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संस्कृति के ऊँचे महलों पर हल्ला बोल: जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में सार्वजनिक कला

आज डीडीआर के भवन-निर्माण में कला के समावेशन और मज़दूर वर्ग की शिक्षा, गरिमा और कल्पना आधारित समाज तैयार करने के प्रयास को याद किया जा रहा है।

सुनिए ‘औफबाउलीड‘ (1948) – जिसे कभी-कभी ‘औफबाउलीड डेर एफडीजे’ (फ्री जर्मन यूथ का पुनर्निर्माण-गीत) भी कहा जाता है – को बर्टोल्ट ब्रेख्त ने लिखा था और पॉल डेसाउ ने इसका संगीत रचा था।

साल 1977 में म्यून्स्टर शहर पश्चिमी जर्मनी का हिस्सा था। शहर की आसी झील के उत्तरी किनारे पर तीन विशाल बिलियर्ड गेंदें स्थापित की गईं। कार के आकार की ये गेंदें सीमेंट से बनी थीं। इन्हें कलाकार क्लेस ओल्डेनबर्ग ने बनाया था। इन्हें वहाँ म्यून्स्टर की मूर्तिकला योजना के तहत लगाया गया था। यह योजना पश्चिमी जर्मनी के उन प्रयासों में से एक थी जिसके ज़रिए समकालीन कला को सार्वजनिक स्थानों में लाया गया। इस कला की अमूर्त भाषा, पॉप कला और उपभोगता वस्तुओं के बड़े/कलात्मक रूप श्रमिक वर्ग के रोज़मर्रा की ज़िंदगी से दूर थे। 

दूसरी तरफ़, जर्मन की आंतरिक सीमा के उस पार, जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक (डीडीआर या पूर्वी जर्मनी) अपने सार्वजनिक कला कार्यक्रम का पच्चीसवाँ साल मना रहा था। इस कार्यक्रम के सबसे महत्वाकांक्षी उदाहरणों में से एक आज भी बर्लिन में खड़ा है। बर्लिन के अलेक्जेंडरप्लात्ज़ को पार कर आप आसमान की ओर देखें: हरमन हेंसलमान के कलेक्टिव द्वारा डिज़ाइन की गई और 1964 में पूरी हुई बारह मंज़िला इमारत, हाउस डेस लेहरर्स (शिक्षकों का भवन) पर, कलाकार वाल्टर वोमाका की कृति उनज़र लेबेन (हमारा जीवन), टॉवर के चारों ओर लिपटी दिखाई देती है। यह भित्ति-चित्र पट्टी लगभग 800,000 सिरेमिक-टाइलों से बनी है, जिन्हें हाथ से काट-काट कर ज़रूरी आकार दिया गया। यह 125 मीटर चौड़ा, सात मीटर लंबा चित्रपट डीडीआर में समाजवादी जीवन का दृश्य पेश करता है। कृति में एक महिला चॉकबोर्ड पर लेक्चर दे रही हैं; एक मेज़ के इर्द-गिर्द एक ब्रिगेड की बैठक चल रही है; एक मज़दूर एक परमाणु मॉडल का परीक्षण कर रहा है और उसके साथ एक युवा जोड़ा व बच्चा हैं; एक किसान हँसिया चला रहा है। एक परवलयिक दर्पण बना है (वक्र आकार का एक दर्पण जो प्रकाश या अन्य तरंगों को एक स्थान पर केंद्रित करने का काम करता है)। एक रॉकेट बना है। एक कबूतर बना है। इनके पीछे और बीच में बने हैं एक हाथ, बैनर, और एक लाल झंडा।

