके लिए शायद इतना ही कह सकते हैं कि जनाब, गालियाँ तो प्रेमचंद और रेणु ने भी यथार्थानुसार इस्तेमाल की हैं। और एक चेतावनी भी कि काशी का अस्सी पढ़ना उनके स्वास्थ्य के लिए बेशक हानीकारक होगा।</p>
<p>ख़ैर, चलिए गालियाँ की गलियों में चलें। फ़र्ज़ कीजिए, कोई पति अपनी पत्नी को या मालिक अपने मज़दूर को मार रहा हो। मारने वाला मार-मार कर थक जाए और मार खाने वाला मार खा-खा कर। वे एक ऐसे मानवीय क्षण में पहुँच जाएँ जहाँ उन दोनों के मुँह से एक दूसरे के लिए गाली निकल जाए, वही समाज प्रसिद्ध, एक-दूसरे की माँ और बहन की ओर लक्षित गाली। तो क्या इन दोनों गालियों का सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक भार एक समान होगा। नहीं, क्योंकि शोषक और शोषित की गालियों का भार एक समान कभी हो ही नहीं सकता। एक का उद्भव असमानता आधारित अन्यायपूर्ण सत्ता के ढाँचे से होता है और दूसरे का इस ढाँचे से प्रताड़ित होकर इसके, क्षणिक ही सही, लेकिन प्रतिकार की भावना से। तो इससे मोटे तौर पर गालियों के बीच एक बँटवारा हो जाता है, शोषक और शोषित की गालियाँ।</p>
<p>इसके अलावा एक तीसरा वर्ग भी है गालियों का। जहाँ दो जन बेमतलब की बात पर भिड़े हों, जैसे भीड़-भड़ाके में गाड़ी की टक्कर या ऐसा ही कुछ। हालाँकि, इस तरह की झड़पों में भी निहित राजनीतिक-सामाजिक कुंठा होती है, लेकिन फिर भी ऐसी घटनाओं से जानवरों की उन लड़ाइयों के दृश्य ज़्यादा याद आते हैं जो वर्चस्व इत्यादि के लिए लड़े जाते हैं, और जिन्हें ज्यों-के-त्यों इंसानी समाज पर लागू नहीं किए जा सकते। इसलिए इन्हें गालियों की मौजूदा बहस में शामिल करना बहुत ज़रूरी नहीं।</p>
<p>ख़ैर, गालियों के सामान्य ज्ञान पर भी चर्चा होनी चाहिए। गालियाँ समाज का हिस्सा अनंत काल से रही हैं। ये हर वर्ग की भाषा में मौजूद हैं। हाँ, उच्च वर्ग और मध्य वर्ग अपनी शालीनता के पर्दे में इसे छिपा लेते हैं। और निम्न वर्ग के पास तो अपना सिर छिपा पाने लायक़ छत नहीं होती तो अपनी गालियाँ कहाँ छिपाएगा। इसलिए उसकी बाक़ी ज़िंदगी की ही तरह उसकी गालियों से अलंकृत भाषा भी बेशुल्क नुमाइश की तरह हमेशा खुली रहती है। वर्ग के साथ-साथ आयु, लिंग, जाति आदि के तमाम खाँचे भी गालियाँ देने की रीत को नहीं बाँट सकते। लेकिन ये गालियाँ हमेशा सामाजिक रूप से कमज़ोर किए गए समूहों, जैसे महिलाओं, तथाकथित निम्न जातियों के हवाले से दी जाती हैं। इसलिए गालियाँ अपने शाब्दिक (जो सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थों से अलग नहीं किया जा सकता) अर्थ में बेशक हिंसा की भाषा है। लेकिन जैसा कि ऊपर ज़िक़्र किया गया कि शोषक और शोषित के आधार पर इस हिंसा में भी एक आंतरिक बँटवारा है, जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।</p>
<div id="attachment_151784" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151784" class="size-large wp-image-151784" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Collage1-1024x683.jpg" alt="" width="1024" height="683" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Collage1-1024x683.jpg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Collage1-300x200.jpg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Collage1-768x512.jpg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/08/Collage1.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-151784" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>आभार: सतरूपा चक्रबर्ती व वंशिका बब्बर</small></p></div>
<p>आइए लौटते हैं छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन की ओर जिसके बहाने से यह बहस एक बार फिर शुरू हुई। इस प्रदर्शन में शामिल तमाम वर्गों और जातियों से आए जेन-ज़ी बच्चों में से शायद ही कोई होगा जिसने अपने माँ-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी या पास-पड़ोस आदि में किसी को गालियाँ कहते नहीं सुना होगा। इसलिए यह कह देना कि यह युवा पीढ़ी के सांस्कृतिक ह्रास की निशानी है सरासर ग़लत होगा, और उतना ही ग़लत यह भी कि गाली देने वाली लड़कियाँ आज से पहले मौजूद नहीं थीं। अगर कोई इस मुग़ालते में है तो गाँव-शहर की किसी महिला से आत्मीय होकर बात करने की कोशिश कर ले, उसे ज़रूर एक नई गाली सीखने को मिल जाएगी। गालियाँ तो उत्तर भारत की संस्कृति में जन्म से विवाह तक के हर समारोह का हिस्सा हैं। ऐसे मौक़ों पर घर परिवार की महिलाएँ जी खोलकर एक-दूसरे को, ख़ानदान के मर्दों को गालियाँ देती हैं, हँसी-मज़ाक़ करती हैं, भले ही उस समय भी उनके चेहरे लंबे घूँघट के पीछे छिपे क्यों न रहें। यह उनके लिए एक तरह से अपनी घुटन से निकलकर खुलकर बोलने का भी मौक़ा है, और परिवार नाम की सामाजिक संस्था में अपने साथ हो रहे रोज़ाना के अन्याय पर अपनी खीझ उतारने का भी। पुरुषों में इस तरह गालियों का प्रयोग काफ़ी आम है। दोस्तों के बीच, साथ काम करने वालों के बीच, या परिवार के बीच एक-दूसरे को गाली देना या अपने से ऊपर वाले को गाली देकर नीचे ले आना बहुत ही आम दृश्य है। इस लिहाज़ से गालियाँ समाज में व्याप्त गहरी समस्याओं के निवारण न हो पाने की स्थिति में पैदा हुई हताशा और निराशा का क्षणिक निराकरण भी हैं।</p>
<p>युवाओं में गालियों के प्रति आकर्षण अधिक और उनके द्वारा इसका इस्तेमाल दूसरे आयु-वर्गों के मुक़ाबले थोड़ा ज़्यादा सजग होता है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि वे अभी सामाजिक प्रवाह के उस मुहाने पर ही होते हैं जिससे वे ख़ुद को अलग भी रखना चाहते हैं और कहीं न कहीं उसका हिस्सा भी होते हैं। वे समाज और व्यक्ति के आंतरिक ऊहापोह के चरम पर होते हैं। बाक़ी बाद में तो सबको थोक-पीटकर प्रवाह में किसी न किसी तरह लगभग शामिल कर ही लिया जाता है। बहरहाल, युवा चूँकि अपने अंदर इस तीखी लड़ाई को झेल रहे होते हैं इसलिए उनके जीवन के लगभग सभी पहलू युद्ध के लिए तैयारी कर रहे योद्धा जैसे होते हैं, जिसमें ज़ाहिर है भाषा भी शामिल है। इसलिए उनकी भाषा अमूमन ज़्यादा आक्रामक होना सहज है। साथ ही, वे अपने से बड़ों से इस भाषा को विरासत में लेते हैं, और यह कुछ हद तक ‘कूल’ भी मानी जाती है। इसीलिए पॉप-कल्चर, जैसे सिनेमा इत्यादि में भी गालियों की भाषा को सत्ता (सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक) से लड़ते हुए व्यक्ति की भाषा के तौर पर पेश किया जाना काफ़ी आम बात है।</p>
<p>अब सवाल उठता है कि क्या हमें एक समाज के तौर पर गालियों के इस यथार्थ को ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लेना चाहिए? नहीं, क्योंकि इंसानी समाज का पुरुषार्थ यह है कि वह हमेशा माज़ी से बेहतर आज, और आज से बेहतर मुस्तक़बिल के लिए काम करे। इसलिए कल की गालियों को आज, और आज की गालियों को कल तक ढोते चले जाना सरासर नामुनासिब है। लेकिन हमारे समाज से गालियाँ तब तक ग़ायब नहीं होंगी जब तक उन्हें पैदा करने वाली परिस्थितियाँ बरकरार हैं। तो इन परिस्थितियों से लड़ने के लिए किस-किस चीज़ की ज़रूरत है?</p>
<p>इसके लिए सबसे ज़रूरी है एक ऐसा सजग समाज जो अपनी मौजूदा ख़ामियों, समस्याओं इत्यादि को उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और प्रवाह में देखे ताकि इन्हें पैदा करने वाले तमाम संरचनात्मक ढाँचो को तबाह किया जा सके। ऐसी सजगता राजनीतिक-सामाजिक रूप से शिक्षित समाज में ही हो सकती है। और हमारे यहाँ तो ‘राजनीति करना ग़लत बात है’ सिखाया जाता है। यह देश जहाँ भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारी हुए वहाँ छात्रों को राजनीति से दूर रहने की हिदायत न सिर्फ़ उनके परिवार, बल्कि शैक्षणिक संस्थान और सरकार तक देते हैं। और अब तो यह बात हिदायत तक सीमित नहीं रही, अब बाक़ायदा हलफ़नामे लिए जाते हैं छात्रों से कि वे किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। और अगर ऐसा होता है तो उन पर कार्रवाई की जाएगी जिससे न सिर्फ़ उनकी शिक्षा बल्कि पूरे करियर पर बुरा असर पड़ेगा। छात्रों का यह ‘अराजनीतिकरण’ करने की साज़िश यूँ तो बहुत पहले से चली आ रही है, लेकिन नवउदारवादी दौर में यह बहुत अधिक देखी जा रही है। नवउदारवाद समाज को अकेले व्यक्तियों के इकाइयों में इसीलिए बाँटता है कि न वे राजनीतिक रूप से सजग हो पाएँ और न ही एक समाज के तौर पर अपने ऊपर हो रहे शोषण से लड़ पाएँ। जब छात्रों के स्तर पर ही लोगों को ‘अ-राजनीतिक’ बना दिया जाएगा तो वे जीवन में आगे चल भी ऐसे ही रहेंगे और आगामी नस्लों को भी यही सीख देंगे।</p>
<p>मौजूदा व्यवस्था विश्वविद्यालयों से सिर्फ़ जी-हज़ूरी करके क़लम घिसने वाले पुतले निकालना चाहती है। ऐसे पुतलों का समाज आख़िर कैसे अपनी भाषा पर विचार करेगा। इसलिए<br>
वह कैसे समझेगा गालियों में निहित हिंसात्मक अर्थों को, और जब वह इन्हें समझेगा ही नहीं तो इनसे लड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।</p>
<p>और यह सवाल न पैदा होना, भारत के मौजूदा दक्षिणपंथी शासन के लिए बहुत ज़रूरी है। ताकि भारत के समाज यह समझ ही न पाएँ कि उनकी नाक के नीचे असल खेल क्या चल रहा है। किस तरह देश अपने आज़ाद होने के बाद के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है, बेरोज़गारी और घोर असमानता ने देश की अर्थव्यवस्था को जकड़ रखा है। देश की लगभग 40% संपदा आबादी के 1% के पास है जिससे हमारा देश दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक बन गया। कैसे पिछले एक दशक में 94,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए और 2024-25 में कुल एंरोलमेंट में सरकारी स्कूलों का हिस्सा 70% से घटकर 49% रह गया। यह केवल देश में छाए संकट की छोटी सी झलक है। इस संकट को समझ पाने वाले समाज को इसीलिए ‘अ-राजनीतिक’ बनाए रखा जा रहा है कि सत्ता का सिंहासन न डोले।</p>
<p>इसलिए जो भाजपा और ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन गालियों को लेकर कोप भवन में बैठे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि गालियों की अग्नि में घी तो वे ही डालते आए हैं। पिछले कुछ सालों में ऑफ़लाइन और ऑनलाइन दुनिया में साफ़ देखा गया है कि युवाओं के बीच गालियों का प्रचलन न सिर्फ़ बढ़ा है बल्कि इनकी स्वीकृति भी। भाजपा सरकार की किसी नीति का विरोध करके देख लीजिए, गालियों का महाकाव्य आपको समर्पित कर दिया जाएगा। देश की संसद तक में भाजपा के भूतपूर्व सांसद ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ ऐसे शब्द बोले जो आम बातचीत में भी नहीं बोले जाने चाहिए। हिंदू त्योहारों और जुलूसों पर ईश्वर की स्तुति की जगह मुसलमानों के ख़िलाफ़ गालियों वाले गीत मस्जिदों के सामने डीजे पर बजाने का चलन तो मौजूदा शासन में ही चला है।</p>
