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लॉन्ग मार्च, नब्बे साल बाद: संप्रभुता और दोहरी सत्ता

बीसवाँ एशिया न्यूज़लेटर (2026)

1949 में क्रांति की जीत से बहुत पहले चीनी कम्युनिस्टों ने रुइजिन में चीनी सोवियत गणराज्य की स्थापना की थी, जिसके अनुभव से वैश्विक दक्षिण अहम सबक़ ले सकता है।

शेन याओयी (चीन), लुडिंग पुल पर लाल सेना की विजय, चित्र-श्रृंखला द रेड़ रिबन ऑन द अर्थ, 1993

प्रिय साथियो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया डेस्क की ओर से अभिवादन।

नब्बे साल पहले, इसी महीने, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का लॉन्ग मार्च समाप्त हुआ था। 22 अक्टूबर 1936 को, गांसू प्रांत और शान्शी प्रांत की सीमा से लगे पठारी इलाके में ह्विनिंग और च्यांगथाइबाओ ज़िलों में लाल सेना की पहली, दूसरी और चौथी अग्रिम टुकड़ियाँ एकत्र हुईं। सेना के आख़िरी दस्ते भी वहाँ पहुँच चुके थे। दो साल तक लड़ते और पैदल चलते हुए—नौ हज़ार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करके, अठारह पर्वत शृंखलाओं और चौबीस नदियों को पार करके, लाखों दुश्मन सैनिकों के हवाई हमलों से बचते हुए—चीनी क्रांति येनान पहुँची। कम्युनिस्ट दक्षिणी च्यांग्शी से चल कर उत्तरी शान्शी पहुँचे थे। फिर दस हज़ार की आबादी वाला शान्सी प्रांत प्रतिरोध का नया केंद्र बन गया।

इस उत्तरी प्रांत में सिर्फ़ एक सेना नहीं पहुँची थी। 1934 में, केंद्रीय सोवियत क्षेत्र से निकले 86,000 लोगों में से सिर्फ़ 8,000 के क़रीब लोग ही यात्रा के आख़िर तक पहुँच पाए थे। अमेरिकी पत्रकार एडगर स्नो ने अपनी किताब रेड स्टार ओवर चाइना में इसे ‘आधुनिक समय की एक बेमिसाल महायात्रा’ कहा था। इतने बड़े नुक़सान के बाद भी, लॉन्ग मार्च के अंतिम पड़ाव तक पहुँचे कम्युनिस्ट अपने साथ एक ऐसा अनुभव लाए थे जिसे कोई घेराबंदी नष्ट नहीं कर पाई थी: 1931 में, च्यांग्शी प्रांत के रुइजिन ज़िले में चीनी सोवियत गणराज्य स्थापित करने का अनुभव। यानी वे सत्ता हासिल करने से पहले सत्ता का निर्माण करना (और ज़मीन से एक राज्य खड़ा करना) जानते थे।

यांग यानपिंग (चीन), लॉन्ग मार्च के रास्ते में लगातार संघर्ष करते हुए, 1977

कुआँ खोदने वालों को भूल न जाना

बीजिंग में सत्ता में आने से बहुत पहले चीन के कम्युनिस्टों ने ग्रामीण इलाक़ों में शासन चलाना सीखा था। नवंबर 1931 में, क्रांतिकारी आधार क्षेत्रों, लाल सेना की इकाइयों, और मज़दूर-किसान संगठनों के 610 प्रतिनिधि रुइजिन के येपिंग अंचल में इकट्ठा हुए और उन्होंने चीनी सोवियत गणराज्य की स्थापना की। यह राष्ट्रीय स्तर पर चीन की पहली मज़दूर-किसान लोकतांत्रिक सरकार थी। इसके प्रारूप संविधान के तहत गणराज्य की सत्ता मज़दूरों, किसानों और लाल सेना के सैनिकों के हाथों में रखी गई। सोलह साल की उम्र से ऊपर के सभी स्त्री-पुरुषों को मतदान का संवैधानिक अधिकार दिया गया। भूमि, श्रम और विवाह से जुड़े ऐसे क़ानून बनाए गए, जिनसे ग्रामीण जीवन के बुनियादी सवाल सार्वजनिक अधिकार के सवाल बन गए: ज़मीन पर खेती कौन करेगा?, क्या एक महिला अपना जीवनसाथी ख़ुद चुन सकती है?, क्या ग़रीब परिवार का बच्चा स्कूल जा सकता है?, आदि।