वाल्टर वोमाका, उनज़र लेबेन (हमारा जीवन), 1962-1964

वोमाका ने जब यह भित्ति-चित्र पट्टी पूरी की, यानी डीडीआर की स्थापना के डेढ़ दशक बाद भी, वहाँ के स्कूलों व फ़ैक्टरियों में उन फ़ासीवाद विरोधी लोग कार्यरत थे जो बुखेनवाल्ड और रेवेन्सब्रुक के नाज़ी यातना शिविरों से बचकर निकले थे। इस कलाकृति के निर्माण का आदेश देने वाले राज्य का विघटन कब का हो चुका है। लेकिन विघटन के छत्तीस साल बाद भी अलेक्जेंडरप्लात्ज़ में वोमाका के यह कृति आज भी मौजूद है। इसके रंग आज भी उतने ही चमकदार हैं जैसे वोमाका अभी-अभी इसे पूरा करके नीचे उतरे हों। यह आर्ट बुलेटिन पूर्वी जर्मनी के उस कार्यक्रम के बारे में है जिसने कला को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाया, व उन समाजवादी परंपराओं की पड़ताल करता है जो इस कार्यक्रम की बुनियाद थीं। हम यह भी जानेंगे कि जर्मनी के पुन:एकीकरण के बाद इन प्रयासों में से क्या बचा रहा है और कितना कुछ बर्बाद किया जा चुका है।

भवन निर्माण में कला का समावेशन

डीडीआर की स्थापना अक्टूबर 1949 में नाज़ी पराजय के मलबे से, सोवियत अधिकृत क्षेत्र में हुई थी। स्थापना के बाद राज्य ने भूमि सुधार, बड़े पैमाने पर राष्ट्रीयकरण, और फासीवाद-विरोध जैसे कार्यक्रम शुरू किए। दूसरी तरफ़, पश्चिमी सीमा के उस पार, संघीय गणराज्य जर्मनी चुपचाप नाज़ी वेहरमाच अधिकारियों को पश्चिम जर्मनी की नव निर्मित सशस्त्र सेना (बुंडेसवेहर) में और नाज़ी न्यायविदों को नई न्यायपालिका में बहाल कर रहा था। 22 अगस्त 1952 को, पूर्वी जर्मनी की डीडीआर मंत्रिपरिषद ने एक अध्यादेश पारित किया: वेरऑर्डनुंग उबर डी क्यून्स्टलरिशे औसगेस्टाल्टुंग वॉन फेरवाल्टुंग्सबाउटेन। यह अध्यादेश प्रशासनिक भवनों के कलात्मक डिज़ाइन के से जुड़ा था; जिसके तहत राज्य निर्माण परियोजनाओं के अंतर्गत इमारतों के अंदर और बाहर जनता से जुड़ी यथार्थवादी कला (वोक्सफ़रबुंडेनर, रियालिस्टिशर कुन्स्ट) पर भवन निर्माण के लिए स्वीकृत बजट का एक से दो प्रतिशत खर्च करना अनिवार्य किया गया। स्कूल, किंडरगार्टन, टाउन हॉल, अस्पताल, सिनेमा, डिपार्टमेंट स्टोर, अपार्टमेंट ब्लॉक, ट्रांसफार्मर स्टेशन, फैक्ट्री कैंटीन की लॉबी आदि सभी जगहों में कला को शामिल किया जाना था। और इसका खर्च सरकार ने उठाया।

जर्मन भाषा में इसे बाउबेज़ोजेने कुन्स्ट (भवन निर्माण में कला का समावेशन) कहा जाता था। इसके समानांतर पश्चिमी जर्मनी (जहाँ अब भी वाइमर-युग की परंपरा क़ायम थी) ने कुन्स्ट एम बाउ (वास्तुकला में कला) कार्यक्रम चलाया। दोनों जर्मनी कला पर ज़ोर दे रहे थे, पर उनके बीच राजनीतिक अंतर था। यह अंतर उनकी प्रणाली में नहीं, बल्कि इस बात में था कि दोनों राज्य अपने कलाकारों को दीवारों पर क्या और किसके लिए रंगने के लिए कह रहे थे। 1955 में यह स्पष्ट रूप से सामने आया। पश्चिम जर्मनी के शहर कासेल में पहली डोक्यूमेंटा प्रदर्शनी शुरू हुई। यह शहर पूर्वी जर्मनी सीमा से थोड़ी ही दूरी पर था। इस प्रदर्शनी की स्थापना की थी अर्नोल्ड बोडे ने। और यह दुनिया में समकालीन कला की उन प्रदर्शनियों में भी शामिल है जिन्हें बार-बार लगाया गया। समाजवादी खेमे के कलात्मक सिद्धांत की माँग थी कि श्रमिकों, किसानों और समाजवादी निर्माण का यथार्थवादी व सुलभ चित्रण जनता के बीच ले जाया जाए। इसके विपरीत, डोक्यूमेंटा प्रदर्शनी को शुरुआत से ही राज्य-विनियमित समाजवादी यथार्थवाद के बरक़स पश्चिम जर्मनी के सौंदर्यात्मक प्रतिसंतुलन के रूप में स्थापित किया गया। प्रदर्शनी ने ऐब्स्ट्रैक्ट (abstract) चित्रकारों – वासिली कैंडिंस्की, पॉल क्ली, मैक्स बेकमैन और बाद में जैक्सन पोलक और विलेम डी कूनिंग – आदि की कलाकृतियों को सामने रखा। इन कलाकारों को सीआईए के कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम और म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट (MoMA) के अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम द्वारा भी इसी युद्धोत्तर दशक के दौरान बढ़ावा दिया जा रहा था। लेकिन डीडीआर ने मज़दूर वर्ग के लिए सार्वजनिक कला का निर्माण किया; उनका उद्देश्य था कि कला को उस वर्ग के लिए सिरजा जाए जो स्वयं समाजवाद का निर्माण कर रहा था।

