वैश्विक दक्षिण के जेन ज़ी आंदोलनों पर सात विचार बिंदु: तैंतालीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
वैश्विक दक्षिण में जेन ज़ी के विद्रोह नवउदारवाद से उपजे संकटों की ओर इशारा करते हैं। क्या इन्हें प्रगतिशील मोड़ दिया जा सकता है?
Muro sagrado de la dignidad (गरिमा की पवित्र दीवार), गीएर्मो ग्रेबे (चिली), 2021.
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
मैं चिली के सैंटियागो शहर में रहता हूँ, यहाँ की दीवारों पर अब भी 2019 के estallido social (सामाजिक आंदोलन) के दौरान बने चित्रों की हल्की छाप मौजूद है। इतने सालों बाद भी ये नारे मानो आज भी सड़कों पर गूँज रहे हैं – Nos quitaron tanto que nos quitaron hasta el miedo (लूटने वालों ने हमसे सब कुछ लूट लिया, हमारा डर भी), No son 30 pesos, son 30 años (बात सिर्फ़ 30 पेसो की नहीं 30 साल की है)। ये दोनों नारे नव-उदारवाद के तहत चिली की जनता पर थोपी गई सरकारी बजट कटौती के ख़िलाफ़ थे, इन कटौतियों में मेट्रो टिकट के दाम 30 पेसो बढ़ाने और देश के सरकारी वेतन प्रणाली में भारी कटौती शामिल है। इसके ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का नेतृत्व स्कूल जाने वाले उन छात्रों ने किया जो 2001 (उम्र 18) और 2005 (उम्र 14) के बीच पैदा हुए थे। इनकी पीढ़ी को जेनरेशन Z या जेन ज़ी कहा जाता है। यूँ तो यह नाम मुख्यधारा के मीडिया का दिया हुआ है और ऐसे आंदोलनों की सामाजिक पेचीदगियों तथा राष्ट्र विशेष की परिस्थितियों को धूमिल कर देता है। फिर भी इस नाम और ‘पीढ़ी’ की अवधारणा के बारे में और चर्चा करना उपयोगी होगा।
चिली के विद्रोह प्रदर्शनों में आगे चलकर सभी उम्र के लोग जुड़े और उन्होंने सिबैस्टीयन पिंयेरा की दक्षिणपंथी सरकार गिरा दी। यह विद्रोह इकलौता नहीं था। इस दौर में पैदा हुए युवाओं ने दुनिया के कई हिस्सों में विद्रोह प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, इनमें शामिल हैं दिल्ली में एक सामूहिक बलात्कार की घटना के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन (2012); यूनाइटेड स्टेट्स में बंदूक हिंसा के ख़िलाफ़ मार्च फ़ॉर आवर लाइव्ज़ (2018); और जलवायु परिवर्तन संकट के ख़िलाफ़ फ़्राइडेस् फ़ॉर फ़्यूचर अभियान (2018) जिसकी शुरुआत की थी ग्रेटा थन्बर्ग ने (जन्म 2003, जिन्हें हाल ही में इज़राइल की सरकार ने प्रताड़ित किया था)। चिली के प्रदर्शनों के बाद 2021 में कोलंबिया में राष्ट्रीय हड़ताल हुई, श्रीलंका में 2022 में Aragalaya (संघर्ष) हुआ, और इस साल नेपाल में विद्रोह प्रदर्शन हुए जिनके चलते वहाँ की मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी सरकार को सत्ता से जाना पड़ा। इनमें से हर विद्रोह किसी एक मुद्दे के ख़िलाफ़ नैतिक विरोध के रूप में शुरू हुआ लेकिन विस्तृत होकर उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह बन गया जो युवाओं के जीवन को बेहतर बना पाने में असमर्थ साबित हुई थी।
चुनावों से एक हफ़्ता पहले, जोसफ़ म्बतिया बेरतीर्स (केन्या), 2007
