इस डोसियर में प्रयुक्त चित्र बांडुंग सम्मेलन को समर्पित हैं, जहाँ विविध लोग, राष्ट्र और राजनीतिक परियोजनाएँ—जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट रास्ता या धुरी थी—एक साझा संघर्ष के इर्द-गिर्द जुटे, उपनिवेशवाद से परे एक दुनिया के निर्माण के लिए। उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं और राष्ट्रों को बांडुंग भावना एक साथ लाई जिसे इस डोसियर में पीली धारियों द्वारा दर्शाया गया है। राष्ट्रीय मुक्ति के उस दौर की आकांक्षाओं से आज वैश्विक दक्षिण में नए सूत्र, नई दिशाएँ और एक नया मिज़ाज उभर रहा है।
सात दशक पहले 1955 में अफ्रीका और एशिया के उनत्तीस देशों की सरकारों के प्रमुख और साथ ही उन उपनिवेशों, जो तब तक आज़ाद नहीं हुए थे, के प्रतिनिधि इंडोनेशिया के बांडुंग में एशिया-अफ्रीका सम्मेलन के लिए एकत्रित हुए। यह विऔपनिवेशीकरण (उपनिवेशवाद के ख़त्म होने) की प्रक्रिया का चरम बिंदु था। यह एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि पहली बार तीसरी दुनिया के लाखों लोगों के प्रतिनिधि विऔपनिवेशीकरण की विशाल प्रक्रिया और इसके प्रभावों का आकलन करने के लिए एक जगह इकट्ठा हुए था। इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो (1901-1970) ने इस सम्मेलन का आयोजन किया था और उद्घाटन भाषण भी दिया था जिसमें यह सम्मेलन आयोजित करने वालों की आकांक्षाएँ झलकती थीं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि यह सम्मेलन ‘मानवता का मार्गदर्शन करे’ और यह मार्ग ‘मानवता को सुरक्षा और शांति प्राप्त करने की ओर ले चले’। वे तमाम राष्ट्र प्रमुख वहाँ केवल भारत की आज़ादी (1947), चीनी क्रांति (1949) और गोल्ड कोस्ट में सत्ता के हस्तांतरण (1951) जिससे अंतत: घाना को आज़ादी मिली (1957) का जश्न मानने ही इकट्ठा नहीं हुए थे; बल्कि वे साबित करना चाहते थे कि एक नए एशिया और नए अफ्रीका का जन्म हो चुका है।1
सुकर्णो के साथी रुसलान अब्दुलगनी (1914-2005) बांडुंग सम्मेलन के प्रधान सचिव थे। सम्मेलन के दौरान और बाद में वे एक ‘बांडुंग भावना’ के बारे में चर्चा करते रहे। इसकी व्याख्या उन्होंने ‘शांतिप्रिय, हिंसा विरोधी, भेदभाव विरोधी और सबके विकास की भावना’ के रूप में की ‘जो एक दूसरे के मामलों में ग़लत ढंग से हस्तक्षेप नहीं करती बल्कि एक दूसरे के लिए अत्यंत आदर’ रखती है।2 यह ‘बांडुंग भावना’ आदर्शवादी नहीं थी; इसकी जड़ें उपनिवेशों की जनता के स्वतंत्रता आंदोलनों में थीं, इन आंदोलनों को पाँच साल बाद संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने उपनिवेशों और उनकी जनता द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की घोषणा में ‘मुक्ति की प्रक्रिया’ कहा जो ‘अप्रतिरोध्य और अपरिवर्तनीय’ है।3
यह ‘बांडुंग भावना’ आदर्शवादी नहीं थी; इसकी जड़ें उपनिवेशों की जनता के स्वतंत्रता आंदोलनों में थीं, इन आंदोलनों को पाँच साल बाद संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने उपनिवेशों और उनकी जनता द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की घोषणा में ‘मुक्ति की प्रक्रिया’ कहा जो ‘अप्रतिरोध्य और अपरिवर्तनीय’ है।4 बांडुंग भावना उन लाखों करोड़ों लोगों की आवाज़ थी जो उपनिवेशवादी शासन में रह रहे थे और जो उपनिवेशवाद की भयावहता के ख़िलाफ़ तथा एक नई दुनिया की अपनी उम्मीद के लिए लड़ रहे थे।