चार दशकों तक डीडीआर ने इस उद्देश्य से तक़रीबन दस हज़ार कलाकृतियाँ बनवाईं। भित्ति चित्रों जैसी बड़ी कलाकृतियों को ओपन कॉम्पीटिशन के ज़रिए बनावाया गया और अमूमन ये कलाकार-समूहों द्वारा बनाई गईं। यह भी एक कारण है कि कला की इस परंपरा में बुर्जुआ कला के इतिहास के मुक़ाबले रचनाकार का व्यक्तिगत स्वामित्व कम महत्व रखता है।

इस कार्यक्रम के ज़रिए समाज में एक व्यापक बदलाव लाने की कोशिश की जा रही थी: कला और उत्पादन, कलाकारों और श्रमिकों के बीच की खाई को कम करने की कोशिश। 1958 में कम्युनिस्ट पार्टी (एसईडी) की पाँचवीं पार्टी कांग्रेस में प्रथम सचिव वाल्टर उलब्रिच्ट ने कहा था कि ‘[मज़दूर वर्ग] को संस्कृति की ऊँची इमारतों पर धावा बोलना चाहिए और इन्हें अपना बना लेना चाहिए’। इसके अगले साल यही विचार पहले बिटरफ़ेल्ड सम्मेलन में पेश किया गया। सम्मेलन 24 अप्रैल 1959 को बिटरफ़ेल्ड केमिकल कंबाइन संयंत्र के संस्कृति भवन में आयोजित हुआ था। वहाँ एक मज़दूर-लेखक, वर्नर ब्रायनिग, ने नारा दिया ‘क़लम उठाओ, कॉमरेड!’। सम्मेलन ने लेखकों को कारखानों में जाने, चित्रकारों को ब्रिगेडों में शामिल होने और मज़दूरों को आर्ट स्टूडियो में जाने का आह्वान किया। इस कार्यक्रम में सरकारी इमारतों की दीवारें जनता का अख़बार बन गईं; और अलेक्ज़ेंडरप्लात्ज़ पर वोमाका की कलाकृति ‘उनज़र लेबेन’ उस अख़बर के पहले पन्नों में से एक थी।

ड्रेस्डन और आइज़नहुटनस्टाट की दीवारें

बर्लिन से ट्रेन लेकर दो घंटे की दूरी पर है ड्रेस्डन। वहाँ एक संस्कृति भवन है जिसे वोल्फगांग हैंश ने डिज़ाइन किया था और जो 1969 में बन कर तैयार हुआ। इस भवन की एक दीवार पर तीस मीटर चौड़ी व साढ़े दस मीटर लंबी एक कलाकृति है। 466 कंक्रीट पैनलों से बनी इस कलाकृति पर रंगीन काँच के टुकड़े चिपके हैं। इसका शीर्षक है: ‘डेर वेग डेर रोटेन फ़ाने‘ (‘लाल झंडे की राह’)। इसे 1968–69 के दौरान गेरहार्ड बोंडज़िन की ड्रेस्डन अकैडमी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट्स के शिक्षकों व छात्रों के एक समूह ने बनाया था। यह कलाकृति जर्मन मज़दूर आंदोलन के इतिहास को बयान करती है: 1848 की क्रांतियाँ और ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ का प्रकाशन; जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) की स्थापना; नवंबर क्रांति और क्रांतिकारी रोज़ा लक्समबर्ग और कार्ल लिब्कनेख्त की हत्या; स्पेनिश गृह युद्ध में जर्मन स्वयंसेवक; नाज़ीवाद के खिलाफ प्रतिरोध; और अक्टूबर 1949 में डीडीआर की स्थापना।

