ब्रिक्स, दिल्ली: पश्चिमी नियंत्रण से मुक्त व्यापार-व्यवस्था का निर्माण
किसी देश की धनराशि को वॉशिंगटन द्वारा रोके जाने की मनमानी का जवाब ब्रिक्स ने नई मुद्रा से नहीं बल्कि व्यापार के वैकल्पिक तरीक़े से दिया है।
प्यारे दोस्तो,
दिल्ली में हाल में संपन्न दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि इससे संकेत मिला कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भी अब समझ रही है कि उसका भविष्य रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में है, जबकि इससे पहले उसने अमेरिका और इज़राइल के साथ रणनीतिक संबंध बनाने की कोशिश की थी।
लाल अटलांटिक, रोज़ाना पॉलीनो (ब्राज़ील), 2017
वस्तुस्थिति यह है कि यूएस, यूरोपीय संघ, नाटो, और जी7 (उपनिवेशवादी और पूर्व-औपनिवेशिक शक्तियों के क्लब) अब दुनिया की निर्णायक शक्तियाँ नहीं रहे हैं। इसके बजाय दुनिया एक अधिक लचीली बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। वित्तीय प्रतिबंधों या सैन्य हस्तक्षेपों पर टिका पश्चिम का फ़रमान अब नहीं चलता। ब्रिक्स की दिल्ली घोषणा ने रणनीतिक रूप से व्यापार और वित्तीय प्रवाह के वैकल्पिक चैनल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया। ये अपने आप में उन यूएस बैंकों और स्विफ्ट प्रणाली से स्वतंत्र होना है जिसके माध्यम से अधिकांश वैश्विक लेनदेन किए जाते हैं। यह यूएस के स्विफ्ट प्रणाली और पश्चिमी बैंकों पर नियंत्रण का नतीजा ही है कि पश्चिम, रूस और ईरान पर तथाकथित ‘वैश्विक‘ प्रतिबंध लगा सकता है क्योंकि इनके साथ उसके युद्ध चल रहे हैं। ईरान के साथ सीधे तौर पर और रूस के साथ उसके मोहरे की तरह काम करने वाले व्लादिमीर ज़ेलेंस्की के नेतृत्व वाली यूक्रेनी सरकार के ज़रिए।
इस शिखर सम्मेलन के लिए ईरान के विरुद्ध युद्ध ने एक रणनीतिक भूमिका तैयार की, हालाँकि स्पष्ट तौर से इसका ज़िक़्र नहीं किया गया। इज़राइल के ज़रिए पश्चिमी एशिया में और सीधे तौर पर वेनेज़ुएला में हुए यूएस के सैन्य हस्तक्षेप से साफ़ होता है कि वह दुनिया के इकलौती प्रभुत्वशाली ताक़त की अपनी हैसियत छोड़ने को तैयार नहीं है। इस हैसियत को फ़्रान्सिस फ़ूकुयामा ने ‘अमेरिकन इमपेरिम’ (अमेरिकी साम्राज्य) का नाम दिया था। यह बात उस संदर्भ में भी समझी जानी चाहिए जिसमें मोदी सरकार ने भारत की पहले की कई भू-रणनीतिक स्थितियों से पीछे हटकर समझौता किया है, खासकर फ़िलिस्तीन के मामले में। इज़राइल के साथ उसकी बढ़ती नज़दीकी अफ्रीकी, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों के उस व्यापक रुख के बिल्कुल विपरीत है, जो पश्चिम एशिया की मुख्य समस्या इज़राइल को एक बसाहट-आधारित औपनिवेशिक राज्य के रूप में देखते हैं।
फ़ासीवाद पर विजय, हैनिबल अल्खास (ईरान), 1996
साझा समस्याएँ
ब्रिक्स के भीतर मौजूद मतभेदों को देखते हुए, और ख़ासकर मेज़बान देश भारत के साथ मतभेदों को देखते हुए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि शिखर सम्मेलन में उस साझा समस्या पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसका सामना उन सभी देशों को करना पड़ता है जो अमेरिका के नेतृत्व वाले नव-औपनिवेशिक और उपनिवेश बसाने वाले गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। समस्या यह है कि यूएस व्यापार नियमों से अलग हटकर आपस में कैसे व्यापार किया जाए। इन कड़े व्यापार नियमों के बल पर ही यूएस मनमाने ढंग से किसी भी व्यापार पर ‘प्रतिबंध’ लगा देता है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के शासन में यूएस व्यापार नियमों का प्रयोग कर भारत से यूएस निर्यात होने वाले उत्पादों पर भारी शुल्क (100% तक) लगाया गया क्योंकि भारत रूस पर यूएस प्रतिबंध के बावजूद उससे तेल आयात करता है। जबकि इस दौरान यूएस ख़ुद अपने परमाणु ऊर्जा प्लांटों के लिए रूस से यूरेनियम आयात करते हुए अपना दोहरापन दिखा रहा है।
