चीन के ख़िलाफ़ जापान के बढ़ते ‘युद्ध तेवर’ का प्रतिरोध
चीन के ख़िलाफ़ आक्रामक बयानों और यूएस गठजोड़ में तेज़ होती युद्ध की तैयारियों के साथ जापान अपने औपनिवेशिक इतिहास की राह पर लौट रहा है।
इरी मारुकी व तोशी मारुकी (जापान), हिरोशिमा पैनल्स’ श्रृंखला का पाँचवाँ (V) पैनल, वी बॉयज़ एंड गर्ल्स, 1951
प्रिय दोस्तो,
जापान की सरकार चीन के ख़िलाफ़ तेज़ी से युद्ध की तैयारी कर रही है। 2010 के दशक के मध्य में ओकिनावा और अमामी से इस तैयारी की शुरुआत हुई, जो अब क्यूशू, पश्चिमी जापान और पूरे देश में फैल रही है। इस साल से, जापान ने मुख्य भूमि चीन तक पहुंचने में सक्षम लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात करना भी शुरू कर दिया है।
जापान के ‘आत्म-रक्षा बल’ (एसडीएफ़) युद्ध-अभ्यास और जापान-यूएस [संयुक्त राज्य अमेरिका] संयुक्त सैन्य अभ्यास में अक्सर नागरिक हवाई अड्डों और बंदरगाहों के साथ-साथ सड़कों व अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाता है। नागरिक जहाज़ और फेरी रूट (जलमार्ग) अब सैन्य उपकरण और सैनिकों की आवाजाही के लिए बरते जा रहे हैं। जापानी सरकार और रक्षा मंत्रालय एसडीएफ़ का अंडरग्राउंड मुख्यालय बना रहे हैं। आधिकारिक तौर पर इसे एक ‘निवारक उपाय’ बताया जा रहा है। लेकिन वास्तव में, यह कदम चीन के साथ संभावित युद्ध की तैयारी का हिस्सा है। कमान मुख्यालय को भूमिगत करके सुरक्षित रखने के इंतज़ाम किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीन के ऊपर रहने वाली आम जनता की सुरक्षा के लिए कोई तैयारी नहीं की जा रही।
हालाँकि चीन के ख़िलाफ़ युद्ध की तैयारी अकेला जापान नहीं कर रहा है। कई वर्षों से ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड के युद्धपोत और विमानवाहक पोत संयुक्त अभ्यास के लिए चीन के पास के समुद्री क्षेत्रों में आ रहे हैं। ये वही साम्राज्यवादी शक्तियाँ हैं जिन्होंने 1840 के दशक से 1940 के दशक तक चीन पर आक्रमण किया और उस पर क़ब्ज़ा जमाया था। 2024 में, जापान-यूएस संयुक्त अभ्यास ‘कीन स्वॉर्ड 25’ में 45,000 जापानी और यूएस सैनिकों, 40 युद्धपोतों, तथा 370 विमानों को तैनात किया गया था। इस अभ्यास में ऑस्ट्रेलियाई और कनाडाई सैन्यबलों ने भी हिस्सा लिया, जबकि यूके, फ़्रांस, जर्मनी, इटली और नाटो ने पर्यवेक्षक (ऑब्ज़र्वर) के रूप में शिरकत की। इसमें सैन्य अड्डों के साथ-साथ तीस से अधिक नागरिक हवाई अड्डों और बंदरगाहों का इस्तेमाल किया गया था। इस संयुक्त अभ्यास के लिए ओकिनावा और अमामी में एक संयुक्त जापान-यूएस कमान पोस्ट स्थापित किया गया। अमामी, ओकिनावा, मियाको, इशिगाकी द्वीपों पर मिसाइल यूनिटें तैनात हैं, और वहाँ एंटी-शिप मिसाइल अभ्यास के ज़रिए चीनी जहाज़ों पर हमले करने का अभ्यास किया गया। 6 मई 2026 को, जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी ने फ़िलीपींस के उत्तरी लुज़ोन में एसडीएफ़ इकाइयों द्वारा चीनी जहाजों पर हमले का अभ्यास करते हुए लाइव-फ़ायर मिसाइल अभ्यास का निरीक्षण किया।
