लूला और प्रति-क्रांति के दौर की भयावह वास्तविकताएँ: पैंतालीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
ब्राज़ील के चुनावों में मज़दूरों ने चरम दक्षिणपंथ को हराया है। अब उन्हें जन आंदोलनों को मज़बूत करने और संप्रभु आर्थिक नीति के विकास का काम करना है।
पहाड़ी, कैंडिडो पोर्तिनारी (ब्राज़ील), 1933
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
लूला के नाम से प्रसिद्ध लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने 1989 से आठ बार ब्राज़ील के राष्ट्रपति बनने की कोशिश की है। चार बार (2002, 2006, 2022 और 2026) उन्होंने यह पद हासिल किया है। अपनी हालिया जीत के समय लूला की उम्र अस्सी वर्ष है। 1969 में साओ बर्नार्डो दो कांपो और डियाडेमा में धातु कामगार संघ का नेतृत्व करने से लेकर इन चुनावों तक लूला की राजनीतिक पारियों के दौरान ब्राज़ील या तो सैन्य तानाशाही (1964-1985) के तहत रहा या एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिसमें पुराने शासक वर्गों और वॉशिंगटन में बैठे उनके सहयोगियों का पलड़ा भारी रहा है। शक्तियों के इस संतुलन की वजह से राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी लूला वह सब नहीं कर पाए जो कर सकते हैं।
इस साल के चुनावों का मुख्य नारा था बोरा लूला यानी ‘चले चलो, लूला’। लेकिन जाना कहाँ है? दूसरे दौर के मतदान से पहले ब्राज़ील के मज़दूर और किसान, हाशिए पर धकेले गए इलाक़ों में रह रहे यहाँ के निवासी, और भूमि तथा आवास के लिए चल रहे यहाँ के आंदोलनों से जुड़ी जनता भारी संख्या में सड़कों पर उतरी ताकि अपनी माँगों को सामने रखे और फ्लावियो बोल्सोनारो के नेतृत्व में सत्ता में वापसी करने की कोशिश कर रहे चरम दक्षिणपंथ को रोका जा सके। लेकिन राष्ट्रपति पद पर लूला के तीन कार्यकालों के बाद भी इन सीमाओं को सैद्धांतिक या अमूर्त नहीं कहा जा सकता। चुनाव जीत लेने से पूँजी की सत्ता ख़त्म नहीं हो जाती, भूमि सुधार नहीं हो जाते, रोज़गार की अनिश्चितता ख़त्म नहीं हो जाती या वे संस्थान ध्वस्त नहीं हो जाते जिनके ज़रिए अमीर अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं। लूला की जीत ने संघर्ष से हासिल की गई लोकतांत्रिक और सामाजिक उपलब्धियों को चरम दक्षिणपंथ से बचाया है लेकिन इससे प्रति-क्रांति के दौर के मुश्किल हालात बदल नहीं गए।
धन, पिएत्रीना केक्काची (ब्राज़ील), 1967
नब्बे के दशक के शुरूआती दौर से, जिसे नवउदारवाद या भूमंडलीकरण जैसे व्यंजनात्मक नाम दिए गए, प्रतिक्रांति की ताक़तों का दुनिया भर में एक नया दबदबा कायम हुआ है। इससे पहले के दशकों में सैन्य तख़्तापलट और जबरन सत्ता परिवर्तन के चक्रों ने पहले ही राष्ट्रीय मुक्ति और समाजवादी ताक़तों को दबाने के प्रयास किए। अस्सी के दशक का ऋण संकट और सोवियत संघ के विघटन ने अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के संतुलन को निर्णायक रूप से बदल दिया और प्रति-क्रांति के हमले को सुगठित होने दिया। सोवियत संघ ने कुछ हद तक साम्राज्यवाद को रोका हुआ था लेकिन अब साम्राज्यवाद को उन सरकारों को दंडित करने की ज़्यादा छूट मिल गई जो उसकी सत्ता का विरोध कर रही थीं। इस दौर को नवउदारवाद और भूमंडलीकरण जैसे नाम दिए गए, वे इसकी अहम नीतियों और आर्थिक एकीकरण के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को ज़ाहिर करते हैं, लेकिन इसके राजनीतिक सार को अमूर्त बना देते हैं। एक अवधारणा के रूप में प्रतिक्रांति उन उपलब्धियों को संगठित ढंग से पलटने की प्रक्रिया को बताती है, जो समाजवादी आंदोलनों, मज़दूर वर्ग के संघर्षों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के ज़रिए हासिल की गई थीं। यह स्पष्ट करती है कि किन ताक़तों ने आगे बढ़कर अपनी स्थिति मज़बूत की और किन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा।