<p>तो अपने हक़ की आवाज़ उठा रहे छात्रों से ही क्यों उम्मीद हो कि वे सब मर्यादाएँ मानें। बल्कि सोचने की बात तो यह है कि क्या इन्हें इन मर्यादाओं का ज्ञान भी है। और यह ज्ञान आएगा कहाँ से? राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से प्रगतिशील समाज से। ऐसा समाज जो समझ सके कि ‘जो है’ और ‘जो होना चाहिए’ के बीच का फ़र्क़ कैसे पाटा जाए। लेकिन ऐसा समाज ही तो सत्ता के लिए ख़तरा है इसलिए उसकी सभी संभावनाओं को या तो बर्बाद कर दिया गया है और जो कुछ किसी तरह बच गई है उन्हें कारावासों के डर से या क़ैद करके दबाए रखने के सारे प्रयास जारी है। लिहाज़ा गालियों के बहाने जिस संकट से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है वो जस-का-तस बना हुआ है।</p>
<p>लेकिन छात्रों और युवाओं के लिए यह संकट सबसे साफ़ है, उनके लिए यह आर-पार की लड़ाई है। क्योंकि उनका सारा भविष्य इस पर टिका है। इसलिए अपने फ़ौरी मुद्दों (पेपेर लीक, बेरोज़गारी इत्यादि) पर उन्होंने सरकार को घेरा है। यह घेराव चूँकि इसी समाज में बने युवाओं ने किया है तो इसकी भाषा भी इसी समाज की होगी। आदर्श आंदोलन केवल आदर्श समाज में होते हैं। गाली देना बुरी बात है, मगर वे परिस्थितियाँ और भी बुरी हैं जो इन्हें जन्म देती हैं। इन परिस्थितियों के ख़िलाफ़ लड़े बिना सिर्फ़ गालियों के ख़िलाफ़ लड़ना, शब्दों पर हमला है, अर्थों पर नहीं।</p>
<p><span style="color: #ba2025;"><strong>-सोनाली</strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अति निम्न मज़दूरी पर काम करते हैं ज़्यादातर प्रवासी श्रमिक</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/ati-nimna-mazdoori-part3/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[उमेश यादव]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Jul 2026 16:47:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गाँवों में भुखमरी से पीड़ित अनेक कामगार शहर आते हैं और यहाँ किसी भी शर्त पर मज़दूरी करने के लिए तैयार हो जाते हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4 style="text-align:center;">नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया के मज़दूरों की सर्वे रिपोर्ट-3</h4>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">सर्वे रिपोर्ट की </span></span><a href="https://thetricontinental.org/asia/noida-mazdoor-survey/"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">पहली कड़ी</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> में हमने नोएडा के कपड़ा कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों के रहने के हालात का जायज़ा लिया। </span></span><a href="https://thetricontinental.org/hi/asia/grameen-gareebi-se-shahri-bebasi-tak/"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">दूसरे भाग</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> में हमने ग्रामीण भारत के उन संरचनात्मक पहलुओं तथा मज़दूरों के मूल निवास की परिस्थितियों का विश्लेषण किया जो उनको प्रवास के लिए मजबूर करते हैं। इस भाग में हम उनकी कमाई का विश्लेषण करेंगे। अति निम्न मज़दूरी ग्रामीण क्षेत्रों में समाज के सबसे निचले पायदान पर मौजूद</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">आर्थिक संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित कामगारों को ही प्रवास के लिए आकर्षित कर पाती है। साथ</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">ही</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">साथ</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">यह ग्रामीण भुखमरी से अपेक्षाकृत बेहतर अवसर तो देती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">लेकिन ग्रामीण असमानता की संरचना को भी बरक़रार रखती है। यह न तो इनको शहर का हिस्सा बनने देती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">न ही इनको गाँव में ख़ुशहाल ज़िंदगी जीने का मौक़ा देती है। त्रासदी यह है कि ऐसे कामगार न गाँव में सुकून से बस पाते हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">न अपने प्रवास के शहर में। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">टेक्स्टाइल और कपड़ा उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का एक </span></span><a href="https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2117470&amp;lang=2&amp;reg=48"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">महत्वपूर्ण स्तंभ</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> है। कुल जीडीपी में इसका योगदान करीब </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">2.3 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">; </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">और भारत के सालाना निर्यात का </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">12 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत भाग टेक्स्टाइल और कपड़ा उद्योग से होता है। भारत के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">संयुक्त अरब अमीरात</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">बांग्लादेश</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">ब्रिटेन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तथा जर्मनी जैसे देश प्रमुख निर्यात केंद्र हैं। कृषि के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार प्रदान करने वाला सेक्टर है। करीब </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">4.5 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">करोड़ श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से तथा </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">10 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">करोड़ श्रमिक टेक्स्टाइल और कपड़ा उद्योग से संबद्ध क्षेत्रों में </span></span><a href="https://www.ibef.org/exports/apparel-industry-india"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">कार्यरत</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> हैं। तमिलनाडु</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">गुजरात</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">हरियाणा</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">महाराष्ट्र</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">और उत्तर प्रदेश शीर्ष टेक्स्टाइल और </span></span><a href="https://www.texmin.gov.in/static/uploads/2026/05/5c48e80d2180ca3194b9e9b01340696d.pdf"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">कपड़ा निर्यातक</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> राज्य हैं। </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">2024-25 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">के दौरान गौतम बुद्ध नगर भारत का दूसरा सबसे बड़ा </span></span><a href="https://www.texmin.gov.in/static/uploads/2026/05/5c48e80d2180ca3194b9e9b01340696d.pdf"><span style="color: #000080;"><u><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">टेक्सटाइल निर्यातक</span></span></u></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> ज़िला था। हमारे सर्वे में शामिल मज़दूर गौतम बुद्ध नगर के टेक्स्टाइल और कपड़ा कारखानों में ही काम कर रहे थे। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">पीएलएफ़एस के अनुसार </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">7 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत से ज्यादा शहरी श्रमिक गारमेंट सेक्टर में काम करते हैं। शहरी महिला कामगारों की गारमेंट सेक्टर में सहभागिता पुरुषों की तुलना में ज्यादा है। पाँच प्रतिशत शहरी पुरुष श्रमिकों के मुकाबले चौदह प्रतिशत शहरी महिला श्रमिक गारमेंट सेक्टर में काम कर रही थीं। यह मैन्युफ़ैक्चरिंग के उन अपवाद सेक्टरों में से एक है जिनमें महिला श्रमिकों की भागीदारी अच्छी है। लेकिन इस सेक्टर में काम लैंगिक आधार पर बँटा मालूम पड़ता है। सवैतनिक कार्य पुरुष</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रधान हैं जबकि अवैतनिक कार्य महिला प्रधान। </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">2023-24 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">में गारमेंट सेक्टर में काम करने वाले शहरी पुरुषों में से लगभग </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">67 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत सवैतनिक कार्य </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">(</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">दिहाड़ी मज़दूरी तथा नियमित वेतनभोगी मज़दूरी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">) </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">में संलग्न थे</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">जबकि महिलाओं के लिए यह आँकड़ा मात्र </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">20 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत था। महिलाओं का मुख्य हिस्सा बिना मेहनताना के काम करने वाली श्रेणियों में कार्यरत था। यही कारण है कि महिला मज़दूरों की बड़ी तादाद संलग्न होने के बावज़ूद कारखानों में उनकी संख्या पुरुषों की तुलना में नगण्य है। घर और कारखाना का यह लैंगिक विभाजन गारमेंट सेक्टर में गहरा है। इस लैंगिक विभेद की वजह से हमारे सर्वे में शामिल सारे मज़दूर पुरुष हैं। </span></span></span></span></p>
<div id="attachment_151099" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151099" class="size-large wp-image-151099" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_latakaku.jpg-768x1024.webp" alt="" width="768" height="1024" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_latakaku.jpg-768x1024.webp 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_latakaku.jpg-225x300.webp 225w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_latakaku.jpg-1152x1536.webp 1152w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_latakaku.jpg-1536x2048.webp 1536w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px"><p id="caption-attachment-151099" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>कुमार मिसल, <em>लक्ष्मी</em>, 2022</small></p></div>
