फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ हमारा नारा, ‘दुश्मन आगे बढ़ने न पाए’: चौंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
चीन और USSR के लाखों लोग फ़ासीवाद से लड़ते हुए क़ुर्बान हुए। फिर उभर रहे साम्राज्यवादी-सैन्यीकरण के ख़तरे के बीच नो कोल्ड वॉर ने दोहराई शांति की अपील।
सेवस्तोपोल की सुरक्षा, अलेक्जेंडर अलेक्जेंड्रोविच डेइनेका (सोवियत संघ), 1942
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
जापानी आक्रामकता के ख़िलाफ़ चीन की जनता के प्रतिरोध की याद में बीजिंग में बने संग्रहालय में जाकर किसी को भी युद्ध और सैन्यवाद से नफ़रत होने लगेगी। यह संग्रहालय मार्को पोलो (या लूकुओ) ब्रिज के नज़दीक ही है, जहाँ से चीन की जनता ने अपने देश के उत्तरी हिस्से को जापानी क़ब्ज़े से आज़ाद कराने की लड़ाई शुरू की थी। इस संग्रहालय में सबसे ज़्यादा प्रभाव उन चीज़ों का पड़ता है जो जापानी सैन्यवाद के घिनौने हिंसात्मक स्वरूप को दर्शाती हैं, जैसे नानचिंग नरसंहार (1937-1938); उत्तरपूर्वी शहर हार्बिन में यूनिट 731 द्वारा चलाया गया एक भयावह जैविक और रासायनिक युद्ध तथा इंसानों पर किए गए घृणित परीक्षण (1936-1945); और इयान्फू के बंदीगृह जहाँ जापानी सेना यौन दासियों को क़ैद रखती थी।
संग्रहालय में घूमते हुए आपको पता चलेगा कि द्वितीय विश्वयुद्ध की इस सबसे लंबी चली लड़ाई में लाखों चीनी नागरिकों की मौत हुई: यह लड़ाई 1937 से 1945 के बीच जापानी सैन्यवादियों और चीन की जनता के बीच लड़ी गई। इसके आँकड़े चौकाने वाले हैं: कम-से-कम 2 करोड़ चीनी नागरिक और सैनिक मारे गए, 8 करोड़ लोग बेघर हो गए, कैंटॉन के पास पर्ल रिवर डेल्टा का तीस प्रतिशत इंफ़्रास्ट्रक्चर बर्बाद हो गया, आधे से ज़्यादा शंघाई तबाह कर दिया गया और चीन की राजधानी नानचिंग का अस्सी प्रतिशत हिस्सा मलबे में तब्दील कर दिया गया। जापानी सेना की थ्री ऑल (सबको जला दो, सबको मार दो, सबको लूट लो) नीति हर लिहाज़ से एक जनसंहार थी (उदाहरण, 1942 में हेबे प्रांत के एक गाँव में जापानी सेना ने एक सुरंग में ज़हरीली गैस भर दी, इस सुरंग में आठ सौ किसान छिपे हुए थे, उन सबको मार दिया गया)।
मोर्चे पर!, हु यीचुआन (चीन), 1932
द्वितीय विश्व युद्ध में हुई कुल मौतों का आँकड़ा आज भी बहस का मुद्दा है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि सबसे ज़्यादा लोगों की मौत सोवियत संघ (2.7 करोड़ – ऑस्ट्रेलिया की मौजूदा जनसंख्या के बराबर) और चीन (2 करोड़ – चिली की मौजूदा जनसंख्या के बराबर) में हुई। सोवियत संघ के आँकड़े के कई स्रोत हैं जिसमें 1942 में गठित एक्स्ट्राऑर्डिनरी स्टेट कमिशन (ChGK, सोवियत संघ में गठित एक कमिशन जिसका काम था द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ियों के अत्याचारों इत्यादि की जाँच करना) भी शामिल है। ऐसा पहला ट्रायब्यूनल क्रास्नोडार (उत्तर काकेशस) में 4 जनवरी 1943 को नाज़ियों से नालचिक दोबारा हासिल कर लेने के बाद गठित हुआ था। इस ट्रायब्यूनल की जाँच में शहर के पास टैंक से बचने के लिए बनी खाई में हज़ारों लोगों की लाशें मिलीं। इन्हें ज़हरीली गैस से मारा गया था। इससे दो साल पहले 1941 में नाज़ी हाई कमांड ने हंगर प्लान (लोगों को भूखा मारने की योजना) के नाम से एक योजना लागू की, इसमें सोवियत संघ का खाद्यान्न और भोजन सामग्री कहीं और भेज दिए गए जिसकी वजह से वहाँ 42 लाख नागरिकों की मौत हुई।
हमारे सामने जो संख्याएँ आती हैं वो सोच से भी बाहर हैं – कहीं दस लाख की हत्या, कहीं हज़ारों की और कहीं और लाखों की। दुनिया की कौन सी बही में इन सबका हिसाब क़िताब लिखा जा सकता है?