1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना इस महत्त्वाकांक्षा को व्यक्त करती थी कि दुनिया भर में एक ही वैश्विक व्यापार व्यवस्था कायम की जाए। काफ़ी असमान इतिहास और उत्पादक क्षमताओं वाले देशों पर एक जैसे नियम इस तरह लागू हुए जिससे शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय निगमों को फ़ायदा हुआ। इसके साथ ही बौद्धिक संपदा से जुड़े नए प्रतिबंधों ने उत्पादक क्षमता का विकास करने के लिए अहम प्रौद्योगिकियों तक पहुँच को सीमित कर दिया। पूँजी-खाता उदारीकरण ने रफ़्तार पकड़ी, जबकि सेवाओं में व्यापार पर सामान्य समझौते (GATS) के 1997 के पाँचवें प्रोटोकॉल ने वित्तीय बाज़ारों को विदेशी वित्तीय फर्मों के लिए और अधिक खोल दिया। जैसे-जैसी पूँजी गतिशील होती गई, देशों पर निवेश आकर्षित करने की होड़ में शामिल होने का दबाव झेलना पड़ा जबकि नवउदारवादी सुधारों ने पूँजी पर नियंत्रण, वित्त पर सार्वजनिक नियंत्रण और केंद्रीय योजना को कमज़ोर कर दिया। इसके साथ ही, बहुराष्ट्रीय वित्त का बहुत ज़्यादा विस्तार हुआ। ब्लैकरॉक परिसंपत्ति प्रबंधन के असाधारण विस्तार को दर्शाता है: इसकी प्रबंधन के अधीन परिसंपत्तियाँ 1999 में $165 अरब से बढ़कर सितंबर 2026 तक $15.5 खरब हो गईं – नाममात्र रूप से 1999 के स्तर से लगभग चौरानबे गुना। गोल्डमैन सैक्स इसी तरह बैंकिंग और निवेश प्रबंधन के विस्तार को दर्शाता है, जिसकी कुल परिसंपत्तियाँ 1999 में लगभग $250 अरब से बढ़कर 2025 में $1.81 खरब हो गईं, जो सात गुना वृद्धि है।
पाराती में दिव्यात्मा का उत्सव, डजानिरा दा मोट्टा ई सिल्वा (ब्राज़ील), 1960
पूरे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में, सामाजिक-लोकतांत्रिक और उदारवादी दलों ने ज़्यादा-से-ज़्यादा नवउदारवादी रुझान को अपनाया, और समाज कल्याण तथा श्रमिक वर्ग की शक्ति के विस्तार की अपनी पुरानी प्रतिबद्धताओं को भुला दिया। इसका मतलब यह था कि अब वामपंथी रुझानों वाले दलों को लोकतांत्रिक अधिकारों और समाज कल्याण के लिए संघर्ष का ज़्यादा भार उठाना पड़ा। जबकि ये दल ख़ुद यूएस साम्राज्यवाद के सीधे हमलों और उत्पादन प्रक्रिया की पुनर्संरचना तथा अस्सी के दशक के बाद से अनिश्चित रोज़गार बढ़ने की वजह से कमज़ोर हो रहे थे। सोवियत संघ के विघटन के साथ कई कम्युनिस्ट और वामपंथी पार्टियाँ ख़त्म हो गईं या उन्होंने अपनी दिशा बदल ली या काफ़ी ज़्यादा कमज़ोर हो गईं, जबकि सशस्त्र आंदोलन लगातर जारी सैन्य हमले के चलते कमज़ोर हो गए (जैसे भारत में माओवादी) या धीरे-धीरे बिखर गए (जैसे कोलंबिया का FARC-EP और तुर्की का PKK)। इस दौर में बेशक कई बेहद ज़रूरी सफलताएँ भी हासिल की गईं, जैसे 1994 में दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेदी शासन का अंत, 1998 में वेनेज़ुएला में बोलीवारियन प्रक्रिया की शुरुआत और 2008 में नेपाल में राजशाही का अंत। लेकिन इनमें से हरेक मामले में राष्ट्रीय-लोकतांत्रिक परिवर्तन के बावजूद पूँजीवादी संपत्ति संबंध बरक़रार रहे। बोलीवारियन प्रक्रिया इनमें से सबसे ज़्यादा सफल हो पाई। इसने समाजवादी सामुदायिक संस्थानों के निर्माण सहित अन्य तरीक़ों से राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव किए, लेकिन यह कच्चे तेल के निर्यात पर निर्भरता से वेनेज़ुएला को उबार नहीं पाई।