यह गणराज्य दोहरी सत्ता का उदाहरण था, क्योंकि रूढ़िवादी ताक़तों द्वारा शासित क्षेत्र के एक हिस्से में यह वैकल्पिक राज्य स्थापित किया गया था, जिसकी अपनी सेना, क़ानून व्यवस्था और मुद्रा थी। स्थापना के कुछ महीनों के भीतर, फरवरी 1932, में गणराज्य का राष्ट्रीय बैंक शुरू हो गया। पाँच कर्मचारियों वाले इस बैंक में, गणराज्य की अपनी मुद्रा (लेनिन की तस्वीर वाले एक युआन के नोटों) में लेन-देन किया जाता।
कुओमिन्तांग (केएमटी) ने प्रतिबंध लगा कर रुइजिन ज़िले में नमक, दवाइयों और कपड़े की आपूर्ति रोक दी। तब गणराज्य के विदेश व्यापार ब्यूरो ने चावल और टंगस्टन के बदले गुज़र-बसर के लिए ज़रूरी सभी चीज़ों का इंतज़ाम किया। गणराज्य ने एक समाचार एजेंसी भी स्थापित की, जिसने रेड चाइना नाम का अख़बार छापना शुरू किया। साल 1934 तक (यानी गणराज्य की स्थापना के केवल तीन सालों के भीतर) अख़बार की चालीस हज़ार से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी थीं। इसके अलावा, जनवरी 1934 तक पुराने सामुदायिक भवनों में 3,052 ‘लेनिन स्कूल’ खोले जा चुके थे, जहाँ 89,710 बच्चे पढ़ने आते थे- यानी इस आधार क्षेत्र में स्कूल जाने की उम्र वाले सभी बच्चों में से आधे स्कूल जाने लगे थे।

रुइजिन आधार क्षेत्र में स्थापित इस गणराज्य के चुनावों में उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक की जाती थी, और मतदाता किसी भी उम्मीदवार को चुनाव में उतरने से रोक सकते थे। एक क़स्बे में मतदाताओं ने ऐसे उम्मीदवार को हटा दिया, जिसने वहाँ की बहुत सारी ज़मीन अपने नाम कर ली थी। एक अन्य उम्मीदवार को इसलिए हटाया गया क्योंकि वह चंदे में मिले पैसों का हिसाब नहीं दे पाया। इसी तरह के अनुभवों के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण हो रहा था: कि जनता से सीखो, उसके विचारों को राजनीतिक नीति में बदलो, और संगठन तथा कार्रवाई के ज़रिए नई नीति को जनता के बीच ले जाओ। यही प्रशिक्षण (मास लाइन) आगे चलकर क्रांति की पहचान बनी।
शाज़ोउबा क़स्बे में माओ त्से-तुंग अपने घर बाहर कपूर के पेड़ के नीचे बैठकर गाँववालों से उनके जीवन के बारे में बात करते थे। माओ को पता चला कि गाँव के लोग पीने और खाना पकाने का पानी जिन तालाबों से लेते हैं, वहाँ मवेशी नहाते भी हैं। माओ ने पार्टी कार्यकर्ताओं और सैनिकों के साथ मिलकर पानी के संभावित स्रोतों की जाँच की। उन्होंने कुआँ खोदने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए उन्हें स्थानीय अंधविश्वास से जुड़ी आशंकाओं को दूर करना पड़ा और उन्होंने ख़ुद इस काम को शुरू करने की ज़िम्मेदारी ली। वह कुआँ आज भी वहाँ मौजूद है, और उसके पीछे पत्थर पर लिखा है: ‘पानी पीकर, कुआँ खोदने वालों को भूल न जाना’।

