कोलंबो से काठमांडू तक, हाशिए के जिस वर्ग को ‘बेकार’ समझ लिया गया था, उसने सरकारें गिराना तो सीख लिया है—परंतु सत्ता सेना, तकनीकविदों और दक्षिणपंथियों के हाथ में चली जाती है। क्यों?”
पंद्रह एशियाई देशों के प्रतिनिधियों ने कोलंबो में आयोजित एक सम्मेलन में विदेशी सैन्य अड्डों, कर्ज की गुलामी, तख्तापलट की कोशिशों, वैचारिक नियंत्रण के अंत का आह्वान किया।
1979 में यूएस के आख़िरी सिपाही के ताइवान से चले जाने के बावजूद इस पर वॉशिंगटन की पकड़ ढीली नहीं हुई — बस नियंत्रण की सूरत बदल गई, बैरकों और जंगी जहाज़ों की बजाए शिक्षा…
फ़ारस की खाड़ी की राजशाहियों को हिफ़ाज़त के नाम पर बेचे गए विदेशी सैन्य अड्डों ने उन्हें एक अनचाही जंग में खींच लिया और जवाबी हमलों में उनकी सरज़मीन पहला निशाना बनी।
दशकों के सांगठनिक कार्य ने एक बँटे हुए समाज को सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सहकारी संस्थाओं और काडर-निर्माण के ज़रिए बदला है। यह इस बात का प्रतीक है कि कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी हार के बावजूद…
पूरे एशिया से महिला बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं ने मिलकर एक सच्चाई उजागर की: इस महाद्वीप में फैले यूएस सैन्य अड्डे अपने मेज़बान देशों की रक्षा नहीं करते — वे युद्ध लाते हैं, ज़मीन में ज़हर…
ओकिनावा के किसानों से लेकर फ़िलीपींस के ‘मैग्निफिसेंट 12’ तक — एशिया के लोगों ने यूएस सैन्यवाद का सामना पहले भी किया है। विरोध की यह परम्परा आज और भी ज़रूरी हो उठी है, क्योंकि…