मार्च 2025 में, तत्कालीन रक्षा मंत्री जेन नाकातानी ने यूएस रक्षा सचिव हेगसेथ के सामने ‘वन थिएटर’ (एक कार्यक्षेत्र) अवधारणा का प्रस्ताव रखा – जिसके तहत कोरियाई प्रायद्वीप, पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर को एक ही ऑपरेशन क्षेत्र माना जाएगा। जापान से काफ़ी दूर स्थित दक्षिण चीन सागर भी अब एसडीएफ़ के कार्यक्षेत्र का हिस्सा है। इसे चीन की सैन्य घेराबंदी की योजना के अलावा और कुछ नहीं माना जा सकता।
माई फेई (चीन), चेरिश द कॉमन पीपूल, हेल्प द कॉमन पीपूल, 1938
औपनिवेशिक जापान का ऐतिहासिक रास्ता
चीन के ख़िलाफ़ युद्ध का तेवर अख़्तियार करना औपनिवेशिक जापान के नक़्शेकदम पर चलने जैसा है। 150 साल पहले, अपने उत्थान के बाद से, आधुनिक जापान ने बार-बार अपने पड़ोसियों पर आक्रमण किए और उन पर क़ब्ज़ा जमाया, वर्चस्व स्थापित करने के लिए व्यापक स्तर पर क़त्ले-आम किया, और एशिया में एक महाशक्ति बन गया। युद्धोत्तर जापान, अपने औपनिवेशिक इतिहास पर गहराई से विचार किए बिना और उसकी जवाबदेही दिए बिना, अब फिर से सैन्यीकरण के रास्ते पर चल पड़ा है। सानाए तकाइची की मौजूदा सरकार इसी औपनिवेशिक मार्ग पर तेज़ी से आगे बढ़ने को आमादा दिखती है।
नवंबर 2025 में, प्रधानमंत्री तकाइची ने बयान दिया कि यदि चीन बलपूर्वक ताइवान के साथ एकीकरण करने की कोशिश करता है, तो उसके ख़िलाफ़ जापान सैन्य बल का उपयोग करेगा। यानी चीन द्वारा जापान पर कोई प्रत्यक्ष हमला न करने पर भी जापान चीन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने को तैयार है। चीन ताइवान को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखता है, जिसे चीन और कोरिया के ख़िलाफ़ आक्रामकता के प्रथम चीन-जापान युद्ध (1894-95), के बाद जापान ने उपनिवेश बनाया गया था। चीन के लिए, ‘एकीकरण’ का मतलब उस औपनिवेशिक क्षेत्र को वापस पाना है। लेकिन तकाइची की टिप्पणी दिखाती है कि ताइवान का पूर्व औपनिवेशिक मालिक चीन से उसके एकीकरण को रोकना चाहता है। उनकी टिप्पणियों ने जापान-चीन संयुक्त विज्ञप्ति तथा शांति एवं मित्रता संधि को भी तोड़ दिया – जो पाँच दशक से भी पुराना वह समझौता है जिसके तहत दोनों देशों के बीच शांति और सौहार्द बनाए रखने का जापान ने संकल्प लिया था। इससे भी अधिक चिंताजनक जापान की आंतरिक जनभावना है – तकाइची के बयान के बाद हुए सर्वेक्षणों से सामने आया कि करीब सत्तर प्रतिशत लोग मानते थे कि तकाइची को अपने बयान वापस लेने की कोई ज़रूरत नहीं है।