<h2 align="left" style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>न्यूनतम भी नसीब नहीं </b></span></span></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">87 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत मज़दूर बड़े कारखानों </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">(500 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">से ज्यादा मज़दूर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">) </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">में कार्यरत थे। शेष मज़दूर मध्यम आकार </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">(100 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">से लेकर </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">500 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">मज़दूर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">) </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">के कारखानों में काम कर रहे थे। बड़े कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों की औसत मासिक कमाई </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">11,000 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपए थी जबकि मध्यम आकार के कारखानों में काम करने वाले मज़दूर की औसत कमाई </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">10,500 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपए के करीब थी। सर्वे में शामिल कुल मज़दूरों में सबसे ज्यादा भाग दर्ज़ी का काम करने वालों का था। एक दर्ज़ी की औसत मासिक पगार </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">11,000 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपए के करीब थी। हेल्परों की मासिक पगार </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">8,300 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपए थी। मज़दूरों की तनख़्वाह उनके काम के अनुसार कम अथवा ज्यादा थी। कपड़े मोड़ना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">साफ़ करना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">पैक करना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तथा स्टोर की देखभाल करना जैसे कामों के लिए </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">10,000 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपए प्रतिमाह से कम का वेतन था</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">जबकि कपड़े काटना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">उन पर रंग चढ़ाना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तथा बटन टाँकना जैसे कामों की मासिक तनख़्वाह </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">13,000 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">से </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">15,000 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपयों के बीच थी। सुपरवाइज़रों की तनख़्वाह मज़दूरों से काफ़ी ज्यादा</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, 19,000 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रुपए प्रतिमाह के लगभग थी। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">राज्य सरकारों का श्रम आयोग न्यूनतम मज़दूरी तय करता है और उनमें आवधिक वृद्धि करता है ताकि महँगाई के अनुसार मज़दूरी बढ़ सके। हमने सर्वे में शामिल मज़दूरों की मज़दूरी का उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा प्रकाशित न्यूनतम मज़दूरी से मिलान किया। श्रम मंत्रालय तीन तरह की श्रेणियों की मज़दूरी तय करता है—कुशल मज़दूर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">अर्ध</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">कुशल मज़दूर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तथा अकुशल मज़दूर। हमारे सर्वे में मुख्यत</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">: </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">कुशल तथा अकुशल मज़दूर शामिल थे। तकरीबन आधे मज़दूरों को ही सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी मिल पा रही थी। तालिका </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">1 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">दोनों श्रेणियों में न्यूनतम मज़दूरी प्राप्त करने वाले मज़दूरों के प्रतिशत को दर्शाती है। अकुशल मज़दूरों—जो ज़्यादातर नए</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">नए काम पर लगे होते हैं तथा हेल्पर जैसे काम करते हैं—में न्यूनतम मज़दूरी प्राप्त करने वालों का प्रतिशत कुशल मज़दूरों से कम था। ये ज़्यादातर काम की तलाश में पहली बार शहर गए युवा प्रवासी होते हैं अथवा गारमेंट कारखानों में काम शुरू करने वाले मज़दूर होते हैं। इनकी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर उनको न्यूनतम मज़दूरी से महरूम करना अधिक आसान होता है—और जैसा कि हमारा विश्लेषण बताता है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">अक्सर यही होता है। </span></span></span></span></p>
<p align="center"><strong><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तालिका </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">1: </span></span></strong><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><i>उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम आयोग द्वारा न्यूनतम मज़दूरी या उससे ज्यादा अर्जित करने वाले सर्वे में शामिल मज़दूरों का प्रतिशत</i></span></span></span></span></p>
<div id="attachment_151075" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151075" class="wp-image-151075 size-large" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table1-1024x268.png" alt="" width="1024" height="268" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table1-1024x268.png 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table1-300x79.png 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table1-768x201.png 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table1.png 1244w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-151075" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>आँकड़ो का स्रोत: सर्वे के आँकड़ो से लेखक की गणना</small></p></div>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">हमने यहाँ उत्तर प्रदेश राज्य की न्यूनतम मज़दूरी दरों का उपयोग किया है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">क्योंकि नोएडा प्रशासनिक दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा है। लेकिन यहाँ दिल्ली राज्य की न्यूनतम मज़दूरी का उपयोग करना व्यावहारिक होगा</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">क्योंकि यहाँ रहने का ख़र्च दिल्ली शहर के बराबर है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">और उत्तर प्रदेश राज्य के किसी भी शहर से बेहद ज़्यादा। दिल्ली सरकार की न्यूनतम मज़दूरी को पैमाना बनाकर विश्लेषण करने पर पता लगता है कि विरले ही किसी मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी मिल रही थी। सिर्फ़ चार प्रतिशत कुशल मज़दूरों को ही दिल्ली सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी मिल पा रही थी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">जबकि एक भी अकुशल मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिल रही थी। जीतोड़ काम करने बाद अपना पेट पालने के लिए आवश्यक निम्नतम मज़दूरी तक न मिल पाना गारमेंट सेक्टर के ज्यादातर मज़दूरों की हक़ीक़त है। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">एक तो सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी की दरों को पहले से ही भरण</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">पोषण के लिए नाकाफ़ी माना जाता रहा है। यह न सिर्फ़ शहरों में एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए अपर्याप्त होता है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">बल्कि अमानवीय हालात में रहने के लिए भी नाकाफ़ी होता है। उसके ऊपर से</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">समस्या यह है कि अधिकतर कारखाने अपने मज़दूरों को यह अमानवीय रूप से निम्न न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं देते। सरकारें भी इस अमानवीय शोषण को प्रश्रय देती हैं। पहले तो वे बेहद निम्न न्यूनतम मज़दूरी तय करके मज़दूरों के शोषण को वैधानिक जामा पहनाती हैं। फ़िर उसके अनुपालन को नज़रअंदाज़ करने मज़दूरों के अतिशोषण का आधार तैयार करती हैं। पूँजीपतियों की अतिशोषणकारी मज़दूरी और उसका सरकारी आधार मिलकर प्रवासी मज़दूरों की दुर्दशा की इबारत लिखते हैं। </span></span></span></span></p>
