रेड अलर्ट: बेरूत में विस्फोट

4 अगस्त की शाम को, लेबनान की राजधानी बेरूत (दस लाख से अधिक शरणार्थियों को मिलाकर जिसकी जनसंख्या 68 लाख है) के बंदरगाह के गोदाम संख्या 12 में आग लग गई। इस आग से धुएँ का एक विशाल ग़ुबार निकला, जिसके बाद इससे भी भयानक विस्फोट हुआ। ये शक्तिशाली विस्फोट बाहर की ओर फैला और बेरूत के कई हिस्से तबाह हो गए। बंदरगाह पर जो कुछ भी मौजूद था वो मिट्टी में मिल गया। विस्फोट का असर चारों दिशाओं में लगभग 15 किलोमीटर तक हुआ। कम-से-कम 70,000 घर क्षतिग्रस्त हुए, इनमें से कुछ बिलकुल रहने लायक़ नहीं बचे 160 के क़रीब लोग मारे गए हैं; 5,000 लोग घायल हुए हैं; बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता हैं; दो अस्पताल नष्ट हो गए हैं। फ्रांसीसी उपनिवेशवाद, अमेरिकी हस्तक्षेपों, इज़राइल के हमलों क़ब्ज़ों और 15 साल से चल रहे गृह युद्ध के इतिहास के बावजूद, लेबनान में यह अब तक का सबसे बड़ा विस्फोट है।

 

क्या हुआ?

इस साक्ष्य के सामने आने में देर नहीं लगी कि जहाँ विस्फोट हुआ था, वह हथियारों या पटाखों या मिसाइल्स का कोई जहाज़ नहीं था, बल्कि एक इमारत थी जिसमें 2,750 टन अमोनियम नाइट्रेट था, जो कि नवंबर 2013 से बंदरगाह के एक गोदाम में लापरवाही से संग्रहीत था।

अमोनियम नाइट्रेट एक ज्वलनशील रसायन है जिसका उपयोग उर्वरक, विस्फोटक और रॉकेट ईंधन में किया जाता है। 2013 में, मोल्दोवन ध्वज वाला एक मालवाहक जहाज़ एमवी रोसस, इस माल के साथ बेरूत पहुँचा; जहाज़ बीरा (मोजाम्बिक) की ओर जा रहा था। बंदरगाह अधिकारियों ने समुद्र में चलने के अयोग्य उस जहाज़ और उसके तथाकथितख़तरनाक मालको ज़ब्त कर लिया। 2014 से 2017 के बीच सीमा शुल्क अधिकारियों ने छह बार, बेरूत में तत्काल मामलों के न्यायाधीश से इस माल को बेचने या व्यवस्थित करने के दिशा निर्देश जारी करने की माँग की। यह हो सकता है कि अमोनियम नाइट्रेट नाइट्रोप्रिल के रूप में आया हो; नाइट्रोप्रिल कोयला खदानों में इस्तेमाल किया जाने वाला ब्लास्टिंग एजेंट है। एक छोटी सी चिंगारी से भी अमोनियम नाइट्रेट में बड़ा विस्फोट हो सकता है। उसी गोदाम में पटाखे भी थे। बेरूत के बंदरगाह के निदेशक और सीमा शुल्क निदेशक सहित 19 से ज़्यादा अधिकारियों को गिरफ़्तार किया गया है। इस मामले की जाँच चल रही है।

 

दुर्घटना क्या होती है?

दुर्घटना वो होती है जिसका पहले से अनुमान न हो, जिसके लिए किसी प्रकार का मानवीय कृत्य ज़िम्मेदार हो। 4 अगस्त को बेरूत में हुआ विस्फोट कोई दुर्घटना नहीं थी। अत्यधिक ज्वलनशील माल छह साल से भी ज़्यादा समय से एक गोदाम में रखा हुआ था; बेरूत के बंदरगाह का ये गोदाम, गेम्मायज़े और कारेंटिना के आवासीय इलाक़ों से सटा हुआ है। पिछले छह साल से, प्रत्यक्ष राजनीतिक संबद्धता वाले सीमा शुल्क अधिकारी ख़तरे की रिपोर्ट्स लीक कर रहे थे। विस्फोट की संभावना से अधिकारी अवगत थे। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया।