बांडुंग भावना के विलुप्त हो जाने की कई वजहें रहीं। एक तो यह कि औपचारिक रूप से तो औपनिवेशिक शासन ख़त्म हो गए थे लेकिन नवउदारवादी ढाँचे का दबाव फिर भी बरक़रार था। इस भावना की अब केवल याद रह गई है। औपनिवेशिक शासन के बाद पैदा हुई पीढ़ियों ने उपनिवेशवाद विरोधी लंबे और कठिन संघर्षों की विरासत को संजोकर नहीं रखा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अजेंडा नवउदारवादी ढाँचे के सामने कमज़ोर पड़ गया; उत्तर-औपनिवेशिक दौर में किसानों और मज़दूरों ने अपने देश के शासक वर्ग को तो समस्या के रूप में देखा लेकिन इस दुस्साध्य ढाँचे को अपने शत्रु के रूप में नहीं पहचाना। बांडुंग सम्मेलन के सत्तर साल बाद यह सवाल करना ज़रूरी है कि क्या यह भावना अब भी कहीं मौजूद है, भले ही वैश्विक दक्षिण में कहीं भूली-बिसरी याद के रूप में ही। इस डोसियर का यही उद्देश्य है, इसे एक लंबा निबंध भी कहा जा सकता है जो किसी लंबे शोध के निष्कर्षों को पेश करने की बजाय कुछ विचारोत्तेजक प्रश्न उठाना चाहता है।5 हमें आशा है कि इन प्रश्नों से आपसी बातचीत और बहस का दौर शुरू होगा।
भाग 1: बांडुंग भावना का अर्थ क्या था
पूर्वी दुनिया में घुसपैठिए
5 अक्टूबर 1953 को संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका) के उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन एशिया के लंबे दौरे पर निकले, वे (जापान से ईरान तक) यहाँ के चौदह देशों की यात्रा करने वाले थे और इससे लगे दो देशों (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड) की भी। निक्सन कुछ ज़रूरी उद्देश्यों के साथ एशिया आए थे: जुलाई में कोरियाई प्रायद्वीप में हुए युद्धविराम को लेकर अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों को आश्वस्त करने के लिए; इंडोचाइना में अमेरिका की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए, यहाँ पर अधिकांश सैन्य वित्तपोषण अमेरिका ने फ्रांस से हथिया लिया था और फिर मई 1954 में डिएन बिएन फु में फ्रांस की हार के बाद समस्त सैन्य भूमिका अमेरिका के हाथ में आ गई; तथा एशिया में चीनी क्रांति की नई भूमिका को समझने के लिए। दो दशक बाद अपने संस्मरण में निक्सन ने इस यात्रा के बारे में लिखा ‘वॉशिंगटन और दूसरे पश्चिमी देशों की राजधानियों में जब स्वप्नजीवी लोग कह रहे थे कि एशिया में कम्युनिस्ट चीन कोई ख़तरा नहीं बन सकता क्योंकि यह पिछड़ा और अल्पविकसित है’ तब उन्होंने ‘ख़ुद महसूस किया कि इसका प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में फैलना शुरू हो चुका था’। निक्सन ने लिखा कि ‘हमारी ही तरह पूर्वी दुनिया में हस्तक्षेप करने वाले’ सोवियत संघ के उलट ‘चीन के कम्युनिस्टों ने स्टूडेंट एक्स्चेंज कार्यक्रम शुरू कर दिए थे और बड़ी संख्या में छात्रों को लाल चीन में कॉलेजों में मुफ़्त पढ़ाई के लिए भेजा जा रहा था’।6 निक्सन ने अपनी सरकार को रिपोर्ट दी कि अमेरिका को एशिया में चीनी क्रांति की वजह से हो रही इन नई गतिविधियों का ज़ोरदार जवाब देना होगा।
