वैश्विक दक्षिण को एक औद्योगिक नीति की ज़रूरत क्यों है: छत्तीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
पूँजीवाद वैश्विक दक्षिण को कच्चा माल निकालने और सस्ते निर्यात तक सीमित रखता है। लोकतांत्रिक योजना से निर्भरता टूटेगी और संसाधन सामूहिक आर्थिक शक्ति का रूप लेंगे।
मेक्सिको सिटी, हुआन ओ’गोर्मन (मेक्सिको), 1949
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
चालीस साल तक वैश्विक दक्षिण के देशों को बताया गया कि आर्थिक नियोजन एक भूल है। राज्य को अपने हाथ पीछे खींचने थे, कर/शुल्क में कमी आनी थी, सरकारी निगमों का निजीकरण किया जाना था और निवेश के लिए उन लोगों पर भरोसा करना था जो बटन दबाते ही एक देश से दूसरे देश तक धन पहुँचा देते हैं। विकास कुछ अपेक्षित फ़ायदों पर सवार होकर आने वाला था: हर देश को वह बेचना था जो उसके पास पहले से मौजूद था और वो ख़रीदना था जो दूसरों ने बनाना सीख लिया था। इसके परिणाम हरारे से जकार्ता तक साफ़ देखे जा सकते हैं। जिन देशों में खनिजों के भंडार हैं, उपजाऊ ज़मीन है और युवा मज़दूर हैं, वे वैश्विक मूल्य शृंखला के सबसे कम फ़ायदे वाले छोर पर फँसे हैं। ये देश कच्चा माल निर्यात करते हैं और इसके बदले ऊँचे दामों पर तैयार माल का आयात करने को मजबूर हैं। उदाहरण के लिए घाना कोको का निर्यात करता है और चॉकलेट आयात करता है, वहीं वेनेज़ुएला कच्चे तेल का निर्यात करता है और रिफ़ाइंड तेल का आयात करता है। वैश्विक दक्षिण से संपदा बाहर जा रही है और ऋण तथा असंगठित क्षेत्र का विस्तार हो रहा है। साथ ही साथ सामाजिक क्षेत्र में सरकारी ख़र्च में कटौती की नीतियों का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है।
वैश्विक दक्षिण के लिए एक प्रगतिशील औद्योगिक नीति की शुरुआत इस तरह के समझौतों को अस्वीकार करने से होनी चाहिए। ‘अर्थव्यवस्था’ एक तटस्थ या प्राकृतिक तथ्य नहीं है। बल्कि यह उपनिवेशवादी हस्तक्षेपों, नवउपनिवेशवादी पुनर्गठन, संपत्ति के अधिकार के राज और तकनीक तथा पूँजी तक पहुँच के रुझानों का एक ऐतिहासिक उत्पाद है। विकास दर ज़रूरी है लेकिन यह सवाल और भी ज़रूरी है कि किस चीज़ का उत्पादन किया जा रहा है, कैसे किया जा रहा है और उत्पादन प्रक्रिया पर किसका नियंत्रण है, और मुनाफ़े को कैसे वितरित किया जाता है। विकास का लक्ष्य विकास दर नहीं होना चाहिए बल्कि फलता-फूलता इंसानी जीवन होना चाहिए।
जल, चार्ल्ज़ शीलर (अमेरिका), 1945
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़), विश्व बैंक, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) जैसे संस्थान जो पहले वैश्विक दक्षिण के लिए औद्योगिक नीति को दक़ियानूसी बताते थे, अब इन्होंने अपना रवैया बदल लिया है। मसलन, ओईसीडी अब यह मानता है कि बाज़ार की शक्तियाँ कमज़ोर उत्पादन, नाज़ुक आपूर्ति शृंखला और ग्रीन तथा डिजिटल परिवर्तनों से अकेले नहीं निपट सकतीं; यानी दीर्घ अवधि के निवेश के लिए अपनी पूँजी को दाँव पर लगाने वाली कंपनियाँ ज़्यादा नहीं हैं। विश्व बैंक इससे भी दो क़दम आगे बढ़कर, यह मत पेश कर रहा है कि औद्योगीकरण सिर्फ़ राज्य-नीत निवेश से ही संभव है। इस निवेश में इंडस्ट्रियल पार्क, माल-ढुलाई के लिए आधारभूत ढाँचा और दीर्घकालिक वित्तपोषण के प्रावधान शामिल