लॉन्ग मार्च के दौरान कम्युनिस्टों ने रणनीति के तहत पीछे हटने का फ़ैसला लिया था। उन्हें समझ आ गया था कि वे कुओमिन्तांग (KMT) की पाँचवीं घेराबंदी का अब और मुक़ाबला नहीं कर सकते। लेकिन वे ख़ाली हाथ पीछे नहीं हट रहे थे। वे चीन में गणराज्य चलाने के अपने अनुभव, उसके कानूनों, मुद्रा, स्कूलों और काम करने के तरीक़ों को अपने साथ ले जा रहे थे। जनवरी 1935 में, लॉन्ग मार्च के दौरान ही, ज़ुनयी में हुई बैठक के बाद माओ ने व्यवहार में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व सँभाल लिया।

छियान सोंगयान (चीन), लाल सेना लॉन्ग मार्च की चुनौतियों से नहीं डरती।

सत्ता के तीन रूप

ट्राईकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फ़ॉर सोशल रिसर्च में हम एक आगामी डोज़ियर की तैयारी के सिलसिले में सत्ता के अलग-अलग रूपों पर चर्चा कर रहे हैं। सामाजिक सत्ता:- लोगों की संगठित होकर एक साथ काम करने और समाज में आम समझ बनाने की क्षमता। सरकारी सत्ता:- शासन की संस्थाओं तक पहुँचने और उनका इस्तेमाल करने की क्षमता। व्यवस्थागत सत्ता:- राज्य के वर्गीय चरित्र को बदलने और उत्पादन के साधनों तथा सामाजिक अधिशेष को लोकतांत्रिक नियंत्रण में लाने की क्षमता। इन रूपों के बीच का अंतर समझना ज़रूरी है, क्योंकि चुनाव जीतना क्रांति नहीं है और संस्थाएँ खड़ी किए बिना किसी सामाजिक आंदोलन को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल है।

रुइजिन और येनान के अनुभवों से स्पष्ट हुआ कि सबसे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सत्ता के इन तीनों रूपों को एक साथ, एक ही प्रक्रिया के हिस्से के रूप में विकसित किया जा सकता है। दस हज़ार से अधिक सहकारी समितियों, महिला संगठनों, किसानों को लिखना सिखाने वाले साक्षरता कार्यक्रमों और पार्टी कार्यकर्ताओं को तैयार करने वाली राजनीतिक शिक्षा के ज़रिए सामाजिक सत्ता का निर्माण किया गया। सोवियत कांग्रेसों, संविधान और भूमि, श्रम, वित्त तथा शिक्षा से जुड़े विभागों के ज़रिए सरकारी सत्ता खड़ी की गई। ये संस्थाएँ व्यापक जनता के प्रति जवाबदेह थीं। व्यवस्थागत सत्ता का निर्माण ज़मीन के पुनर्वितरण के ज़रिए हुआ, जिससे ज़मींदारों का भूमि पर मालिकाना हक़ समाप्त हुआ; आठ घंटे के कार्यदिवस और समान वेतन की व्यवस्था लागू हुई; और एक ऐसे बैंक की स्थापना हुई, जिसके ज़रिए वित्तीय व्यवस्था को क्रांतिकारी सत्ता के नियंत्रण में लाया गया।

इन आधार क्षेत्रों में सामाजिक संगठन, सशस्त्र सत्ता, प्रशासन, भूमि सुधार और नई राजनीतिक संस्थाएँ एक साथ विकसित हुईं। यह सब उन इलाक़ों में हो रहा था, जहाँ पुरानी व्यवस्था के साथ संघर्ष जारी था। यही रणनीति के रूप में दोहरी सत्ता है: इसमें सत्ता कोई एक बार हासिल कर लेने वाली चीज़ नहीं, बल्कि इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। इसके तहत हर संस्था को इस कसौटी पर परखा जाता है कि क्या वह आम लोगों की अपने जीवन को आकार देने की क्षमता को बढ़ा पाती है या नहीं।

नब्बे साल बाद वैश्विक दक्षिण को रुइजिन के अनुभव से क्यों सीखना चाहिए?

