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केरलम् में कम्युनिस्ट चुनाव भले हारे हों, लेकिन उनका काम जारी है

दसवाँ एशिया न्यूज़लेटर

दशकों के सांगठनिक कार्य ने एक बँटे हुए समाज को सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सहकारी संस्थाओं और काडर-निर्माण के ज़रिए बदला है। यह इस बात का प्रतीक है कि कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी हार के बावजूद लोकतंत्र को मज़बूत करने का काम जारी रखता है।

लाल चींटियाँ, मानस दास (भारत).

प्रिय साथियो,

ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया की ओर से अभिवादन।

हर पाँच साल में केरलम् के मतदाता एक नई राज्य सरकार चुनने के लिए मतदान करते हैं। केरलम् की आबादी साढ़े तीन करोड़ है। पिछली दो बार से केरलम् में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई(एम) की अगुवाई में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ़) की सरकार रही। 4 मई को भारत के चुनाव आयोग ने घोषणा की कि एलडीएफ़ को विधानसभा की 140 में से सिर्फ़ 35 सीटें मिली हैं और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ़) ने, जिसकी अगुवाई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस करती है, 102 सीटों के साथ चुनाव जीत लिया है।

अगर एलडीएफ़ जीत जाती तो यह ऐतिहासिक होता क्योंकि केरलम् में आज तक किसी भी मोर्चे ने लगातार तीन चुनाव नहीं जीते हैं। 2021 में जब एलडीएफ़ ने दोबारा चुनाव जीता था तब भी यह किसी अचंभे से कम नहीं था। और तब इसने 2016 की 91 सीटों के मुक़ाबले 99 सीटें पाई थीं। इससे पहले केरलम् में किसी मोर्चे को लगातार दो बार चुनाव जीतने का मौक़ा नहीं मिला था। 

अब सवाल यह है कि इस बार के चुनावी परिणाम को कैसे देखा जाए। क्या केरलम् की जनता फिर से एक बार एलडीएफ़ और एक बार यूडीएफ़ को चुनाव जिताने की रिवायत की ओर लौट रही है। या यह सीपीआई(एम) की अगुवाई वाले वामपंथ के लिए किसी गहरी मुसीबत का संकेत है?

कुडुंबश्री, गोपिका बाबू (भारत), 2021.

आधुनिक केरल का विकास

पिछले साल केरलम् की एलडीएफ़ सरकार ने दो बड़ी उपलब्धियों की घोषणा की। पहली, केरलम् ने अत्यधिक ग़रीबी ख़त्म कर दी है। 2021 में चीन ने दुनिया को बताया था कि उनके देश से अत्यंत ग़रीबी ख़त्म हो चुकी है। वह दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने अत्यधिक ग़रीबी ख़त्म की। इसके बाद केरलम् ऐसा करने वाला दुनिया का दूसरा क्षेत्र बना। केरलम् ने दूसरी घोषणा की कि प्रदेश में शिशु मृत्यु दर प्रति हज़ार जन्मों में पाँच मौतें से नीचे आ गई है। यह अमरीका की शिशु मृत्यु दर से भी कम है। ग़ौरतलब है कि 2016 से 2026 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे पिनाराई विजयन का जन्म 1945 में हुआ था और उनसे पहले उनकी माँ के ग्यारह बच्चे जीवित नहीं बचे थे। उस समय केरल की शिशु मृत्यु दर थी प्रति हज़ार जन्मों में सौ से ज़्यादा मौतें।

इस तरह की कई उपलब्धियाँ प्रदेश ने हासिल कीं। इनके पीछे आधुनिक विज्ञान और तकनीकी तरक़्क़ी का तो योगदान रहा ही लेकिन 1956 में केरलम् राज्य बनने के बाद से वाम सरकारों द्वारा अपनाई गई जन-पक्षधर नीतियों ने बड़ी भूमिका निभाई है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि कम्युनिस्टों ने राज्य की संस्थाओं के लोकतांत्रीकरण और प्रदेश के सामाजिक उत्थान में निर्णायक भूमिका निभाई है। जबकि ऐसा करते हुए वामपंथी लगातार चुनौतियों का सामना कर रहे थे। 1957 और 1987 के बीच चुनी गईं वामपंथी सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं, कभी केंद्र सरकार की दख़ल (जैसे 1959 में) के कारण और कभी कमज़ोर गठबंधनों की वजह से। इसके बावजूद भूमि सुधार की शुरुआत वामपंथी सरकार ने की, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की नींव वामपंथी सरकार ने रखी, और इसके साथ ही मज़दूरों की ज़िंदगी में सुधार के कई उपाय किए।