तीस साल लंबे चले गृह युद्ध के बाद की राजनीतिक संरचना जिसमें सैन्य नेता व्यापारिक हितों में लग गए उस भयावह स्थिति में यह विस्फोट कोढ़ में खाज की तरह है। गृह युद्ध को समाप्त करने के लिए 1990 के ताइफ़ समझौते की बैठक में किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया था। बल्कि इसके ठीक विपरीत हुआ और सांप्रदायिक नेतृत्वकारियों को देश की सरकार में वैधता मिल गई; गृहयुद्ध के सांप्रदायिक नेता ही अपने द्वारा नष्ट किए गए देश के संरक्षक बन गए। भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग स्कूलों, अस्पतालों और सभी तरह की सार्वजनिक सेवाओं पर ख़र्च कम कर के ख़ुद को समृद्ध बनाता रहा; सार्वजनिक सेवाओं को दुकानों में बदल दिया गया। इसके अलावा, पूर्व अरबपति प्रधानमंत्री रफ़ीक़ हरीरी द्वारा लागू की गई नवउदारवादी संरचनात्मक पुनर्निर्माण की नीतियों के कारण समाज क्रोनी पूँजीवाद की जड़ों में जकड़ गया, जिसकी संभावना लेबनान में गृह युद्ध से पहले ही मौजूद थी। हरीरी का पुनर्निर्माण कार्य लाभप्रद बैंकिंग क्षेत्र (जिसमें अधिकांश राजनेताओं की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी है) से फ़ायदा लेने के लिए खाड़ी देशों से विदेशी निवेश आकर्षित करने, उनके निगम सॉलिडेयर के स्वामित्व में एक विशेष शहर बनाने और अन्य भ्रष्टाचारपूर्ण ग़ैरउत्पादक क्षेत्रों के विकास पर आधारित था।

संरक्षण के संबंधों पर निर्भर रहने वाली लेबनानी सांप्रदायिक व्यवस्था और विदेशी हितों के साथ उसके गठजोड़ से सांप्रदायिक समूहों के नेताओं को सत्ता बनाए रखने में मदद मिली। ज्योंज्यों उनका लालच बढ़ा और उनके काम करने के तरीक़ों का नियंत्रण घटता गया त्यो-त्यों राज्य तंत्र और संसाधनों का उपयोग कर अपने अनुयायियों और समर्थकों को बुनियादी सेवाएँ देने की उनकी क्षमता घटती गई। ख़ास तौर पर, जनता की रक्षा करने की रुचि कम होने के साथ-साथ जनता को आपदाओं से बचाने की उनकी क्षमता कम होती चली गई। अमोनियम नाइट्रेट बंदरगाह के गोदाम में कैसे आया और छह साल से भी ज़्यादा समय तक वहाँ कैसे पड़ा रहा, इसका ब्योरा उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि निर्दयी, निष्क्रिय और आदिम/रूढ़िवादी लेबनानी सांप्रदायिक व्यवस्था पर सवाल करना जो कभी भी किसी सत्ताधारी को ज़िम्मेदार ठहराने में सक्षम नहीं रही है।

 

इस हादसे का आर्थिक परिणाम क्या होगा?

यद्यपि लेबनान उच्चमध्यमआय वाला देश माना जाता है, लेकिन सीरिया के संकट; तीस वर्षों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रभाव और उससे संबंधित अस्थायी आर्थिक नीतियों के प्रभाव; अक्टूबर 2019 में राजनीतिक वर्ग के ख़िलाफ़ शुरू हुए विद्रोह; इज़राइली आक्रमणों; और अब महामारी के संकट में लेबनान में पहले से मौजूद असमानताएँ तथा ग़रीबी और बढ़ी है। लेबनानी मुद्रा लीरा के मूल्य में सितंबर 2019 से 80% गिरावट आई है; इसके साथ अब लिक्विडिटी और ऋण संकट, घटती उपभोक्ता माँग और बढ़ती मुद्रास्फीति का हल करने की कोई उम्मीद नहीं बची है। विडंबना यह है कि इस आपदा के बाद सहायता के रूप में देश को जो धन मिलेगा, उससे शासक वर्ग को संजीवनी मिलेगी और इसका अवश्यंभावी पतन स्थगित हो जाएगा।

विश्व स्तर पर, लेबनान में आबादी के अनुपात के हिसाब से सबसे ज़्यादा संख्या में शरणार्थी रहते हैं एक अनुमान के हिसाब से इनमें पड़ोसी सीरिया से लगभग 15 लाख शरणार्थी और पीढ़ियों से अपनी मातृभूमि पर लौटने के अधिकार से वंचित 2 लाख फ़िलिस्तीनी शरणार्थी शामिल हैं। लेबनान में आज तेज़ी से बढ़ते वित्तीय वियोजन से पहले, 2019 में ही युवाओं में लगभग 40% बेरोज़गारी का अनुमान था, जबकि सीरिया के 73% शरणार्थी, 65% फ़िलिस्तीनी शरणार्थी, और 27% लेबनानी ग़रीबी में जी रहे थे। जून 2020 में, यह अनुमान लगाया गया था कि देश की लगभग आधी आबादी ग़रीबी में धकेली जा चुकी है। प्रवासी घरेलू मज़दूरजिनमें से लाखों ऐसे हैं जो क़ानूनी कफ़ला प्रणाली के तहत आधुनिक ग़ुलामों की तरह रहते हैंऔर भी ज़्यादा पीड़ित हैं; उनके मालिक उन्हें पैसा नहीं देते और उनके पास अपने देश लौटने का कोई रास्ता नहीं है। घरों, अस्पतालों, संगठनों और व्यापारोंविशेष रूप से बंदरगाह जहाँ से लेबनान देश की 80% आवश्यक वस्तुएँ आती हैंपर बरपे इस क़हर ने देश को हाशिए पर धकेल दिया है।