वैश्विक दक्षिण के ज़्यादातर देशों को जो राज्य व्यवस्था विरासत में मिली है, वह औपनिवेशिक शासन की देन है। उनकी सीमाएँ, कर व्यवस्था और दमनकारी संस्थाएँ इस तरह बनाई गई थीं कि उनसे संसाधन लूटे जा सकें। औपचारिक रूप से आज़ादी मिलने के बाद भी उनकी अर्थव्यवस्थाएँ कच्चे माल, विदेशी पूँजी और कर्ज़ पर निर्भर बनी रहीं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, प्रतिबंधों, अमेरिकी डॉलर और उन कमरों में तय किए जाने वाले व्यापार समझौतों के ज़रिए हर दिन इन देशों की संप्रभुता सीमित की जाती है, जहाँ उनकी भागीदारी नहीं होती।

इसलिए संप्रभुता के लिए संघर्ष एक वास्तविक संघर्ष है और किसी भी बुनियादी बदलाव के कार्यक्रम के लिए ज़रूरी शर्त है। लेकिन संप्रभुता ज़रूरी तो है, पर अपने आप में काफ़ी नहीं। सिर्फ़ राष्ट्रीय झंडा वापस हासिल कर लेने से, अगर उत्पादन के संबंधों में बदलाव नहीं होता, तो हो सकता है कि विदेशी ताक़तों के साथ मिलकर काम करने वाले शासक अभिजात वर्ग की जगह देश का ही एक नया शासक वर्ग ले ले। साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष और वर्ग-संघर्ष को एक ही प्रक्रिया के दो पहलुओं के रूप में देखा जाना चाहिए।

रुइजिन का अनुभव इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह दिखाता है कि घेराबंदी और संकट के बीच भी एक ही आंदोलन के ज़रिए ये दोनों काम किए जा सकते हैं। साथ ही, यह अनुभव हमें सिखाता है कि दूसरों के अनुभवों से सीखना—चाहे वह मॉस्को का अनुभव हो या किसी दूसरे क्रांतिकारी आंदोलन का—उनकी नकल करना नहीं बन जाना चाहिए। 1930 में शुनवू ज़िले का सर्वेक्षण करने के बाद माओ ने लिखा था, ‘जाँच-पड़ताल नहीं, तो बोलने का अधिकार नहीं।’ यह बात किताबों में लिखी बातों को आँख मूँदकर मानने के ख़िलाफ़ थी। साथ ही, इसका मतलब यह भी था कि हर समाज के लोगों को अपनी परिस्थितियों के आधार पर ख़ुद सोचने का अधिकार भी है और इसकी ज़रूरत भी।

झांग रेनयुआन (चीन), लॉन्ग मार्च करती लाल सेना, 1976

क्रांति की जन्मभूमि

चीन में लॉन्ग मार्च की समाप्ति को पीछे हटने के रूप में नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की बुनियाद के रूप में याद किया जाता है। येनान से क्रांति आगे बढ़ी और वह राष्ट्रीय प्रतिरोध का मुख्य केंद्र बना। इसके बाद ही 1 अक्टूबर 1949 को चीन के जनवादी गणराज्य (पीआरसी) की स्थापना का रास्ता खुला। नब्बे साल पहले येनान पहुँचे थके-हारे सैनिकों ने अगले दस-बारह सालों में करोड़ों किसानों को संगठित किया, 12 लाख सदस्यों वाली पार्टी बनाई और दस लाख सैनिकों की सेना खड़ी की, और ऐसी संस्थाओं तथा विचारों को विकसित किया, जिनके आधार पर भविष्य के चीन का शासन चलना था।