पीढ़ी की अवधारणा एक सदी पहले जर्मन विचारक कार्ल मैनहाइम ने अपने निबंध ‘The Sociological Problem of Generations’ (1928) [पीढ़ियों की समाजशास्त्रीय समस्या] में विकसित की थी। मैनहाइम के लिए एक पीढ़ी किसी युग विशेष में पैदा होने से परिभाषित नहीं होती, बल्कि उनके ‘सामाजिक स्थान’ (soziale Lagerung) से होती है। राजनीतिक दृष्टि से, एक पीढ़ी तब बनती है जब वह तेज़ और विघटनकारी परिवर्तनों का अनुभव करती है, जो उसे परंपरा से पुनः साक्षात्कार करने के लिए मजबूर करते हैं — नए ‘सांस्कृतिक वाहकों’ (Kulturträger) के माध्यम से, अर्थात् वे व्यक्ति और संस्थाएँ जो संस्कृति का संचार करती हैं। इस प्रक्रिया में वह सामाजिक परिवर्तन की एक सक्रिय शक्ति बन जाती है — यह उस प्रवृत्ति से बिल्कुल अलग है जिसके तहत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पीढ़ियों को बाज़ार-आधारित (जैसे बेबी बूमर्स, जेनरेशन एक्स, जेनरेशन वाई आदि) पहचान दी गई। मैनहाइम ने पीढ़ियों को सामाजिक परिवर्तन लाने वाली शक्ति के रूप में देखा, जबकि नवउदारवादी संस्कृति ने उन्हें बाज़ार के मुताबिक़ विभिन्न ‘खंडों’ में बाँट दिया।
ऐंडीज़ से दक्षिण एशिया तक के इन प्रदर्शनों में सामाजिक विकास की सीमित संभावनाओं से त्रस्त युवाओं ने सड़कों पर उतर कर एक बर्बाद होती व्यवस्था को सिरे से नकारा और इन प्रदर्शनों की चर्चा में जेन ज़ी शब्द का प्रयोग हो रहा है। इसमें कुछ हद तक मैनहाइम के सिद्धांत की भूमिका है। यह भी सच है कि इन विरोध प्रदर्शनों को उकसाने और आकार देने में अमूमन साम्राज्यवादी शक्तियों का हाथ होता है, लेकिन इन्हें केवल बाहरी हस्तक्षेप का परिणाम भर कह देना सरासर ग़लत होगा। इन ‘जेन ज़ी प्रदर्शनों’ को समझने के लिए ज़रूरी है कि इन देशों के अहम अंदरूनी सामाजशास्त्रीय कारणों का विश्लेषण किया जाए। इनमें से कई परस्पर जुड़ी हुई प्रक्रियाओं से संचालित हैं जो राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से उपजी हैं लेकिन साथ ही अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों से भी प्रभावित होती हैं। इन घटनाओं को समझने की शुरुआत करने और शायद इन्हें प्रगतिशील दिशा में मोड़ने के लिए इस न्यूज़लेटर में हम सात विचार बिंदु पेश कर रहे हैं।
प्रतिरोध के रंग IV, मुविंदु बिनॉय (श्रीलंका), 2022
विचार बिंदु एक- पूरे दक्षिण एशिया में युवाओं की संख्या बहुत अधिक है, यहाँ की मध्य आयु (आधी आबादी) 25 वर्ष है और इन युवा समाजों के लोग क़र्ज़-सरकारी खर्च में कटौती की कठोर नीतियाँ, प्राकृतिक आपदाएँ और निरंतर जारी युद्ध झेल रहे हैं। अफ़्रीका में मध्य आयु है 19 वर्ष – सब महाद्वीपों में से सबसे कम। नाइजर की मध्य आयु है 15.3 वर्ष; माली की 15.5; यूगांडा और अंगोला दोनों 16.5 और ज़ाम्बिया में 17.5।
विचार बिंदु दो- वैश्विक दक्षिण का युवा वर्ग बेरोज़गारी से परेशान है। नवउदारवाद ने इन राष्ट्रों की क्षमता को कमज़ोर कर दिया है, और बेरोज़गारी की समस्या से निपट पाने के लिए इनके पास बहुत कम उपाय मौजूद हैं (जिसकी वजह से यहाँ सरकारी नौकरियों की माँग उठती है, जैसे बांग्लादेश के कोटा सुधार आंदोलन में हुआ)। मध्यवर्गीय आकांक्षाओं वाले पढ़े-लिखे इन युवाओं को उचित रोज़गार नहीं मिल रहा, जिससे ढाँचागत बेरोज़गारी या बेमेल कौशल की समस्या उत्पन्न होती है। ऐसे में बहुत से अनिश्चित रोज़गार पनपते हैं, जिन्हें आम भाषा में तरह-तरह के नाम दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, अल्जीरिया में बेरोज़गारों के लिए एक शब्द है जो अरबी और फ़्रांसीसी दोनों से लिया गया है — वे लोग जो दीवार का सहारा लेते हैं ताकि वह गिरे नहीं। इस शब्द को ‘हित्तिस्त’ (hittiste) कहा जाता है, जो अरबी शब्द ‘हैत’ (hayt) से निकला है, जिसका अर्थ है दीवार। 1990 के दशक में विश्वविद्यालयों का विस्तार और निजीकरण हुआ यानी फ़ीस लेने के रास्ते खोल दिए गए, इस दौर में फ़ीस देकर पढ़ने वाले ही अधिकांश छात्र जेन ज़ी हैं। मध्य और निम्न-मध्य वर्ग के ये बच्चे हैं, लेकिन इनमें श्रमिक वर्ग और छोटे किसानों के भी बच्चे हैं जो थोड़ी-बहुत प्रगति करके सामाजिक तौर से आगे बढ़ गए थे। जेन ज़ी इतिहास की सबसे अधिक शिक्षित पीढ़ी है, और साथ सबसे ज़्यादा क़र्ज़ में डूबी और बेरोज़गार भी। आकाँक्षा और अनिश्चितता के बीच के इस संघर्ष से ही भारी असंतोष उत्पन्न होता हिया।
