एशिया के लोग युद्ध की कीमत जानते हैं: आठवाँ एशिया न्यूज़लेटर (2026)
ओकिनावा के किसानों से लेकर फ़िलीपींस के ‘मैग्निफिसेंट 12’ तक — एशिया के लोगों ने यूएस सैन्यवाद का सामना पहले भी किया है। विरोध की यह परम्परा आज और भी ज़रूरी हो उठी है, क्योंकि एक नया शीतयुद्ध हमारे दरवाज़े तक आ चुका है।
दिएगो रिवेरा (मेक्सिको), पेसादीया दे गेर्रा, स्वेन्यो दे पास (युद्ध का दुःस्वप्न, शान्ति का सपना), 1952
प्यारे साथियो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया की ओर से अभिवादन।
30 अप्रैल 1975 के दिन, एक टैंक साइगॉन (वियतनाम) के इंडेपेंडेन्स पैलेस का फाटक तोड़कर अंदर घुस गया। इसके साथ तीन दशक से जारी युद्ध का अन्त हुआ, जिसमें तीस लाख से भी ज़्यादा वियतनामी लोगों की जान गई थी और पचहत्तर लाख टन संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के बम इंडोचीन क्षेत्र पर बरसाए गए थे। वियतनाम ने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताक़त को हराया था। पर यह अकेले वियतनाम की कहानी नहीं थी, बल्कि लगभग एक शताब्दी पहले से चली आ रही परंपरा का बेहतरीन हिस्सा थी। एशिया और प्रशांत महासागर के देशों के लोग अपनी धरती पर यूएस सैन्यवाद और आक्रामक युद्धों के ख़िलाफ़ संगठित होते रहे हैं।
इस परम्परा को फिर से ज़िंदा करना पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है, क्योंकि यूएस से थोपा जा रहा नया शीतयुद्ध एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र में पैर पसार रहा है। सैन्य अड्डों का विस्तार हो रहा है। मिसाइल तैनात किए जा रहे हैं। और ऐसे आक्रामक समझौते रचे जा रहे हैं जिनका उद्देश्य सिर्फ़ चीन को घेरना नहीं, बल्कि हर उस देश को सबक़ सिखाना है जो अपनी संप्रभुता की रक्षा करने का साहस करे। इस बढ़ते ख़तरे के बीच यह ज़रूरी है कि हम अपने इतिहास की ओर लौटें, जिसमें एशिया के लोगों ने इस ख़तरे का मुक़ाबला किया था और जीत हासिल की थी।
नाकामुरा हिरोशी (जापान), सुनागावा, 1955
अमन की तलाश में
अक्टूबर 1952 में, कोरिया के ख़िलाफ़ अमेरिकी युद्ध जारी था। तब लगभग पचास देशों से चार सौ सत्तर प्रतिनिधि बीजिंग (चीन) में एशिया और प्रशांत क्षेत्र शान्ति सम्मेलन के लिए इकट्ठे हुए थे। इन प्रतिनिधियों में मज़दूर यूनियनों के कार्यकर्ता, शिक्षक, महिला ऐक्टिविस्ट, संत व भिक्षु, सांस्कृतिक कर्मियों सहित अन्य अंतर्राष्ट्रीयतावादी शामिल थे। भाग लेने वालों में लगभग एक-तिहाई महिलाएँ थीं। सम्मेलन हॉल में मेक्सिको के कम्युनिस्ट चित्रकार दिएगो रिवेरा का विशाल चित्र Pesadilla de guerra, sueño de paz,1952 (युद्ध का दुःस्वप्न, शान्ति का सपना) टँगा था। इस चित्र में बिना चेहरों वाले सैनिक जनता पर अत्याचार कर रहे हैं। यह वो दौर था जब कोरिया, वियतनाम और मलय में युद्ध जारी थे। हॉल में इस चित्र के सामने वाले दीवार पर पाब्लो पिकासो का Dove of Peace,1949 (शान्ति का कबूतर) चित्र टँगा था। इन चित्रों के बीच प्रतिनिधियों ने परमाणु हथियारों के विरुद्ध स्टॉकहोम अपील (1950) पर हस्ताक्षर किए थे।
