साहेल में थॉमस संकारा की विरासत अब भी ज़िंदा है: तैंतीसवाँ न्यूज़लेटर (2025)
आज़ादी के बाद से ही बुर्किना फ़ासो नवउपनिवेशवादी अल्पविकास के चंगुल में फँसा है – क्या ट्राओरे की सरकार थॉमस संकारा के नक़्शेकदम पर चलकर यहाँ बदलाव ला पाएगी?
प्राचीन योद्धा 2, वॉरन सारे (बुर्किना फ़ासो), 2014
प्यारे दोस्तो,
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान की ओर से अभिवादन।
1987 में बुर्किना फ़ासो में हुए सैन्य तख़्तापलट के दौरान राष्ट्रपति थॉमस संकारा की मौत के कुछ महीने बाद ही राजधानी औगाडौगौ में प्रिंटरों ने संकारा के चेहरे वाली क़मीज़ें छापना शुरू कर दिया। जल्दी ही उनकी तस्वीर पूरे देश में दिखाई देने लगी। संकारा के क़ानून मंत्री रहे ब्लेज़ कॉम्पोरे ने 2014 तक देश पर शासन किया। शुरू से ही संकारा की हत्या के षड्यंत्र का शक उन पर था लेकिन बुर्किनाबे (बुर्किना के) न्यायालयों ने 2021-2022 में जाकर उन्हें दोषी क़रार दिया। तब तक वह भाग कर कोटे डी आइवर (आइवरी कोस्ट) जा चुके थे और अब तक वहीं भगोड़ों की तरह रह रहे हैं। कॉम्पोरे अपने पूरे शासन काल में संकारा का अनुयायी होने का दावा करते रहे – यह एक ऐसी राजनीतिक विरासत थी जिसे वह छोड़ नहीं सकते थे।
कॉम्पोरे बीस साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए और संकारा के क़रीबी साथी बने, उन्होंने 1983 के उस तख़्तापलट में हिस्सा लिया था जिसके बाद संकारा सत्ता में आए। जो लोग एक बेहद ग़रीब देश में संपत्ति की ताक़त को नहीं समझ सकते उनके लिए यह मान लेना मुश्किल था कि कॉम्पोरे ख़ुद से महज़ दो साल बड़े अपने गुरु के ख़िलाफ़ कैसे जा सकते थे। कॉम्पोरे ओउब्रितेंगा प्रांत से आते हैं, इस प्रांत में ग़रीबी की दर देश में सबसे ज़्यादा है। संकारा का एजेंडा था बुर्किना फ़ासो की उपनिवेशवादी विरासत को बदलना – इसके लिए सबसे पहले उन्होंने इसका नाम रिपब्लिक ऑफ़ अपर वोल्टा से बदलकर बुर्किना फ़ासो किया – ईमानदार लोगों का देश – कॉम्पोरे इस प्रक्रिया में उनके साथ रहे। लेकिन कभी-कभी व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठ पाना मुश्किल होता है और विदेशी जासूसी विभाग इन्हीं का फ़ायदा उठाते हैं।
पानी की प्रतिमा, सैदू डिको (बुर्किना फ़ासो), 2020
बुर्किना की राजनीति में तख़्तापलट बहुत बार हुआ – 1996, 1974, 1980, 1982, 1983, 1987, 2014, और 2022 में – लेकिन इस देश की ऐसी कोई ख़ास बात सामने नहीं आती जिससे समझ आ सके कि क्यों वक़्त-वक़्त पर यहाँ यूँ तख़्तापलट होते रहे। 1950 के दशक से अफ़्रीका के चौवन देशों में सैन्य तख़्तापलट हुए हैं – इनकी शुरुआत हुई जुलाई 1952 से जब फ़्री ऑफ़िसर (गमन अब्दुल नासर के नेतृत्व में) ने मिस्र की राजशाही का तख़्तापलट किया और सबसे हालिया उदाहरण अगस्त 2023 में गैबॉन में जनरल ब्राइस ओलिगुई नगुएमा के नेतृत्व में हुए तख़्तापलट का है। ये तख़्तापलट नवउपनिवेशवादी ढाँचे का मूर्त रूप हैं जिसमें बुर्किना फ़ासो और गैबॉन जैसे देश फँसे हुए हैं। उपनिवेशवाद, ख़ासतौर