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एशिया से दूर रहो: संप्रभुता और एकजुटता के लिए कोलंबो घोषणापत्र

चौदहवाँ एशिया न्यूज़लेटर (2026)

पंद्रह एशियाई देशों के प्रतिनिधियों ने कोलंबो में आयोजित एक सम्मेलन में विदेशी सैन्य अड्डों, कर्ज की गुलामी, तख्तापलट की कोशिशों, वैचारिक नियंत्रण के अंत का आह्वान किया। 

प्यारे दोस्तो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया की ओर से अभिवादन।

पचास साल पहले, अगस्त 1976 में, कोलंबो ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के पाँचवे शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी। सम्मेलन के घोषणापत्र में बांडुंग भावना की स्पष्ट झलक मिलती है, जिसमें तीसरी दुनिया में शांति, संप्रभुता और विकास को सुदृढ़ करने का संकल्प लिया गया। शीतयुद्ध के दौरान हिंद महासागर का सैन्यीकरण इस सम्मेलन की चर्चा का एक अहम विषय रहा। श्रीलंका की पहल पर, वर्ष 1971 में संयुक्त राष्ट्र ने हिंद महासागर को शांति क्षेत्रघोषित करने का प्रस्ताव पारित किया था। लिहाज़ा पाँचवें NAM शिखर सम्मेलन के आखिरी घोषणापत्र में शांति-क्षेत्र से जुड़े प्रस्ताव को खास जगह मिली:

 

सम्मेलन ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि हालिया घटनाक्रमों के परिणामस्वरूप हिंद महासागर क्षेत्र एशिया में महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का मुख्य केंद्र बन सकता है। इस स्थिति के चलते क्षेत्र में नौसैनिक वर्चस्व के लिए महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा हिंद महासागर में तनाव और टकराव को जन्म देगी। इन परिस्थितियों में यह अनिवार्य है कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा में योगदान के रूप में हिंद महासागर शांति क्षेत्र प्रस्तावको बिना विलम्ब लागू किया जाए।

वह प्रस्ताव कभी लागू नहीं हुआ। श्रीलंका के दक्षिण में स्थित डिएगो गार्सिया में बने संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) सैन्य अड्डे अफगानिस्तान, इराक और हाल ही में ईरान के खिलाफ यूएस के आक्रामक युद्धों के लॉन्चपैड के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं। 4 मार्च को अमेरिकी पनडुब्बियों ने श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में निहत्थे ईरानी जहाज आईआरआईएस देना को टॉरपीडो से निशाना बनाया। इस हमले में कम से कम 80 नाविक मारे गए जो भारत में नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद लौट रहे थे। इस अभूतपूर्व आक्रामकता ने शांति क्षेत्र माने जाने वाले इस भूभाग को युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है। न तो भारतीय और न ही श्रीलंकाई सरकार इस हमले की निंदा करने का साहस जुटा सकीं। श्रीलंकाई पक्ष केवल इतना कर सका कि उसने जीवित बचे नाविकों को निकाला, ईरान के दूसरे जहाज आईआरआईएस बुशहर को सुरक्षित आश्रय दिया और नाविकों की सकुशल स्वदेश वापसी सुनिश्चित की।

यूएस द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध की पृष्ठभूमि में और कोलंबो में हुए पाँचवें गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) शिखर सम्मेलन की वर्षगांठ से ठीक एक महीने पहले, एशिया के 15 देशों के 40 से अधिक संगठनों से जुड़े 80 से ज़्यादा प्रतिनिधि ‘Hands Off Asia: A Peoples Call for Sovereignty and Solidarity’ कॉन्फ़्रेन्स के लिए कोलंबो में इक्कट्ठे हुए। इंटरनेशनल पीपल्स असेंबली (IPA) द्वारा ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के सहयोग से आयोजित इस तीन दिवसीय (16 से 18 जुलाई) कॉन्फ़्रेन्स में, जन-आंदोलनों के नेताओं, राजनयिकों और बुद्धिजीवियों ने कर्ज से लेकर सैन्यीकरण जैसे, एशिया के वर्तमान समय को परिभाषित करने वाले अहम मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श किया।

