फ़िदेल से हमने क्या पाया: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2026)
फ़िदेल की विरासत हमें सिखाती है कि उपनिवेशवादी लूट से मुक्ति के लिए उत्पादन क्षमता और मानवीय गरिमा ज़रूरी है।
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
मैं सिर्फ़ सोलह साल का था जब 1983 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के दिल्ली में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान मैंने पहली बार फ़िदेल कास्त्रो को देखा था। जब वे भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सम्मेलन स्थल पर मिले, तब प्रोटोकॉल तोड़ते हुए फ़िदेल ने उन्हें गले लगा लिया था। अगर फ़िदेल आज ज़िंदा होते तो इस हफ़्ते अपना सौवाँ जन्मदिन मनाते। फ़िदेल को भारत से प्यार था, यह बात मुझे अठारह साल बाद दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में पता चली। उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘मैं कई बार भारत गया हूँ, पर थोड़े-थोड़े वक़्त के लिए’। उस समय मैं डर के मारे उन्हें बता नहीं पाया कि मैंने उन्हें गुटनिरपेक्ष आंदोलन के शिखर सम्मेलन में देखा था और उनके विशाल व्यक्तित्व को देखकर सोचने लगा था कि क्यूबा भी एक विशाल देश होगा, न कि 110,000 वर्ग किलोमीटर का टापू देश जिसकी जनसंख्या उस कलकत्ता मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र से भी कम है जहाँ मैं पैदा हुआ था। दूर से ही उन्हें उनके हरे मिलिट्री वाले कपड़ों में देखकर मैं नौजवान फ़िदेल के बारे में सोचने लगा जो सिएरा माएस्ट्रा (क्यूबा की सबसे बड़ी पर्वत शृंखला होने के साथ-साथ वहाँ की क्रांति का एक प्रतीक) से मार्च करते हुए हवाना में आया होगा। साथ ही मैं यह भी सोच रहा था कि क्या उन्होंने आत्मरक्षा के लिए अपनी आस्तीन में पिस्तौल छिपाई होगी क्योंकि उन पर कई जानलेवा हमले हुए, पर उनका बाल भी बाँका नहीं हो सका।
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2001 में डरबन के नस्लीय भेदवाद विरोधी विश्व सम्मेलन में फ़िदेल ही इकलौते नेता थे जिनके लिए दोनों, सरकारी और ग़ैर-सरकारी, मंचों में खड़े होकर तालियाँ बजाई गईं। फ़िदेल ने जिस ईमानदारी से अपनी बात रखी उसने सभी तरह की राजनीतिक विचारधाराओं वाले लोगों को प्रभावित किया। यह ‘मानव अधिकारों’ और ‘भूमंडलीकरण’ का दौर था, ये दोनों ऐसे शब्द थे जिनके ज़्यादा मायने नहीं थे क्योंकि ज़मीन पर तो असमानता बिना रोक-टोक बनी हुई थी। तो फिर नस्लभेद और पर्यावरण के विनाश, ऋण और महिला अधिकारों आदि से जुड़े मंचों का ऐसे दौर में क्या मतलब रह जाता है जब चीज़ें बद से बदतर होती जा रही हों? जब वैश्विक दक्षिण में घरेलू (पारिवारिक) ऋण तबाही के स्तर पर पहुँच चुका हो, सूट-बूट में सजे नेताओं ने वही घिसी-पिटी बातें कीं। लेकिन अपने मिलिट्री वाले हरे लिबास में फ़िदेल उनसे बिलकुल उलट थे। उनकी साफ़गोई और मुस्कान ने सत्य को सहन करने लायक़ बनाया और लोगों को प्रेरित किया कि वे एक गरिमामय भविष्य के लिए फ़िदेल की लड़ाई में शामिल हों। हम सबने खड़े होकर फ़िदेल के लिए तालियाँ बजाईं सिर्फ़ उनके शब्दों के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि उन्होंने हमारे मन की ही बात रखी थी।
