ध्रुवीकरण से परे एक दुनिया: तैंतालीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
वॉशिंगटन की घटती ताक़त से नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन इससे वित्त, तकनीक और उत्पादन पर बड़ी कंपनियों का एकाधिकार अपने-आप ख़त्म नहीं हो जाएगा।
बादलों के भीतर और बाहर, संख्या 13, लाओ तोंगली (चीन), 2025
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
सोवियत संघ के विघटन के बाद के तीन दशकों तक लगातार छपने वाली किताबों और समाचारों में हमें यही बताया जाता रहा कि दुनिया का अब एक ही केंद्र रह गया है—संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस)। शीत युद्ध के अंत के क़रीब, 1990 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने एक ‘नई विश्व व्यवस्था’ की बात कही थी। इस उभरती हुई विश्व व्यवस्था में वॉशिंगटन तय करेगा कि राजनीति की कौन-सी सीमाएँ स्वीकार्य हैं, अमेरिकी सेना उन सीमाओं की निगरानी करेगी और अमेरिकी वित्तीय संस्थाएँ उन देशों की आर्थिक नीतियाँ तय करेंगी, जिन्होंने लंबे और कठिन संघर्षों के बाद आज़ादी हासिल की थी। हमें बताया गया कि इतिहास के बड़े वैचारिक संघर्ष अब समाप्त हो चुके हैं। ‘एकध्रुवीय क्षण’ (Unipolar Moment) पद ने इस व्यवस्था को एक ऐतिहासिक तथ्य का रूप दे दिया। इसके पीछे एक राजनीतिक दावा था: समाजवाद और साम्यवाद अब अप्रासंगिक हो चुके हैं और उदार पूँजीवाद का अमेरिकी मॉडल ही भविष्य का एकमात्र रास्ता है।
आज यह दावा अपनी प्रामाणिकता लगभग खो चुका है क्योंकि दुनिया के कुछ हिस्सों में अपना आदेश चलाने की वॉशिंगटन की ताक़त काफ़ी घट गई है और बाक़ी हिस्सों में इसे काफ़ी प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान में हमने समीर अमीन की किताब ‘कैपिटलिज्म इन द एज ऑफ ग्लोबलाइजेशन‘ (1997) में वर्णित ‘केंद्र के पाँच एकाधिकार‘ के ढाँचे का उपयोग किया है: प्रौद्योगिकी, वैश्विक वित्त, प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच, अंतरराष्ट्रीय संचार और मीडिया, और सामूहिक विनाश के साधन। इस रूपरेखा के आधार पर हमने पाया कि कच्चे माल, वित्त और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पर यूएस और इसके सहयोगियों के वर्चस्व को तो काफ़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन सैन्य शक्ति और सूचना पर इनके वर्चस्व की जड़ें बहुत गहरी हैं। इनमें से तीन क्षेत्रों में यूएस के नेतृत्व वाली शक्ति का यह क्षरण काफी हद तक चीन की औद्योगिक और तकनीकी प्रगति, पश्चिमी प्रतिबंधों और अन्य प्रकार के दबावों का सामना करने वाले देशों की प्रतिरोध क्षमता, और वैश्विक दक्षिण में संप्रभु विकास के पक्ष में एक नए रुझान को दर्शाता है। ब्रिक्स+ का विस्तार हालाँकि काफ़ी जटिल है लेकिन इससे भी दिखाई देता है कि उन देशों के सामने और भी संभावनाएँ बरक़रार हैं, जिन्होंने उपनिवेशवाद की मार झेली है और उसके बाद नव-उपनिवेशवादी शक्तियाँ इन्हें अपने अधीन रखने का प्रयास कर रही हैं।
वॉशिंगटन के घटते प्रभुत्व की वजह से परिस्थिति में आए बदलाव को व्याख्यायित करने के लिए एक बार फिर से ‘बहुध्रुवीय’ शब्द उभर आया है। यह संभावना सच लगने लगी है कि कोई एक देश पूरी दुनिया के भविष्य का निर्धारण नहीं करेगा, लेकिन बहुध्रुवीय दुनिया बनाने की इच्छा के साथ-साथ इन बदलावों को समझना और उनका विश्लेषण करना भी ज़रूरी है। हमारे नए डोसियर बीयोंड पोलैरिटी: फ़ॉर अ मार्क्सिस्ट थियोरी ऑफ़ द वर्ल्ड ऑर्डर (अक्टूबर 2026) [ध्रुवीकरण से परे: विश्व व्यवस्था के लिए एक मार्क्सवादी अवधारणा] की शुरुआत इस बात पर ज़ोर देते हुए होती है कि दुनिया में ताकत का संतुलन कैसे बदल रहा है, यह देखने के साथ-साथ हमें यह भी समझना चाहिए कि इस व्यवस्था को बनाए रखने वाले सामाजिक संबंध क्या हैं। यह सवाल करता है कि उत्पादन और प्रौद्योगिकी, पूँजी संचय, वर्ग संबंध और संघर्ष, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त को अनुशासित करने वाले नियम कैसे राष्ट्रों के बीच सत्ता को आकार देते हैं। कुल मिलाकर, ये गतिशीलताएँ विश्व व्यवस्था के ऐसे आयाम उजागर करती हैं जिन्हें ध्रुवीयता की भाषा पर्याप्त रूप से नहीं समझा सकती। ये सत्ता की उन निरंतरताओं को भी सामने लाती हैं जिन्हें राज्य-केंद्रित ढाँचा अस्पष्ट कर देता है।