गेरहार्ड बोंडज़िन और सामूहिक, ‘डेर वेग डेर रोटेन फ़ाने’ (लाल झंडे की राह), 1969

यह कलाकृति श्लॉसश्ट्रासे बुलेवार से साफ़ देखी जा सकती है। इसके ठीक बीचों-बीच एक महिला का चित्र है, जिसका हाथ ऊपर उठा हुआ है; वह एक कारखाने के गेट के सामने खड़ी है; साथ में बैरिकेड पर सशस्त्र मज़दूर और लाल झंडे लिए सैनिक हैं – जहाँ कभी स्वस्तिक का निशान हुआ करता था। कंक्रीट पैनलों पर इन चित्रों को हड़ताल के पर्चों का इस्तेमाल कर बनाया गया है, जिन्हें इमारती स्तर पर पेश करने के लिए बड़ा (एन्लार्ज) किया गया था। बोंडज़िन कलेक्टिव ने यह भित्ति-चित्र 1969 की गर्मियों में डीडीआर की 20वीं वर्षगांठ के मौक़े पर पूरा किया था। तब से इसे एक सांस्कृतिक स्मारक घोषित किया गया है। इसके चारों ओर के भवन की दो बार मरम्मत की जा चुकी है, पहली बार 1990 के दशक की शुरुआत में, और दूसरी बार 2012–2017 में। दूसरी मरम्मत के बाद भवन का कॉन्सर्ट हॉल ड्रेस्डन फिलहारमोनिक ऑर्केस्ट्रा का दफ़्तर बन गया; लेकिन कलाकृति को हटाया या छेड़ा नहीं गया है। 

ड्रेस्डन से उत्तर-पूर्व दिशा में चलते हुए आप आइज़नहुटनस्टाट शहर पहुँचेंगे। यहाँ डीडीआर ने अपना पहला सुनियोजित समाजवादी शहर स्तालिनश्टाट बसाया था। पहले यह जगह अविकसित थी, पर 1950 के बाद से आइज़नहुटनकोम्बिनाट ओस्ट इस्पात संयंत्र स्थापित किया गया, जिसके आस-पास यह शहर बसा, जहाँ युद्धोत्तर शरणार्थियों की एक पूरी पीढ़ी आकर बसी। शहर के टाउन हॉल से थोड़ी दूरी पर, लिंडेन-आली (लिंडेन रोड), जिसका पहले नाम था लेनिन-आली, पर स्थित उस समय के मैग्नेट डिपार्टमेंट स्टोर की उत्तरी दीवार पर, वोमाका की दूसरी भित्ति-कृति बनी है। 1965 में बनी इस कृति का शीर्षक है ‘फ्रीडेन दुर्च टेक्निशेस विसन, टेक्निशेन फोर्टश्रिट’ (‘तकनीकी ज्ञान, तकनीकी प्रगति के माध्यम से शांति’)। राज्य के झंडों की औद्योगिक पृष्ठभूमि के सामने एक मज़दूर का हाथ एक सफ़ेद कबूतर को उड़ाता हुआ; आस्तीन पर औज़ारों, मज़दूरों और तकनीकी श्रम की तस्वीरें। यह शांति की तस्वीर है – उस देश के लिए, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में पचास से सत्तर लाख लोगों को खो दिया था; जिसका पश्चिमी पड़ोसी 1955 में नाटो के तहत फिर से सशस्त्र हो चुका था; पर जिसके अपने बच्चे किंडरगार्टन में वह साझा भाषा सीख रहे थे जिसमें सफ़ेद कबूतर को शांति का दूत माना जाता है।

वाल्टर वोमाका, फ्रीडन दुर्च टेक्निशेस विसेन, टेक्निशेन फोर्टश्रिट (तकनीकी ज्ञान, तकनीकी प्रगति के माध्यम से शांति), 1965