यह सच है कि यूएस कहने को अब भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है (हालाँकि क्रय शक्ति समता यानी पीपीपी के आधार पर नहीं), और यह किसी देश को अधिकतर बैंकों और स्विफ़्ट प्रणाली के ज़रिए वित्तीय लेनदेन से बाहर कर सकता है। इसलिए दिल्ली सम्मेलन में व्यापार को ही सबसे अहम मुद्दे के तौर पर रखा गया। स्वतंत्र विदेश और आर्थिक नीतियों की इच्छा रखने वाले किसी भी देश के लिए यह अहम है, और अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए भी।
ब्रिक्स ने जो रणनीतिक मार्ग चुना है वह एक वैकल्पिक मुद्रा निकालने का नहीं है जिसका इस्तेमाल सब देश कर सकें। क्योंकि ऐसी वैकल्पिक प्रणाली के लिए या तो एक नई मुद्रा निकालनी पड़ेगी या किसी मौजूदा सदस्य राष्ट्र की मुद्रा को ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंकों को समर्थन देना होगा। इसके बजाय, ब्रिक्स ने एक ऐसी व्यवस्था चुनी है जो हर देश को दूसरे देशों से व्यापार करने में अपनी मुद्रा में लेनदेन करने की छूट देती है। इसे लागू किए जाने से पहले कई समस्याओं का समाधान ज़रूरी है। एक देश से दूसरे देश को धन पहुँचाने के लिए एक आसान प्रणाली की ज़रूरत है, इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि दोनों देश एक विनिमय दर पर राज़ी हों। दूसरा काम है, दोनों तरफ़ के केंद्रीय बैंकों को ऐसे लेनदेन के लिए सक्षम करना।
क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के संदर्भ में वैश्विक जीडीपी हिस्सेदारी (%): ब्रिक्स 5 बनाम जी7
आज अधिकांश ब्रिक्स देशों के पास एक बड़ा लाभ यह है, विशेष रूप से उन देशों के पास जो संभवतः लेनदेन का सबसे बड़ा हिस्सा संभालेंगे, कि उनके पास पहले से ही प्रत्येक देश के भीतर आंतरिक लेनदेन के लिए भुगतान माध्यम मौजूद हैं। इसमें चुनौतियाँ इस प्रकार हैं:
- प्रत्येक देश की भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ना, जैसे भारत की UPI, ब्राज़ील की Pix, चीन की CIPS, और रूस की SPFS। दक्षिण अफ्रीका अभी के लिए बाहर रखा गया है, जब तक कि वह ऊपर दिए गए चार में से किसी एक से ख़ुद को नहीं जोड़ लेता।
- प्रत्येक वस्तु का मूल्य उस देश की मुद्रा में निर्धारित करना, जो अपना उत्पाद बेचता है, और दोनों देशों की मुद्राओं के बीच उस दिन के लिए निर्धारित विनिमय दर को लागू करना।
- प्रत्येक देश की मुद्राओं को एक-दूसरे के मुक़ाबले निर्धारित करना। चूँकि इसमें केवल चार देशों की भुगतान प्रणालियाँ शामिल हैं, इन देशों के केंद्रीय बैंकों को प्रतिदिन उनके बीच विनिमय दरें निर्धारित करनी होंगी।
एक आंतरिक मुद्रा उस दौर में चीज़ों को आसान बना सकती थी जब सिर्फ़ बैंक एक-दूसरे से बातचीत करते थे, लेकिन ब्रिक्स देशों में आज जो उन्नत डिजिटल भुगतान माध्यम मौजूद हैं उन्होंने लेनदेन की समस्या को हल करना बहुत आसान कर दिया है। इसलिए ब्रिक्स की अपनी नई मुद्रा निकालने से आसान है कम्प्यूटर प्रणालियों और डिजिटल कनेक्टिविटी पर काम करना। इससे एक दूसरी समस्या का भी समाधान होता है कि ब्रिक्स के बीच से कोई एक प्रभुत्ववादी देश नहीं खड़ा हो जाएगा, जैसे कि नाटो में यूएस की स्थिति है।
संप्रभुता की ओर
