ईरान और वह ढाल जो निशाना बन गई
फ़ारस की खाड़ी की राजशाहियों को हिफ़ाज़त के नाम पर बेचे गए विदेशी सैन्य अड्डों ने उन्हें एक अनचाही जंग में खींच लिया और जवाबी हमलों में उनकी सरज़मीन पहला निशाना बनी।
काज़िम चलीपा (ईरान), दश्त (Desert), 1984.
प्रिय साथियो,
मैं इस्फ़हान से लिख रही हूँ। यह ईरान का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और हालिया जंग में दूसरा सबसे ज़्यादा प्रभावित शहर भी। 8 अप्रैल 2026 के युद्धविराम के बाद हम ईरानियों को आख़िरकार सिर पर उड़ते लड़ाकू विमानों और दिन-रात के धमाकों से राहत मिली और अपनों की सलामती की चिंता करने से भी।
ईरान पर हमला फ़ारस की खाड़ी की ख़ानदानी राजशाहियों की मेज़बानी में काम कर रहे अमरीकी सैन्य और क़ब्ज़ा-अड्डों से हुआ। संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, क़तर और सऊदी अरब ने अपना हवाई इलाक़ा और अपनी ज़मीन यूएस युद्ध सामग्री और सैन्य अड्डों के हवाले कर दी। उन्होंने यूएस की तथाकथित रक्षा प्रणालियों पर अरबों डॉलर ख़र्च किए, इस ख़ुशफ़हमी में कि ये उन्हें किसी भी हमले से बचा लेंगी। यूएस का ईरान को दुनिया और ख़ाड़ी देशों के लिए ख़तरा बताकर बाँटो और राज करो का उपाय पूरी तरह सफल रहा। इस उपाय के सहारे उसने इन राजशाहियों को हथियार ख़रीदने और यूएस के साथ सुरक्षा समझौते करने पर राज़ी कर लिया।
यह जंग न सिर्फ़ इस क्षेत्र के बल्कि साम्राज्यवादी ताक़त के तौर पर यूएस के इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुई है। जंग में यह भ्रम चकनाचूर हो चुका है कि यूएस के सैन्य अड्डे मेज़बान देशों के लिए ढाल की तरह काम करते हैं।
मोहम्मद रज़ा ग़ादेरी (ईरान), हर रोज़ आशूरा है और हर सरज़मीन करबला (Every day is Ashura and every land is Karbala), बिना तारीख़.
रक्षा या उकसावा?
कहा जाता रहा कि यूएस सैन्य अड्डों की मेज़बानी करने वाले देश हमलों से संरक्षित रहेंगे। लेकिन असल में फ़ारस की ख़ाड़ी के देश यूएस के ‘संरक्षित साझीदारों’ की बजाए सबसे पहले निशाने बन चुके हैं –– जो किसी भी टकराव में हाई-वैल्यू टार्गेट बने रहेंगे। यह जंग ईरान के ख़िलाफ़ थी, लेकिन इसमें सबके लिए सबक़ हैं। जिस भी मुल्क पर यूएस हमला करता है वह यही तर्क अपनाएगा — उनकी जवाबी कार्रवाई यूएस के सैन्य अड्डों की मेज़बानी करने वाले पड़ोसी देशों पर ही होगी। यह तथाकथित संरक्षण टार्गेट बनने की स्वीकृति है। यूएस अड्डे टकराव को टालते नहीं निमंत्रित करते हैं। ख़ाड़ी देशों को वॉशिंगटन के सैन्य ढाँचे में जकड़कर इन सैन्य अड्डों ने कूटनीतिक गुंजाइश को सीमित किया है, जवाबी कार्रवाइयों को बढ़ावा दिया है, और नागरिक ढाँचे को संभावित नुक़सान के दायरे में ला पटका है। सुरक्षा गारंटियों, तेज़ प्रतिक्रिया, निवारण/प्रतिरोध जैसे हिफ़ाज़त के वादे दरसल आपको एक निशाने बना देते हैं।