लेबनान अरब दुनिया में सबसे उन्नत स्वास्थ्य प्रणालियों में से एक हुआ करता था। लेकिन, लेबनानी शासक वर्ग की नवउदारवादी नीतियों ने स्वास्थ्य व्यवस्था को नष्ट कर दिया है, जो COVID-19 महामारी के चलते बिलकुल ध्वस्त हो चुकी है। देश में 26 सार्वजनिक और 138 निजी अस्पताल है; देश में ज़रूरी दवाओं का 90% और चिकित्सा उपकरणों का 100% आयात किया जाता है। चिकित्साकर्मी वेतन की कमी का विरोध कर चुके हैं; रोगियों को अस्पतालों में भर्ती नहीं किया जा सकता।

इस प्रमुख बंदरगाह के विनाश से देश में खाद्य और चिकित्सीय वस्तुओं की आपूर्ति करना लगभग असंभव हो गया है (त्रिपोली बंदरगाह सेज़्यादा से ज़्यादाबेरूत की तुलना में केवल 40% सामान ही लाया जा सकता है); विस्फोट की जगह के पास के अनाज भंडारजिनमें कई महीने का अनाज रखा थानष्ट हो गए हैं; दवा, खाद्य वस्तुओं और गैस पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी रद्द कर दिए जाने की संभावना है। 56 बिलियन डॉलर की आशावादी जीडीपी वाले देश को 5 बिलियन डॉलर से अधिक की आर्थिक क्षति हुई है।

 

इस हादसे का राजनीतिक परिणाम क्या होगा?

लेबनान में 17 अक्टूबर 2019 से भ्रष्टाचार और ख़राब होती सामाजिक स्थिति, पर्यावरण और राजनीति के संकटों के ख़िलाफ़ लगातार विरोध हो रहा है। पिछले नौ महीने से बिजली और पानी की नियमित सप्लाई, भ्रष्टाचार से मुक्त जवाबदेह संस्थानों, विश्वसनीय न्यायपालिका, एक सुरक्षित मुद्रा और साथ ही ग़ैरसांप्रदायिक राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली के लिए प्रदर्शन हो रहे हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रॉन बेरूत गए, उन्होंने राजनीतिक नेताओं को बुलवाया उन्हें राजकीय कौशल के बारे में समझाया, और धन देने और सुधारों के वादे किए। इस बीच, बेरूत के पास ही युवाओं ने फ्रांसीसी जेल में बंद राजनीतिक क़ैदी जॉर्ज इब्राहिम अब्दुल्ला को रिहा करने की माँग की; राजनीतिक गतिविधियों के मद्देनज़र फ्रांसीसी अधिकारियों ने अदालत के रिहाई के फ़ैसले को अस्वीकार कर दिया है। फ्रांसीसीनेतृत्व में हुए डोनर सम्मेलन से लेबनान के लिए 250 मिलियन यूरो की आपातकालीन सहायता राशि जुटाई गई है, लेकिन ये सहायता अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और उसकी सामाजिकआर्थिक शर्तों पर देश की निर्भरता को और बढ़ा देगी।

विस्फोट के बाद, कारेंटिना के श्रमिकवर्ग के मोहल्लों और गेम्मायज़े के कैफ़े मोहल्लों के पीड़ित लोगों की मदद और सड़कों की साफ़सफ़ाई करने के लिए सरकारी कर्मचारी नहीं बल्कि युवा आगे आए हैं। राजनीतिक वर्ग ने तुरंत विस्फोट से उत्पन्न हुएअवसरोंको भुनाना शुरू कर दिया, जबकि मृतकों और मलबे में दबे हुए लोगों को अभी निकाला जा रहा था।

8 अगस्त को, इस हादसे की जवाबदेही के साथ तत्काल जाँच और इस तबाही के लिए ज़िम्मेदार वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की गिरफ़्तारी की माँग करते हुए बड़े पैमाने पर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने मंत्रालयों और अन्य संस्थानों को घेरकर प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया कि यह देश उनका है और इस पर उनका हक़ है। सरकार ने इसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की, लेकिन जनता के हौसले नहीं तोड़ सकी।