हैं। आईएमएफ़ इनके मुक़ाबले थोड़ा बचकर चल रहा है – वह सब्सिडियों और नए उद्योगों की सुरक्षा की महत्ता को तो स्वीकार करता है लेकिन ऐसे क्षेत्रों की सुरक्षा करने के जोख़िम भी बताता है जिनमें भीतरी प्रतिस्पर्धा नहीं है। ये सब संस्थान दबी आवाज़ में ही सही पर अब सुझाव दे रहे हैं कि योजना बनाने की ज़रूरत है। हम यहाँ जोड़ना चाहेंगे कि किसी भी प्रकार की योजना बनाने का काम लोकतांत्रिक ढंग से और जनता की भलाई के लिए किया जाना चाहिए। हमें लोकप्रिय सत्ता और राज्य क्षमता का निर्माण करना होगा ताकि पूँजी को अनुशासित किया जा सके और अगर यह सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने से इनकार करे तो इसे दंडित किया जा सके।
औद्योगिक नीति के पक्ष में पुराने मतों में एक तरह की असमानता झलकती है। जब अमीर देश सेमीकंडक्टरों, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उद्योगों या ग्रीन तकनीकों के लिए सब्सिडी देते हैं तो इसे ‘नवाचार’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ करार दिया जाता है। लेकिन जब ग़रीब देश अपने खनिजों को ख़ुद प्रॉसेस करने या नए उद्योगों को बचाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें ‘विकृति’, ‘अदक्षता’, ‘भ्रष्टाचार’ और ‘वित्तीय जोख़िम’ का डर दिखाया जाता है। जबकि सच यह है कि वैश्विक बाज़ार पहले से ही शक्तिशाली देशों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पैटेंट की सत्ता, वित्तीय संस्थानों और सैन्य प्राथमिकताओं द्वारा योजनाबद्ध है। असली सवाल है कि यह योजना कौन, किसके फ़ायदे के लिए और मूल्य शृंखला के किस चरण में बनाता है।
योग्या में सेकाटेन उत्सव, हाजी विदायत (इंडोनेशिया), 1983
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) राज्य समन्वय की आवश्यकता पर बल देता है ताकि व्यापार नीति, ऊर्जा नीति, शिक्षा और अनुसंधान नीति, पर्यावरण नीति और विदेशी निवेश नियम एक ही दिशा में आगे बढ़ें। समन्वय के बिना, एक सरकार स्थानीय प्रसंस्करण (प्रॉसेसिंग) की घोषणा कर सकती है; जबकि उसका केंद्रीय बैंक उद्योग को दीर्घकालिक ऋण से वंचित करता है, उसकी बिजली-व्यवस्था कारखानों को विफल करती है और उसकी व्यापार-व्यवस्था आयात को बढ़ावा देती है। UNCTAD के तर्क उपयोगी हैं; लेकिन वे उस सच को अनदेखा करते हैं जो सबके सामने है – पूँजीपति लोक-कल्याण नहीं, लाभ चाहते हैं।
ऐसी औद्योगिक नीति बेशक विफल होगी जो पूँजी को अनुशासित नहीं करती और उसे समाज की भलाई की ओर निर्देशित नहीं करती। सार्वजनिक उद्यम उन सामाजिक रूप से आवश्यक क्षेत्रों में दीर्घकालिक निवेश करने के लिए आवश्यक हैं जिनमें निजी क्षेत्र कोई रुचि नहीं दिखाता। निजी सट्टेबाजी के लिए सार्वजनिक निधि का उपयोग करने की बजाय सार्वजनिक संस्थानों के लिए सार्वजनिक निधि का उपयोग करना कहीं बेहतर है। ये संस्थान प्रबंधित बाजार (managed markets) तैयार कर सकते हैं, नई प्रौद्योगिकियों को विकसित कर सकते हैं और सामाजिक रूप से लाभकारी उत्पादन को विकसित कर सकते हैं। अंततः एक औद्योगिक नीति तब तक टिकाऊ नहीं हो सकती, जब तक देश कुछ व्यापार बाधाएँ और पूँजी नियंत्रण बहाल नहीं करते। इन उपायों के बिना, सरकारों को विदेशी मुद्रा की गंभीर कमी और भारी राजकोषीय लागतों का सामना करना पड़ेगा। समय के साथ, ये दबाव सार्वजनिक वित्त को कमज़ोर करेंगे और औद्योगिक विकास नज़रंदाज़।