1983 में गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में शामिल होने से दो साल पहले फ़िदेल ने कमेटीज़ फ़ॉर द डिफ़ेन्स ऑफ़ द रेवोल्यूशन (सीडीआर) के सम्मेलन को भी संबोधित किया था। सीडीआर उन स्थानीय गुटों का संगठन था जिसकी स्थापना 1960 में हुई थी और इन्होंने अपने समुदायों तथा राष्ट्र की सुरक्षा में एक अहम भूमिका निभाई। फ़िदेल ने यहाँ क्यूबा की क्रांति की उपलब्धियों की ओर तो इशारा किया ही, पर संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) द्वारा लगाई गई कड़ी घेरेबंदी की वजह से खड़ी हुई समस्याओं के बारे में भी चर्चा की। फ़िदेल ने कहा कि सबके बावजूद घेरेबंदी ‘हमें वो कामयाबी हासिल करने से नहीं रोक पाई जो हमने पहले कभी नहीं देखी थी’। उन्होंने इन कामयाबियों की सूची पेश की :
लगभग पूरी आबादी को रोज़गार देना, बेकारी पर अंकुश लगाना; जुआ, नशा, वेश्यावृत्ति जैसी बुरी आदतों पर क़ाबू पाना; निरक्षरता को ख़त्म करना; कम-से-कम छठी क्लास तक की शिक्षा सुनिश्चित करना और इसे बढ़ाकर नवें दर्जे तक ले जाने के प्रयास; और दुनिया के अल्पविकसित देशों में सबसे बेहतरीन सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थापना करना।
फ़िदेल ने कहा था ‘हम परेशानियों के सामने झुकने वाले नहीं’।
यह तीसरी दुनिया के लिए एक बुनियादी सबक़ है। यह सही है कि उपनिवेशवाद ने हमारे देशों को बर्बाद किया। यह भी सही है कि नव-उपनिवेशवादी ढाँचे अब भी हमारे देशों का संसाधन और संपदा लूट रहे हैं। सच है कि युद्ध और ऋण पर आधारित संरचनात्मक ढाँचे के तहत हर उस देश को बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है जो संप्रभुता स्थापित करने की कोशिश करता है। ये सब सच है और ये समस्याएँ बरक़रार हैं। लेकिन हम इन समस्याओं के सामने घुटने नहीं टेक सकते।
फ़िदेल यूटोपियन समाजवादी नहीं थे। वे उनका विरोध करते थे जिनका मानना था कि हम ग़रीबी से सीधा संपदा तक की छलांग लगा सकते हैं। फ़िदेल ने मार्क्स को पढ़ा था। ख़ासतौर से उनकी प्रसिद्ध और प्रचलित गोथा कार्यक्रम की समालोचना (1875), जिसमें मार्क्स कहते हैं ‘अधिकार कभी भी समाज की आर्थिक संरचना और उससे निर्धारित उसके सांस्कृतिक विकास से ऊँचा नहीं हो सकता’। दूसरे शब्दों में, जिस समाज की उत्पादन-शक्तियाँ पर्याप्त अधिशेष पैदा नहीं कर सकतीं और इसलिए लोगों के लिए पर्याप्त अवकाश तथा सांस्कृतिक संस्थाएँ उपलब्ध नहीं करा सकतीं, वह समाज अपने बल पर मानव मुक्ति की परिस्थितियाँ पैदा नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, पूँजीवादी व्यवस्था में संपत्ति के उदार अधिकार हर व्यक्ति को संपत्ति रखने की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, जो पूँजीवाद-पूर्व सामाजिक संरचनाओं के तहत प्रतिबंधित था। लेकिन वे संपत्ति से मुक्ति, यानी, संपत्ति-विहीन होने के अत्याचार से मुक्ति की गारंटी नहीं देते। केवल प्रचुरता वाले ‘साम्यवादी समाज के एक उच्चतर चरण’ में स्वतंत्रता के लिए सामाजिक आधार स्थापित किया जा सकता है। मार्क्स लिखते हैं कि ‘तभी बुर्जुआ अधिकार के संकीर्ण क्षितिज को पूरी तरह से पार किया जा सकता है और समाज अपने परचम पर लिखेगा: प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार!’