सितंबर 1954 में मनीला पैक्ट नाम से एक साझा सैन्य संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद आठ देशों ने दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संगठन (SEATO) का गठन किया। इनमें सिर्फ़ तीन देश एशिया के थे (पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स और थाईलैंड) जबकि दो यूरोपीय देश थे (फ्रांस और यूके)। इसके तीन अन्य सदस्य राष्ट्रों ने 1951 में एक अन्य सैन्य समझौता किया था जिसका नाम था ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और यूनाइटेड स्टेट्स सिक्योरिटी (ANZUS) संधि। इस संधि और SEATO के साथ ही एशिया के प्रशांत क्षेत्र में तीन अन्य प्रमुख संधियाँ भी हुईं: 1951 में जापान और मित्र राष्ट्रों के बीच हुई सैन फ्रांसिस्को शांति संधि, 1953 में दक्षिण कोरिया और अमेरिका के बीच हुई म्यूचूअल डिफ़ेंस संधि और 1954 में चीन गणराज्य (तब फ़ोर्मोसा अब ताइवान) और अमेरिका के बीच हुई म्यूचूअल डिफ़ेंस संधि।7 1951 में जॉन फोस्टर डलेस , जो 1953 में अमेरिका के विदेश मंत्री बने, ने सुझाव दिया कि अमेरिका को जापान से मलय प्रायद्वीप (यह म्यांमर, थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर के कुछ हिस्से से बना है) तक नौसैनिक अड्डों के टापुओं की एक शृंखला का निर्माण करने की ज़रूरत है ताकि सोवियत संघ और चीनी जनवादी गणराज्य (पीआरसी) को घेरा जा सके। इन पाँच संधियों ने जापान से थाईलैंड तक इस शृंखला के निर्माण की नींव रखी।8 1956 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी को ब्रिटिश ज्ञापन मिला जो ‘SEATO सैन्य योजना के बारे में था जो मानकर चल रहा था कि परमाणु और ग़ैर-परमाणु हथियारों का प्रयोग इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए किया जाएगा… जो भी भविष्य की योजना परमाणु हथियारों को ध्यान में रखकर नहीं की जाएगी वह ज़ाहिर है अव्यवहारिक और अनुपयोगी होगी’।9 दूसरे शब्दों में जिन पाँच संधियों ने चीन को घेरा उन्होंने एशिया के मुहानों पर परमाणु हथियारों की तैनाती को बढ़ावा दिया और ज़रूरत पड़ने पर इनके प्रयोग की अनुमति भी दी।
यह याद रखना ज़रूरी है कि यह सब सिर्फ़ काग़ज़ों पर नहीं हो रहा था। अमेरिका 1945 में ही जापान पर एटम बम गिरा चुका था और 1951 के अंत तक कोरिया के उत्तरी हिस्से में हर तरह के बुनियादी ढांचे को बम से उड़ा चुका था (बमबारी हालाँकि 1953 तक चली थी)।10 अमेरिकी वायु सेना ने कोरिया पर बमबारी की थी उसके कमांडर मेजर जेनरल एमेट ओ’डॉनल ने जून 1951 में अमेरिकी सीनेट को बताया ‘सब तबाह किया जा चुका है। अब वहाँ नाममात्र के लिए भी कुछ नहीं बचा है’। ओ’डॉनल ने यह भी कहा कि जब नवंबर 1950 में चीनी सेनाओं ने उत्तर कोरिया की सरहद पर यालू नदी पार की तो अमेरिकी वायु सेना ने अपने बम से लैस जहाज़ ज़मीन पर ही रखे क्योंकि ‘कोरिया में और कोई निशाने नहीं बचे थे’।11 दिसंबर 1953 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने विन्स्टन चर्चिल को सुझाव दिया कि अगर चीन कोरिया में हुए युद्धविराम का उल्लंघन करता है तो अमेरिका चीन पर एटम बम गिरा देगा। इसके कुछ ही समय बाद मार्च 1955 में अमेरिका की सरकार ने पीआरसी (चीन) को स्पष्ट कर दिया कि अगर पीपल्स लिबरेशन आर्मी फ़ोर्मोसा (अब ताइवान) में दाखिल होती है तो अमेरिका परमाणु हथियार इस्तेमाल कर सकता है।12
शांतिपूर्ण सहअस्तित्व