ये स्थाई सैन्य अड्डे स्पष्ट निशाना बन जाती हैं — ख़ासकर ईरान के सैन्य सिद्धांत को देखते हुए, जो लड़ाकू विमानों की जगह मिसाइलों और ड्रोनों पर टिका है। ईरान ने ऐसे हज़ारों ड्रोन बनाए हैं और बनाना जारी रख सकता है, जो सस्ते, तैनात करने में आसान, तथा सुरक्षा प्रणालियों को चकमा देकर निकल जाने में सक्षम हैं। मेज़बान देश अपनी स्वायत्तता और संप्रभुता खो बैठे। यूएस अड्डों की मेज़बानी करके वे उसके उकसावे के फ़ैसलों से बंधे थे। इस जंग में हिस्सा लेना या न लेना उनके हाथ में नहीं था; अड्डों की मेज़बानी करके वे पहले ही अपना पक्ष तय कर चुके थे।
ख़ाड़ी देशों में यूएस के सैन्य अड्डों का घना जाल है: जैसे क़तर में अल-उदैद हवाई अड्डा, बहरीन की नौसैनिक सहायता सुविधा में अमरीकी पाँचवें बेड़े का मुख्यालय, तथा कुवैत, अमीरात, सऊदी अरब में अलग इन्स्टालेशन। इन अड्डों को ईरान के ख़िलाफ़ निवारक बताया जाता है, लेकिन इनकी भौगोलिक जगह ऐसी है कि मेज़बान देशों के सामाजिक समुदाय जवाबी हमले में पहला निशाना बनने वाली संपत्तियों, जैसे कमांड सेंटर, रनवे, बंदरगाहों, रडार प्रणालियों व ईंधन भंडारों, के आस-पास स्थित हैं। और ये तथाकथित सहयोगी , जो ईरानी नागरिकों की हत्या में भागीदार हैं, फिर तर्कसंगत निशाने बन जाते हैं। मेज़बान मुल्क सिर्फ़ सुरक्षा कवच की मेज़बानी नहीं करता; वह निशानों की मेज़बानी भी करता है।
अक्टूबर 2023 से यूएस सैन्य अड्डों पर 170 से ज़्यादा हमले हो चुके हैं। यूएस को जो असल नुक़सान हुआ है वह उनके द्वारा शुरू में माने गए नुक़सान से कहीं ज़्यादा है। यूएस अधिकारियों ने निजी तौर पर कुल नुक़सान 50 अरब डॉलर के क़रीब आँका है, लेकिन पेंटागन के सार्वजनिक आँकड़े इसका लगभग आधा नुक़सान बताते हैं। इन सूचनाओं को लेकर सेंसरशिप कड़ी रही है। पश्चिमी नागरिकों सहित अनेकों लोगों को अमीरात, कुवैत व दूसरी जगहों पर ईरान के जवाबी हमले के बाद की तस्वीरें खींचने पर गिरफ़्तार किया गया। यह कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं: विदेशी अड्डे जाल की ही तरह काम करते हैं। क़तर का अल-उदैद, बहरीन में पाँचवें बेड़े का मुख्यालय, और सऊदी अरब का प्रिंस सुल्तान एयर बेस ख़ासतौर पर जवाबी हमले का निशाना बने। जिन रडार प्रणालियों को यूएस अजेय बताता रहा, वे इन ख़ानदानी राजशाहियों के नुक़सान का ज़रिया बन गईं।
चैथम हाउस की एक रिपोर्ट इस दोषपूर्ण सौदे को उजागर करती है: फारस की खाड़ी की सरकारें अपनी संप्रभुता और खुलकर फैसले लेने की आज़ादी को उस सुरक्षा कवच के लिए दांव पर लगा रही हैं, जिसे छोटे या गैर-बराबर हमले (asymmetric threats) आसानी से बाईपास कर जाते हैं। जब ईरानी ड्रोनों और मिसाइलों ने उस ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया, तो यूएस खुद को ही मुश्किल से बचा पाया, मेज़बान देशों की रक्षा करना तो बहुत दूर था। इन खाड़ी देशों की यही सबसे बड़ी शिकायत रही है कि अमेरिका ने संकट के समय उन्हें