इतने अरसे में वामपंथी पार्टी के चुनाव हार जाने पर भी पार्टी काडर ने कभी संघर्ष का मैदान नहीं छोड़ा। जब भी किसी सरकार ने जन-विरोधी नीतियाँ अपनाने की कोशिश की, ख़ासकर नवउदारवादी दौर में, वे सड़कों पर विरोध में उतरे हैं। कम्युनिस्ट केरल की उपलब्धियों की रक्षा करने वाली सबसे बड़ी ताक़त बने रहे। इसके साथ साथ उन्होंने सामाजिक उत्थान से जुड़ा काम भी जारी रखा। जैसे सहकारी संस्थाएँ, सार्वजनिक पुस्तकालय, सांस्कृतिक केंद्र स्थापित करना, और मज़दूरों को यूनियनों में संगठित करना।

केरलम् में सोलह हज़ार से ज़्यादा पंजीकृत सहकारी समितियाँ हैं। इनमें से एक चौथाई वित्तीय सहकारी समितियाँ हैं। इसके अलावा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी श्रम सहकारी संस्थाएँ हैं जैसे, अस्पताल कर्मचारियों, शैक्षणिक कर्मचारियों, होटल कर्मचारियों आदि की। सहकारी आंदोलन के इतिहास और सिद्धांतों पर ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने हाल में एक अध्ययन प्रकाशित किया था। केरलम् में साढ़े नौ हज़ार से ज़्यादा पंजीकृत सार्वजनिक पुस्तकालय हैं, और इनमें से ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों में हैं। केरलम् में सार्वजनिक पुस्तकालय आंदोलन का इतिहास राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और ज़मींदारी-विरोधी संघर्षों के दौर तक जाता है। उस दौर में रात की कक्षाओं में जनता को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता, और दुनिया की ख़बरें देते हुए उन्हें मुक्ति की नई विचारधारा से परिचित कराया जाता।

केरलम् की अहम उपलब्धियों में से एक रही है साक्षरता अभियान। इस अभियान ने केरल से निरक्षरता मिटाई। दूसरी अहम उपलब्धि रही कुडुंबश्री सहकारी संस्था की स्थापना। यह दुनिया के सबसे बड़े महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों में से एक है, और लगभग 48 लाख महिलाएँ इसकी सदस्य हैं। इन कार्यक्रमों की निर्माण प्रक्रिया ने केरल के समाज को लोकतांत्रिक बनाया और कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए सक्षम वामपंथी राजनीतिक काडर तैयार किया। सहकारी आंदोलन और साक्षरता कार्यक्रम वे दो प्रक्रियाएँ हैं जो पिछले 69 सालों से केरल को मज़बूत बना रही हैं। 

इन सालों में केरलम् ने जीवन-स्तर के वे मानक हासिल किए हैं जो दुनिया के सबसे अमीर पूँजीवादी देशों में ही मुमकिन होते हैं। प्रदेश में शिशु मृत्यु दर घटी है और जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। स्कूल व्यवस्था से कोई बच्चा बाहर नहीं है। बाल मज़दूरी पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है। सार्वभौमिक टीकाकरण से लेकर पूर्ण विद्युतीकरण तक सब संभव हुआ है। पूँजीवादी देश ये मानक हासिल कर पाते हैं क्योंकि उनके पास अथाह दौलत है। उनकी यह दौलत दुनिया के बड़े हिस्सों पर उपनिवेश स्थापित करके, ग़ुलामों का व्यापार करके, और वैश्विक दक्षिण से लगातार जारी नवऔपनिवेशिक लूट से आई है। लेकिन केरलम् ने सामाजिक सुधार, धन के पुनर्वितरण, और जन-भागीदारी के ज़रिए लोकतंत्र को सार्थक बनाते हुए यह कामयाबी हासिल की। इसे संभव बनाने के लिए कई तरह के कदम उठाए गए। जैसे भूमि सुधार और साक्षरता अभियान लागू करना, सार्वजनिक शिक्षा को मज़बूत बनाना, मज़दूरों को बेहतर मज़दूरी देना, पीपल्ज़ प्लानिंग के ज़रिए योजना प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना, और स्थानीय प्रशासन को मज़बूत करना।

शीर्षकहीन, स्वाति कमललक्ष्मीविजय (भारत).