विचार बिंदु तीन- एक गरिमामय जीवन के लिए देश/राज्य छोड़कर जाने की मजबूरी को जेन ज़ी स्वीकार नहीं करते। नेपाल में युवा प्रदर्शनकारियों ने नौकरी की तलाश में दूसरी जगह जाने की मजबूरी के ख़िलाफ़ नारे लगाए: हमें नेपाल में नौकरी चाहिए। हम नौकरी की तलाश में देश से बाहर नहीं जाना चाहते। नौकरी पाने के लिए देश छोड़ने की यह मजबूरी अपनी संस्कृति के लिए शर्म पैदा करती है और अपने समाज को आकार देने वाले संघर्षों के इतिहास से भी काट देती है। दुनिया में आज लगभग 16.8 करोड़ लोग प्रवासी मज़दूर या नौकरीशुदा हैं – अगर इनका एक अलग देश होता तो वह दुनिया का नौवाँ सबसे बड़ा देश होता, बांग्लादेश (16.9 करोड़ जनसंख्या) के बाद और रूस (14.4 करोड़) के बीच। इन प्रवासी मज़दूरों में हैं खड़ी देशों में काम करने वाले निर्माण मज़दूर और स्पेन में काम करने वाले एंडीज़ क्षेत्र और मोरक्को के मज़दूर। ये जो पैसा अपने घरों को भेजते हैं उन्हीं से इनके देशों का घरेलू उपभोग चल पाता है; कई मामलों में तो विदेशों से भेजे जाने वाला यह कुल धन (जो 2023 में 85,700 करोड़ डॉलर था) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भी ज़्यादा होता है (जैसा कि मेक्सिको के मामले में है)। सामाजिक विस्थापन, मज़दूरी और श्रम में अंतर्राष्ट्रीय नस्ली भेदभाव, और प्रवासियों के साथ दुर्व्यवहार – जिसमें उनके शैक्षणिक अनिवार्यताओं को नकार देना भी शामिल है – यह सब पलायन के लिए किसी भी तरह के आकर्षण की संभावना को ख़त्म कर देते हैं।
शरणगाह, सबिता दंगोल (नेपाल), 2020
विचार बिंदु चार- बड़े कृषि व्यापारियों और खदान कंपनियों ने छोटे किसानों और खेत मज़दूरों पर अपने हमले तेज़ कर दिए। (भारत में किसान आंदोलन की यही वजह थी)। इन वर्गों के युवा ग्रामीण संकट से तंग आ चुके हैं और अपने माता-पिता की पीढ़ी के अमूमन असफल हो जाने वाले प्रदर्शनों की वजह से विचारों से उग्र हो जाते हैं। ये रोज़गार के लिए पहले शहरों और फिर विदेशों का रुख़ करते हैं। ये अपने ग्रामीण अनुभवों को शहरों में लाते हैं और ज़्यादातर इन प्रदर्शनों की पैदल सेना यही युवा होते हैं।
विचार बिंदु पाँच- जेन ज़ी के लिए जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट कोई अमूर्त समस्या नहीं है बल्कि विस्थापन और बढ़ती महँगाई के ज़रिए सर्वहाराकारण की निकट आती आशंका का एक कारण है। ग्रामीण इलाक़ों में जनता देख पा रही है कि ग्लेशियर पिघलना, सूखा और बाढ़ सब वहीं हो रहा है जहाँ से साम्राज्यवादी ‘ग्रीन’ सप्लाई चैन लिथीयम, कोबाल्ट और हाइड्रो ऊर्जा जैसी संपदाएँ निकालने की फ़िराक़ में हैं। यह जनता जानती है कि पर्यावरण संकट सीधे तौर से इनके बर्बाद वर्तमान से जुड़ा है, ज़ाहिर है भविष्य से भी।