<h2 align="left" style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>शोषण के अनेक तरीक़े </b></span></span></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">मज़दूरों की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा ग़ैर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">कृषि सेक्टर होने के बावज़ूद गारमेंट सेक्टर की मज़दूरी अन्य सेक्टरों से कम है। गारमेंट सेक्टर में अन्य मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टरों की तुलना में मज़दूरों की मासिक कमाई कम होती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">ख़ासकर नियमित वेतनभोगी मज़दूरों तथा स्व</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">नियोजित मज़दूरों की। नीचे दी गई तालिका में यह फ़र्क साफ़ दिखता है। गारमेंट सेक्टर अतिनिम्न मज़दूरी देने वाले सेक्टरों में शामिल है। जैसा कि कि हमने ऊपर देखा</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">इस सेक्टर में सबसे ज़्यादा हकमारी महिलाओं की होती है। जिन श्रमिक</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">श्रेणियों में महिलाओं की हिस्सेदारी ज़्यादा है उनमें ही सबसे कम मज़दूरी मिलती है। यह काफ़ी कुछ उत्पादन की प्रणाली पर भी निर्भर करता है। गारमेंट सेक्टर में सारा काम कारखाने में कराए जाने की ज़रूरत नहीं होती। बहुत सारे ऐसे काम होते हैं जिनमें कारखाने के भीतर सुपरवाइज़र की नज़र के सामने काम कराए बिना भी गुणवत्ता को परखा जा सकता है और मज़दूरों को काम के अनुसार मज़दूरी दी जा सकती है। उदाहरण के लिए बटन टाँकना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">सिलाई करना</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">खास पैटर्न में कपड़ों को काटना इत्यादि। इस तरह के कामों में महिलाओं की संलग्नता ज़्यादा देखने को मिलती है। ऐसे मज़दूरों को स्व</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">नियोजित मज़दूर के नाम से जाना जाता है। और चूँकि ये सीधे कारखानों के भीतर काम नहीं करते तथा इनके ऊपर काम के घंटों की प्रत्यक्ष बंदिश नहीं होती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">अत</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">: </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">उन्हें दिहाड़ी अथवा नियमित वेतनभोगी मज़दूर नहीं माना जाता है। ये तकनीकी रूप से कारखाने अथवा किसी नियोक्ता के लिए काम नहीं करते। मज़दूर की परिभाषा के बाहर ऐसे मज़दूरों को न न्यूनतम मज़दूरी देने की कोई वैधानिक वजह होती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। फलत</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">: </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">ये बाकी मज़दूरों से भी कम कमाते हैं। सीधा कारखानों में जाकर काम न करने की वजह से उनके काम और उनकी पहचान को भी नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। </span></span></span></span></p>
<p align="center"><strong><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तालिका </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">2: </span></span></strong><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><i>वर्ष </i></span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><i>2023–24 </i></span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><i>में टेक्स्टाइल</i></span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><i>, </i></span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><i>तथा टेक्स्टाइल को छोड़कर अन्य विनिर्माण गतिविधियों में संलग्न शहरी श्रमिकों का औसत मासिक वेतन</i></span></span></span></span></p>
<div id="attachment_151083" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151083" class="wp-image-151083 size-large" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table2-1024x360.png" alt="" width="1024" height="360" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table2-1024x360.png 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table2-300x105.png 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table2-768x270.png 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_table2.png 1244w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-151083" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>आँकड़ों का स्रोत: पीएलएफ़एस 2023–24, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI), भारत सरकार।</small></p></div>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">गारमेंट सेक्टर के हालात आर्थिक विकास के वर्तमान आयाम और इसमें मेहनतकश जनता की जगह के बीच के विरोधाभास को उजागर करते हैं। हमारे सर्वे के आँकड़े इस सेक्टर के एक बेहद छोटे इलाक़े के कुछ मज़दूरों के अनुभवों पर आधारित हैं। लेकिन सरकार द्वारा कराए जाने वाले देशव्यापी सर्वे भी मज़दूरों की बदहाली को ही बयान करते हैं। पीएलएफ़एस के अनुसार टेक्सटाइल सेक्टर में संलग्न </span></span></span></span><a href="https://sansad.in/getFile/annex/270/AU3997_Grmmw2.pdf?source=pqars"><span style="color: #000080;"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"><u>94 </u></span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत</span></span></span></span></span></a><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;"> मज़दूर असंगठित सेक्टर में काम कर रहे थे। यानी कि उनके पास श्रम कानूनों का आभासी कवच तक नहीं था और वे समाजिक सुरक्षा से भी महरूम थे। सोचिए</span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">आर्थिक तरक्की का वर्तमान विमर्श—जिसका निर्यातोन्मुखी आर्थिक विकास एक आधार स्तंभ है—अपने सबसे सफल सेक्टरों में से एक में </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">94 </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">प्रतिशत मज़दूरों को काम करने की मानवीय परिस्थितियों की वैधानिक गारंटी भी नहीं दे पा रहा है। अभी तो हम संगठित सेक्टर में श्रम कानूनों की अवहेलना की चर्चा ही नहीं कर रहे हैं। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">अतिनिम्न मज़दूरी मज़दूरों की बदहाली का प्रमुख कारण है—उनके गाँवों में भी और शहरों में भी। गाँव में व्याप्त ग़रीबी से बचने के लिए वो शहर की ओर भागते हैं। शहर में गारमेंट जैसे सेक्टर—जो प्रवासी मज़दूरों के श्रम के बूते कायम हैं—उनके शोषण के नाना तरीके ईजाद करते हैं। कुछ को मज़दूर मानने से इंकार कर दिया जाता है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तो कुछ की मज़बूरी का फ़ायदा उठाकर उनको </span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">‘</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">हेल्पर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">‘ </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">जैसे तमगे दिए जाते हैं। लचर श्रम कानूनों—जो मज़दूरों की गरिमा को बचाने में हमेशा से विफल रहे हैं तथा मज़दूरों को अमानवीय परिस्थितियों से बचाने में विरले ही सफल हुए हैं—के अनुपालन के असंख्य नुस्खे तैयार किए गए हैं। पूंजीपतियों की ये कारगुजारियाँ सरकारी शह मिलने के बाद ही कारगर हो पाती हैं। इतने सारे प्रपंच करके मज़दूरों को अमानवीय रूप से निम्न मज़दूरी दिया जाना संभव बनाया जाता है। </span></span></span></span></p>
<div id="attachment_151091" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-151091" class="size-large wp-image-151091" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_Header_HI-1024x745.jpg" alt="" width="1024" height="745" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_Header_HI-1024x745.jpg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_Header_HI-300x218.jpg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_Header_HI-768x559.jpg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part3_Header_HI.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px"><p id="caption-attachment-151091" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>कुमार मिसल (भारत), <em>निरक्षर 2</em>, 2024</small></p></div>
<h2 align="left" style="margin:3em 0;"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Palanquin Dark;"><span style="font-size: large;"><b>दोनों जगह हाशिए पर</b></span></span><b> </b></span></span></h2>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">यही कारण है कि दिन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">भर कमरतोड़ मेहनत करने के बाद ज़्यादातर मज़दूर अपने लिए एक कमरा तक किराए पर नहीं ले सकते। ऐसी जगहों पर नहीं रह सकते जो उनकी निजता की हिफ़ाज़त कर सकें</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">साफ़</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">सुथरी हों</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">और जहाँ पीने योग्य पानी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">तथा शौचालय जैसी सुविधाएँ हों। वो शहर</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">जिसकी आर्थिक प्रगति उनके श्रम पर टिकी है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">का हिस्सा बनने का सपना भी नहीं देख सकते। ये दिन</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">रात परिश्रम करने के बावज़ूद अपने परिवार को अपने साथ रख नहीं सकते क्योंकि उनकी कमाई शहर में परिवार के भरण</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">पोषण के लिए अपर्याप्त है। अतिनिम्न मज़दूरी उनको अपने ही देश में एकाकी और निर्वासन का जीवन जीने के लिए मजबूर करती है। </span></span></span></span></p>
<p style="text-align: justify;" align="left"><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">यह अतिनिम्न मज़दूरी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">गाँव में बसे आश्रितों की मूलभूत ज़रूरतों को कुछ हद तक पूरा तो करती है</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">लेकिन इतना ही कि वो रोटी और कपड़े जैसी ज़रूरतों को बमुश्किल पूरा कर सकें। उनकी गाँव की ग़रीबी भी कायम रहती है और शहरी विपन्नता भी। सारी कमाई रोज़मर्रा की ज़रूरतों में चले जाने की वजह से इनके पास खास बचत नहीं हो पाती। ये कभी</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">–</span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">कभार गाँव तो जा सकते हैं</span></span></span></span><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">, </span></span><span style="font-family: Arial;"><span lang="hi-IN"><span style="font-family: Baloo;"><span style="font-size: large;">लेकिन शहर में आना इनकी मज़बूरी होती है। इस तरह गाँव बेरोज़गारी और ग़रीबी का स्रोत बने रह जाते हैं और शहरों के गारमेंट जैसे सेक्टर इसका फ़ायदा उठाकर उनसे सस्ते श्रम का लाभ उठाते हैं। </span></span></span></span></p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सड़कों पर उतरा युवा आक्रोश: जेन ज़ी दरअसल एक वर्ग-संघर्ष है</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/gen-z-ek-varg-sangharsh-hai/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Jul 2026 05:28:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बेरोज़गारी और परीक्षा घोटालों से जूझ रहे भारतीय युवा अब दमन की परवाह किए बिना अपने हक़ और गरिमा की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतर आए हैं।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>20 जुलाई को हज़ारों नौजवानों ने जंतर-मंतर से संसद तक मार्च किया। उनके हाथों में पोस्टर थे, और ज़ुबान पर नारे। वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा माँग रहे थे। कारण? एक के बाद एक परीक्षाओं में धाँधली, पेपर लीक, रद्द होते इम्तिहान, और इस सबके बाद छात्रों के नुक़सान की ज़िम्मेदारी लेने से मुँह फेरती एक सरकार। दिल्ली पुलिस ने जवाब में बैरिकेड लगाए, आँसू गैस के गोले छोड़े, और लाठीचार्ज किया। कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया; बाक़ी छोटी-छोटी टोलियों में बँटकर संसद की ओर बढ़ते रहे। सोशल मीडिया पर महज़ व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ यह आंदोलन अब सड़कों पर आकर सत्ता से आमने-सामने की टक्कर ले रहा है।</p>