विश्व शांति और अंतर्राष्ट्रीयतावाद

यह सफ़ेद कबूतर डीडीआर की सार्वजनिक कला में बार-बार दिखाई पड़ता है। बर्लिन में एक आम अपार्टमेंट की दीवार पर कलाकार ओरट्राउड लेर्च की काँच के टुकड़ों से बनी कृति फ्रीडेन्सटाउबे (शांति का कबूतर) इस प्रतिबद्धता का प्रतीक है। पाब्लो पिकासो ने 1949 की पेरिस शांति कांग्रेस के लिए सफ़ेद कबूतर का लिथोग्राफ चित्र बनाया था और वो परंपरा डीडीआर की सार्वजनिक इमारतों पर साफ़ दिखाई देती है। डीडीआर के कलाकारों ने सिरेमिक, काँच, और इनेमल आदि से सफ़ेद कबूतर बनाए। वे कलाकार एक ऐसे देश में अपनी कृतियाँ बना रहे थे, जहाँ ‘शांति’ देश की अपनी फासीवाद-विरोधी समझ से निकाला एक नीतिगत विषय था।

ओरट्राउड लेर्च, फ्रीडेन्सटाउबे (शांति का कबूतर), 1977

डीडीआर में शांति का प्रतीक केवल यह सफ़ेद कबूतर ही नहीं था। समय के साथ-साथ इस प्रतीक में तमाम देशों के लोगों के चित्र जुड़ते गए। जिससे शांति को उपनिवेशवाद-विरोध, मुक्ति, समाजवादी अंतर्राष्ट्रीयतावाद और वोल्करफ्रॉइंडशाफ़्ट (जन-मैत्री) से जोड़ा गया।

कलाकार विली नॉयबर्ट की इनेमल पेंटिंग -इंटरनेशनल सॉलिडारिटैट (अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता) – सबसे पहले सुह्ल, थुरिंगिया के सिविक हॉल में लगाई गई थी। लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में इसे हटा दिया गया। 2010 में इसे थाले में एक बार फिर लगाया गया, यह वही औद्योगिक शहर है जहाँ नॉयबर्ट लंबे समय तक रहे थे और काम किया। यह कलाकृति शांति और मुक्ति को किसी अंतिम अवस्था के रूप में नहीं बल्कि ऐसी चीज़ के रूप में दिखाती है जो संघर्ष के माध्यम से अर्जित की जाती है: सफ़ेद कबूतर के पंखों के नीचे, दुनिया अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के एक क्षेत्र के रूप में प्रकट होती है।

अंतर्राष्ट्रीय वर्ग संघर्ष, मुक्ति की गतिशील प्रक्रिया और वोल्करफ्रॉइंडशाफ़्ट (जन-मैत्री), डीडीआर की सार्वजनिक संस्कृति में कई रूप में सामने आए। डीडीआर के अपने संसाधन सीमित थे, फिर भी उसने दुनिया भर में मुक्ति आंदोलनों और नए बने राष्ट्र-राज्यों का समर्थन किया – जिसमें स्कूलों, अस्पतालों, और कारखानों का निर्माण; हज़ारों छात्रों को निःशुल्क प्रशिक्षण देना; आंदोलन पत्रिकाएँ छापना और भेजना; तथा कुछ मुक्ति आंदोलनों के लिए पूर्वी जर्मनी में कार्यालय उपलब्ध कराना आदि शामिल था। इस एकजुटता कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी था कि इसे आम लोगों द्वारा कार्यस्थलों, स्कूलों और मोहल्लों में सामूहिक अभियानों के माध्यम द्वारा निर्मित व जारी रखा गया था।

‘सॉलिडारिटैट यूबेन!’ (एकजुटता का अभ्यास करो!) डीडीआर की सॉलिडारिटैट्सकोमिटी (एकजुटता समिति) का एक नारा था। यह समिति एक केंद्रीय समिति थी और तमाम एकजुटता कार्यों को एक सूत्र में बाँधने का काम करती थी। यह समिति जनता को उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों और मुक्ति संघर्षों के बारे में जानकारी देने तथा उनके लिए सहयोग इकट्ठा करने हेतु देशव्यापी अभियान चलाती थी; एकजुटता कार्य का अर्थ समझाने तथा इन कार्यों को प्रचारित करने के लिए कलाकारों द्वारा निर्मित पोस्टरों व सूचना सामग्रियों का इस्तेमाल होता। व्यावहारिक एकजुटता के लिए दोनों ही बातें प्रमुख थीं: एक, यह जानना कि दुनिया में क्या हो रहा है और दूसरा, उस पर कार्रवाई करना।