निस्संदेह विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया में स्थानांतरित हो चुका है, और चीन इसकी धुरी बन गया है। साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों ने विस्तृत अड्डों और गठबंधनों के नेटवर्क के माध्यम से एक अति-साम्राज्यवादी सैन्य ढाँचे को बनाए रखा है, जबकि डॉलर वैश्विक वित्त में केंद्रीय बना हुआ है। इन सभी बदलावों के बावजूद, देशों के बीच आर्थिक ताक़त के बँटवारे के बराबर कॉर्पोरेट शक्ति का बँटवारा नहीं हुआ है। 31 मार्च 2026 तक, दुनिया की दस सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों – जिनमें से आठ का मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका में है – का वैश्विक शेयर बाजार पूंजीकरण में लगभग एक-छठा हिस्सा हासिल किया: Nvidia, Apple, Alphabet, Microsoft, Amazon, Saudi Aramco, Broadcom, Meta, TSMC और Tesla। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास (UNCTAD) की 2025 की रैंकिंग भी ऐसी ही चौंकाने वाली तस्वीर पेश करती है। यह रैंकिंग 2024 के आँकड़ों के आधार पर, विदेशों में मौजूद परिसंपत्तियों के हिसाब से ग़ैर-वित्तीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बनाई गई थी। इसमें शीर्ष दस कंपनियों के मुख्यालय अमेरिका, पश्चिमी यूरोप या जापान में थे। ये कंपनियाँ हैं: Shell (यूनाइटेड किंगडम), Toyota (जापान), Volkswagen (जर्मनी), TotalEnergies (फ्रांस), Deutsche Telekom (जर्मनी), BP (यूनाइटेड किंगडम), Stellantis (नीदरलैंड), Microsoft (संयुक्त राज्य अमेरिका), Exxon Mobil (संयुक्त राज्य अमेरिका) और Anheuser-Busch InBev (बेल्जियम)। किसी देश का उत्पादन और निर्यात बढ़ सकता है लेकिन उसकी कंपनियाँ फिर भी ऐसी तकनीकों पर निर्भर बनी रहती हैं जिन पर उनका नियंत्रण नहीं है और ऐसे वाणिज्यिक नेटवर्कों पर जिनकी शर्तें वे तय नहीं कर सकतीं।
कोमालापा चौक, आंद्रेस कुर्रुचिच कूमेज़ (ग्वाटेमाला), तिथि अज्ञात
कंपनियाँ अपनी ताकत का इस्तेमाल ऐसी जगह पर नहीं करतीं, जहाँ राज्यों की कोई भूमिका न हो। वे सरकारी शोध और बुनियादी ढाँचे पर निर्भर होती हैं, अपने संपत्ति संबंधी दावों को लागू करवाने के लिए अदालतों पर और अपने हितों की रक्षा के लिए सरकारों पर निर्भर होती हैं—कभी-कभी सरकारें इसके लिए सैन्य बल का भी इस्तेमाल करती हैं। राजनीतिक सत्ताओं के द्वारा जो समझौते बरक़रार रखे जाते हैं उन्हीं के ज़रिए पूँजी राष्ट्रों की सरहदें लाँघती है। अंतरराष्ट्रीय पूँजी की जड़ें घरेलू वर्गीय संबंधों में होती हैं, जिनके तहत शासक वर्ग के कुछ हिस्से उन समझौतों से मुनाफ़ा कमाते हैं जो उनके समाजों को विदेशी पूँजी के अधीन बनाते हैं और देशों के संप्रभु विकास में रुकावट पैदा करते हैं। इसलिए साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष हरेक समाज के भीतर भी चलता है और राष्ट्रों के बीच भी।
कंपनियों की ताक़त इसलिए भी बनी हुई है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के ढाँचे में अब तक ऐसे बदलाव नहीं किए गए हैं कि वे पूर्व उपनिवेश रहे देशों की आकांक्षाओं को पूरा कर सके। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में मताधिकार की एक असमान व्यवस्था है। वहाँ सबको बराबर अधिकार नहीं है। मताधिकार हर देश के कोटे के हिसाब से तय होता है, यानी जिस देश का कोटा जितना बड़ा होता है, उसकी मतदान में उतनी ही अधिक हिस्सेदारी होती है। आईएमएफ के काम करने के तरीक़े का उसका अपना विवरण स्वयं इस असमान व्यवस्था को स्पष्ट करता है। आईएमएफ के मतदान शेयरों और जनसंख्या आँकड़ों के आधार पर हमारे संस्थान की एक गणना में पाया गया कि प्रति व्यक्ति वैश्विक उत्तर के पास वैश्विक दक्षिण की तुलना में नौ गुना अधिक मतदान शक्ति है। विश्व अर्थव्यवस्था में आए बदलावों के बावजूद, उन लोगों को निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिला है, जिनकी मेहनत और संसाधनों के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था चलती है।