इन परिस्थितियों में, वामपंथ के व्यापक हिस्से ने अपने व्यावहारिक कार्यक्रमों को तीन आपस में जुड़े उद्देश्यों के इर्द-गिर्द विकसित किया : लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करना, सामाजिक कल्याण की योजनाओं को बनाए रखना और उनका विस्तार करना तथा ऐसी बहुपक्षीय संस्थाओं का निर्माण करना, जिनसे देशों को अपने विकास की नीतियाँ स्वतंत्र रूप से तय करने की अधिक गुंजाइश मिल सके। लूला के नेतृत्व में ब्राज़ील के अनुभव को इसी व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
फल बेचने वाला, तार्सिला दो अमाराल (ब्राज़ील), 1925
लोकतंत्र: 1975 में लूला अपनी यूनियन के अध्यक्ष चुने गए और जल्दी ही वे सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ मज़दूर आंदोलन की नेतृत्वकारी भूमिका में आ गए। 1978 और 1980 के बीच हुई हड़तालों और 1980 में वर्कर्स पार्टी (PT) की स्थापना को आज भुला दिया गया है। इनमें लूला ने अहम भूमिका निभाई थी और तानाशाही को कमज़ोर करने तथा लोकतंत्र की ओर वापसी की प्रक्रिया को तेज़ करने में भी। ये संघर्ष उस व्यापक विपक्षी आंदोलन का हिस्सा थे जिन्होंने 1985 में सैन्य शासन का ख़ात्मा किया। श्रमिक वर्ग का संगठन, साथ ही किसान संघर्ष—जो 1984 में स्थापित भूमिहीन श्रमिक आंदोलन (MST) के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने वाले थे—ने ट्रेड यूनियनों के संगठित होने, समाचार पत्र प्रकाशित करने, राजनीतिक दलों का निर्माण करने और चुनाव लड़ने के अधिकारों के लिए संघर्ष का विस्तार किया। पूरे दक्षिण अमेरिका में, चरम दक्षिणपंथ और उसके सहयोगियों ने लोकतांत्रिक सफलताओं को पलटने के लिए वामपंथ के ख़िलाफ़ सब हथकंडे अख़्तियार किए। इनमें शामिल हैं क़ानूनी हमला जैसे ब्राज़ील में डिल्मा रूसेफ़ पर चलाया गया 2016 का अभियोग और इक्वाडोर में राष्ट्रपति पद की पूर्व उम्मीदवार लुइसा गोंज़ालेज़ की हालिया गिरफ़्तारी; तथा सीधे सैन्य हस्तक्षेप, जैसे इस साल जनवरी में यूएस ने वेनेज़ुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मदूरो तथा फ़र्स्ट लेडी और राष्ट्रीय असेंबली सदस्य सिलिया फ्लोरेस को अगवा कर लिया। लूला के फिर से जीतने से संघर्ष करके हासिल की गईं लोकतांत्रिक उपलब्धियों की रक्षा तो होती है, लेकिन इससे चुनावों के बीच के दौर में अपने-आप जन भागीदारी बढ़ नहीं जाती। युवाओं के समूहों और 1 करोड़ फ़ॉलोअर वाले Exército do Lula (लूला की सेना) व्हाटस्एप ग्रुप जैसे डिजिटल अभियानों सहित MST और अन्य जन संगठनों ने चुनाव अभियान के दौरान लोगों को लामबंद करने में सक्रिय भूमिका निभाई, ख़ासतौर से दूसरे चरण के मतदान से पहले। अगले कुछ सालों में, मज़दूर संगठनों, स्थानीय संगठनों, किसान आंदोलनों और शहरी ग़रीबों के आंदोलनों को अपनी सामाजिक शक्ति बढ़ानी होगी ताकि पूँजी, बहकावे, और संगठित दबाव के सामने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की कमज़ोरी कुछ कम हो। उन्हें उन क्षेत्रों में विचारों और भावनाओं की लड़ाई का नेतृत्व भी करना चाहिए जहाँ चरम दक्षिणपंथी ताकतों ने मजबूत गढ़ बना लिए हैं, जैसे सोशल मीडिया और आस्था-आधारित समुदाय।