<p>प्रदर्शनकारी ख़ुद को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सदस्य कह रहे हैं। क्योंकि एक जज ने अदालती टिप्पणी में एक्टिविस्टों और बेरोज़गार नौजवानों को कॉकरोच और परजीवी कह कर नीचा दिखाया था। इस अपमान को नौजवानों ने सामूहिक ललकार का तमग़ा बना लिया। अगर देश के हुक्मरान अपने बेरोज़गार नौजवानों को कॉकरोच समझते हैं, तो कॉकरोच अब इकट्ठे होकर संघर्ष करेंगे। भारतीय जनता पार्टी का कटाक्ष करते हुए इसे कॉकरोच जनता पार्टी का नाम दिया गया है, लेकिन इस नई पार्टी में उस पूरी पीढ़ी के अनुभव हैं, जिसे बार-बार कलंकित किया जाता रहा। आर्थिक व्यवस्था की नाकामी के लिए अलग अलग तरीक़ों से इस पीढ़ी को ज़िम्मेदार बताया गया। कभी कहा गया कि ये ज़रूरत से ज़्यादा हैं, और कभी कहा गया कि ये नाशुक्रे हैं, नाकारा हैं। इन्हें रोज़गार देने की बजाए, पूँजीवादी व्यवस्था इन्हें डिस्पोज़ेबल (इस्तेमाल के बाद फेंकने लायक़) समझती रही है।</p>
<p>6 जून को दिल्ली में हुए अपने पहले बड़े प्रदर्शन के बाद से यह आंदोलन पुणे, मुंबई, बेंगलुरु, लखनऊ और नागपुर जैसे शहरों तक फैल चुका है। समर्थकों ने जंतर-मंतर पर सिट-इन मोर्चा शुरू किया। वहीं जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक उनकी माँगों के समर्थन में भुख हड़ताल पर बैठ गए। सही तरीक़े से जवाब देने की बजाए उन्हें जबरन अस्पताल पहुँचा दिया गया। आंदोलन की माँगें स्पष्ट हैं: दाख़िला व भर्ती परीक्षाओं की साख पुन:स्थापित हो, आत्महत्या कर गए छात्रों के परिवारों को मुआवज़ा मिले, भ्रष्टाचार में डूबी परीक्षा-व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए, और शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें। पर इन माँगों के पीछे एक बड़ा सामाजिक संकट छिपा है। परीक्षा में आने वाला पेपर सिर्फ़ सवालों से भरा एक काग़ज़ नहीं होता। बल्कि लाखों मेहनतकश परिवारों के लिए वह बरसों की बचत, क़ुर्बानी, पढ़ाई और उम्मीद का दूसरा नाम है। जब वह पेपर लीक हो जाता है या इम्तिहान रद्द हो जाता है, तो एक पूरे परिवार की योजनाएँ नाकामयाब हो जाती हैं।</p>
<div id="attachment_150372" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-150372" class="size-full wp-image-150372" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/Vikrant-Bhise-Rise-of-Protests-2021.png" alt="" width="671" height="573" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/Vikrant-Bhise-Rise-of-Protests-2021.png 671w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/Vikrant-Bhise-Rise-of-Protests-2021-300x256.png 300w" sizes="auto, (max-width: 671px) 100vw, 671px"><p id="caption-attachment-150372" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>बढ़ते विरोध प्रदर्शन (विक्रांत भीसे, 2021)</small></p></div>
<p>मीडिया कॉकरोच आंदोलन को हिंदुस्तान का पहला ‘जेन ज़ी प्रदर्शन’ बता रहा है। इस बात में कुछ सच्चाई है। इस आंदोलन की भाषा सोशल मीडिया से जन्मी है, तथा यह आंदोलन मीम, व्यंग्य, पैरोडी, छोटे वीडियो व अपना ही मज़ाक़ बनाने की कला का बड़ी कुशलता से इस्तेमाल कर रहा है। इसमें शामिल कई नौजवानों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के अलावा कोई और सरकार नहीं देखी है। उनकी राजनीतिक शब्दावली ऐसे हालात में विकसित हुई है, जिसमें टेलीविज़न मीडिया सत्ता के आगे घुटने टेक चुका है, असहमति को जुर्म बना दिया गया है, और इंटरनेट एक साथ निगरानी का औज़ार भी है तथा वो बची हुई जगह भी है जहाँ विरोध की आवाज़ तेज़ी से फैलती है। पर ‘जेन ज़ी’ शब्द पूर्ण विश्लेषण को दबा देता है। यह समाजशास्त्र के मुखौटे में दरअसल एक विपणन श्रेणी (मार्केटिंग कैटेगरी) है। इस शब्दावली के तहत एक खेतिहर मज़दूर की बेटी और एक अरबपति का बेटा एक ही श्रेणी में आते हैं क्योंकि वे उम्र में एक दूसरे के बराबर हैं। जेनरेशन परीक्षा नहीं देती, जेनरेशन नौकरी नहीं ढूँढती, जेनरेशन डिलीवरी का काम नहीं करती, जेनरेशन कोचिंग की फ़ीस के लिए क़र्ज़ नहीं लेती, ये सभी काम एक सामाजिक वर्ग करता है। असली सवाल यह नहीं कि ये सभी नौजवान कब पैदा हुए। सवाल यह है कि उन्हें कैसी आर्थिक व्यवस्था विरासत में मिली है, और इस व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह है या नहीं।</p>
<p>ये नौजवान प्रदर्शनकारी इसलिए बग़ावत पर नहीं उतरे कि उनका अटेन्शन स्पैन कम है, या सत्ता से उन्हें कोई ख़ास चिढ़ है। वे इसलिए बग़ावत पर हैं क्योंकि पूँजीवाद उन्हें एक सम्मानजनक आर्थिक ज़िंदगी नहीं दे सका है। उनसे कहा गया कि पढ़ो, डिग्रियाँ हासिल करो, नए हुनर सीखो, रेस में आगे रहने की कोशिश करते रहो, ‘उद्यमी’ बनो। उनके परिवारों ने क़र्ज़ लिए, ज़मीनें बेच दीं, इलाज के खर्च टाले, घर के ख़र्च घटाए, सिर्फ़ इसलिए कि पढ़ाई और कोचिंग का पैसा जुटा सकें। पर इस बेरहम सफ़र के अंत में अनेकों परिवारों को पता चलता है कि जिस नौकरी का वादा था, वह कहीं है ही नहीं। कुछ नौजवानों के हाथ कॉन्ट्रैक्ट पर अस्थाई नौकरियाँ आती हैं, या बिना तनख़्वाह की इंटर्नशिप, या प्लेटफ़ॉर्म-आधारित गिग वर्क, या फिर ऐसी नौकरियाँ जहां वेतन का उनकी योग्यता से कोई नाता नहीं।</p>
<p>यह समस्या सरकारी आँकड़ों में भी दर्ज है। सरकार के <a href="https://www.mospi.gov.in/uploads/latestReleases/latest_release_1774607827733_3e8964a9-268b-4cc9-ad65-cfc8a9e32f08_Press_note_AR_PLFS_2025_23032025_V2.1_26032026_final.pdf">‘पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे’ (2025)</a> के मुताबिक़ पंद्रह से उनतीस साल के नौजवानों में 9.9 फ़ीसदी बेरोज़गारी है। जबकि शहरी नौजवानों में बेरोज़गारी 13.6 फ़ीसदी है। इसके साथ, पंद्रह से उनतीस साल के पच्चीस प्रतिशत युवा न नौकरी कर रहे हैं, न पढ़ाई, और न ही कोई प्रशिक्षण। ये चौंकाने वाले आँकड़े भी बहुत कुछ नहीं बताते। ये नहीं बताते कि बड़ी संख्या में युवा अंडर-एम्प्लॉमेंट में हैं (उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार काम और वेतन नहीं मिलता)। ये आँकड़े नहीं बताते कि पेपर देने वालों के पीछे परिवारों की अन-पेड मेहनत लगती है। ये आँकड़े उस लाचारी व ना-उम्मीदी को नहीं दर्शाते जो इंसान को किसी भी काम को ‘रोज़गार’ मान लेने पर मजबूर करती है। भारत के सिर्फ़ 23.6 फ़ीसदी वर्कर नियमित तनख़्वाह वाली नौकरी में हैं, जबकि 56.2 फ़ीसदी ‘सेल्फ़-एम्प्लॉएमेंट’ में हैं। ‘सेल्फ़-एम्प्लॉएमेंट’ एक ऐसी श्रेणी है जिसमें करोड़ों कमाने वाले पेशेवरों से लेकर रेहड़ी लगाने वाले और पारिवारिक खेतों में बिना मज़दूरी के काम करने वाले सभी लोग शामिल हैं।</p>
<p>‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर ह्यूमन डेवलपमेंट’ और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की <a href="https://www.ilo.org/publications/india-employment-report-2024-youth-employment-education-and-skills">‘इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट</a>‘ तस्वीर को और भी साफ़ कर देती है। 2022 में स्नातक (ग्रैजूएशन) कर चुके नौजवानों में 29.1 फ़ीसदी बेरोज़गारी थी, उन नौजवानों से नौ गुना ज़्यादा जो पढ़-लिख नहीं सकते थे। क़रीब 82 फ़ीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में थे, और तक़रीबन 90 फ़ीसदी अनौपचारिक रूप से काम पर लगे थे। नियमित वर्करों का वेतन या तो ज्यों का त्यों रहा या कम हुआ है। प्लेटफ़ॉर्म-आधारित रोज़गार बढ़ा है, जो कि असंगठित मज़दूरी का विस्तार है, जहां काम के बदले कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती पर वर्कर लगातार डिजिटल निगरानी में रहते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ पहली नौकरी के लिए इंतज़ार का समय औसतन एक साल से ज़्यादा था, और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित नौजवान अपने प्रशिक्षण से कम दर्जे का काम कर रहे थे।</p>
<p>यही विरोधाभास इन प्रदर्शनों की जड़ है। शिक्षा ने भारत के नौजवानों की आकांक्षा और क्षमता तो बढ़ाई, पर अर्थव्यवस्था ने उनके लिए ढंग की नौकरियों की गिनती नहीं बढ़ाई। जितना ज़्यादा वे पढ़ते हैं, उतना ही व्यवस्था द्वारा किए गए वादे से दूर होते जाते हैं। उनकी डिग्रियाँ उनकी नाकाबिलियत का नहीं, बल्कि उस आर्थिक ढाँचे की नाकामी का सबूत हैं जो वित्त, पूँजी-प्रधान उत्पादन, निजीकरण और कॉरपोरेट एलीट वर्ग को मालामाल करने के लिए बना है।</p>
<p>यह संकट मोदी सरकार से शुरू नहीं हुआ, पर भाजपा के बारह साल के राज ने इसे बढ़ाया ज़रूर है। नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे कारोबार तबाह कर दिए। ये वो कारोबार थे जो ऐतिहासिक रूप से बड़ी तादाद में जनता को काम देते रहे हैं। सरकारी भर्तियाँ या तो टलती रहीं या घटा दी गईं। ख़ाली पद अब भी ख़ाली पड़े हैं। पक्की नौकरियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट की नौकरियों ने ले ली है। लाखों लोग हर साल श्रम-बाज़ार में दाखिल होते हैं, लेकिन उन्हें काम देने के लिए पर्याप्त विनिर्माण (मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर) का विस्तार नहीं हुआ है। इस बीच सरकारी शिक्षा को लगातार कमज़ोर किया जा रहा है, और कोचिंग के बाज़ार को बढ़ावा मिला है। इस बाज़ार ने परिवारों की वाजिब चिंता को ज़बरदस्त मुनाफ़े का ज़रिया बना लिया है। सरकार जीडीपी, हाईवे संख्या, डिजिटल भुगतान, यूनिकॉर्न कंपनियों (एक अरब डॉलर मूल्य वाले स्टार्टअप) और अरबपतियों की दौलत आदि के बढ़ने का जश्न मनाती है। पर इनमें से कोई भी आँकड़ा अनगिनत परिवारों के एक सवाल का जवाब नहीं दे सकता, कि नौकरी कहाँ है?</p>