आगे बढ़ता एशिया

हैंड्स ऑफ़ एशिया (एशिया से दूर रहो) सम्मेलन कई कारणों से ऐतिहासिक था। सबसे पहले, आठ वर्षों में आईपीए (IPA) एशिया का यह पहला सम्मेलन था (पिछला सम्मेलन 2018 में ढाका, बांग्लादेश में हुआ था)। तब से वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य, विशेषकर दक्षिण एशिया में, बहुत बदल चुका है। 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान थे, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना थीं, और नेपाल की संसद में कम्युनिस्टों के पास एक मजबूत व अडिग दिखने वाला बहुमत था। इस बीच, इमरान खान गिरफ्तार किए जाने के बाद से लगातार जेल में बंद हैं; शेख हसीना को इस्तीफा देना पड़ा और तब से वे भारत में निर्वासन में रह रही हैं; तथा तथाकथितजेन ज़ीउभार के बाद हुए चुनावों में नेपाली कम्युनिस्टों की बुरी तरह हार हुई। दक्षिण एशिया में यदि कोई एक सरकार बची रही है, तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दक्षिणपंथी सरकार हैहालांकि, युवाओं और छात्रों के नेतृत्व में हुए हालिया प्रदर्शनों के बाद इस पर भी भारी दबाव आ गया है। आज दक्षिण एशिया भर का माहौल प्रत्याशा से भरा है, क्योंकि एक पूरी पीढ़ी इस इंतजार में खड़ी है कि उसकी जिंदगी आखिर कब शुरू होगी। राजनीति में बेशक बदलाव हो रहे हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था वहीं की वहीं ठहरी हुई है; और श्रीलंका इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

दूसरा, एशिया का पश्चिमी हिस्सा इस समय सक्रिय युद्ध की चपेट में है, जो कि इस क्षेत्र में यूएस साम्राज्यवाद और ज़ायनवादी आक्रामकता का सीधा परिणाम है। अक्टूबर 2023 से इज़राइल ग़ज़ा में जो कर रहा है, उसके लिए जनसंहार ही एकलौता शब्द है; इसमें 70,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और बच्चों सहित अनगिनत अन्य घायल हुए हैं। यूएस और यूरोपीय समर्थन से इस इज़राइली जनसंहार का दायरा दक्षिणी लेबनान, सीरिया और ईरान तक फैल गया है। इस तबाही ने यूएस-नेतृत्व वाले साम्राज्यवाद और ज़ायनवाद की कमियों को भी बेनकाब कर दिया है वे शहरों और बुनियादी ढाँचों को मलबे में बदलने के लिए अपनी विनाशकारी ताकत का इस्तेमाल तो कर सकते हैं, लेकिन ये अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने और विकल्प या समाधान देने में नाकाम हैं। फ़िलिस्तीन, ईरान और यमन के लोग इनका डट कर मुक़ाबला कर रहे हैं। फ़ारस की खाड़ी की राजशाहियों को पता चल चुका है कि यूएस के सैन्य अड्डों की मेज़बानी ने उन्हें एक ऐसी जंग का निशाना बना दिया है, जिसे वे ख़ुद रोक नहीं सकते।

तीसरा, एशिया का पूर्वी हिस्सा औद्योगिक विकास और क्षेत्रीय एकीकरण के एक निर्णायक स्तर पर पहुँच चुका है। हालाँकि, डॉलर के वर्चस्व, टैरिफ की ब्लैकमेलिंग, और सैन्य गठबंधनों के कारण इन देशों पर  लगातार आर्थिक दबाव बना हुआ है। वैश्विक अर्थव्यवस्था का गुरुत्वाकर्षण केंद्र एशिया की ओर स्थानांतरित हो चुका है, जहाँ चीन की संपूर्ण औद्योगिक शृंखला एक संयोजक की भूमिका निभा रही है। लेकिन जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस जैसे व्यापारिक साझीदार एक गहरी दुविधा में फँसे हुए हैं, क्योंकि यूएस उन्हें मजबूर कर रहा है कि वे चीन को घेरने के लिए अपने ज़्यादा से ज़्यादा संसाधन सैन्य कार्रवाइयों में झोंकें। डॉलर और यूएस के उपभोक्ता बाज़ार तक पहुँच को हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने से स्थानीय अभिजात वर्ग की कमज़ोरी खुलकर सामने आ गई है, और यह भी साबित हो गया है कि आर्थिक प्रतिबंधों के सामने उनकी तथाकथित देशभक्ति कितनी जल्दी ढह जाती है। एशिया का उभार सही अर्थों में लंबे और निरंतर जन-संघर्षों के बिना मुमकिन नहीं होगा। 