विचार बिंदु छह- जेन ज़ी की समस्याओं को पारंपरिक राजनीति नहीं सुलझा पा रही। संविधानों में मौजूदा यथार्थ नहीं झलकता और न्याय व्यवस्था की कोई जवाबदेही नहीं है और वह किसी और ही दुनिया में जी रही है। इस पीढ़ी का राज्य के जिन घटकों से सीधा राब्ता पड़ता है वे हैं दूसरों की बात न सुनने वाली नौकरशाही और सैन्यकृत पुलिस। राजनीतिक दल वॉशिंगटन की क़र्ज़-सरकारी खर्च में कटौती की नीति की वजह से पंगु बन चुके हैं और ग़ैर-सरकारी संस्थाएँ पूरी व्यवस्था की कमियों की बजाय व्यक्तिगत समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले दलों के अजेंडे चुक गए हैं या वे क़र्ज़ तथा सरकारी ख़र्च में कटौती की नीतियों की वजह से बर्बाद हो चुके हैं, इसकी वजह से वैश्विक दक्षिण में एक राजनीतिक रिक्तता आ चुकी है। ‘सबसे निजात पाने’ की राजनीति की परिणति आख़िर सोशल मीडिया इन्फ़्लूयन्सरों को शोहरत मिलने में होती है (जैसे काठमांडू के मेयर बालेन शाह) जो राजनीतिक दलों वाली राजनीति में शामिल नहीं होते लेकिन अपनी लोकप्रियता का फ़ायदा उठाकर राजनीति के विरुद्ध और मध्य-वर्ग के असंतोष के बारे में प्रवचन देते रहे हैं।
विचार बिंदु सात- असंगठित रोज़गार ने एक असंगठित समाज को जन्म दिया है जिसमें श्रमिकों के बीच भाईचारे की या मज़दूर संगठनों के सदस्य बनने की कोई संभावना नहीं बचती। रोज़गार के उबरीकरण ने जीवन को ही एकाकी बना दिया है, जहाँ मज़दूर अकेलेपन का शिकार हैं और किसी भी तरह के जुड़ाव/लगाव से वंचित रहते हैं। सोशल मीडिया के ज़बरदस्त प्रसार के साथ मिलकर इस एकाकीपन ने इंटरनेट को ही विचारों के आदान-प्रदान का मुख्य ज़रिया बना दिया है और राजनीतिक संगठन की पारंपरिक प्रक्रिया की जगह ले ली है। इन विरोध प्रदर्शनों का कारण सोशल मीडिया को मान लेना काफ़ी आकर्षक लगता है लेकिन यह सही नहीं। सोशल मीडिया संचार का माध्यम है जो लोगों को अपनी भावनाएँ और रणनीति साझा करने की जगह देता है लेकिन यह इन परिस्थितियों का कारण नहीं है। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि इंटरनेट सरप्लस को हथियाने का भी एक ज़रिया है – गिग वर्कर उस ऐल्गोरिदम के ग़ुलाम हैं जो उन्हें कम-से-कम वेतन में ज़्यादा-से-ज़्यादा काम करने पर मजबूर करती है।
Fiesta indígena (मूलनिवासियों के उत्सव), कमिलो एगस (एक्वडॉर), 1926
ये सात विचार बिंदु उन परिस्थितियों की रूपरेखा पेश करने की कोशिश हैं, जिनकी वजह से वैश्विक दक्षिण में जेन ज़ी विद्रोहों की लहर आई है। ये प्रदर्शन मोटे तौर पर शहरों में हुए हैं और ऐसा कम ही दिखता है कि इन्होंने किसानों तथा ग्रामीण मज़दूरों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की हो। इन प्रदर्शनों के अजेंडे विकासशील देशों में लंबे समय से चले आ रहे ढाँचागत संकट की बात नहीं करते। साफ़-साफ़ कहा जाए जेन ज़ी के ढर्रे की राजनीति मध्य-वर्ग के अथाह असंतोष में जाकर कहीं खो जाती है। बांग्लादेश और नेपाल की तरह इस तरह के विरोध प्रदर्शन अमूमन ऐसी सामाजिक शक्तियों के हाथों में चले जाते हैं जो सड़कों पर दूसरों के मुँह से अपनी बात कहलवाते हैं और ऐसे अजेंडे विकसित करते हैं जिनसे पश्चिमी निवेशकों को फ़ायदा पहुँचे। इसके बावजूद इन विरोध प्रदर्शनों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमने ऊपर जिन परिस्थितियों का ज़िक़्र किया है उनकी वजह से ऐसे प्रदर्शनों की संख्या बढ़ना तय है। समाजवादी ताक़तों के सामने यह चुनौती है कि वे जेन ज़ी की असल समस्याओं को एक ऐसे कार्यक्रम में ढालें जो सामाजिक अधिशेष में ज़्यादा हिस्सेदारी की माँग करे और उस अधिशेष का इस्तेमाल नेट फ़िक्स्ड निवेश को बढ़ाने के लिए तथा सामाजिक संबंधों को बदलने के लिए करे।
स्नेह सहित,
विजय