वैश्विक दक्षिण में औद्योगिक नीति के विध्वंस का एक हिस्सा 1994 का व्यापार-संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकारों पर समझौता (TRIPS) है, जिसने नीति के संभावित क्षेत्र को संकुचित कर दिया, जिसका उपयोग देश कभी मौजूदा प्रौद्योगिकियों की नकल, अनुकूलन और निर्माण के लिए करते थे। TRIPS ने देशों के लिए अपनी शर्तों पर नई प्रौद्योगिकियाँ बनाना कठिन बना दिया। अब समय आ गया है कि वैश्विक दक्षिण के राज्य बौद्धिक संपदा अधिकारों की पूर्ण मान्यता पर पुनर्विचार करें। जब सार्वजनिक ज़रूरत की बात हो तो अनिवार्य लाइसेंसिंग पहले से ही जीवन-रक्षक दवाओं के उत्पादन की अनुमति देती है। इसी तरह के उपायों का विस्तार अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में औद्योगिक विकास के लिए किया जाना चाहिए। इससे आवश्यक तकनीक तक पहुँच में सुगमता होगी, घरेलू उत्पादन मज़बूत होगा और बहुराष्ट्रीय निगमों पर निर्भरता कम होगी।
कल्पना की उड़ान, ग्रेशम तापीवा न्याउडे (ज़िम्बाब्वे), 2019
ज़िम्बाब्वे की लिथियम नीति समकालीन औद्योगिक नीति के लिए आवश्यक आर्थिक कल्पना का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। दिसंबर 2022 में, ज़िम्बाब्वे के वैधानिक साधन 213 ने मंत्रि-स्तरीय अनुमति के बिना लिथियम युक्त अयस्कों और अपरिष्कृत लिथियम के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। इस नीति ने इस औपनिवेशिक आम-समझ को उलट दिया कि किसी अफ्रीकी देश की भूमिका खोदना और भेजना भर है। देश ने एक रणनीतिक संसाधन पर नियंत्रण का उपयोग करके खनन कंपनियों पर प्रसंस्करण में निवेश करने के लिए दबाव डाला और अधिक मूल्य-वर्धन, कौशल और घरेलू कर राजस्व का सृजन किया। यह ठीक वैसा ही क़दम है, जिसके ख़िलाफ़ मुख्यधारा का अर्थशास्त्र चेतावनी देता है। लेकिन ऐसे साहसिक उपाय तब आवश्यक हो सकते हैं, जब मौजूदा प्रणाली निष्कर्षण (extraction) को ‘कुशल’ और औद्योगीकरण को ‘अकुशल’ दिखाती है। ज़िम्बाब्वे के प्रतिबंध ने खनन पूँजी के सामने के समीकरण बदल दिए: अयस्क तक पहुँच के लिए घरेलू प्रसंस्करण में निवेश काफ़ी आवश्यक हो गया। इससे फर्मों को लिथियम अयस्क को सांद्र (concentrate) में प्रसंस्करण करने की ओर बढ़ाने में मदद मिली। और हाल ही में, लिथियम-सल्फेट सुविधाओं के लिए योजनाओं की ओर भी जिससे ज़िम्बाब्वे बैटरी इनपुट के एक क़दम और क़रीब आ गया है।
ज़िम्बाब्वे की नीति को रोमांटिक तरीक़े से देखे बिना इसका बचाव किया जाना चाहिए। अयस्क को सांद्र (concentrate) में प्रॉसेस करना बैटरी मूल्य-शृंखला पर नियंत्रण रखने के समान नहीं है। विदेशी फर्में अभी भी उत्पादन पर हावी हैं। प्रौद्योगिकी, वित्त और बाज़ार पहुँच बहुराष्ट्रीय निगमों के नियंत्रण में बनी हुई हैं। स्थानीय समुदायों ने काम की परिस्थितियों, भूमि और जल अधिकारों और ख़राब विनियमन से जुड़ी चिंताएँ उठाई हैं। केवल निर्यात प्रतिबंध इंजीनियरों, पर्याप्त बिजली, सार्वजनिक-स्वामित्व वाले अनुसंधान या घरेलू निर्माताओं को खड़ा नहीं कर सकता। इसलिए ज़िम्बाब्वे का अगला क़दम गहरा और अधिक सार्वजनिक होना चाहिए: एक ‘खान-से-विनिर्माण’ योजना, जो भूगर्भीय ज्ञान, राज्य इक्विटी, विकास बैंक ऋण, व्यावसायिक शिक्षा, रासायनिक प्रॉसेसिंग, घटकों के उत्पादन, पुनर्चक्रण (recycling) और क्षेत्रीय माँग को जोड़ती है। ऐसी योजना को खनन समुदायों और श्रमिकों को संस्थागत शक्ति प्रदान करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक राजस्व निजी संपत्ति के बजाय सार्वजनिक वस्तुएँ बनाएँ।