फ़िदेल जानते थे कि उनकी यह समझ उन्हें यूटोपियावाद (काल्पनिक आदर्शवाद) और उदारवाद की परंपराओं से अलग करती है। साथ ही उन्हें यह बुनियादी सत्य भी समझ आ गया था: उपनिवेशवादी और नव-उपनिवेशवादी परिस्थितियों के तहत पूँजीवाद का असमान विकास ग़रीब देशों को अपनी उत्पादक शक्तियों का विकास नहीं करने देगा, बल्कि वे सिर्फ़ अपने अल्पविकास को ही विकसित करते चले जाएँगे। इसका मतलब था कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों को पहले औपनिवेशिक शासकों को सत्ता से हटाना होगा और उसके बाद कुशलतापूर्वक दो ऐतिहासिक कार्य एक साथ करने होंगे: उत्पादक शक्तियों का निर्माण (जो बुर्जुआ वर्ग का काम होना चाहिए था) और उत्पादन के साधनों का समाजीकरण (जो एक समाजवादी परियोजना का उद्देश्य होता है)। ग़रीब देशों में बुर्जुआ और सर्वहारा, दोनों वर्गों के काम समाजवादी ताक़तों को बेहद दबाव झेलते हुए पूरे करने होंगे। लेकिन समस्याओं की वजह से हम रुक नहीं सकते।
साल 2001 में मैं डरबन के एक होटल के कमरे में फ़िदेल और उनके साथ आए प्रतिनिधियों के साथ बैठा था, जब वे मुझसे भारत में जातिगत भेदभाव के बारे में सवाल पूछ रहे थे। फ़िदेल की जिज्ञासा दूसरों को भी उत्सुक बना देने वाली थी और उन्हें अपनी इस जिज्ञासा का पूरा एहसास था। मैं उनसे काफ़ी प्रभावित था और कोशिश कर रहा था कि उनके सवालों के जवाब दूँ। उस समय मैं चौंतीस बरस का था और मेरे मन में यही चल रहा था कि घर पर मेरी छह महीने की बच्ची कैसी होगी।
फ़िदेल ने मुझे समाजवाद के निर्माण की कठिनाइयों के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने यह भी बताया कि शुरुआती दशकों में क्यूबा की क्रांति नस्ल और लैंगिकता पर आधारित ऊँच-नीच और सामाजिक पदानुक्रम को पर्याप्त रूप से समाप्त नहीं कर पाई थी। यह सच है कि क्यूबाई क्रांति ने सार्वजनिक क्षेत्रों से भेदभाव दूर कर दिया था लेकिन नस्लवाद की गहरी जड़ों से निपटने के लिए बहुत कुछ नहीं किया जा सका था। इन दृढ़ वास्तविकताओं से निपटना ज़रूरी है, इसके लिए सबसे पहले मुश्किल तथ्यों से शुरुआत करनी होगी और फिर परिस्थितियों को बदलने के तरीक़े तलाशने होंगे। सच्चाई से मुँह फेर लेना प्रगति की राह में अड़चन पैदा करना है। फ़िदेल को यह अच्छी तरह पता था।
डरबन सम्मेलन को संबोधित करते हुए फ़िदेल ने इन जटिल और आसानी से दूर न होने वाली वास्तविकताओं पर बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ‘नस्लवाद, नस्लवादी भेदभाव और ज़ेनोफोबिया [विदेशियों या अजनबियों का डर] इंसानों की नैसर्गिक प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं – इनके जन्म की सीधी वजहें हैं युद्धों, सैन्य कार्रवाइयों, दासता और इंसानी समाजों के पूरे इतिहास में सबसे शक्तिशाली द्वारा सबसे कमज़ोर का व्यक्तिगत या सामाजिक शोषण’। अगर हम इस सच को मान लें तो नस्लवाद से लड़ने के लिए बेहतर व्यवहार पर सेमिनार करवाना या अच्छी आदतों को साझा करना भर काफ़ी नहीं होगा। हमें उस व्यवस्था को ही बदलना होगा जो सामाजिक भेदभाव को इतनी शक्ति देती है। हमें पूँजीवादी व्यवस्था को ही उखाड़ फेंकना होगा।