समाज कल्याण: अपने पिछले तीन कार्यकालों में लूला ने स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशनों, शिक्षा, आवास और आय समर्थन के ज़रिए समाज कल्याण को विस्तार देने का संघर्ष लड़ा है। ब्राज़ील की सांख्यिकीय संस्था (IBGE) की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2023 में 27.3% के मुक़ाबले 2024 में ग़रीबी घटकर 23.1% हो गई है – हालाँकि यह अब भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा है जैसा नहीं होना चाहिए, लेकिन यह दर तीन साल से लगातार घट रही है। ये सिर्फ़ गिरावट के आँकड़े नहीं हैं, ये लोग हैं जो अब अपनी ज़रूरत की चीज़ें ख़रीद पा रहे हैं, बच्चे हैं जो पहले से ज़्यादा सुरक्षित हैं और परिवार हैं जो कुछ हद तक गरिमा प्राप्त कर पा रहे हैं। पुनर्वितरण से आर्थिक शक्ति नहीं बदल जाती और न ही इससे उन उत्पादक शक्तियों का निर्माण हो पाता है जो अनिवार्य होते हुए भी सीमित हैं। तानाशाही के बाद के दौर में, ब्राज़ील में लगातार विऔद्योगीकरण हुआ है, साथ ही निवेश भी निचले स्तर पर बना रहा, ख़ासतौर से आधारभूत ढाँचे में। अगर एक मज़बूत उत्पादक आधार न बनाया जाए और सार्वजनिक आय का विस्तार न किया जाए तो सामाजिक कार्य वित्त और अमीरों के हितों वाले राजनीतिक जोड़-तोड़ के सामने कमज़ोर बने रहेंगे, न कि सतत आय वृद्धि और एक व्यापक कर आधार में इनका आधार बन पाएगा। लूला के शासन के तीन कार्यकालों में सामाजिक क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई, लेकिन इसे संभव बनाने वाले राजनीतिक समझौतों ने उनकी आगे की राह भी सीमित कर दी। इन समझौतों ने उन गठबंधनों की ताक़त भी ख़त्म कर दी, जिनके सहारे सरकार से हर छोटी-से-छोटी रियायत हासिल करने के लिए संघर्ष किया जा सकता था। इसी थकान और निराशा के बीच दक्षिणपंथी ताक़तें पनपती हैं। वे असुरक्षित रोज़गार से पैदा होने वाली बेबसी और अपमान की भावना को प्रवासियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वामपंथ के प्रति आक्रोश में बदल देती हैं। जब तक उन सामाजिक संबंधों और व्यवस्थाओं को नहीं बदला जाता, जो असुरक्षा को बनाए रखते हैं, तब तक मानवीय गरिमा की रक्षा करना और उसे बढ़ावा देना मुश्किल बना रहता है। रोज़मर्रा के जीवन की भावनाओं के इस जटिल धरातल पर दक्षिणपंथ की सरलीकृत और ख़तरनाक व्याख्याएँ लोगों के मन में जगह बना सकती हैं।
इतान्याएम के मकान, अल्फ्रेदो वोल्पी (ब्राज़ील), 1940 के दशक के अंत में
बहुपक्षवादः अपने पहले कार्यकाल से ही लूला ने वैश्विक दक्षिण के देशों में संप्रभुता की मौजूदा संभावनाओं को विस्तार देने के लिए दक्षिण-दक्षिण व्यापार और सहयोग को बढ़ावा दिया है। 2004 में क्यूबा और वेनेज़ुएला के साथ ब्राज़ील ALBA प्रक्रिया में भागीदार नहीं बना, लेकिन क्षेत्रीय समन्वय के लिए अपनी प्रतिबद्धता के हिस्से के रूप में इसने 2008 में वेनेज़ुएला के साथ यूनियन ऑफ़ साउथ अमेरिकन नेशन्स (UNASUR) का गठन किया। 