सम्मेलन की अध्यक्षता चीन की क्रांतिकारी नेता सोंग चिंगलिंग (मैडम सुन यात-सेन) ने की थी। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन की राजनीतिक शुरुआत 1933 में शंघाई में आयोजित साम्राज्यवाद-विरोधी एक गुप्त सम्मेलन से जुड़ी थी। वह सम्मेलन मंचूरिया पर जापानी आक्रमण के दौरान, शंघाई के एक कारख़ाना-क्षेत्र की एक पुरानी इमारत में हुआ था। उस गुप्त सम्मेलन के दौरान प्रतिनिधि ज़मीन पर बैठे थे और दो दशक बाद वह इतने बड़े सम्मेलन में तब्दील हो चुका था। कोरिया से आए प्रतिनिधियों ने यूएस जैविक युद्ध के सबूत पेश किए। जैविक युद्ध यानी, युद्ध में मनुष्यों, जानवरों या पौधों को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचाने के इरादे से बैक्टीरिया, वायरस , कीड़े और कवक जैसे जैविक विषैले पदार्थों का इस्तेमाल करना। सम्मेलन में जापान के पुनर्शस्त्रीकरण को रोकने और क्षेत्र से विदेशी सैन्य अड्डों को हटाने की माँग की गई।
इस सम्मेलन को जानबूझकर और ख़ामोशी से भुला दिया गया है। रिवेरा का वह चित्र और उसकी प्रतिलिपि (कॉपी) दोनों लापता हैं। पर यह याद रखने लायक़ है कि 1952 के इस सम्मेलन ने 1955 के बांडुंग सम्मेलन की ज़मीन तैयार की थी। यह सम्मेलन एशियाई नज़रिए से अमन-चैन के विचारों को व्यक्त करने और प्रसारित करने का मंच बना। इन्हीं विचारों ने बांडुंग सम्मेलन के दस सिद्धांतों को आकार दिया था। बांडुंग से उठे आत्मनिर्णय, संप्रभुता और गरिमा के नारे स्पष्ट रूप से यूएस नेतृत्व में इस क्षेत्र को बदल रही सैन्य उपस्थिति के ख़िलाफ़ थे।
यिन फ़ूकांग (चीन), अमेरिकी साम्राज्यवाद के सैन्य उकसावों और युद्ध की धमकियों का विरोध करो!, 1958
प्रतिरोध का इतिहास
इसके बाद आने वाले दशकों में एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र में यूएस सैन्यवाद के विरुद्ध भारी जनप्रतिरोध चले। जापान के ओकिनावा द्वीप में, जहाँ ओकिनावा युद्ध (1945) में लगभग एक तिहाई लोग मारे गए थे, यूएस ने बचे हुए लोगों को नज़रबंदी शिविरों (ऐसे शिविर जहाँ लोगों को मुक़दमे या सामान्य जेल प्रक्रिया के बिना निगरानी में रखा जाता था) में बंद कर दिया और उनकी ज़मीने बिना मंज़ूरी के सैन्य अड्डे बनाने के लिए हड़प लीं। जब ओकिनावा के लोग अपने घरों को लौटे तो देखा कि पुराना जापानी हवाई अड्डा अब काडेना एयर बेस बन चुका था। यह एयर बेस अब लगभग बीस वर्ग किलोमीटर में फैला है, और टोक्यो के हानेडा हवाई अड्डे से 1.3 गुना बड़ा है।
यह द्वीप कभी संप्रभुता वापस नहीं हासिल कर पाया; बल्कि यूएस सैन्य प्रशासन ने इस क़ब्ज़े को वैध रूप दे दिया। 1950 का दशक आते आते यूएस सैनिक टैंकों, बुलडोज़रों आदि से किसानों को उनकी बची-खुची ज़मीन से भी खदेड़ने लगे। मियूमे तांजी ने मिथ, प्रोटेस्ट ऐंड स्ट्रगल इन ओकिनावा (2006) [ओकिनावा में मिथक, प्रतिरोध और संघर्ष] में बताया है कि किसानों की ज़मीनें कोड़ियों के भाव पर किराए पर लेने की पेशकश की गई, जिसे 98% किसानों ने ठुकरा दिया। किसानों ने उस दौर में जो नारा लगाया वह आज भी हक़ीक़त है: ‘पैसा साल भर के लिए होता है, पर ज़मीन हज़ारों साल साथ देती है’। ओकिनावा जापान के कुल क्षेत्रफल का मात्र 0.6 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन जापान में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों में से सत्तर प्रतिशत अड्डे यहीं हैं।