वर्ष 1937 में जब जापान चीन पर हमला कर रहा था, तब जापानी सरकार और मीडिया ने ‘हिंसक चीनियों को सबक सिखाओ’ का नारा उछाला, तथा चीन के पूर्णतः न्यायसंगत प्रतिरोध को बर्बर व हिंसक बताकर बदनाम किया। इस नैरेटिव का प्रयोग जापान के आक्रामक कृत्यों को न्यायसंगत ठहराने और युद्ध के लिए जनसमर्थन जुटाने के लिए किया गया था। कई नागरिकों ने इन नारों का समर्थन किया और युद्ध के समर्थन में राष्ट्रीय एकता की एक कृत्रिम भावना तैयार की गई। उस दुष्प्रचार के दायरे में समस्या की असली जड़ —यानी खुद जापान की आक्रामकता— पर बात करने की कोई जगह नहीं थी। यही इतिहास आज के जापान में फिर से दोहराया जा रहा है। चीन के विरुद्ध वैमनस्य फैलाने वाले बयानों से सरकार और मीडिया पटे पड़े हैं, जबकि चीन के नज़रिए को समझने की कोई कोशिश नहीं दिखती।
हम चुपचाप देखते नहीं रह सकते। इससे पहले कि बात आगे बढ़े, हमें इसे रोकना होगा – अन्यथा जापान एक बार फिर से चीन और एशियाई देशों की जनता के ख़िलाफ़ आक्रामक राष्ट्र बन बैठेगा। इस तरह के घटनाक्रम से संपूर्ण पूर्वी एशिया में अनगिनत ज़िंदगियाँ बर्बाद हो जाएँगी। जापान को अपने 150 वर्षों के आधुनिक इतिहास का निष्पक्षता से मूल्यांकन करना चाहिए, युद्ध की तैयारियों पर विराम लगाना चाहिए, और पूर्वी एशिया में शांति के पक्ष में खड़ा होने वाला देश बनना चाहिए।
त्सुबासा कातो(जापान), शीर्षकहीन, तिथि अज्ञात
युद्ध के लिए आमादा जापान का प्रतिरोध
2010 के दशक से बढ़ रही युद्ध की तैयारियों पर राष्ट्रीय मीडिया में लगभग न के बराबर चर्चा हुई है। इसका विरोध भी बिखरा और सीमित रहा है। लेकिन जब सैन्यीकरण क्यूशू से पश्चिमी जापान की तरफ़ बढ़ने लगा, हमने अंतत: 2023 से इन विरोध संघर्षों को एक साझा लड़ाई में बदलने का काम शुरू किया। साल 2024 में हमने ओकिनावा और पश्चिमी जापान में संवाद एवं एकजुटता सम्मेलन आयोजित किए: अप्रैल में एहिएम; अगस्त में ओकिनावा; सितंबर में कुरे; तथा नवंबर में ओइता में। फरवरी 2025 में कागोशिमा में एक अधिवेशन में ‘स्टॉप द वॉर! ओकिनावा-वेस्टर्न जापान नेटवर्क’ का गठन हुआ। जिसके घोषणापत्र में निम्नलिखित संकल्प लिया गया:
‘“जानो। साथ आओ। रोको।” – शांति स्थापना के वास्ते हम अपने संघर्ष में नया कदम बढ़ा रहे हैं। सूचना साझा करते हुए, जानकारी का संचयन कर, संवाद स्थापित कर और एकजुट होकर लड़ते हुए– नागरिकों की सामूहिक ताक़त के बूते हम सरकार द्वारा थोपे गए इस युद्ध को रोककर रहेंगे।’
जून 2025 में, ओकिनावा और पश्चिमी जापान के विभिन्न हिस्सों से लोग सरकार के साथ संवाद करने, संसद प्रदर्शन व नागरिक एकजुटता रैली के लिए टोक्यो में इकट्ठे हुए। तब से, हमने कई ऐक्शन लिए हैं। अक्टूबर 2025 में, हमने होसोनो (क्योटो) में विरोध प्रदर्शन किया, जहाँ एक विशाल मिसाइल डिपो बन रहा है। नवंबर 2025 में, हम ओइता गए, जहाँ एक अन्य डिपो पूरा होने वाला है। इसके बाद हम कुमामोटो गए, जो देश का पहला ऐसा डीपो है जहाँ लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात हैं। दिसंबर 2025 में, हम कुरे (हिरोशिमा) में एकत्रित हुए, जहाँ एक व्यापक सैन्य केंद्र स्थापित करने की योजना की जा रही है। और मई 2026 में, हम मैज़ुरु (क्योटो) गए, जो एक प्रमुख नौसैनिक बंदरगाह है, जिसे टोमाहाक मिसाइलें तैनात करने के लिए चुना गया है। इन सभी अभियानों में देश के कोने-कोने से आए लोगों के साथ स्थानीय नागरिक भी डटकर खड़े रहे। अक्टूबर 2026 में तीसरा ‘टोक्यो ऐक्शन’ करने की तैयारी भी पूरी है।