<div id="attachment_150380" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-150380" class="size-full wp-image-150380" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/vikrant-bhise-2023.png" alt="" width="500" height="576" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/vikrant-bhise-2023.png 500w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/vikrant-bhise-2023-260x300.png 260w" sizes="auto, (max-width: 500px) 100vw, 500px"><p id="caption-attachment-150380" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small>शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो (विक्रांत भीसे, 2023)</small></p></div>
<p>इसलिए पेपर लीक को महज़ दफ़्तरी भ्रष्टाचार समझना नाकाफ़ी है। ये असल में वर्गीय अन्याय का रूप हैं। लाखों लोग चंद पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, क्योंकि पक्के काम को जान-बूझकर घटाया गया है। हर उम्मीदवार को फ़ीस भरनी पड़ती है, लंबे सफ़र तय करने पड़ते हैं, पढ़ाई का सामान ख़रीदना पड़ता है, और कोचिंग सेंटरों में बरसों गँवाने पड़ते हैं। जब किसी परीक्षा में दिक़्क़त आती है, तो सरकार तकनीकी शब्दावली का प्रयोग करती है और जाँच समितियों के गठन की बात करती है। पर परीक्षा के लिए बैठे नौजवानों की जो जवानी उनसे छीनी गई इसके बारे में कोई बात नहीं होती। उनके लिए पेपर देने का समय घटता जाता है; क़र्ज़ा बढ़ता जाता है; और ज़िंदगी का एक और साल ऐसे ही ख़त्म हो जाता है।</p>
<p>सरकार इन प्रदर्शनों को एक बेसब्र पीढ़ी के भावुक उबाल के रूप में परिभाषित कर इसे नज़रंदाज़ करना चाहेगी। आंदोलन का मज़ाक़ बनाने से लेकर, प्रदर्शनकारियों का दमन, बातचीत का लालच, आंदोलन में फूट डालने की कोशिश आदि सरकार अपने सभी हथियार इस्तेमाल करेगी। नौजवानों से कहा जाएगा कि उनमें तजुर्बा नहीं, कि विदेशी ताक़तें उन्हें बहका रही हैं, कि उनका प्रदर्शन देश की छवि दाग़दार कर रहा है। पर यह माँग करने में कुछ भी ऐंटी-नैशनल नहीं कि देश अपने नौजवानों को कोई ढंग का काम दे। भारत को कलंकित तो वह व्यवस्था करती है, जिसे नौजवान उपभोक्ता के रूप में चाहिए, आँकड़े के रूप में चाहिए, डिलीवरी करने वाले के रूप में चाहिए, चुनावी भीड़ के रूप में चाहिए, पर जहां अधिकार रखने वाले वर्कर, आवाज़ रखने वाले नागरिक और भविष्य के हक़दार इंसान के रूप में उनके लिए कोई जगह नहीं है।</p>
<p>कॉकरोच आंदोलन की ऊर्जा बहुत अहम है, पर स्वतःस्फूर्त फूटा आक्रोश और डिजिटल पहुँच सत्ता की जड़ को अकेले नहीं हरा पाएँगे। परीक्षा-सुधार को रोज़गार, सार्वजनिक शिक्षा, श्रम-अधिकारों और आर्थिक पुनर्वितरण की लड़ाई से जोड़कर ही यह आंदोलन लंबे समय तक टिक सकता है। जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों का भविष्य कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों, स्कीम-वर्करों, डिलीवरी राइडरों, फ़ैक्ट्री अप्रेंटिस, बेरोज़गार स्नातक युवाओं और ग्रामीण मज़दूरों के भविष्य से जुड़ा है। इस आंदोलन को उन कोशिशों का डटकर विरोध करना होगा, जो संगठित राजनीति, ट्रेड यूनियनों और पुराने छात्र संगठनों को किसी बीते ज़माने के खंडहर बताकर ख़ारिज करती हैं। संगठित मज़दूर वर्ग ने जो तजुर्बा कमाया है, वह नौजवानों की बग़ावत पर बोझ नहीं बनेगा; बल्कि वही एक ऐसा सहारा है जो इस बग़ावत को ताक़त और दिशा दे सकता है।</p>
<p>‘कॉकरोच’ नाम में एक अनचाहा ऐतिहासिक सच छुपा है। कॉकरोच इसलिए ज़िंदा बचे रहते हैं क्योंकि उन्हें मिटाना मुश्किल है। पर सड़कों पर उतरे ये नौजवान महज़ इतना नहीं माँग रहे कि एक सड़ रही व्यवस्था की दरारों में वे किसी तरह ज़िंदा रह सकें। वे जीना चाहते हैं, काम करना चाहते हैं, जो कुछ पढ़ा-सीखा है उसे इस्तेमाल में लाना चाहते हैं, और गरिमा के साथ समाज के काम आना चाहते हैं। उनका ग़ुस्सा देखने में एक जेनरेशन का ग़ुस्सा लगता है, पर असल में यह एक वर्ग का ग़ुस्सा है। वामपंथ के लिए जरूरी है कि इस आक्रोश का महिमामंडन करने, या केवल बाहर से इसे उपदेश देने से बचे। वामपंथ का काम है कि इस आंदोलन के साथ संवाद बनाए, उस संपूर्ण ढाँचे की शिनाख़्त करने में आंदोलन की मदद करे जो नौजवानों की तकलीफ़ का कारण है, तथा आंदोलन की तात्कालिक माँगों को ऐसे कार्यक्रम से जोड़े जो लाखों पक्की व समाज के काम आने वाली नौकरियाँ पैदा कर सके।</p>
<p>संसद के बाहर छोड़ी गई आँसू गैस प्रदर्शनकारियों के उठाए सवाल का जवाब नहीं है। देश के हुक्मरान उन्हें बैरिकेड के पीछे धकेल सकते हैं, उन्हें कीड़े, परजीवी या उपद्रवी कह सकते हैं। पर जो समाज अपने नौजवानों के लिए जगह बनाने से इनकार करेगा, वह अंतत: यही देखेगा कि नौजवानों ने ख़ुद उस समाज का नए सिरे से निर्माण करने की ठान ली है।</p>
<p><span style="color: #ba2025;"><strong>-विजय प्रसाद</strong></span></p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पहले खाद की किल्लत और अब मानसून की बेरुख़ी </title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/pehle-khaad-ki-killat-ab-monsoon-ki-berukhi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[उमेश यादव]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Jul 2026 12:35:46 +0000</pubDate>
				<guid isPermaLink="false">https://thetricontinental.org/?post_type=india&#038;p=149672</guid>

					<description><![CDATA[कम वर्षा तथा अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए खाद संकट से पैदावार में कमी आ सकती है, जिससे किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_149726" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-149726" class="size-full wp-image-149726" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579.jpg" alt="" width="1100" height="733" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579.jpg 1100w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579-300x200.jpg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579-1024x682.jpg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/C1100-reena-saini-kallat-deep-rivers-run-quiet-2579-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1100px) 100vw, 1100px"><p id="caption-attachment-149726" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-size: 15pt;">रीना सैनी कलाट, <em>नदी के रेखाचित्र</em>, 2020</span></small></p></div>
<p style="text-align: justify;">कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के <a href="https://upag.gov.in/pdf-reports?rtab=Crop+Weather+Watch+Group+Reports&amp;rtype=reports&amp;rurl=https%3A%2F%2Fstorage.googleapis.com%2Fupag-10-128-23-3%2FMIR-Reports-Crop-Outlook%2FI_17827270970110526_Crop%2C_Rainfall_%26_Reservoir_as_on_29th_June_2026.pdf">अनुसार</a> 25 जून 2026 तक मात्र 183 लाख हेक्टेयर खेतों की बुवाई हो पाई है। पिछले ख़रीफ़ के मौसम में अब तक 236 लाख हेक्टेयर की बुवाई पूरी हो गई थी। बुवाई के रकबे में इस चिंताजनक देरी का मुख्य कारण मानसून का बेहद विलंब से आना तथा औसत से कम स्तर की बारिश है। ज़्यादातर ख़रीफ़ फ़सलों का रकबा पिछले साल की तुलना में कम है। जहाँ धान की बुवाई का रकबा 9 प्रतिशत कम है, वहीं दालों का रकबा करीब 7 प्रतिशत कम रहा। तिलहन में यह गिरावट 19 प्रतिशत है जबकि कपास में 16 प्रतिशत।</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?ModuleId=3&amp;NoteId=154892&amp;id=154892&amp;utm_source=chatgpt.com&amp;reg=48&amp;lang=2">दक्षिणपश्चिमी मानसून</a> का आगमन सामान्यत: 1 जुलाई को हो जाता है। इस साल यह 4 जुलाई को केरल <a href="https://internal.imd.gov.in/press_release/20260604_pr_5049.pdf">पहुँचा</a>। यह भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण वर्षा का मौसम पैदा करता है। यह भारत की कुल सालाना वर्षाजल का क़रीब 75 प्रतिशत लेकर आता है। दक्षिणपश्चिमी मानसून इस साल देरी से भी पहुँचा है और इसकी बारिश का स्तर भी सामान्य स्तर से कम है। कुल वर्षा का <a href="https://internal.imd.gov.in/press_release/20260618_pr_5084.pdf">स्तर</a> 1 से 17 जून के बीच अपने दीर्घकालिक औसत स्तर से 38 प्रतिशत कम रहा। सबसे ज़्यादा प्रभावित मध्य भारत और पूर्वी एवं उत्तरपूर्वी भारत के क्षेत्र हैं। जुलाई माह में भी औसत से कम बारिश का <a href="https://internal.imd.gov.in/press_release/20260630_pr_5107.pdf">अनुमान</a> है।</p>
<p style="text-align: justify;">विलंबित मानसून फ़सलों की उपज को कम करता है। फ़सलों की उपज में गिरावट चिंताजनक है।  भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। कुल सालाना वैश्विक विश्व निर्यात का तक़रीबन 40 प्रतिशत <a href="https://www.cybex.in/blogs/indian-rice-exports-guide-for-exporters-how-it-is-building-its-dominance?__cf_chl_f_tk=KPepgU_KKYbi2n3zBVQqLlReZWJ7q170u9YiVHMypPw-1783081260-1.0.1.1-Busm3DYeJ2jCE7KFnYTHzZThazx0TBVLbg69MWMU6S0">हिस्सा</a> भारत करता है। इससे भारत की निर्यात से अर्जित राशि में कमी आ सकती है। भारत अपनी घरेलू <a href="https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2200287&amp;reg=3&amp;lang=1">खाद्य तेल</a> की ज़रूरत का आधे से ज़्यादा हिस्सा आयात से पूरा करता है। तिलहन उत्पादन में कमी से खाद्य तेल की आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। बढ़े आयात और घटे निर्यात की वजह से भारत का कृषीय व्यापार संतुलन बिगड़ेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">2023-24 के हालिया मौजूद भूमि उपयोग आँकड़ों के अनुसार भारत में क़रीब साठ प्रतिशत खेती की ज़मीन पर ही सिंचाई सुविधा मौजूद थी। क़रीब 40 प्रतिशत खेती की ज़मीन सिंचाई के लिए मानसून-निर्भर है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में 90 प्रतिशत खेतों तक सिंचाई के साधन मौजूद हैं। लेकिन अन्य राज्यों में खेती की ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर मानसून के भरोसे ख़रीफ़ की खेती होती है। पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों में आधे से भी ज्यादा खेतों का रकबा मानसून निर्भर है। इन राज्यों की ख़रीफ़ की पैदावार पर कमज़ोर मानसून का विषम प्रभाव पड़ने वाला है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के क़रीब 70 प्रतिशत किसान 1 हेक्टेयर से कम जोतों पर <a href="http://../../../../../../Downloads/Changes%20in%20Indian%20Agriculture%20Recent%20Household-level%20Evidences.pdf">खेती करते</a> हैं। ये मुख्यत: अपने परिवार के भोजन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए फ़सलें उगाते हैं। कम पैदावार उनकी खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी। इनको अपनी खाने की आवश्यकता पूरी करने के लिए बाज़ार से अनाज ख़रीदने को विवश होना पड़ेगा। फ़सलों की कम पैदावार सामान्यत: उनकी स्थानीय क़ीमतों में भी उछाल लाती है। छोटे किसान पर इसकी दोहरी मार पड़ेगी। पैदावार में गिरावट की वजह से किसानों की आय पर भी प्रभाव पड़ेगा, जो ग्रामीण माँग को शिथिल करेगा। यह पहले से ही निम्न स्तर की माँग से संघर्ष कर रहे देश के लिए किंचित भी अच्छी ख़बर नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">मौसम विभाग का अनुमान है कि वर्तमान में एल-नीनो की क्षीण परिस्थितियाँ मौजूद हैं और मानसून के आगामी हिस्से में उनके प्रबल होने की आशंका है। यह भारत के किसानों की मुश्किलों को और गंभीर बना सकता है। विलंबित मानसून और औसत से कम वर्षा की ख़बर तब आ रही है जब किसान पहले से ही ईरान और अमेरिका तथा इज़रायल के बीच जारी युद्ध के परिणामों को झेल रहे थे। तेल के दामों में वृद्धि की वजह से किसानों की लागत बढ़ रही थी। रही-सही कसर रासायनिक खाद के संकट ने पूरी कर दी।</p>