मार्शल द्वीप समूह में युएस ने 67 परमाणु परीक्षण किए हैं। इन परीक्षणों का नुक़सान बारह सालों तक हर रोज़ 1.6 हिरोशिमा बम विस्फोट होने के बराबर है। प्रशांत महासागर के लोगों ने इस नुक़सान को सीधे-सीधे झेला है। यही कारण है कि उन्होंने इसके ख़िलाफ़ मोर्चा खड़ा किया। परमाणु-मुक्त एवं स्वतंत्र प्रशांत आंदोलन 1975 में फ़िजी में शुरू हुआ। इस आंदोलन ने परमाणु प्रदूषण के विरुद्ध अपने संघर्ष को संप्रभुता की माँग से जोड़ा। 1980 में हवाई में हुए एक सम्मेलन में आंदोलन ने अपने नाम में ‘स्वतंत्र’ शब्द जोड़ा गया। उनका मानना था कि परमाणु-मुक्त होना तभी संभव है जब इस क्षेत्र को सामूहिक बर्बादी के हथियार अपने साथ लाने वाले विदेशी सैन्य अड्डों से भी आज़ाद किया जाएगा।
फ़िलीपींस के संघर्ष ने असाधारण सफलता हासिल की। दशकों तक, सीनेटर क्लारो रेक्तो, लोरेंज़ो तान्यादा और होसे दिओक्नो के नेतृत्व में फ़िलीपीनी राष्ट्रवादी यह कहते रहे कि यूएस सैन्य अड्डों का असल मक़सद नव-औपनिवेशिक नियंत्रण क़ायम करना है। 1950 के दशक में ही सीनेटर रेक्तो ने चेतावनी दी थी कि ये अड्डे फ़िलीपींस की रक्षा नहीं करेंगे, बल्कि ‘आक्रामकता को आकर्षित कर सकते हैं’। फ़र्दिनांद मार्कोस की तानाशाही के समय लगभग दो साल तक बंदी रहे सीनेटर दिओक्नो ने 1983 में एंटी बेसिज़ कोअलिशन [सैन्य-अड्डा-विरोधी गठबंधन] की स्थापना की। दशकों के इस संघर्ष का निर्णय एक चुनाव से हुआ। 16 सितम्बर 1991 को फ़िलीपींस की सीनेट में यूएस सैन्य अड्डों की सन्धि पर मतदान हुआ जिसमें 12 में से 11 मत इसके ख़िलाफ़ पड़े। इस संधि के विरोध में वोट डालने वाल सीनेटरों को ‘मैग्निफिसेंट 12’ कहा गया। सीनेटर आकिलीनो पिमेंतेल ने सदन से कहा: ‘आज के दिन, जो मुझे उम्मीद है कि एक औपनिवेशिक शक्ति के चंगुल से हमारी मुक्ति का दिन है, मैं उनसे कहता हूँ जो हमें राजनीतिक गुमनामी और विनाश की धमकियाँ देते हैं — कि जाओ, जिस हद तक जा सकते हो जाओ — क्योंकि हम भी अपनी पूरी ताक़त लगा देंगे!’
क्लार्क एयर बेस और सुबिक बे नेवल बेस बंद कर दिए गए और फ़िलीपींस दुनिया का ऐसा पहला देश बन गया जिसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से यूएस सेना को बाहर निकाला।
रेने मेदेरोस (क्यूबा), शीर्षकहीन, 1971.
नया शीतयुद्ध
आज यूएस सैन्यीकरण पूरे क्षेत्र में फैल रहा है और एक ऐसे नए शीतयुद्ध को हवा दे रहा है जो पूरे एशिया को अपनी चपेट में ले लेगा।
फ़िलीपींस: यूएस और फ़िलीपींस के बीच ‘उन्नत रक्षा सहयोग समझौता या EDCA’ है। जिस पर 2014 में तत्कालीन यूएस राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हस्ताक्षर किए थे और जिसे अगले राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 2023 में विस्तार दिया। इस समझौते के अंतर्गत यूएस फ़िलीपींस में नौ सैन्य ठिकानों को इस्तेमाल कर सकता है। इनमें ताइवान स्ट्रेट के पास स्थित कागायान प्रान्त के अड्डे भी शामिल हैं।
जापान: जापानी सरकार ने अपने सैन्य बजट को पाँच सालों में दोगुना कर तैंतालीस ट्रिलियन येन (269 अरब डॉलर) कर दिया है। जापान ने यूएस से 400 टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल ख़रीदी हैं और हेनोको (ओकिनावा) में एक नए यूएस मरीन [समुद्री] अड्डे का निर्माण कर रहा है — जबकि 2019 के जनमत-संग्रह में बहत्तर प्रतिशत ओकिनावा-वासियों ने इस निर्माण के ख़िलाफ़ वोट दिया था।
ऑस्ट्रेलिया: AUKUS समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया यूएस की परमाणु-संचालित पनडुब्बियों और बी-52 बमवर्षकों की बारी-बारी से तैनाती करेगा। इस कार्यक्रम की अनुमानित लागत 250 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (178 अरब यूएस डॉलर) से अधिक है।