ज़िम्बाब्वे की सफलता को प्रसंस्करण संयंत्रों (प्रॉसेसिंग प्लांट) से नहीं, बल्कि इस बात से मापा जाना चाहिए कि क्या लिथियम नीति नए सार्वजनिक स्कूलों, अस्पतालों, जल और परिवहन बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा ग्रिडों और अन्य सार्वजनिक वस्तुओं के निर्माण में मदद करती है।
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संयुक्त राष्ट्र का अफ्रीका के लिए चौथा औद्योगिक विकास दशक (2026–2035) हमारे समय की महत्ता को पहचानता है। लगभग 1.2 करोड़ युवा अफ्रीकी प्रत्येक वर्ष श्रम-बल का हिस्सा बनते हैं; जबकि अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (ACFTA) क्षेत्रीय मूल्य-शृंखलाओं के निर्माण के लिए आवश्यक स्तर प्रदान करता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अफ्रीका से कच्चे-माल निर्यात से मूल्य-वर्धित वस्तुओं के उत्पादन की ओर बढ़ने का आह्वान करना सही है। लेकिन घोषणाएँ और ‘बैंक योग्य परियोजनाएँ’ पर्याप्त नहीं हैं। जैसा कि ग्रिव चेल्वा और मैं अपनी पुस्तक ‘हाउ द इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड स्ट्रैंगल्स अफ्रीका‘ (2026) में तर्क देते हैं कि अफ्रीका को सार्वजनिक विकास बैंकों, महाद्वीपीय बुनियादी ढाँचा योजना, समन्वित खनिज नीति, स्थानीय-सामग्री नियम, नए उद्योग के संरक्षण और विदेशी ऋणों से राहत की आवश्यकता है जो ठीक उसी राजकोषीय क्षमता को हड़प लेते हैं, जिसकी औद्योगीकरण को आवश्यकता होती है।
औद्योगिक नीति के विरोधी कोई तटस्थ विकल्प नहीं देते। निवेश को बहुराष्ट्रीय निगमों पर छोड़ने का मतलब है कहीं और तैयार की गई योजना को स्वीकार करना: उद्योग के बिना खानें, खाद्य प्रसंस्करण के बिना खेत, गरिमामय काम के बिना शहर और एक ग्रीन परिवर्तन, जिसमें प्रौद्योगिकियाँ उत्तर में दक्षिण से निकाले गए खनिजों का उपयोग करके डिज़ाइन की जाती हैं। औद्योगिक नीति मुक्ति की गारंटी नहीं है; लेकिन यह वर्ग-संघर्ष का एक क्षेत्र बन सकती है। और इसका आधार होगा कि कौन निवेश, उत्पादन, और आर्थिक अधिशेष को नियंत्रित करता है। वैश्विक दक्षिण के लोगों को अपने संसाधनों का उपयोग भविष्य बनाने के लिए करने का अधिकार है।
वर्तमान ऐतिहासिक दौर ने औद्योगिक नीति पर बहस के लिए जगह बनाई है, आंशिक रूप से क्योंकि 2008 के वित्तीय संकट के बाद के लंबे ठहराव ने पुराने नुस्ख़ों को काफ़ी तेज़ी से बेकार बना दिया है। दशकों तक योजना को बदनाम करने और राज्य क्षमता को कमज़ोर करने के बाद, वैश्विक दक्षिण के देशों में उन पर थोपे गए सौदे से बेहतर कुछ सोचने का साहस होना चाहिए। ऐसे में ज़िम्बाब्वे की शोना भाषा की एक पुरानी कहावत याद रखने लायक हो सकती है: Chawawana batisisa mudzimu haupi kaviri – जो तुमने पाया है, उसे मज़बूती से पकड़ो, क्योंकि पूर्वज दो बार नहीं देते।
स्नेह सहित,
विजय