एलेवेटर्स, ऐल्फ़्रेडो गुट्टेरो (अर्जेंटीना), 1928
वहीं, विश्व व्यापार संगठन (WTO) का बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधी पहलुओं पर समझौता (जिसे TRIPS के नाम से जाना जाता है) सदस्य देशों के लिए यह ज़रूरी बनाता है कि वे पेटेंट और बौद्धिक संपदा के अन्य अधिकारों की सुरक्षा के लिए न्यूनतम मानक बनाए रखें। हालाँकि, इस समझौते में कुछ छूट के प्रावधान भी हैं, लेकिन इन अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से कंपनियों को अपनी बौद्धिक संपदा पर ऐसे कानूनी अधिकार मिल जाते हैं, जिन्हें वे कई देशों में लागू करवा सकती हैं। गरीब देशों को अपनी विकास संबंधी ज़रूरतें पूरी करने के लिए ऐसे अधिकार हासिल नहीं हैं। तकनीक तक पहुँच आज भी ऐसे नियमों से तय होती है, जो कंपनियों के स्वामित्व और उनसे होने वाली कमाई की रक्षा करते हैं। ऐसी संस्थाएँ उन असमानताओं को बनाए रखती हैं, जो औपनिवेशिक शासन से विरासत में मिली हैं। ये असमानताएँ उन नियमों और प्रक्रियाओं में भी दिखाई देती हैं, जिनके तहत औपचारिक रूप से स्वतंत्र देशों का शासन चलता है।
यही हमारे डोसियर का मुख्य विचार है। अपनी इच्छा दूसरों पर लादने में वॉशिंगटन का घटता प्रभाव बेशक महत्त्वपूर्ण संभावनाओं को जन्म दे सकता है लेकिन ये संभावनाएँ अपने-आप कॉर्पोरेटों के एकाधिकार या नव-उपनिवेशवादी निर्भरता पैदा करने वाले संस्थागत समझौतों को ख़त्म नहीं कर देंगी। और न ही यूएस के दबाव का प्रतिरोध करने वाले देशों के बीच सहयोग का यह अर्थ है कि उन देशों का सामाजिक चरित्र एक जैसा है। उनके स्वामित्व के रूप, उनकी योजना प्रणालियाँ, और जनशक्तियों तथा शासक वर्गों के बीच का संतुलन अब भी निर्णायक तत्व बने हुए हैं। हमें यह पूछना चाहिए कि संप्रभुता के किसी विशिष्ट प्रयोग से क्या संभव होता है और उस संभावना का उपयोग करने की शक्ति किसे मिलती है। राष्ट्रीय नीति-क्षेत्र की पुनर्प्राप्ति और कॉर्पोरेट शक्ति को सीमित करने में सक्षम अंतरराष्ट्रीय नियमों का निर्माण एक ही संघर्ष के अंग हैं।
शहर में नल से पानी भरते लोग, जॉर्ज लिलांगा (तंजानिया), 2002
यहाँ एक ऐसा इतिहास है जिसे लौटा लाने की ज़रूरत है। 1974 में, जब तीसरी दुनिया के देशों ने नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग को आगे बढ़ाया, तो संयुक्त राष्ट्र ने बहुराष्ट्रीय निगमों पर केंद्र (UNCTC) की स्थापना की और उसी वर्ष बाद में बहुराष्ट्रीय निगमों पर आयोग की स्थापना की। साथ मिलकर इन निकायों ने कॉर्पोरेट शक्ति को अंतरराष्ट्रीय जाँच का विषय बनाने में मदद की। UNCTC ने सूचना एकत्र की, कॉर्पोरेट गतिविधि पर शोध किया, नीति विश्लेषण किया, और सरकारों को तकनीकी सहायता प्रदान की। बड़े निगमों के साथ बातचीत करने वाले देशों को औपचारिक स्वतंत्रता को आर्थिक संप्रभुता में बदलने के लिए ज्ञान और संस्थागत क्षमता की ज़रूरत थी।