देश स्विफ्ट और पश्चिमी वित्तीय व्यवस्थाओं से दूर जाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? इसकी वजह ऐसी व्यवस्था के भीतर अमेरिका के पास मौजूद विशाल वित्तीय शक्ति है। इस शक्ति के जरिए वह न केवल राजनीतिक कारणों से किसी भी देश पर वित्तीय प्रतिबंध लगा सकता है, बल्कि स्विफ्ट प्रणाली के माध्यम से काम करने वाले पश्चिमी बैंकों में रखे धन को भी जब्त कर सकता है। 1979 में अमेरिका ने अमेरिकी बैंकों में ईरान की धनराशि जब्त कर ली थी। 2022 में यूरोपीय संघ के देशों ने यूरोपीय बैंकों में रूस की धनराशि ज़ब्त कर ली थी।
स्कारलेट में एक अध्ययन: संप्रभु पुलिस (उत्सव), पु यिंगवेई (चीन), 2021
अमेरिका किसी भी देश पर जो वित्तीय प्रतिबंध लगाता है, उन्हें उसके कानूनों के अतिरिक्त क्षेत्रीय अधिकार के दावों से प्रभावी बनाया जाता है। उदाहरण के लिए, दिसंबर 2018 में, हुआवे की मुख्य वित्त अधिकारी और उपाध्यक्ष मेंग वान्चोऊ को यूएस के प्रावधानिक प्रत्यर्पण अनुरोध के आधार पर कनाडा में गिरफ्तार किया गया था। यह वह अतिरिक्त क्षेत्रीय अधिकार है जिसका लाभ यूएस को विश्व की प्रभुत्वशाली शक्ति होने के कारण और यूएस अदालतों द्वारा उसके कानूनों की व्याख्या के कारण प्राप्त है। यूएस के अनुसार, दुनिया में कहीं भी डॉलर में कोई भी लेनदेन यूएस कानून और यूएस अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
स्विफ्ट, यूएस डॉलर, और यूएस-यूरोपीय संघ की मुद्राओं तथा बैंकिंग प्रणालियों से दूरी बनाना ब्रिक्स देशों के लिए केवल सुविधा नहीं है। यह इसलिए मायने रखता है ताकि वे अपने घरेलू कानूनों के आधार पर, यूएस और यूरोपीय संघ के कानूनों की बहिर्राष्ट्रीय पहुँच के बजाय, जिस भी देश के साथ चाहें व्यापार करने का अपना अधिकार प्रयोग कर सकें। वस्तुतः, यह अपने आप में यह दावा करना है कि उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद के दिन समाप्त हो गए हैं।
ब्रिक्स प्रक्रिया के समर्थक मानते हैं कि दुनिया को पश्चिमी नियंत्रण के प्रयासों के विरुद्ध एकजुट होना होगा, यह नियंत्रण सिर्फ़ सीधे सैन्य हस्तक्षेप के ज़रिए ही नहीं बल्कि मौजूदा वित्तीय और आर्थिक ढाँचों के माध्यम से भी किया जाता है। वेनेज़ुएला से लेकर ईरान तक उपनिवेशवादी और नव-उपनिवेशवादी युद्ध अब भी जारी हैं। इनमें से हर युद्ध इन देशों की जनता को तो लड़ना ही पड़ रहा है, लेकिन इनके लिए दुनिया भर की प्रगतिशील ताक़तों के समर्थन की भी ज़रूरत है।
मैं – यानी अफ़्रीका, मैं – यानी एशिया, नलिनी मालिनी (भारत), 2015
दुनिया पर वित्तीय रूप से नियंत्रण करने की कोशिश और भी ख़तरनाक है क्योंकि यह हम सबकी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती है। ब्रिक्स के देशों में भू-राजनीतिक मुद्दों को लेकर भले ही मतभेद हो सकते हैं, जैसा कि फ़िलिस्तीन, रूस-यूक्रेन युद्ध, और ईरान के विरुद्ध यूएस-इज़राइल के युद्ध मामलों में देखा गया है। लेकिन सभी ब्रिक्स देशों के लिए एक चीज़ है जो फ़ायदेमंद है: अपने व्यापार को पश्चिम की बाहरी ताक़त के चंगुल से निकालना, ख़ासतौर से यूएस के चंगुल से।
यदि ब्रिक्स इस महत्वपूर्ण मुद्दे को हल कर सके कि हम किस प्रकार किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के बिना, एक-दूसरे से व्यापार की प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं, तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। ऐसी प्रणाली का समय न केवल आ गया है, बल्कि हमारे पास इसके लिए साधन भी हैं: ब्रिक्स के चार प्रमुख आर्थिक शक्तियों के भुगतान गेटवे। यह किसी भी प्रकार से कोई बड़ी तकनीकी समस्या नहीं है और इसके लिए केवल इसे लागू करने की इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
स्नेह सहित,
प्रबीर पुरकायस्थ
प्रबीर पुरकायस्थ एक वैज्ञानिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। वे दिल्ली साइंस फ़ोरम के संस्थापक सदस्य और न्यूज़क्लिक.इन के संपादक हैं।