कोलंबो घोषणापत्र

हैंड्स ऑफ एशिया’ (एशिया से दूर रहो) अभियान की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सिर्फ सैन्य अड्डों और लड़ाइयों के खिलाफ नहीं है, बल्कि आर्थिक दबाव, राजनीतिक दखल और वैचारिक शिकंजे (जिसे हमारा संस्थान ब्रेन कैप्चरया ज़हनी कब्जा कहता है) के खिलाफ भी एक आवाज़ है। यह मुहिम राजनीतिक आज़ादी के साथ-साथ आर्थिक और वैचारिक संप्रभुता की भी मांग करती है। यह केवल सरकारों के स्तर पर तालमेल बिठाने तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनता की आपसी एकजुटता पर जोर देती है।

सम्मेलन के अंतिम सत्र में कोलंबो घोषणापत्र पढ़ा गया।

इंटरनेशनल पीपल्स असेंबली (IPA) द्वारा ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के सहयोग से आयोजित  ‘हैंड्स ऑफ एशिया’ (एशिया से दूर रहो): संप्रभुता और एकजुटता के लिए अवाम की पुकार’ सम्मेलन के लिए कोलंबो में इकट्ठे हुए हम, एशिया के 15 देशों के आंदोलनों, राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों और जन-संगठनों के प्रतिनिधि, पूरे महाद्वीप में गूँज रहे एक नारे के प्रति खुद को समर्पित करते हैं:

हैंड्स ऑफ एशिया (एशिया से दूर रहो) ! जिसका अर्थ है:

सैन्य स्तर पर

हमारे समुद्रों से दूर रहो। हमारी ज़मीन से दूर रहो। हमारे आसमान से दूर रहो। हमारी संप्रभु भूमि पर यूएस या उसके साझीदारों का कोई सैन्य अड्डा न हो। ऑकस (AUKUS) और क्वाड (Quad) जैसे समझौतों का अंत हो। ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध बंद हो। फिलिस्तीन में जनसंहार रोका जाए। एशिया की घेराबंदी हमेशा के लिए खत्म हो।

आर्थिक स्तर पर

हमारी अर्थव्यवस्थाओं से दूर रहो। हमारे संसाधनों से दूर रहो। हमारी आजीविका से दूर रहो। सॉव्रेन बॉंड के कर्ज की गुलामी हमें मंजूर नहीं। आईएमएफ की शर्तें हमें मंजूर नहीं। टैरिफ की धमकियां बंद हों। तकनीक के आदान-प्रदान पर रोक न लगाई जाए। 

एशियाई जनता को अपनी अर्थव्यवस्था का स्वरूप खुद चुनने का अधिकार हो। 

राजनीतिक स्तर पर

हमारी राजनीति से दूर रहो। हमारे चुनावों से दूर रहो। हमारे आंदोलनों से दूर रहो। 

सत्ता पलट के षड्यंत्र और दक्षिणपंथी कठपुतली सरकारें हमें स्वीकार नहीं। 

एशिया के लोगों को अपना राजनीतिक भविष्य खुद तय करने का अधिकार हो। 

वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर पर

हमारे इतिहास से दूर रहो। हमारे मीडिया से दूर रहो। हमारी कल्पनाशीलता से दूर रहो। 

हम खुद को और एक-दूसरे को जिस रूप में जानते-समझते हैं, उस पर औपनिवेशिक नियंत्रण खत्म हो। 

एशिया के लोगों को अपनी कहानी खुद कहने और अपनी जन-संस्कृति का निर्माण करने का अधिकार हो।

हमारा दुश्मन एक है और वह एकजुट है। इसलिए हमारा जवाब भी वैसा ही होना चाहिए। हम इस महाद्वीप की जनता की एकजुटता का संकल्प लेते हैं उस संप्रभुता, शांति और समाजवादी क्षितिज की ओर जिसके लिए हमारे लोग हमेशा संघर्ष करते रहे हैं।

एशिया का भविष्य यहाँ की जनता तय करेगी। हैंड्स ऑफ एशिया! एशिया से दूर रहो!

सस्नेह,

अतुल चंद्रा

टिंग्स चाक

शिरान इलानपेरुमा

अतुल और टिंग्स ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया के सह-संयोजक हैं। शिरान ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया में शोधार्थी हैं।  

 

पुनश्च: ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया की ओर से, हम श्रीलंका के निम्नलिखित संगठनों का दिल से शुक्रिया अदा करते हैं, जिन्होंने अपने देश और महाद्वीप, दोनों के लिए इस नाज़ुक समय पर सम्मेलन में शिरकत की: जनता विमुक्ति पेरामुना, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ श्रीलंका, डेमोक्रेटिक लेफ़्ट फ़्रंट, फ़्रंटलाइन सोशलिस्ट पार्टी और फ़्री फ़िलिस्तीन मूवमेंट श्रीलंका।