एक चुनावी हार

पिछले अड़तीस सालों में से चौबीस साल केरलम् में वामपंथी सरकार रही है। और इस दौरान जब भी वामपंथी दलों ने चुनाव जीता, तमाम तरह के हमलों के बावजूद, सरकार ने अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया। पिछले दशक में विजयन (जिन्हें प्यार से लोग ‘कैप्टन’ बुलाते हैं) की अगुवाई वाली सरकार ने जन-कल्याण, ढाँचागत विकास, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास पर ज़ोर दिया। सरकार ने स्कूलों के आधुनिकीकरण और सरकारी अस्पतालों के विस्तार के ज़रिए सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत किया। 2018 की विनाशकारी बाढ़ (और इसके बाद के वर्षों में आई छोटी बाढ़ों), 2018 में फैली निपाह महामारी, और 2020 की कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार के प्रबंधन को दुनिया भर में सराहा गया। राजमार्गों और पुलों समेत बुनियादी ढाँचा विकसित करने की परियोजनाओं ने राज्य के परिवहन नेटवर्क की सूरत बदल दी। सरकार ने कल्याणकारी पेंशनों में इज़ाफ़ा किया, आवास योजनाओं का विस्तार किया, और डिजिटल गवर्नैन्स को बढ़ावा दिया। इनमें से अधिकतर काम केरल इन्फ़्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फ़ंड बोर्ड द्वारा किए गए। अगर यह चुनाव सिर्फ़ नीतिगत उपलब्धियों पर लड़ा जाता, तो एलडीएफ़ की लगातार तीसरी चुनावी जीत पक्की थी।

लेकिन पूँजीपति व्यवस्था में चुनावी लोकतंत्र ऐसे काम नहीं करता। यहाँ कई तरह की जन-प्रवृतियाँ गढ़ी जाती हैं, जैसे सत्ता-विरोध की भावना को उकसाना और जनता में सरकार के काम के प्रति संदेह उत्पन्न करना। सोशल मीडिया और मुख्य धारा के कॉरपोरेट मीडिया ने इस तरह के विचारों को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया कि सरकार की असली उपलब्धियाँ धुँधली नज़र आएँ। जैसे अत्यधिक ग़रीबी को ख़त्म करने की उपलब्धि की बजाए दूसरे मामलों में सरकार की निष्क्रियता की झूठी-सच्ची खबरें फैलाई गईं ।

कम्युनिस्ट भारत, हुआन मिगेल हर्नांडेज़ (वेनेज़ुएला), 2021.

काम जारी है

1937 में, केरलम् के कोड़िकोड शहर में एक सब्ज़ी की दुकान की छत पर, पाँच लोगों ने गुप्त रूप से एक पार्टी बनाई थी। यह थी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की केरल इकाई। उस ज़माने में इस बात की भनक लगने पर पीटे जाने या गोली मार दिए जाने का ख़तरा था। छुपते-छुपाते या जेल से काम करते हुए पार्टी की यह इकाई बढ़ी। सफ़र में कई साथी फाँसी पर पर चढ़ाए गए, कई गोलियों से मारे गए, और कई पुलिसिया दमन में दम तोड़ गए। फिर भी, सिर्फ़ बीस साल में वह इकाई इतनी बड़ी हो गई कि 1957 में केरलम् विधानसभा का पहला चुनाव जीतकर राज्य में सरकार बनाई।