इस इतिहास से जुड़ी एक भौतिक ज़िम्मेदारी भी है। पुराने केंद्रीय सोवियत क्षेत्र – जहाँ क्रांति का जन्म हुआ था – में चीन के दूसरे इलाक़ों के मुक़ाबले सड़कें, उद्योग और भरोसेमंद सार्वजनिक सेवाएँ सबसे आख़िर में पहुँचीं। कहा जाता है कि माओ से लेकर चाउ एनलाई तक, पहली पीढ़ी के नेताओं को हमेशा इस बात का अफ़सोस रहा कि क्रांति के बाद वे कभी रुइजिन नहीं लौट पाए। जून 2012 में राज्य परिषद ने इस क्षेत्र के पुनरुत्थान की ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय स्तर पर ली। इसके तहत केंद्र सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों को विशेष ज़िलों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई और कच्ची मिट्टी से बने घरों का नवीनीकरण किया गया।

रुइजिन के येपिंग क्षेत्र के हुआवू गाँव में चीड़ के सत्रह पेड़ उन सत्रह लोगों की याद में खड़े हैं, जो लाल सेना में शामिल होने के लिए गए थे और कभी लौटकर नहीं आए। दशकों तक उनके परिवार इन पेड़ों के सामने ग़रीबी में जीवन बिताते रहे। 2012 की नीति लागू होने के एक दशक के भीतर, गांझोउ प्रान्त में ग़रीब के रूप में दर्ज सभी 19.5 लाख लोग ग़रीबी से बाहर आ चुके थे। इनमें हुआवू गाँव के परिवार भी शामिल थे। आज इस गाँव में हर साल हज़ारों लोग आते हैं, जिनमें अफ़्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के शोधकर्ता भी हैं, जो वैश्विक दक्षिण अकादमिक मंच (जीएसएएफ़) के शोध केंद्र गांनान में आयोजित अध्ययन कार्यक्रमों के तहत यहाँ पहुँचते हैं।

रुइजिन के स्मारक संग्रहालय में एक शिलालेख पर लिखा है, ‘चीन का जनवादी गणराज्य (पीआरसी) यहीं से निकला था।’ पीआरसी यह नहीं भूला है कि उसकी शुरुआत कहाँ से हुई थी।

लॉन्ग मार्च की समाप्ति विश्व इतिहास की ऐसी घटना है, जिसे वैश्विक दक्षिण अपनी सामूहिक स्मृति में सँजोए हुए है: एक बिखरी और थकी हुई सेना उत्तर पहुँची, अपने साथ दोहरी सत्ता का अनुभव लेकर; यह एक नई शुरुआत थी जिससे एक नई दुनिया का निर्माण हुआ।
एक नई दुनिया बनाने की ताक़त संसदों या महलों में नहीं होती। यह ताक़त आम लोगों की उस बढ़ती क्षमता में होती है, जिसके ज़रिए वे अपने कामकाज को दिशा देते हैं, अपने समुदायों का शासन चलाते हैं, नेताओं को जवाबदेह बनाते हैं और अपने साझा भविष्य का फ़ैसला ख़ुद करते हैं। आज जहाँ भी यह क्षमता विकसित हो रही है—गांनान के गाँवों में, एशिया की मज़दूर यूनियनों और सहकारी संस्थाओं में और हर उस आंदोलन में, जो पुरानी व्यवस्था की सीमाओं को मानने से इनकार करता है—वहाँ लॉन्ग मार्च जारी है।

स्नेह सहित,
टिंग्स चाक और ग्रेस काओ

(टिंग्स चाक ट्राईकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फ़ॉर सोशल रिसर्च में एशिया की सह-समन्वयक और वेनहुआ ज़ोंगहेंग की संपादक हैं। ग्रेस काओ वेनहुआ ज़ोंगहेंग की परियोजना प्रबंधक और चीनी-अंग्रेज़ी दुभाषिया हैं।)