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ख़ुद को पुराने साम्राज्यवादी धड़े के नेता के रूप में स्थापित करने लगा ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि बर्बाद हो चुके यूरोप के मुक़ाबले इसके पास विशाल सैन्य और आर्थिक शक्ति थी। उसी दौरान, ब्रिटेन मलय प्रायद्वीप में विद्रोह (1948-1960 का मलय आपातकाल) दबाने का एक हिंसक अभियान चला रहा था, और फ्रांस इंडोचाइना में एक हारता हुआ युद्ध लड़ रहा था (1949 तक इंडोनेशिया में डच को पहले ही हराया जा चुका था)। एशिया की धरती ख़ून से भीग रही थी और यही ख़ून उन उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं की आँखों में उतर आया था जो बांडुंग में इकट्ठा हुए थे। इसीलिए इस सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय शांति और नस्लभेद ही रहे: यहाँ आए उपनिवेशवाद विरोधी नेताओं को डर था कि मानवता के अंतर्राष्ट्रीय बँटवारे की पुरानी उपनिवेशवादी मानसिकता कहीं उत्तर-औपनिवेशिक दौर में भी बरकरार न रहे, और साथ ही वह हिंसा भी जो उपनिवेशवादियों के विरोधियों पर बरपाई जाती थी। बांडुंग सम्मेलन के दस शील (दस आदर्श) ने 1954 में चीन और भारत द्वारा प्रस्तुत पंचशील को आगे बढ़ाया जिसके आधार पर वे आपसी मतभेदों के बावजूद मिलकर काम कर सकें। ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ के यह आदर्श एशिया में सैन्य संधियाँ करने और महाद्वीप के इर्द-गिर्द सैन्य अड्डे स्थापित करने तथा राष्ट्रों को परमाणु हमलों से डराने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं।
तुर्की के नाटो में शामिल होने के चार साल बाद 1956 में, तुर्की के एक कम्युनिस्ट शायर, नाज़िम हिक़मत ने हिरोशिमा की सात साल की एक बच्ची के लिए एक शोकगीत लिखा। गीत का शीर्षक था ‘हिरोशिमा चाइल्ड’ (हिरोशिमा की बच्ची) जो अपने ‘मारे हुए बच्चे, फिर से उगते नहीं’ वाक्य के लिए मशहूर है:
शांति के लिए मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए
तुम आज लड़ो, तुम लड़ो आज
ताकि दुनिया के बच्चे
ज़िंदा रह सकें, बड़े हो सकें और हँस सकें, खेल सकें।
यही बांडुंग भावना का सार है। यह बिल्कुल सरल और स्पष्ट था। यही भावना उस दस आदर्शों में व्याप्त है जो 24 अप्रैल 1955 को सम्मेलन की अंतिम प्रेस विज्ञप्ति में जारी किए गए थे:
1. मौलिक मनवाधिकारों और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के उद्देश्यों और आदर्शों का सम्मान।
2. सभी राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय सीमाओं का सम्मान।
3. सभी नस्लों की बराबरी और छोटे-बड़े सभी राष्ट्रों की समानता को मान्यता।
4. किसी भी राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप या दख़ल देने से बचना।
5. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप किसी भी राष्ट्र के, अकेले या दूसरों के साथ मिलकर, अपनी रक्षा के अधिकार का सम्मान।
6. (क) किसी बड़ी ताक़त के विशेष हितों के लिए एकजुट सैन्य समझौतों के प्रयोग से बचना।
(ख) किसी एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर दबाव डालने से बचना।
7. किसी भी राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलफ उग्रता या बलप्रयोग करने या धमकी देने से बचना।
8. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुरूप, सभी अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण तरीकों से निपटारा, जैसे कि बातचीत, समझौता, मध्यस्थता, या न्यायिक समाधान, साथ ही पक्षों की अपनी पसंद के अन्य शांतिपूर्ण तरीकों से।