अकेला छोड़ दिया। इन सुरक्षा संधियों की वजह से इन देशों के पास न तो अपनी आज़ादी बची है और न ही खुद की रक्षा करने की काबिलियत। इस पूरे समझौते का ढांचा उलटा असर (strategic inversion) दिखाता है: जो सुरक्षा कवच एक ‘बीमा’ जैसा लगता था, वह अब एक बड़ी मुसीबत (liability) बन गया है, क्योंकि जब भी यूएस किसी देश पर निशाना साधता है, तो पलटवार में वह देश उन ठिकानों पर हमला करता है जहां से यूएस सेना काम कर रही होती है। यह भ्रम अब टूट चुका है कि ‘यूएस का साथ आपको बचा लेगा’। ये यूएस सैन्य ठिकाने अब दुश्मनों के लिए आसान निशाना बन गए हैं, और इन्होंने पूरे क्षेत्र के लिए एक संकट पैदा कर दिया है। मेज़बान सरकारें चाहकर भी खुद से तनाव कम नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि उनके ही देश का इस्तेमाल दूसरे पीड़ित देशों के खिलाफ हमले और तनाव बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।
हबीब सादेग़ी (ईरान), दिलों का जनाज़ा (A Funeral for Hearts), बिना तारीख़.
प्राच्यवाद और अतिवास्तविक दुश्मन
इन सबकी बुनियाद वैचारिक है। क्रिस्टोफ़र वीवर के साथ लिखे अपने लेख ‘Hyperreal Warriors and Oriental Foes’ में, जो कि जून 2025 की बारह दिन की जंग के तुरंत बाद मिडल ईस्ट क्रिटीक में छपा, हमने दिखाया है ईरान का प्राच्यवादी (orientalist) चित्रण उसे एक ऐसे विवेकहीन देश के रूप में पेश करता है जो यूएस, ज़ायोनी शासन और फारस की खाड़ी के देशों के लिए एक स्थाई ख़तरा है। दरअसल, ये प्राच्यवादी रूढ़ियाँ ईरान को एक साम्राज्यवादी ताक़त के रूप में दिखाने का काम करती हैं ताकि इस इलाक़े के मुल्कों को समझौतों में बाँधा जा सके और यूएस के जुर्मों में उन्हें भागीदार बनाया जा सके। इस प्राच्यवादी तस्वीर के साथ ही ईरान को एक ‘अतिवास्तविक दुश्मन’ के तौर पर पेश किया जाता है, जिसे हराया नहीं जा सकता, जो अजेय है, और जिससे सिर्फ़ वॉशिंगटन के साथ समझौता करके ही बचा सकता है। इस विमर्श के ये दोनों पहलू एक ही नैरेटिव युद्ध के काम आते हैं।
साम्राज्यवादी कूटनीति वही पुराने घिसे-पिटे तरीक़े ही अपनाती है। वे लगातार यही रट लगाते रहते हैं कि ‘ईरानी लोग यूएस की मौत के नारे लगाते हैं’, या फिर यह कि यूएस वहाँ की महिलाओं को आज़ाद कराना चाहता है। असल में, ईरान के प्रति यूएस की दुश्मनी की शुरुआत 1979 क्रांति से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत उससे बहुत पहले हो चुकी थी, जब 1953 में सीआईए (CIA) ने लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ के खिलाफ तख्तापलट की साज़िश रची थी – इसलिए नहीं कि वे कोई अयातुल्ला थे या यूएस विरोधी नारे लगाते थे (वे तो एक धर्मनिरपेक्ष नेता थे), बल्कि इसलिए क्योंकि वे ईरान के तेल का राष्ट्रीयकरण करना चाहते थे। अन्य देशों के प्रति यूएस की शत्रुता का असली स्रोत यही है।
काज़िम चलीपा (ईरान), शीर्षकहीन , बिना तारीख़.