1976 में, आयोग ने बहुराष्ट्रीय निगमों पर संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावित आचार संहिता पर काम शुरू किया। इसका दायरा स्वैच्छिक कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व की अपीलों से कहीं बड़ा था। मसौदे में राष्ट्रीय संप्रभुता और मेज़बान देशों के विकास लक्ष्यों के प्रति कॉर्पोरेट सम्मान, उनके राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, कराधान [taxation] और अंतरण मूल्य निर्धारण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सूचना ज़ाहिर करने, श्रम परिस्थितियाँ, और पर्यावरण संरक्षण के बारे में चर्चा की गई। इसमें इस बात का भी ज़िक़्र था कि राज्यों को बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। उन नियमों के बारे में वार्ताएँ हुईं जिनके तहत गहरी असमानता से ग्रस्त रिश्तों को अनुशासित किया जाना चाहिए। इसमें यह भी शामिल था कि संहिता के दायित्व बाध्यकारी होंगे या स्वैच्छिक।
ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ, जे.पी. मीका (कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य), 2014
यह राजनीतिक समझ आज भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। कोई कंपनी कई देशों में एक ही रणनीति के तहत अपना काम चला सकती है, जबकि उसे नियंत्रित करने की कोशिश करने वाली सरकारें राष्ट्रीय सीमाओं और सूचनाओं तक असमान पहुँच के कारण बँटी रहती हैं। इन सरकारों के बीच सहयोग से कंपनियों की इस बँटवारे का फ़ायदा उठाने की क्षमता कम की जा सकती है। कंपनियों को अपने कामकाज की जानकारी सार्वजनिक करने के नियमों से उनके काम में पारदर्शिता आ सकती है। कराधान के साझा नियमों से सरकारें अपने राजस्व की रक्षा कर सकती हैं और तकनीक हस्तांतरण की व्यवस्थाओं से देश के भीतर तकनीकी क्षमताओं का विकास हो सकता है। आर्थिक स्वतंत्रता के लिए ऐसी संस्थाओं की ज़रूरत है, जो पूँजी के अंतरराष्ट्रीय संगठन का मुक़ाबला कर सकें।
इस संहिता को कभी स्वीकार नहीं किया गया। इस पर बातचीत 1980 के पूरे दशक में चलती रही, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। ताकतवर कंपनियों और पश्चिमी देशों के विरोध के साथ-साथ कर्ज़ का संकट भी सामने आया, जिससे तीसरी दुनिया के देशों की मोलभाव करने की ताकत कमजोर पड़ गई। इसी दौरान नवउदारवादी नीतियों की ओर बढ़ते रुझान ने उस संस्थागत ढाँचे को भी बदल दिया, जिसके भीतर यह प्रयास किया जा रहा था। 1992 में, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र का कार्यक्रम UNCTC से हटाकर आर्थिक और सामाजिक विकास विभाग को सौंप दिया गया। 1993 में इसे UNCTAD के अधीन कर दिया गया। इस विषय पर महत्त्वपूर्ण शोध का काम जारी रहा, लेकिन संहिता को स्वीकार न किया जाना इस कोशिश से पीछे हटने का संकेत था कि कंपनियों के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय ढाँचा बनाया जाए।
क्षमा की अंतिम सीमा, फ़ौज़ी सत्यपुत्रा (इंडोनेशिया), 2018
UNCTC के काम एक सबक़ है: अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिए पूँजी को अनुशासित किया जा सकता है। आज के लिए तैयार किए जा रहे किसी भी अजेंडे के लिए ज़रूरी होगा कि कराधान, श्रम, कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, और पर्यावरणीय नुक़सान को पलटना आदि के नियमों को अनिवार्य रूप से लागू किया जा सके, और साथ ही ऋण की एक ऐसी रूपरेखा बने जो राष्ट्रों को अपना विकास करने दे। इस अजेंडे को तैयार करने में मज़दूरों, किसानों और प्रभावित समुदायों को भी मदद करनी होगी और इसे लागू करने की माँग उठानी पड़ेगी।
बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था के वादे का सही आकलन लोगों के जीवन से करना होगा। क्या एक किसान अपनी फसल से हुआ मुनाफ़ा अपने पास रख सकता है? क्या एक मज़दूर उत्पादन की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है? क्या एक देश अपने संसाधनों को स्कूलों, अस्पतालों, और उत्पादन क्षमता में ढाल सकता है? पूँजी को अनुशासित करने की क्षमता रखने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के निर्माण का अधूरा काम हमें याद दिलाता है कि अभी कितना कुछ करना बाक़ी है, तभी जाकर ताक़तवर देशों के आपसी संबंधों में परिवर्तन होगा, जिससे अंतत: शक्ति का हस्तांतरण जनता के पक्ष में किया जा सकेगा।
स्नेह सहित,
विजय