फरवरी 2026 में हुए प्रतिनिधि सभा के चुनावों में तकाइची प्रशासन की भारी जीत के बाद, बड़ी संख्या में युवा, विशेषकर महिलाएँ, संविधान संशोधन और सैन्यीकरण के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में आए। 19 अप्रैल 2026 को संसद के सामने हुए प्रदर्शनों और देशव्यापी एकजुटता प्रदर्शनों में 50,000 से अधिक लोगों ने शिरकत की। ये विरोध प्रदर्शन जनता ने अपने आप आयोजित किए थे। टोक्यो में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन, अब देश भर में फैल रहे हैं। साल 2015 में, जब सरकार ने ऐसे कानून बनाने की कोशिश की थी जो जापान को यूएस-नीत युद्धों में सीधे तौर पर झोंक सकते थे, तो उनके ख़िलाफ़ विशाल छात्र आंदोलन उभरा था। लेकिन वर्तमान में हो रहे विरोध प्रदर्शन 2015 के प्रदर्शनों से भी ज़्यादा भौगोलिक विस्तार पा चुके हैं। जापान के लिए, जहाँ युवा-नेतृत्व वाला युद्ध-विरोधी आंदोलन लंबे समय से अनुपस्थित रहा है, यह वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है।
मेइरो कोईज़ुमी (जापान), फ़ॉग #15, 2020
जन-प्रतिरोध के समक्ष मौजूद तीन प्रमुख बाधाएँ
जापान के युद्ध तेवर के ख़िलाफ़ प्रतिरोध खड़ा करने में तीन मुख्य चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती है सैन्यीकृत क्षेत्रों में जारी संघर्ष को नए युवा संघर्ष के साथ जोड़ना। इसके लिए सैन्यीकरण के ख़िलाफ़ हो रहे क्षेत्रीय संघर्षों, 2015 से लगातार चल रहे संविधान-संशोधन विरोधी आंदोलन, नए युवा-नेतृत्व वाले युद्ध-विरोधी आंदोलन, और तकाइची-विरोधी आंदोलन में संवाद स्थापित करने की ज़रूरत है। ये आंदोलन जितना क़रीब आएँगे, इस संघर्ष की पूरे जापान में लहर की तरह फैलने की संभावना उतनी ज़्यादा बढ़ेगी। अक्टूबर 2026 में, हम इन सभी ताकतों को एकजुट करने, चीन के ख़िलाफ़ जापान के बढ़ते युद्ध तेवर का विरोध करने, और युद्ध-विरोधी आंदोलन को मज़बूत करने के लिए टोक्यो में एक कार्रवाई आयोजित करने जा रहे हैं।
दूसरी चुनौती है जापान में फैल रहे ‘हिंसक चीन’ वाले नैरेटिव को ध्वस्त करना। सरकार और मीडिया सैन्यीकरण को निवारक उपाय के रूप में पेश करते हैं। अधिकांश नागरिक इस बात पर विश्वास करते हैं और इसके बदले उन्हें जो क़ीमत चुकानी पड़ रही है उसके विरोध में कुछ नहीं बोलते। पुनर्शस्त्रीकरण के साथ बढ़ा हुआ टैक्स और जनता को राहत देने वाले सार्वजनिक ख़र्च में भारी कटौटियाँ भी आती हैं। दूसरी ओर, आम नागरिकों को अपने रोज़मर्रा के जीवन में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और वे सामाजिक सुरक्षा तथा करों में राहत की माँग कर रहे हैं। यदि ज़्यादातर लोग यह समझ लें कि चीन के पास जापान पर हमला करने का कोई कारण नहीं है, और वास्तव में यह जापान-यूएस की मिलीभगत है जिससे पूर्वी एशिया में युद्ध का ख़तरा पैदा हो रहा है, तो सैन्यीकरण के लिए समर्थन कम हो जाएगा। चीन यूएस के आस-पास कोई सैन्य अभ्यास नहीं करता, लेकिन चीन के ठीक बगल में जापान-यूएस-नाटो अभ्यास हो रहे हैं। इसलिए, चीन-विरोधी दुष्प्रचार को मात देना एक ज़रूरी काम है।