निर्भरता से संप्रभुता की ओर
पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई का कोई एक तय तरीका नहीं हो सकता। ईरान इसका एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे अपनी स्वदेशी संस्कृति और विचारधारा को एक मजबूत जवाब में बदला जा सकता है। ईरान के प्रतिरोध को समझने के लिए शिया धर्मशास्त्र को समझना ज़रूरी है, जिसके बुनियादी सिद्धांत सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान से जुड़े हैं। ईरान ने साफ कह दिया है: हम बंदूक की नोक पर कोई समझौता नहीं करेंगे। हम आखिरी सांस तक लड़ेंगे, लेकिन साम्राज्यवादी ताकतों के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। हमारा सीधा नारा है—’ज़िल्लत मंज़ूर नहीं’। इमाम रुहोल्लाह खुमैनी ने यूएस सरकार को ‘ग्रेट सैटर्न’ (बड़ा शैतान) कहा। यह कोई जुमला नहीं था बल्कि असल ज़िंदगी के कड़वे अनुभवों से निकला एक सच था: शैतान, धोखेबाज़ और बुरा होता है, जो कभी अपने वादे पर नहीं टिकता। हमने खुद देखा है कि बातचीत के दौरान भी यूएस किस तरह ईरान पर हमला करता है और अंतर्राष्ट्रीय संधियों को तोड़ देता है। अब दुनिया की आँखें खुल रही हैं। हमें लोगों को प्रतिरोध के अलग-अलग तरीकों के बारे में बताना होगा और अपने मूल्यों से जुड़े स्वदेशी रास्ते खोजने होंगे। चालीस साल से ईरान बेहद कड़े और क्रूर प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, फिर भी उसने इस साम्राज्यवादी ताकत को झुकने पर मजबूर कर दिया है।
यूएस सैन्य ठिकाने असल में युद्ध को बुलावा देते हैं। वे मेज़बान देशों को उन लड़ाइयों का हिस्सा बना देते हैं, जो उनके बस में ही नहीं होतीं। सुरक्षा का झूठा दावा उनके ख़ुद एक निशाना बन जाने की संभावना को छिपा देता है। आज के दौर के ड्रोन, मिसाइलें और गुरिल्ला तकनीकें इस तथाकथित सुरक्षा चक्र को आसानी से पार कर जाती हैं। ऐसे में किसी भी गुट में शामिल न होना (तटस्थता रहना) ही सबसे बड़ी रणनीतिक गारंटी है। फारस की खाड़ी की सुरक्षा के लिए कूटनीति तथा संप्रभुता बचाए रखने और तनाव कम करने की ज़रूरत है न कि यूएस सैन्य ठिकानों पर अपनी निर्भरता बढ़ाने की। सुरक्षा तब मिलती है जब आप साम्राज्यवादी ताकतों से दूरी बनाकर रखते हैं, न कि उन पर निर्भर होकर। इन सैन्य ठिकानों से किसका फायदा हो रहा है, और इसका नुकसान कौन झेल रहा है? इस सवाल के जवाब के साथ यह भी साफ़ हो जाता है कि यूएस के साथ समझौते से असल में फायदा किसे होता है। इन सैन्य ठिकानों को क्षेत्र से उखाड़ फेंकना होगा, और फारस की खाड़ी व एशिया के लोगों को इन्हें हटाने के लिए ईरान की जनता का साथ देना चाहिए।
शुभकामनाओं सहित,
डॉ. सितारेह सादेकी
डॉ. सितारेह सादेकी तेहरान यूनिवर्सिटी के ‘फैकल्टी ऑफ वर्ल्ड स्टडीज’ में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वे ओरिएंटलिज्म (प्राच्यवाद), अमेरिकी साम्राज्यवाद और पश्चिम एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर लिखती हैं।
नोट: लेखक के विचार निजी हैं और ज़रूरी नहीं कि ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च’ इनसे पूरी तरह सहमत हो।