लीना ओदेना, होसे एम. पोंस (स्पेन गणराज्य), 1937
फ़ासीवाद और सैन्यवाद के विरुद्ध लड़ी गई इस लड़ाई के अंत की अस्सीवीं वर्षगाँठ (3 सितंबर 1945) के मौक़े पर नो कोल्ड वॉर कलेक्टिव ने युद्ध के ख़िलाफ़ और शांति के लिए सैंटीआगो अपील जारी की है। हम आग्रह करते हैं कि आप इस अपील को पढ़ें और दूसरों के साथ साझा करें। 1950 की स्टॉकहोम अपील की तरह ही हम भी लाखों लोगों को इससे जोड़ सकते हैं, जो निगरानी रखें और कहें कि no pasarán (दुश्मन आगे न बढ़ने पाए)। यह अपील इस प्रकार है:
युद्ध इंसानी रचनात्मकता, जीवन के मूल्य और हम सबकी इस धरती के ख़िलाफ़ सबसे बड़ी धोखेबाज़ी है।
अस्सी साल पहले संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) ने दुनिया का पहला परमाणु बम गिराया और एक ऐसा हथियार दुनिया को दिया जिसकी अकल्पनीय भयावहता आज भी हमारे लिए ख़तरा बनी हुई है।
फ़ासीवाद और सैन्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में लाखों लोगों ने अपनी जान दी; इनमें सोवियत संघ और चीन के वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने बहुत बड़ा बलिदान दिया और सबसे ज़्यादा क्षति भी झेली।
उनकी बहादुरी के बदले में सिर्फ़ उन्हें याद करना ही काफ़ी नहीं; उन्हें हमारे प्रयासों की भी उम्मीद है।
हम साम्राज्यवाद और लालच के अंतहीन हिंसक चक्र को अस्वीकार करते हैं।
हम माँग करते हैं एक ऐसे भविष्य की जहाँ शांति, न्याय और सबकी समृद्धि हो – जहाँ लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य से रहते हों, और जहाँ आने वाली नस्लों के लिए इस धरती को बचाकर रखा जाए।
अविलंब निरस्त्रीकरण हो, सैन्यवाद का अंत हो और एक ऐसी दुनिया का निर्माण हो जहाँ सबका जीवन फूले-फले।
किताबों की फेरी लगाने वाला, चांग जू, 1945
यूएस के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 15 अगस्त को अलास्का में मिले। सात साल में पहली बार दोनों देशों के राष्ट्रपति ऐसे मिले थे ( 2018 में पुतिन और ट्रम्प के ही बीच फ़िनलैंड के हेलसिंकी शहर में पिछली मुलाक़ात हुई थी)। इस मुलाक़ात का कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला और लगता भी नहीं कि यूएस और रूस के बीच तनाव कम होने के कोई आसार हैं और न ही यूएस और चीन के बीच। लेकिन इस तरह की वार्ताएँ ज़रूरी हैं। इनके ज़रिए एक बार फिर कूटनीति की ओर रुख़ किया जाता है जो शांति स्थापित करने के लिए बेहद ज़रूरी है। दुनियाभर में युद्ध की गुंजाइश अब न के बराबर है, हालाँकि (ग़ज़ा से सूडान तक) हमारी रूह को झकझोर देने वाला हिंसा का जो तांडव हो रहा है उसे देखकर ऐसा लगता नहीं है। पुतिन और ट्रम्प की मुलाक़ात के दौरान पोप लियो XIV ने कहा कि ‘आज, दुःख की बात है कि हम दुनिया में फैल रही हिंसा के सामने खुद को असहाय महसूस करते हैं – ऐसी हिंसा जो दिन-ब-दिन और अधिक बहरी होती जा रही है तथा मानवता की किसी भी पुकार के प्रति असंवेदनशील है।’ यह बहरी हिंसा और सुनने से इनकार करने वाली हिंसा की धारणा वास्तविक है; यही रवैया इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का है, जो फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार पर लगातार अड़े हुए हैं।
हिंसा और मौन की धारणा बहुत ही झकझोर देने वाली है, खासकर जब स्वयं युद्ध का शोर इतना प्रबल हो। इसमें कोई अचंभा नहीं कि लेनिनग्राड की घेरेबंदी (1941-1944) को अपनी आँखों से देखने वाले गेनाडी गोर (1907-1981) ने इसके बारे में अतियथार्थवादी कविताएँ लिखीं, इसके बाद वे एक नामी साइन्स फ़िक्शन लेखक बने। युद्ध में प्रौद्योगिकी की प्रगति का इस्तेमाल बर्बर लक्ष्यों के लिए किया जाता है इसलिए इसमें वैज्ञानिक गल्प के लक्षण भी मिलते हैं। घेरेबंदी के दौरान फ़ासीवाद का विरोध करते हुए लाखों मारे गए, उसी दौर में लिखी गोर की एक कविता है:
भाषण से ऊबकर नहर ने
पानी से कहा कि वह निष्पक्ष है।
सन्नाटे से परेशान पानी ने
फ़ौरन दोबारा चिल्लाना शुरू कर दिया।
दुशमन आगे न बढ़ने पाए।
स्नेह सहित,
विजय