<div id="attachment_149718" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-149718" class="size-full wp-image-149718" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971.jpg" alt="" width="4200" height="4200" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971.jpg 4200w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-300x300.jpg 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-1024x1024.jpg 1024w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-150x150.jpg 150w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-768x768.jpg 768w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-1536x1536.jpg 1536w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/4._My_Native_Land_II_low_res_1738304482971-2048x2048.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 4200px) 100vw, 4200px"><p id="caption-attachment-149718" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-size: 15pt;"><em>यमुना बाढ़-11</em>, अतुल भल्ला</span></small></p></div>
<p style="text-align: justify;">भारत रासायनिक खादों तथा उनके उत्पादन के लिए आवश्यक अवयवों के लिए मुख्यत: आयात पर निर्भर है। यूरिया के उत्पादन में लगने वाले प्राकृतिक गैस का 78 प्रतिशत हिस्सा <a href="https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/187/AS482_Eh31SM.pdf?source=pqals">आयात</a> किया जाता है। इसी तरह रॉक फ़ॉस्फ़ेट, सल्फ़र, अमोनिया, फ़ॉस्फ़ोरिक एसिड, तथा पोटाश के म्युरिएट का आधा से ज़्यादा हिस्सा भी आयात ही किया जाता है। प्राकृतिक गैस का तक़रीबन <a href="https://www.theguardian.com/world/2026/apr/04/india-fuel-crisis-fertiliser-shortage-farming">दो-तिहाई भाग</a> खाड़ी के देशों से होर्मुज़ की खाड़ी से होकर आता है। रासायनिक खादों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा भी उसी रास्ते आता है। रूस-युक्रेन युद्ध, और उसके बाद ईरान और अमेरिका तथा इज़रायल ने भारत के रासायनिक खाद सेक्टर को डांवाडोल कर रखा है।</p>
<p style="text-align: justify;">होर्मुज़ की खाड़ी की घेराबंदी से भारत के किसान पहले ही खाद की किल्लत और उनकी बढ़ती क़ीमतों को लेकर आशंकित थे। कालाबाज़ारी और ज़माखोरी जैसी समस्याओं से किसान और त्रस्त हो गए हैं। ग़ौरतलब है कि रासायनिक खाद की समस्या पूरी तरह सरकारी नीतियों की देन है। सरकार-दर-सरकार ने, फ़्री-मार्केट के नवउदारवादी सिद्धांत का हवाला देते हुए, रासायनिक खाद के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से आयात पर निर्भरता को बढ़ावा दिया। आज हालत है कि भारत अपनी खेती के लिए आवश्यक खाद के लिए पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार पर निर्भर है, क्योंकि घरेलू उत्पादन क्षमता नाकाफ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में होने वाली एक छोटी सी हलचल भी भारत के किसानों के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा कर देती है और भारत की खाद्य सुरक्षा को ख़तरे में डाल देती है।</p>
<p style="text-align: justify;">ज़ाहिर है, विलंबित और अपर्याप्त मानसून और पहले से मौजूद बढ़ती लागत और खाद के संकट ने मिलकर कृषि क्षेत्र के सामने भारी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। अगर इनसे निपटने के लिए त्वरित क़दम नहीं उठाए गए तो करोड़ों किसानों के लिए कई तरह की चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं। आशंका यह है कि ग्रामीण मज़दूरी में गिरावट आ सकती है। कुल ग्रामीण माँग में गिरावट से अर्थव्यवस्था के बढ़ने की रफ़्तार पर भी ब्रेक लग सकता है। सरकार को एमएसपी के दामों को समुचित स्तर पर तय करके ज़्यादा से ज़्यादा किसानों को इसके दायरे में लाना चाहिए, ख़ासकर उन राज्यों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जहाँ एमएसपी की ख़रीद बेहद कम अथवा नगण्य है।</p>
<p style="text-align: justify;">मनरेगा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमज़ोर पड़ती माँग को सहारा देने का एक कारगर उपाय माना जाता है। मनरेगा के तहत मिलने वाले काम के दिनों और मज़दूरी को बढ़ाकर खेती और मज़दूरी से घटी आय को कुछ हद तक काबू किया जा सकता है। रासायनिक खाद की समस्या के लिए आत्मनिर्भरता ही एक उपाय है। निजी क्षेत्र और बाज़ार की निरंकुशता के भरोसे छोड़े जाने का नतीजा आज देखने को मिल रहा है। सरकार को रासायनिक खाद के उत्पादन में यथासंभव आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए ख़ुद निवेश करके घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की पहल करनी चाहिए। सरकार जब तक प्रभावी नीतियों की बजाय प्रभावहीन जुगाड़ों का सहारा लेती रहेगी,ये समस्याएँ गहराती जाएँगी।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ग्रामीण ग़रीबी से शहरी बेबसी तक</title>
		<link>https://thetricontinental.org/hi/asia/grameen-gareebi-se-shahri-bebasi-tak/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[उमेश यादव]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 18:40:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नोएडा के मज़दूर प्रायः बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के गाँवों के भूमिहीन परिवारों से आते हैं। इनमें से ज़्यादातर ने कम उम्र में ही मज़दूरी शुरू की।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4 style="text-align:center;">नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया के मज़दूरों की सर्वे रिपोर्ट-2</h4>
<p style="text-align: justify;"><a href="https://thetricontinental.org/asia/noida-mazdoor-survey/"><u>नोएडा इंडस्ट्रियल एरिया के मज़दूरों की सर्वे रिपोर्ट</u></a>: भाग 1 ने गारमेंट कारख़ानों में काम कर रहे प्रवासी मज़दूरों के हालात पर प्रकाश डाला। ये मज़दूर—मुख्यत: नौजवान पुरुष—उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से काम की तलाश में यहाँ आते हैं। उनको मालूम है कि यह शहर उनकी श्रम शक्ति को निचोड़कर उन्हें बदले में मुश्किल से ज़िंदा रहने लायक मेहनताना भी नहीं देगा। नतीजतन, वो अमानवीय हालात में यहाँ जैसे-तैसे अपने दिन काटते हैं। उनकी मज़दूरी उनको अपना परिवार साथ में रख पाने और उनका ख़र्च उठा पाने की इजाज़त नहीं देती। किराये के साझा कमरों में रहने वाले इन मज़दूरों के लिए नोएडा कमाई का एक अस्थाई ठिकाना मात्र है।</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल यह उठता है कि जिन जगहों से ये मज़दूर आ रहे हैं, वहाँ किस तरह का आर्थिक संकट है, जिससे बचने के लिए उनको यहाँ के अमानवीय हालात में रहकर काम करने को मज़बूर होना पड़ रहा है? इसके जवाब का रास्ता भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए बदलावों और उनसे जनित खेती की समस्याओं के विश्लेषण से होकर जाता है। यह भूमि के स्वामित्व में मौजूद असमानता, गैर-कृषीय सेक्टरों में उचित रोज़गार सृजन के अभाव जैसे मुद्दों से जुड़ा हुआ है। शहर में अति निम्न वेतन पर काम करने को विवश मज़दूर अपने मूल निवास में व्याप्त एक दीर्घकालिक आर्थिक संकट तथा बेरोज़गारी के भीषण प्रकोप के लक्षण मात्र हैं। इस समस्या की जड़ें ग्रामीण भारत में मौजूद हैं।</p>
<h2 style="margin:3em 0;"><strong>बेरोज़गारी से त्रस्त ग्रामीण भारत </strong></h2>
<p style="text-align: justify;">भारत में पिछले कई दशकों से खेतों के कुल रकबे में कोई वृद्धि नहीं हुई है। खेती का कुल रकबा 1980 के दशक के बाद से ठहराव की स्थिति में है। जोत का औसत आकार भी लगातार घट रहा है। कृषि जनगणना के अनुसार <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/ac/airac2000-01-compressed.pdf"><u>1980-81</u></a> में जहाँ एक औसत जोत का रकबा 1.84 हेक्टेयर था, वहीं, <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/agcen1516/ac_1516_report_final-220221.pdf"><u>2015-16</u></a> के हालिया कृषि जनगणना के मुताबिक यह 1.08 हेक्टेयर था। सीमित कृषि योग्य भूमि और बढ़ती जनसंख्या की वजह से न सिर्फ़ औसत जोत का आकार घट रहा है, छोटे और सीमांत किसानों की संख्या भी बढ़ रही है। <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/ac/airac2000-01-compressed.pdf"><u>1980-81</u></a> में करीब 74 प्रतिशत जोतों का रकबा 2 हेक्टेयर से कम था। जबकि <a href="https://agcensus.da.gov.in/document/agcen1516/ac_1516_report_final-220221.pdf"><u>2015-16</u></a> में करीब 86 प्रतिशत जोतों का रकबा 2 हेक्टेयर से कम था। कृषि भूमि का वितरण भी बेहद असमान है। 2015-16 में 2 हेक्टेयर से कम जोतों की कुल राष्ट्रीय जोतों के क्षेत्रफल में हिस्सेदारी मात्र 47 प्रतिशत थी। विषम असमानता वाली भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटी होती जोत और सीमांत तथा छोटे किसानों की बढ़ती प्रधानता से प्रति हेक्टेयर खेत पर निर्भर लोगों की संख्या बढ़ी है। इसके साथ ही साथ, फ़सलों को उगाने के लिए आवश्यक श्रम में तेज़ गिरावट आई है। नीचे दी गई तालिका 2000-01 और 2021-22 के बीच धान और गेहूँ में प्रयुक्त प्रति हेक्टेयर श्रम में प्रतिशत गिरावट को दर्शाती है। यह तालिका धान तथा गेहूँ दोनों उगाने वाले उत्तर भारत के चुनिंदा राज्यों के आंकड़ों को दिखाती है, लेकिन लगभग हर राज्य में फ़सलों में प्रयुक्त श्रम में गिरावट एक सार्वभौमिक तथ्य है। मुख्यत: धान तथा अन्य फ़सलों की खेती करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों में भी यही पैटर्न देखने को मिलता है। तमिलनाडु में धान की खेती में श्रम की मात्रा में 65 प्रतिशत, कर्नाटक तथा केरल में 56 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है।</p>