2009 में ब्रिक्स की स्थापना से वैश्विक दक्षिण के बड़े देशों से मिलकर एक व्यापारिक गुट बना, तब से इस समूह का विस्तार होता आ रहा है और वैश्विक शासन में सुधार लाने की बहस में यह ज़्यादा-से-ज़्यादा हिस्सा ले रहा है। चुनाव से ठीक पहले, ब्राज़ील ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, कनाडा, यूरोपीय संघ, भारत और केन्या के साथ पार्टनर्स फॉर मल्टीलैटरलिज्म (P4M) का प्रारंभिक सह-प्रायोजक बना—यह बहुपक्षीय व्यवस्था की रक्षा और सुधार के लिए एक पहल है। साथ मिलकर, ये पहलें लूला की इस समझ को दर्शाती हैं कि ब्राज़ील को पश्चिम और दक्षिण के बीच एक सेतु की भूमिका निभानी चाहिए और उसकी ‘सक्रिय और गौरवपूर्ण विदेश नीति’ (política externa ativa e altiva) होनी चाहिए, जिसका अर्थ है कि उसे केवल पश्चिमी प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, बल्कि स्वयं बहुपक्षीय मंचों को आकार देने में मदद करनी चाहिए। ऐसा सहयोग अलग-अलग वर्ग परियोजनाओं वाली सरकारों को एक साथ लाता है और इसलिए अपने आप में सामाजिक परिवर्तन के किसी साझा कार्यक्रम का संकेत नहीं देता। इसका अधिक सीमित किंतु महत्त्वपूर्ण उद्देश्य संप्रभु क्षेत्र की रक्षा करना और विकास के लिए वित्त तक पहुँच का विस्तार करना है, उदाहरण के लिए, दक्षिण के देशों द्वारा बनाई गई संस्थाओं जैसे वर्तमान में ब्राज़ील की पूर्व राष्ट्रपति दिल्मा रूसेफ के नेतृत्व वाले न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से।
प्रतिक्रांति के इस दौर में इन तीनों मोर्चों ने कई ऐसी उपलब्धियों को बचाए रखा है, जिन्हें खोना नहीं चाहिए। लेकिन जब ये रक्षात्मक कार्यक्रम ही राजनीति का पूरा एजेंडा बन जाते हैं, जैसा कि अक्सर होता है, तो उनकी सीमाएँ ख़तरनाक हो जाती हैं। लोगों को सिर्फ़ भूख से छुटकारा पाने की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि यह समझने की भी ज़रूरत है कि असुरक्षा बार-बार क्यों लौट आती है। उन्हें उस राजनीतिक ताक़त का निर्माण भी करना होगा, जिसके सहारे वे उन व्यवस्थाओं को बदल सकें, जो इस असुरक्षा को लगातार बनाए रखती हैं। ऐसा नहीं होने पर लोगों की निराशा का फ़ायदा वे ताक़तें उठा सकती हैं, जो विद्रोह का झूठा आभास तो देती हैं, लेकिन वास्तव में धन-संपत्ति के मालिकों की ताक़त को और मज़बूत करती हैं। ब्राज़ील के इस कड़े चुनाव में लगभग ऐसा ही हुआ। प्रति-क्रांति अपने को आंशिक रूप से इस तरह बनाए रखती है कि वह शोषितों को यह विश्वास दिलाती है कि मुक्ति असंभव है।
लाल पहाड़ी, लासार सेगाल (ब्राज़ील), 1926
ब्राज़ील के मज़दूर वर्ग ने लाखों की संख्या में सामने आकार बोल्सोनारो को हराया, और इस उपलब्धि के रूप में लूला की जीत का जश्न ज़रूर मनाया जाना चाहिए। लेकिन अब आगे का काम शुरू करने की ज़रूरत है: आंदोलनों को मज़बूत किया जाना है ताकि लोगों को उनकी पीड़ाओं से मुक्ति दिलाने की प्रक्रिया जारी रह सके, और ब्राज़ील की उत्पादक शक्तियों को विकसित करने के लिए एक संप्रभु आर्थिक नीति का निर्माण किया जाए। भविष्य हमेशा के लिए किसी एक नेता की बहुमत जुटाने की असामान्य क्षमता पर निर्भर नहीं रह सकता। लूला के बाद उनकी जगह लेने वाला एक और नेता खोजने की बजाय ज़रूरी है एक ऐसा सक्षम वामपंथ बनाना जो हज़ारों लूला खड़े कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो हम वक़्त बदल पाएँगे और प्रति-क्रांति का दौर के ऐसे नए दौर में बदल जाएगा जहाँ क्रांतिकारी उम्मीदों को साकार किया जा सकेगा।
चुनाव अभियान के दौरान चिको बुआर्के, काइतानो वेलोसो, जिल्बेर्तो जिल, डैनियेला मर्करी, शामा और एबोनी जैसे कई उल्लेखनीय ब्राज़ीलियाई कलाकारों ने ‘बोरा लूला’ गीत गाया। जीत के बाद वह गीत अब शायद कम सुना जाए, लेकिन उसकी टेक प्रतिदिन ब्राज़ील की सड़कों पर गूँजती रहनी चाहिए:
Nosso povo tá na rua
A mudança continua.हमारे लोग सड़कों पर हैं।
बदलाव जारी है।
स्नेह सहित,
विजय