से फ़्रांसीसी उपनिवेशवाद, ने कभी भी किसी देश को अपने दमनकारी तंत्र के दायरों से बाहर निकलकर विकसित नहीं होने दिया और न ही इन देशों में एक ऐसा राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग खड़ा होने दिया जो पश्चिमी पूँजी से आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से आज़ाद हो। एक विकासवादी राज्य और स्वतंत्र बुर्जुआ वर्ग की ग़ैरमौजूदगी का मतलब था कि इन देशों का अभिजात वर्ग बिचौलिये की तरह काम करता रहा: इन्होंने विदेशी कंपनियों को राष्ट्रीय संपदा लूटने दी, और इसकी इन्हें काफ़ी अच्छी क़ीमत मिली, इन्होंने सही मायने में लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया का निर्माण नहीं होने दिया, जिसमें मज़दूर संगठनों के ज़रिए अर्थव्यवस्था का लोकतंत्रीकरण भी शामिल है। यही था नवउदारवादी चक्रव्यूह।
इस चक्रव्यूह में फँसे देशों में वह राजनीतिक माहौल नहीं था जिसके ज़रिए वे अंदरूनी वर्गीय वास्तविकताओं और विदेशी पूँजी के सामने संप्रभुता की कमी से उबर पाते। रोज़गार के अवसरों की कमी के कारण छोटे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों के कई युवक सेना में भर्ती हो गए। सेना में आने के बाद ही वे अपने देशों के संकट पर चर्चा कर पाए और प्रगतिशील विचारों को आत्मसात कर पाए – जैसा कि संकारा के साथ हुआ। 1983 में संकारा की विचारधारा अपने देश के औपनिवेशिक इतिहास से जब अलग हुई तो उन्हें इनमें से कई विचारों को लागू करने का मौक़ा मिला: खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए भूमि सुधार; विदेशी लूट से लड़ने के लिए प्राकृतिक संपदा का राष्ट्रीयकरण; साम्राज्यवादी दख़ल से बचने के लिए क्षेत्रीय सैन्य गठबंधन; और राष्ट्रीय एकता का विकास तथा महिला मुक्ति। चार सालों तक उनकी सरकार ने यह प्रगतिशील एजेंडा आगे बढ़ाया और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की ऋण-समाज कल्याण पर सरकारी ख़र्च में कटौती करने की नीति से लड़ते भी रहे। लेकिन फिर उनकी हत्या कर दी गई।
यह याद रखना चाहिए कि 2014 में ब्लेज़ कॉम्पोरे को non-lotissements (अनाधिकृत बस्तियों) में रहने वालों, युवा आंदोलनों और अन्य नागरिक समाज के नेतृत्व वाले एक जन आंदोलन ने सत्ता से हटा दिया था। उस समय उनके ख़िलाफ़ माहौल था। लेकिन यह प्रतिरोध अपनी ताक़त एकजुट नहीं कर पाया और इसका फ़ायदा मिला एक कमज़ोर नागरिक सरकार को, एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे सैन्य गुटों को और अंतत: बुर्किना फ़ासो के कुछ हिस्सों में अल-क़ायदा के कुछ धड़ों को, जो 2011 में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) द्वारा लीबिया की बर्बादी के बाद मज़बूत हुए थे। 2022 में संकारा के विचारों से प्रेरित अफ़सरों के एक समूह, देशभक्तिपूर्ण सुरक्षा और पुनर्स्थापना आंदोलन (Mouvement patriotique pour la sauvegarde et la restauration, एमपीएसआर) के नेतृत्व में जो सैन्य तख़्तापलट हुआ उसका एक घोषित उद्देश्य था कि 2014 के जन आंदोलन के जनादेश को लागू किया जाएगा। एमपीएसआर का नेतृत्व सबसे पहले लेफ्टिनेंट कर्नल पॉल-हेनरी दामीबा ने किया, लेकिन सितंबर 2022 में उनके तख़्तापलट के बाद कैप्टन इब्राहिम ट्राओरे ने सत्ता संभाली। ऐसा लगा कि संकारा की विचारधारा का पुनरुत्थान हुआ हो।
ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने अगस्त में The Alliance of Sahel States Seeks Sovereignty (साहेल राष्ट्रों का गठबंधन संप्रभुता चाहता है) नाम से डोसियर निकाला है। इससे संबंधित शोध और इसका लेखन हमारी पैन (अखिल) अफ़्रीका टीम ने किया है। यह डोसियर न सिर्फ़ बुर्किना फ़ासो बल्कि माली और नाइजर की राजनीति का ऐतिहासिक विश्लेषण भी हमारे सामने पेश करता है, ये राष्ट्र अब Alliance of Sahel States (साहेल राष्ट्रों का गठबंधन, एईएस) के तहत एकजुट हैं। इस डोसियर के शीर्षक में ‘संप्रभुता’ शब्द हमारे विश्लेषण को परिभाषित करता है: अब तक इन देशों में जितने भी चुनाव हुए हैं उन्होंने न तो इनके समाजों की लोकतांत्रिक संभावनाओं को मज़बूत किया है और न ही इनकी अर्थव्यवस्थाओं को विदेशी प्रभाव से लड़ने के लिए सशक्त। एईएस के तीनों देशों में सोने की खदानों की भरमार है और ख़ासकर नाइजर के पास तो उच्चकोटि का येलो केक यूरेनियम मौजूद है – लेकिन इनमें से किसी के भी पास अपनी प्राकृतिक संपदाओं या आर्थिक संस्थानों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है। ये अब तक फ़्रांसीसी मुद्रा व्यवस्था और पश्चिमी कॉर्परेशनों के अधीन हैं। बुर्किना फ़ासो जैसे देशों में संप्रभुता को कुचल देने के लिए किसी खुले निरंकुश शासन की ज़रूरत नहीं है: कॉम्पोरे ने 1991 में 100% मतों से चुनाव जीते थे, 1998 में 90% से और 2005 तथा 2010 में 80% से, लेकिन ये चुनाव पूरी तरह से अलोकतांत्रिक थे। एमपीएसआर, जो संकारा के एजेंडे और 2014 के विरोध प्रदर्शनों की जन भावना को आगे बढ़ा रहा है, उस व्यवस्था की तुलना में कहीं अधिक लोकतांत्रिक है जिसने कॉम्पोरे को चुना था।
2014 का आंदोलन सिर्फ़ अनाधिकृत कालोनियों से ही नहीं निकला था बल्कि यह नाइट क्लबों से भी निकला था। 2013 में रेगे (एक प्रकार का संगीत) कलाकार Sams’K Le Jah (करीम सामा) और रैपर Smockey (सर्ज बंबारा) ने मिलकर Le Balai Citoyen (नागरिकों का झाड़ू, भ्रष्टाचार विरोध का प्रतीक) की स्थापना की। इस ज़मीनी आंदोलन का नाम संकारा के उस अभियान पर रखा गया था जो सड़कों की सफ़ाई और पुराने अभिजात वर्ग तथा विदेशी पूँजी की सफ़ाई करने के लिए चलाए गए थे। Sams’K Le Jah ने देशभर के नाइटक्लबों में संकारा की विरासत को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया:
संकारा, संकारा, संकारा, मेरे राष्ट्रपति,
संकारा, संकारा, संकारा बुर्किना के।
वह ईमानदार आदमी बनाने आया एक गरिमामय अफ़्रीका।
अपने बलिदान से, तुमने मेरी ज़िंदगी को दिए मायने।
तुम्हारा ख़ून वो जीवनदायी झरना है जो गरिमामय अफ़्रीका
के हमारे सपने को हमेशा पोषित करता रहेगा।
स्नेह सहित,
विजय