9. पारस्परिक हितों और सहयोग को बढ़ावा देना।
10. न्याय और अंतर्राष्ट्रीय बाध्यताओं का सम्मान।13
प्रभावी रूप से इन आदर्शों ने एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की अवधारणा रखी, जिसका आधार संयुक्त राष्ट्र का चार्टर (1945) था न कि ऐसी व्यवस्था जो सैन्य गुटों और सैन्य शक्ति के प्रयोग से दुनिया को आकार देना तथा संप्रभुता को कमज़ोर करना चाहे। अब्दुलग़नी ने बांडुंग सम्मेलन पर अपने विचार रखते हुए बताया कि यह ‘मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मानक और प्रक्रियाएँ तय करने’ का एक फ़ोरम था और यह सर्वनाश की जगह सहअस्तित्व के विचार का समर्थक था।14 1955 तक छिहत्तर देश संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर कर चुके थे जिसमें इस पर हस्ताक्षर करने वालों के लिए संधि निभाने के दायित्व थे; अफ्रीका महाद्वीप के अधिकांश हिस्से और प्रशांत द्वीपों के बहुत बड़े हिस्से सहित लगभग अस्सी देश अब भी औपनिवेशिक शासन झेल रहे थे। तब और अब भी संयुक्त राष्ट्र का चार्टर दुनिया में सहमति का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है; 50 और 60 के दशक में जैसे-जैसे देशों ने आज़ादी हासिल की वे संयुक्त राष्ट्र के पूर्ण सदस्य बनते चले गए।
बांडुंग भावना बहुत तेज़ी से दुनिया में फैलने लगी। 1957-1958 में काहिरा में हुए एफ़्रो-एशियाई जनवादी एकजुटता सम्मेलन, फिर 1958 में अक्रा में आयोजित अखिल अफ्रीकी जनवादी सम्मेलन, और इसके बाद 1960 में ट्यूनिस में दूसरे अखिल अफ्रीकी जनवादी सम्मेलन, 1961 में बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष आंदोलन का शिखर सम्मेलन, और अंततः 1966 में हवाना में त्रि-महाद्वीपीय सम्मेलन तक इसकी यात्रा जारी रही। इन प्रत्येक सम्मेलनों ने संस्थागत ढांचे गढ़े: अफ़्रो-एशियाई जनवादी एकजुटता संगठन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन और अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका की जनता के साथ एकजुटता संगठन। इनकी मूल भावना साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष थी – परमाणु खतरे एवं निरस्त्रीकरण पर केंद्रित और इस विचार पर कि हथियारों पर कीमती सामाजिक संपदा की बर्बादी का मतलब था विकास का अजेंडा भुला दिया जाएगा। इन सम्मेलनों के विचार-विमर्श का केंद्रीय बिंदु था बंदूक़ बनाम रोटी। 1963 की सीमित परीक्षण प्रतिबंध संधि जैसे हथियार नियंत्रण के जो भी तंत्र इस दौर में सामने आए, वे सब इन गुटनिरपेक्ष तीसरी दुनिया के देशों के कार्यक्रमों के दबाव में हुए समझौतों का नतीजा थे।15
विकासात्मक सहयोग
संप्रभुता और शांति के आह्वान के अतिरिक्त बांडुंग दौर के भीतर एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का बीज भी था। बांडुंग में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का नारा दिया गया था। इसकी अंतिम प्रेस विज्ञप्ति का पहला भाग पूरी तरह से आर्थिक सहयोग को समर्पित था और इसमें आर्थिक विकास तथा तकनीकी सहायता की आकांक्षा की रूपरेखा पेश की गई थी। यह माँग भी उठाई गयी थी कि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक विकास विशेष कोष की स्थापना की जाए ताकि इन देशों में निवेश के लिए धन मुहैया करवाया जा सके। चूँकि साम्राज्यवाद ने उपनिवेशों में उतना ही विकास करना ठीक समझा जितना कच्चे माल के उत्पादन के लिए ज़रूरी था इसलिए ज़्यादा ध्यान वस्तुओं के दामों को स्थिर रखने और निर्यात से पहले इस माल को प्रॉसेस करने की घरेलू क्षमताओं पर ही दिया गया।