आज वे केवल चुनाव हारे हैं, उनका काम अब भी जारी है। वाम दलों ने कहा है कि वे इस बात का अध्ययन करेंगे कि उनके पक्ष में समर्थन कम होता क्यों दिख रहा है। केरलम् में सीपीआई(एम) के मौजूदा सदस्यों में से आधे सदस्य 2015 के बाद पार्टी में आए हैं इसका मतलब है कि आज पार्टी के ज़्यादातर काडर जनवादी लोकतंत्र स्थापित करने वाले संघर्षों से तपकर नहीं निकले हैं। वे पार्टी से उन दस सालों के दौरान जुड़े जब पार्टी सत्ता में थी। अब जब पार्टी सत्ता में नहीं है, तब केरलम् में लोकतंत्र की रक्षा से जुड़े और लोकतंत्र को मज़बूत करने के संघर्षों में उनकी परीक्षा होगी। काडर का असली विकास वर्ग-संघर्षों में होता है केरलम् के कम्युनिस्ट अब वापस इन संघर्षों की ओर लौटेंगे।

1977 के चुनाव में वाम मोर्चे ने 140 में से सिर्फ़ 29 सीटें जीती थीं, और इनमें से कम्युनिस्टों को मात्र 17 मिली थीं। फिर भी तीन ही साल के बाद, 1980 के चुनाव में वामपंथ ने 98 सीटें जीतीं (जिनमें से अकेली सीपीआई(एम) को 35 सीटें मिली थीं)। 1977 से लेकर 1980 के बीच एलडीएफ़ लगातार जनता के अहम मुद्दों पर मुहिम चला रही थी: जैसे सामाजिक-आर्थिक संकट का हल करना और केरल (तथा भारत में) जनता के बीच धार्मिक बँटवारे होने से रोकना। इन मुहिमों ने केरलम् के समाज और वामपंथ दोनों को मज़बूत किया 1980 में ई.के. नायनार की सरकार चुनी गई (जिन्होंने 1980 से 1981, 1987 से 1991, और फिर 1996 से 2001 तक सरकार चलाई)। 1980 से 2000 के बीच वामपंथ ने योजना प्रक्रिया में जनता की भागीदारी के सिद्धांत और सहकारी संस्थाओं की भूमिका स्थापित की।

केरलम् के पहले लोकतांत्रिक चुनावों के दौरान दक्षिणपंथी प्रचार कर रहे थे कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई तो धार्मिक लोगों को जेल में डाला जाएगा, औरतें सबकी साझी संपत्ति बना दी जाएँगी, तथा प्रदेश में हिंसा और अराजकता का राज होगा। इसी क़िस्म का झूठा प्रचार दुनिया भर में कम्युनिस्टों के बारे में फैलाया जा रहा था। लेकिन जब-जब वामपंथ सत्ता में आया, केरलम्  के लोगों ने ख़ुद ज़ाना कि कम्युनिस्टों की अगुवाई में समाज चलने का असल में क्या मतलब है। दिलचस्प बात यह है कि हाल में चली कम्युनिस्ट-विरोधी मुहिम अलग क़िस्म की थी — यूडीएफ़ खेमे ने प्रचार किया कि वामपंथ को वोट नहीं देना चाहिए क्योंकि लगातार सत्ता में रहने से पार्टी का असली  कम्युनिस्ट चरित्र भ्रष्ट हो सकता है।

वामपंथ चुनाव हार चुका है, लेकिन दूसरे खेमे की मुहिम वामपंथ को बेमानी साबित करने की बजाए उसकी ज़रूरत को ही उजागर करती चली गई। कम्युनिस्ट आंदोलन केरलम् का अभिन्न हिस्सा है। अगर कम्युनिस्ट आंदोलन इस बात को समझ लेता है और जनता का भरोसा फिर से जीत लेता है, तो वह केरलम् को प्रगतिशीत तरीक़े से बदलता रहेगा और दुनिया को सबक़ देता रहेगा।

सस्नेह,

नितीश नारायणन और विजय प्रशाद

सम्पादकीय टिप्पणी: केरलम् मलयालम में केरल का देसी नाम है। राज्य अभी अपना आधिकारिक नाम बदलने की प्रक्रिया में है। ट्राईकॉन्टिनेंटल एशिया टीम ने फ़ैसला किया है कि हम अब से आने वाले अपने सभी लेखों में केरल की जगह केरलम् लिखेंगे।