उदाहरण के लिए, 1965 और 1989 के बीच, एकजुटता समिति ने जनता से लगभग 130 करोड़ डीडीआर मार्क (पूर्वी जर्मनी की मुद्रा) की मानवीय सहायता वियतनाम को भेजी – जिसमें एम्बुलेंस, प्रिंटिंग प्रेस व हनोई स्थित वियतनाम-जीडीआर मैत्री अस्पताल आदि शामिल थे। यह अस्पताल आज Việt Đức Hospital के नाम से जाना जाता है, और आज भी वियतनाम के प्रमुख शल्य चिकित्सा केंद्रों में से एक है। ऐसे अभियानों के ज़रिए, एकजुटता को पोस्टरों, टिकटों, प्रदर्शनियों और अन्य मुद्रित सामग्रियों के माध्यम से दृश्यमान बनाया गया। इस तरह अंतर्राष्ट्रीयता केवल भाषणों या राज्य समझौतों तक सीमित नहीं रही; यह शहरों की दीवारों पर, मुद्रित चित्रों में, और ‘योगदान’ के रोज़मर्रा के कार्यों में दिखाई देती थी। इस तरह एकजुटता का काम एक आशापूर्ण भविष्य बनाने के काम में के एक अहम हिस्सा बना।

विली नॉयबर्ट, इंटरनेशनल सॉलिडारिटैट (अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता), 1977–1978

क्या बचा, क्या बर्बाद हुआ

1990 के बाद, एकीकृत संघीय गणराज्य जर्मनी (BRD) ने डीडीआर की सार्वजनिक सांस्कृतिक बुनियादी संरचना के बड़े हिस्से को बर्बाद करने का कार्य शुरू किया। उसी साल पश्चिमी जर्मनी के चित्रकार जॉर्ज बैज़ेलिट्ज़ ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि “डीडीआर में कोई कलाकार नहीं हैं”। इसके साथ ही लगभग एक दशक तक अख़बारों में बिल्डरस्ट्राइट विवाद (छवि विवाद) छिड़ा रहा। यह विवाद इस बात पर था कि पुनःएकीकरण के बाद पूर्वी जर्मनी की कला का मूल्यांकन कैसा किया जाए। बाउबेज़ोजेने कुन्स्ट (भवन निर्माण में कला का समावेशन) मूहिम के तहत बनी कई कलाकृतियों का एक बड़ा हिस्सा पेंट से ढँक दिया गया, अन्य कलाकृतियाँ इमारतों के नवीनीकरण की भेंट चढ़ गईं, और कई कलाकृतियाँ ‘डीडीआर प्रोपगंडा’ कहकर तोड़ दी गईं। हालाँकि, कुल कितनी कलाकृतियाँ ख़राब/ख़त्म की गईं, इसकी सटीक संख्या किसी के पास नहीं है।

पलास्ट डेर रिपब्लिक (गणतंत्र महल), डीडीआर का संसद भवन और सांस्कृतिक केंद्र, जो कि पुराने शाही महल (बर्लिनर स्टैडट्सच्लोस) के स्थान पर बना था, इस प्रक्रिया का सबसे दृश्यमान प्रतीक बना। कथित एस्बेस्टस संदूषण के कारण 1990 में इस इमारत को बंद कर दिया गया (हालाँकि एस्बेस्टस संदूषण को इसके पहले ही काफ़ी हद तक ख़त्म किया जा चुका था)। इसके बाद 2003 में जर्मनी की संघीय संसद (बुंडेस्टाग) ने इसे ध्वस्त करने का निर्णय लिया और 2006 से 2008 के बीच इसे गिरा दिया गया। इसके साथ ही इस इमारत में स्थित पलास्ट-गैलरी व उसमें मौजूद कलाकार फ्रिट्ज़ क्रेमर की स्थाई प्रदर्शनी भी ख़त्म हो गई। क्रेमर वही कलाकार हैं जिनके द्वारा बनाई बर्टोल्ट ब्रेख्त की मूर्ति बर्लिनर एन्सेम्बल के सामने खड़ी है। पलास्ट डेर रिपब्लिक की गैलरी में मौजूद उनकी स्थाई प्रदर्शनी का शीर्षक था ‘क्या कम्युनिस्टों को सपने देखने की अनुमति है?’ (Dürfen Kommunisten träumen?)। इस गैलरी में कई महत्वपूर्ण डीडीआर कलाकारों की कलाकृतियाँ शामिल थीं। 1990 के बाद, इन कलाकृतियों को संघीय संरक्षण के तहत गोदामों में रख दिया गया। पलास्ट डेर रिपब्लिक के स्थान पर अब हम्बोल्ट फोरम (Humboldt Forum) -एक संग्रहालय और सांस्कृतिक केंद्र- की नई इमारत बन चुकी है। इस बदलाव को लेकर बर्लिन में काफी विवाद हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह डीडीआर की स्मृति को जानबूझकर मिटाने तथा पुराने प्रशियन साम्राज्य की छवि को बहाल करने का प्रयास है। 6.8 करोड़ यूरो की भारी लागत से बना यह सांस्कृतिक केंद्र साल 2020 से अलग-अलग चरणों में आम जनता के लिए खोला गया। 