<p style="text-align: center;"><em><strong>तालिका</strong></em><em>: </em><em>धान तथा गेहूँ की प्रति हेक्टेयर फ़सल में प्रयुक्त श्रम की मात्रा में </em><em>2000-01 </em><em>की तुलना में </em><em>2021-22 </em><em>में आई प्रतिशत गिरावट</em></p>
<p style="text-align: justify;"><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-149646" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part2_labour_use_decline_table.png" alt="" width="450" height="279" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part2_labour_use_decline_table.png 743w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/part2_labour_use_decline_table-300x186.png 300w" sizes="auto, (max-width: 450px) 100vw, 450px"></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><em><strong>आंकड़ों का स्रोत</strong></em>: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ‘प्लॉट लेवल कॉस्ट ऑफ़ कल्टिवेशन’ के यूनिट लेवल आंकड़ो से लेखक की गणना।</span></p>
<p style="text-align: justify;">बेहतर होती तकनीक तथा खेती करने के उन्नत तरीक़ों के अनुपालन की वजह से यह बदलाव अपने आप में खेती की बढ़ती उत्पादकता का परिचायक होता है। लेकिन, जब इस तथ्य को कृषीय अर्थव्यवस्था के अन्य संरचनात्मक पहलुओं के साथ जोड़कर देखा जाए तब समस्या का जटिल रूप प्रकट होना शुरू होता है। औसत जोत का आकार लगातार घट रहा है; फ़सलों में लगने वाले श्रम की मात्रा भी तेज़ी से घट रही है; जबकि खेती से गुज़र-बसर करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेती में संलग्न लोगों की संख्या जहाँ <a href="https://www.indiabudget.gov.in/budget_archive/es2001-02/chapt2002/chap103.pdf"><u>1983</u></a> में करीब 21 करोड़ थी, वहीं <a href="https://www.outlookbusiness.com/economy-and-policy/economist-santosh-mehrotra-on-the-jobs-crisis-that-could-keep-india-poor"><u>2023-24</u></a> मे यह संख्या 28 करोड़ तक पहुँच गई। चिंता की बात तो यह है कि हाल के वर्षों में खेती में संलग्न लोगों का प्रतिशत बढ़ता गया है। 2024-25 में सकल मूल्य संवर्धन में मात्र 14 प्रतिशत का योगदान देने वाले कृषि सेक्टर में वर्कफ़ोर्स का 46 प्रतिशत हिस्सा काम कर रहा था। आवश्यकता ना होने के बावजूद खेतों में काम करना वास्तव में अर्थपूर्ण काम करना नहीं है। यह गाँवों में गैर-कृषीय रोज़गार की भारी कमी को ढकने का तकनीकी प्रयास मात्र है। कृषि में वर्कफ़ोर्स का एक बड़े हिस्से का संलग्न होना बेरोज़गारी के गंभीर स्तर का एक अप्रत्यक्ष संकेतक है।</p>
<p style="text-align: justify;">छोटी जोतों और कम होती आवश्यक श्रम की मात्रा एक और तबक़े को सीधे तौर पर प्रभावित करती है—भूमिहीन ग्रामीण परिवार। खेत में काम कम होने से इनकी जीविका गंभीर रूप से प्रभावित होती है। भूमिहीनता की वजह से इनको खेत में काम न मिलने की स्थिति में खाने के लाले पड़ जाते हैं। ग्रामीण भारत में तकरीबन <a href="https://cpim.org/agrarian-change-in-india-understanding-the-continuities-and-shifts/"><u>41 </u>प्रतिशत</a> परिवार 2018-19 में भूमिहीन थे। हक़ीक़त यह है कि रोज़गार के बेहतर अवसरों का भारी अभाव है। इन लोगों को मैन्युफ़ैक्चरिंग और सर्विस सेक्टरों में रोज़गार नहीं मिल पा रहा है। इस वजह से रोज़गार की तलाश में पलायन करने का दबाव सबसे ज़्यादा भूमिहीन परिवारों पर ही होता है।</p>
<div id="attachment_149662" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" aria-describedby="caption-attachment-149662" class="wp-image-149662 size-full" src="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_.webp" alt="" width="800" height="600" srcset="https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_.webp 800w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_-300x225.webp 300w, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2026/07/d7hftxdivxxvm.cloudfront.net_-768x576.webp 768w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px"><p id="caption-attachment-149662" class="wp-caption-text" style="text-align:center;"><small><span style="font-size: 14pt;">बीरेंद्र यादव, <em>Matter of Material X</em>, 2019</span></small></p></div>
<h2 style="margin:3em 0;"><strong>प्रवास के अलावा कोई चारा नहीं </strong></h2>
<p style="text-align: justify;">खेती के पास काम देने की सीमित क्षमता होती है। बढ़ती आबादी के साथ अगर ग़ैर-कृषीय क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में रोज़गार का सृजन अपरिहार्य हो जाता है। लेकिन भारत में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर नवउदारवादी दौर में न तो सकल मूल्य संवर्धन में अपना हिस्सा बढ़ा पा रहा है और न ही समुचित रोज़गार प्रदान कर पा रहा है। सर्विस सेक्टर सकल मूल्य संवर्धन का सबसे बड़ा भागीदार होने के बावजूद बेहद कम रोज़गार दे पा रहा है। भारत में नवउदारवादी दौर की इन संरचनात्मक कमज़ोरियो की विस्तृत चर्चा हमारे डोसियर <a href="https://thetricontinental.org/hi/bharteey-arthvyavastha-me-uthal-puthal-ka-daur/"><u><em>भारतीय अर्थव्यवस्था में उथल</em></u></a><a href="https://thetricontinental.org/hi/bharteey-arthvyavastha-me-uthal-puthal-ka-daur/"><em><u>–</u></em><em>पुथल का दौर</em></a> को पढ़ें।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण भारत में रोज़गार का यह गंभीर अभाव ही विपदाग्रस्त प्रवास को जन्म देता है। मुख्यत: भूमिहीन परिवार, और छोटे तथा सीमांत किसान परिवारों के लोग स्थानीय अवसरों के अभाव में शहरों की ओर पलायन करते हैं। सर्वे में शामिल मज़दूरों में से 42 प्रतिशत ने मज़बूरी में 18 वर्ष की आयु से पहले ही मज़दूरी करना शुरू कर दिया था। जबकि क़रीब 7 प्रतिशत ने 14 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पहले ही। मात्र 12 प्रतिशत मज़दूरों ने 24 साल के बाद काम करना शुरू किया था। किशोरावस्था में काम करना मज़बूरी में काम करने की विवशता का संकेत होता है। न सिर्फ़ यह बच्चों का बचपना छीनता है, बल्कि उच्च शिक्षा जैसे अवसरों से भी उनको दूर करता है, जिसकी वजह से उनको भविष्य में आजीविका तथा ज़िंदगी के अन्य बेहतर अवसरों से वंचित होना पड़ता है। कृषि क्षेत्र के संकट का प्रभाव सब पर एक समान नहीं होता है। ग्रामीण समाज की असमानता और विपदाग्रस्त प्रवास में गहरा संबंध होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे सर्वे में शामिल मज़दूरों में 76 प्रतिशत के पास उनके गाँव में खेती की भूमि नहीं थी। उनके परिवार भूमिहीन थे। इस सर्वे में मुख्य रूप से भूमिहीन, सीमांत तथा लघु जोतों के सदस्य ही विपदाग्रस्त प्रवासी निकले। बड़ी जोतों वाले मज़दूर नगण्य थे। ग्रामीण भारत में रोज़गार का पैटर्न जहाँ खेती-प्रधान होता जा रहा है, वहीं परिवारों की आय का वितरण अधिकाधिक रूप से मज़दूरी प्रधान। एक औसत ग्रामीन परिवार की मासिक आय में मज़दूरी का हिस्सा 2013 में 33 प्रतिशत था, जो 2019 में बढ़कर 41 प्रतिशत हो गया। वहीं मासिक आय में खेती से होने वाली आय का हिस्सा इस दौरान 50 से घटकर 38 प्रतिशत हो गया। सीमांत और लघु जोत वाले किसानों के मामले में ग़ैर-कृषि मज़दूरी का हिस्सा इससे भी ज़्यादा मात्रा में बढ़ा है और खेती से प्राप्त आय का हिस्सा अधिक मात्रा में गिरा है। खेती से होने वाली आय की गिरावट को खेती में बढ़ती संलग्नता के आलोक में देखने पर खेती एक अतिनिम्न उत्पादकता वाला क्षेत्र बनता जा रहा है। जीविकोपार्जन हेतु यह नाकाफ़ी है जिस वजह से ग्रामीण परिवार ग़ैर-कृषीय गतिविधियों में रोज़गार पाने को बेताब हैं। जीविकोपार्जन का यह संकट लोगों को रोज़गार की तलाश में दूर-दराज़ इलाक़ों में भटकने को विविश कर रहा है। यही कारण है कि किशोर तथा युवा दो पैसे कमाने के लिए इस शहरों में आते हैं तथा बेहद कम मज़दूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">14 प्रतिशत मज़दूर अनपढ़ थे, जबकि 46 प्रतिशत ने पाँचवी कक्षा या उससे कम पढ़ाई की हुई थी। 10 प्रतिशत के पास स्नातक की डिग्री थी। भूमिहीनता न सिर्फ़ गाँव में बाशिंदों की आर्थिक नियति तय करती दिखती है, बल्कि शिक्षा के स्तर और प्रवास के स्वरूप की भी निर्धारक जान पड़ती है। भूमिहीनता की वजह से ग़रीबी की आशंका ज्यादा हो जाती है, इससे बच्चों को समय से पहले पढ़ाई त्यागकर काम पर लगना पड़ता है। इस कारण उनको अपनी ग़रीबी दूर करने लायक रोज़गार प्राप्त करने के लिए ज़रूरी शिक्षा नहीं मिलती, और ग़रीबी का यह चक्र निर्बाध चलता रहता है। इस चक्र का यदा-कदा टूटना अपवाद ही होता है। वर्तमान पीढ़ी पिछली पीढ़ी की आर्थिक विपन्नता को शहरों में नए रूपों में जीने को मज़बूर होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">नोएडा जैसे इंडस्ट्रियल क्षेत्रों, तथा शहरों में लगभग हर तरह के निम्न मेहनताना वाले श्रम की आपूर्ति करने वाले गाँव के प्रवासी मज़दूर ग्रामीण भारत में विद्यमान असमान भूमि वितरण, खेती में व्याप्त संकट एवं रोज़गार के अभाव के मारे हैं। उनका विपदाग्रस्त प्रवास ग्रामीण भारत में कायम भीषण आर्थिक संकट का द्योतक है। यह प्रवास भुखमरी से बचने के लिए ग्रामीण ग़रीबी से शहरी बेबसी की ओर एक यात्रा मात्र है।</p>
<hr style="border:none; border-top:1px solid #999; margin:32px 0 24px;" /><table style="border:none;"><tbody><tr><td style="vertical-align: middle; border:none;"><p><strong>उमेश यादव</strong></p></td></tr></tbody></table>]]></content:encoded>
					
		
		
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