तीसरी चुनौती है वैश्विक दक्षिण के जन-समूहों के साथ एकजुटता स्थापित करते हुए एक युद्ध-विरोधी आंदोलन खड़ा करना। साम्राज्यवादी ताकतों (जिनमें जापान भी शामिल था) से मुक्ति का हमारा साझा अनुभव और इतिहास रहा है। पश्चिमी देश और जापान, जिन्होंने सदियों से दुनिया पर अपना दबदबा बनाए रखा, अब ऐतिहासिक पतन के दौर से गुजर रहे हैं। इसके विपरीत चीन, भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील जैसे देशों की आर्थिक ताक़त और राजनीतिक मुखरता बढ़ी है। ये देश विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को बढ़ावा देते हैं और वियतनाम, इराक़, लीबिया और फ़िलिस्तीन के खिलाफ आक्रामकता के युद्धों का विरोध कर चुके हैं। साल 2023 से फ़िलिस्तीनियों पर पश्चिमी देशों के समर्थन में लगातार जारी इज़रायली हमलों को रोकने के प्रयास भी वैश्विक दक्षिण ही कर रहा है (जिसमें चीन भी शामिल है)। बांडुंग सम्मेलन के दस सिद्धांतों से लेकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन तक यह दृष्टिकोण निरंतर क़ायम रहा है।
वेनेज़ुएला, क्यूबा और ईरान के ख़िलाफ़ यूएस के बर्बर हमले एक पतनशील महाशक्ति की छटपटाहट को दर्शाते हैं। चीन के ख़िलाफ़ युद्ध तेवर दिखाने वाले देश वही यूएस के पिट्ठू पश्चिमी देश हैं। इनका मकसद है वैश्विक दक्षिण के केंद्र, यानी चीन, को कमज़ोर करना ताकि वे अपने अपरिहार्य पतन को कुछ समय के लिए टाल सकें। वेनेज़ुएला, क्यूबा और ईरान में यूएस आक्रामकता से लड़ रहे लोग और हम दरअसल एक साझा संघर्ष लड़ रहे हैं। जापान के युद्ध-विरोधी आंदोलन में अभी यह जागरूकता आई नहीं है। लेकिन हमें अपने संघर्ष को इसी वैचारिक दृष्टिकोण से समझना चाहिए, और इसे एक सच्चे अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए। मानव इतिहास के इस मोड़ पर पूर्वी एशिया में रहते हुए यही हमारा ऐतिहासिक कर्तव्य है।
‘Hands Off Asia’ पहल, जापानी जनता के प्रतिरोध को पूर्वी एशिया व ग्लोबल साउथ के जन-संघर्षों से जोड़ते हुए, आगे चल कर ‘एशियाई जनता का युद्ध-विरोधी नेटवर्क’ का रूप ले सकती है। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले के इक्यासी साल बाद, अगले युद्ध को रोकने का काम अभी शुरू हुआ है।
शुभकामनाओं सहित,
हिरोयुकी तकाइ
(तकाइ ‘स्टॉप द वॉर! ओकिनावा-वेस्टर्न जापान नेटवर्क’ के सह-प्रतिनिधि हैं। इन्होंने Who Invites War in East Asia? – China Containment and US-Japan War Plans in the Ryukyu Arc पुस्तक लिखी है। यह न्यूज़लेटर 11 अगस्त 2026 को इंटरनेशनल पीपुल्स असेंबली एशिया और ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान द्वारा आयोजित एक वेबिनार में दिए गए उनके वक्तव्य पर आधारित है।)