बांडुंग सम्मेलन का दीर्घकालिक प्रभाव यह था कि इसने बहुपक्षीय संस्थानों और प्रक्रियाओं के आकार को काफ़ी प्रभावित किया। ये संस्थान और प्रक्रियाएँ आज भी बरकरार हैं, हालाँकि इनका स्वरूप या तो कमज़ोर कर दिया गया या इन्हें क़ब्ज़ा लिया गया है।16 इनमें 1958 में संयुक्त राष्ट्र आर्थिक विकास विशेष कोष की स्थापना शामिल है, जो 1965 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम बन गया। 1964 में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन की स्थापना हुई और इसके नए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था प्रस्तावों को 1974 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकार कर लिया। 2024 में UNCTAD की साठवीं वर्षगांठ पर उप महासचिव पेड्रो मैनुअल मोरेनो ने घोषणा की: ‘ऐसी ही भावना [बांडुंग सम्मेलन जैसी] के साथ ही नौ वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) का जन्म हुआ’।17
तख़्तापलट का संसार
अप्रैल 1955 में बांडुंग सम्मेलन के आयोजन से कुछ हफ़्ते पहले अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फ़ोस्टर डलेस ने अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत सर रॉजर मकिंस के साथ एक मुलाक़ात की। डलेस ने मकिंस को बताया कि वे ‘एशिया के हालात’ की वजह से ‘काफ़ी अवसाद’ में हैं। यह ‘हालात’ आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 31 मार्च 1955 को भारतीय सांसद में दिए गए भाषण से स्पष्ट होते हैं। यह भाषण बांडुंग सम्मेलन से कुछ ही पहले दिया गया था और इसमें उन्होंने जिन चीज़ों के ख़िलाफ़ बोला उनमें शामिल थीं – SEATO जिसे उन्होंने एक शत्रुतापूर्ण समझौता कहा, नाटो क्योंकि इसने गोवा में पुर्तगाल को समर्थन दिया, दक्षिण अफ्रीका में चल रहे नस्लभेद और साथ ही पश्चिमी देश क्योंकि वे पश्चिमी एशिया में ‘दखलंदजी’ कर रहे थे। डलेस ने कहा कि नेहरू का भाषण ‘का मूल विचार यही था कि पश्चिमी सभ्यता परास्त हो चुकी है और इसकी जगह अब एक नई सभ्यता को लाना ज़रूरी है’। डलेस के भीतर इसी बात से अवसाद पैदा हो रहा था और वे चाहते थे कि बांडुंग सम्मेलन असफल हो जाए क्योंकि उनके मुताबिक़ इसका ‘मूल स्वरूप और विचार ही पश्चिम विरोधी है’।18
ईरान (1953) और ग्वाटेमाला (1954) में हुए तख़्तापलटों के माध्यम से पश्चिम ने घोषणा कर दी कि वह एक नयी तरह की दुनिया का निर्माण नहीं होने देगा। इसके बाद अफ्रीका (1961 में कांगो और 1966 में घाना की जनता के विरुद्ध), दक्षिण अफ्रीका (1964 में ब्राज़ील के लोगों के ख़िलाफ़) और एशिया (1965 में इंडोनेशिया की जनता के विरुद्ध) में तख़्तापलटों की एक झड़ी लग गई। ये चारों तख़्तापलट सांप्रदायिक ताक़तों की प्रतिक्रियाओं के केंद्र बने, इन देशों पर थोपी गई नए सैन्य शासनों अपने महाद्वीपों में किसी भी तरह के प्रगतिशील विकास के प्रयासों का दम घोंटने में भूमिका निभाई। इंडोनेशिया के तख़्तापलट में लाखों कम्युनिस्टों की हत्या कर दी गई, मानो बांडुंग सम्मेलन का बदला लिया गया हो।19
भाग 2: आज बांडुंग भावना ग़ायब क्यों है?