दक्षिण कोरिया: दक्षिण कोरिया में यूएस के लगभग 28,500 सैनिक हैं। इनका मुख्यालय है कैम्प हम्फ्रीज़, जो कि यूएस का किसी विदेशी ज़मीन पर सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। इसे दस अरब डॉलर से अधिक की लागत से बनाया गया है।
ताइवान: वॉशिंगटन ने 2019 से ताइवान को बीस अरब डॉलर से अधिक के हथियारों की बिक्री को मंज़ूरी दी है। इनमें छियासठ एफ़-16वी लड़ाकू विमान, हार्पून मिसाइल सिस्टम और एब्राम्स टैंक शामिल हैं। चीन को रोकने के लिए यूएस ताइवान को हथियारों से लैस करते जा रहा है।
इंडोनेशिया: दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश इस समय एक अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है। यदि यह पास होता है तो यूएस सैन्य विमानों को इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र ‘से होकर गुज़रने का व्यापक अधिकार’ मिल जाएगा।
यह सैन्यीकरण की योजना है। इसकी रचना चीन को घेरने और उन देशों को दंडित करने के लिए की गई है जो अपनी संप्रभुता का दावा करते हैं। इसके ज़रिए एशिया की जनता को वॉशिंगटन के सामरिक हितों के अधीन किया जा रहा है।
ईरान पर यूएस-इज़राइली ग़ैर-क़ानूनी युद्ध ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि यूएस सैन्य अड्डे की मेज़बानी सुरक्षित होना नहीं, बल्कि निशाना बनना है। क़तर में अल-उदैद एयर बेस से लेकर बहरीन में फ़िफ़्थ फ़्लीट के मुख्यालय तक, फ़ारस की खाड़ी में लगभग चालीस हज़ार यूएस सैनिक बीस से अधिक ठिकानों पर तैनात हैं। और इन्हीं जगहों से ईरान और लेबनान पर बमबारी की गई।
ग़ज़ा (फ़िलिस्तीन) में अक्टूबर 2023 से अब तक यूएस-समर्थित इज़राइली आक्रमण में बहत्तर हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। यह दर्शाता है कि यूएस सैन्य मशीनरी भूमध्य सागर से प्रशांत महासागर तक एक ही तरीक़े से काम करती है।
यूएस की महत्त्वाकांक्षाओं और आक्रामकता के बावजूद, एशिया के पास सैन्य-अड्डों के विरोध और युद्ध के विरोध में संगठित होने की पुरानी परंपरा है, जिससे आज प्रेरणा ली जा सकती है। यह परंपरा 1933 के शंघाई सम्मेलन से लेकर 1952 की बीजिंग सभा तक और ओकिनावा के किसानों तथा फ़िलीपींस व प्रशांत द्वीपों के लोगों जुड़ी है। इन संघर्षों को चलाने वाले बहुत-से संगठन आज भी मौजूद हैं। इन संगठनों को जन-आंदोलनों में बदलना आज की ज़रूरत है।
वियतनाम की आज़ादी की वर्षगाँठ पर, इंटर्नेशनल पीपल्ज़ असेम्ब्ली और ट्राइकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने वियतनाम, ईरान, फ़िलीपींस, जापान, चीन और दक्षिण कोरिया के कार्यकर्ताओं के साथ एक ऑनलाइन चर्चा आयोजित की, ताकि एशिया में यूएस सैन्यवाद की वास्तविकता को दुनिया के सामने लाया जाए। एशिया के लोगों ने मुश्किल और लंबी लड़ाइयों के बाद आज़ादी हासिल की है इसलिए वे जानते हैं कि युद्ध की क्या क़ीमत चुकानी पड़ती हैं।
वियतनामी क्रांतिकारी हो ची मिन्ह ने साठ साल पहले से देश के नाम अपनी अपील में कहा था कि ‘स्वतन्त्रता और स्वाधीनता से बढ़कर कुछ नहीं है।’ आज, सही मायनों में स्वतन्त्रता का अर्थ है — यूएस सैन्य हस्तक्षेप और आक्रामकता से मुक्ति।
सस्नेह,
टिंग्स चाक और अतुल चन्द्रा
टिंग्स चाक और अतुल चन्द्रा ट्राइकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के एशिया सह-संयोजक हैं।