जब मैं फ़िदेल के साथ बैठा था तब मैंने मार्क्स द्वारा ‘स्वतंत्रता के क्षेत्र’ और ‘आवश्यकता के क्षेत्र’ के बीच अंतर की चर्चा की थी। स्वतंत्रता का क्षेत्र दुनिया के उन हिस्सों का संदर्भ था, जो – आंशिक रूप से उपनिवेशवाद के माध्यम से – उन्नत उत्पादक शक्तियों से लैस कर पाने में सक्षम रहे थे, और इसलिए समाजवाद की ओर बढ़ने के लिए ज़मीन तैयार कर चुके थे। आवश्यकता का क्षेत्र – औपनिवेशिक लूट के शिकार – अभी भी लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं से आगे नहीं बढ़ पाए थे, और इसलिए समाजवाद से बहुत दूर थे। फिर भी, शास्त्रीय मार्क्सवाद की अपेक्षाओं के विपरीत, क्रांतियाँ आवश्यकता के क्षेत्र में हुईं – जहाँ समाजवाद ‘युवा है और उसमें गलतियाँ हैं’, जैसा कि चे ने 1965 में लिखा था। ‘हम गलतियाँ करते हैं’, फिदेल ने मुझसे कहा, ‘लेकिन हमें उनके बारे में ईमानदार होना चाहिए। हम यह दिखावा नहीं कर सकते कि हमसे गलतियाँ नहीं होतीं। लेकिन हमें ख़ुद को यह भी याद दिलाना चाहिए कि हमारे पास कुछ निश्चितताएँ हैं। हम हमेशा अपने प्रयासों के लिए माफ़ी नहीं माँग सकते, जबकि हमारे ये प्रयास सिर्फ़ दुनिया को अधिक मानवीय स्थान बनाने के लिए हैं।’
फ़िदेल जैसा क्रांतिकारी हमें केवल यह या वह विचार नहीं देता। वह हमें – विशेषकर इन अंतरंग क्षणों में – एक क्रांतिकारी का उदाहरण देता है – वही जिसे हो ची मिन्ह ने अनुकरण की आवश्यकता (necessity of emulation) कहा था। फ़िदेल को अपने विचारों को जोश और निश्चितता के साथ समझाते हुए देखकर, मैं ख़ुद और अधिक जोशीला और निश्चित महसूस कर रहा था। इसने मुझमें उनके अनुकरण करने की इच्छा को मज़बूत किया – एक व्यक्ति के रूप में फ़िदेल का अनुकरण नहीं; बल्कि उस तरीक़े का, जिससे उन्होंने हमारी मानवता को क्रूरता से बचाने और ईमानदारी से एक समाजवादी दुनिया बनाने के संघर्ष में भाग लिया।
अगर आप फ़िदेल के सबसे ज़रूरी भाषणों को सुनेंगे, तो आप पाएँगे कि वे ऐसे बारीक विवरण हैं जो सुनने वालों को अप्रासंगिक लगेंगे। मसलन, वे क्यूबा के हर ज़िले में पैदा हुई फ़सलों के रिकॉर्ड में से कुछ पढ़कर सुनाने लगेंगे, प्लाज़ा दे ला रेवोलुसियोन (हवाना का एक प्रसिद्ध चौक) पर इकट्ठा हुए लोगों को नौकरशाही वाले प्रशासन के महीन से महीन ब्यौरे देने लगेंगे। वे ऐसा क्यों करते थे? हमारे क्रांतिकारी प्रोफ़ेसर फ़िदेल हमें बता रहे थे कि समाजवाद विवरणों में होता है: उत्पादक शक्तियों के निर्माण के विज्ञान के बारे में सजग रहने में, नाकामियों के बारे में स्पष्ट और ईमानदार बनने में, और असफलताओं को सफलताओं में बदलने के लिए जन-भागीदारी के लिए लिए दरवाज़े खोलने में। हम परेशानियों से डरने वाले नहीं हैं।
स्नेह सहित,
विजय
पुनश्च: इस न्यूज़लेटर में प्रकाशित चित्र FIDEL X 100 से लिए गए हैं। यह एक पोस्टर अभियान है जो फ़िदेल की जन्मशताब्दी के अवसर पर चलाया गया। यह अभियान Utopix, ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान, इंटरनेशनल पीपल्स असेंबली, ALBA Movimientos, Pan Africanism Today, Instituto Simon Bolivar, और Young Socialist Artists द्वारा संचालित किया गया।