जिन शहरों/जगहों में डीडीआर की कला व वास्तुकला उसके अंत के बाद भी दो दशकों तक बची रही, वहाँ अब उनके ऐतिहासिक व सांस्कृतिक मूल्य को पुन: मान्यता मिल रही है; साथ ही उन्हें संरक्षित करने की इच्छा भी बढ़ रही है। शायद तीस वर्षों तक सरकारी कटौतियों की बर्बरता ने लोगों में अपनी मानवता और गरिमा – और शायद समाजवाद – को याद रखने की आवश्यकता को बढ़ा दिया है। ब्रैंडेनबर्ग के बीसको कला अभिलेखागार में 1990 के बाद सार्वजनिक इमारतों से हटाई गईं तेईस हज़ार से अधिक डीडीआर कलाकृतियाँ रखी हैं। अब इन कलाकृतियों की पुनर्मूल्यांकन प्रदर्शनियाँ आयोजित की जा रही हैं; जैसे 2003 में बर्लिन के न्यू नेशनलगैलरी में आयोजित ‘कुन्स्ट इन डेर डीडीआर‘ (डीडीआर में कला) प्रदर्शनी; 2012 में वाइमर के न्यूज म्यूज़ियम में ‘अब्सचीड वॉन इकारस‘ (इकारस को विदाई: डीडीआर में दृश्य-संसार पर नया नज़रिया) प्रदर्शनी; और 2017 में पॉट्सडैम के म्यूज़ियम बारबेरिनी में ‘बिहाइंड द मास्क‘ (मुखौटे के पीछे: जीडीआर में कलाकार) प्रदर्शनी। इन प्रदर्शनियों ने ने उस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है, जिसे चित्रकार जॉर्ज बैज़ेलिट्ज़ की घोषणा ने शुरू किया था।

डीडीआर कला के पुनर्मूल्यांकन के यह प्रयास केवल गोदामों से कलाकृतियों को निकालने या भित्तिचित्रों को सार्वजनिक दृष्टि में लौटाने तक सीमित नहीं हैं। ये प्रयास उस प्रश्न को भी फिर से उठा रहे हैं कि डीडीआर इन कलाकृतियों के ज़रिए क्या बनाने की कोशिश कर रहा था: एक ऐसा समाज, जिसमें कला निजी स्वामित्व व विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि मज़दूर वर्ग की रोज़मर्रा की शिक्षा, गरिमा, और कल्पना का हिस्सा हो।

डीडीआर को समाजवादी परंपरा के भीतर फिर से पढ़ा जा रहा है। बर्लिन स्थित ज़ेत्किन फोरम फॉर सोशल रिसर्च और इंटरनेशनेल रीसर्च सेंटर ऑन डीडीआर द्वारा किए जा रहे शोध इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं; जिन्होंने, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान के साथ मिलकर ‘डीडीआर पर अध्ययन’ सिरीज़ के तहत कई लेख प्रकाशित किए हैं। ये लेख आज के प्रगतिशील आंदोलनों के लिए समाजवादी राज्य डीडीआर के इतिहास, सिद्धांतों, व अनुभवों को समझने का ज़रिया बन सकते हैं।

स्नेह सहित,

ज़ेत्किन फ़ोरम फ़ॉर सोशल रिसर्च