स्मृतियों में सराबोर
अप्रैल 1965 में सुकर्णो की संकटग्रस्त सरकार ने इस सम्मेलन की दसवीं वर्षगाँठ मनाई जिसमें तीस देशों के प्रतिनिधियों पहुँचे। फिर भी यह पहले सम्मेलन के सामने फीका था: जनवरी में इंडोनेशिया ने अपनी संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता निलंबित कर दी थी और आने वाले अक्टूबर में देश की सेना अपने बैरक से निकलकर सुकर्णो का तख़्तापलट करने वाली थी। 1965 में अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स में दूसरा ऐफ़्रो-एशियाई सम्मेलन आयोजित करने की कोशिश हुई लेकिन इसे रद्द करना पड़ा जिसकी वजहें थीं- जून 1965 में बेन बेला का तख़्तापलट कर दिया गया; चीन-सोवियत विवाद; और नव स्वतंत्र अफ्रीकी देशों के आपसी मतभेद, कासाब्लांका समूह मज़बूती से अफ्रीकावाद के पक्ष में खड़ा था जबकि ब्राज़ाविल समूह चाहता था कि पुराने औपनिवेशिक शासकों से क़रीबी रिश्ते बने रहें। चूँकि बांडुंग सम्मेलन से निकले कई संस्थान बरक़रार रहे और दशकों तक दुनिया पर अपना प्रभाव डालते रहे इसलिए दूसरा सम्मेलन नहीं करवा पाने से कोई ख़ास असर पड़ा हो ऐसा नहीं लगता। बांडुंग भावना को जिस चीज़ ने तबाह किया वह था तीसरी दुनिया का ऋण संकट जिसने विकासशील देशों को ऋण और जन कल्याण कार्यक्रमों पर सरकारी ख़र्च में कटौती की स्थाई स्थिति में फँसा दिया तथा उनकी विकास से जुड़ी आकांक्षाओं को कुचल दिया। बांडुंग भावना के मिट जाने की यह वजह थी।
तीसरी दुनिया में जो ऋण का संकट खड़ा हुआ वह अपने आप में दर्शाता है कि इतने कम समय में बांडुंग भावना नवउपनिवेशवादी श्रम विभाजन के भौतिक आधार से जीत नहीं पाई। सहयोग और आदान-प्रदान की आत्मनिष्ठ परिस्थितियाँ तो मौजूद थीं लेकिन वस्तुनिष्ठ परिस्थितियाँ नहीं। नए-नए आज़ाद हुए देशों में जितना भी इंफ़्रास्ट्रक्चर मौजूद था वह साम्राज्यवाद की देन था, और हाशिए के देशों से शक्तिशाली देशों तक लूट पहुँचाने के लिए बना था। 1963 में विकासशील देशों का 70% से ज़्यादा निर्यात विकसित देशों में ही जाता था।20 अब जिसे वैश्विक दक्षिण कहा जाता है उसके पारस्परिक प्राचीन व्यापारिक रिश्ते उपनिवेशवाद ने बर्बाद कर दिए और उन्हें फिर से बनाना कोई आसान काम नहीं था। इसके ऊपर ये नए स्वतंत्र हुए देश, दुनिया की अधिकांश आबादी का घर होने के बावजूद वैश्विक व्यापार का एक बहुत छोटा सा भाग थे। इनका निम्न स्तरीय तकनीकी विकास भी तकनीक विशेषज्ञताएं एक-दूसरे के साथ सुचारू रूप से साझा करने में रुकावट था।
बांडुंग प्रक्रिया में साथ आए इन नए-नए आज़ाद देशों में से हरेक का पूँजी सृजन और अंदरूनी वर्ग संरचना का विशिष्ट चरित्र था और सब तब भी साम्राज्यवाद द्वारा निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन के खाँचों में सीमित थे।21xvii औपनिवेशिक दौर के अल्पविकास और साम्राज्यवादी तख़्तापलट तथा विद्रोह-दमन के हमलों से बच न पाने के कारण तीसरी दुनिया के ऋण संकट ने सहयोग की भावना की जगह प्रतियोगिता के नियम को स्थापित कर दिया। इस संकट ने हाशिए के देशों को आपस में बाँटा और इस प्रकार अनुशासित किया कि वे बहुराष्ट्रीय पूँजी की शर्तों पर फिर से वैश्विक बाज़ार का हिस्सा बना दिए गए।22
2005 में अफ्रीका और एशिया के लगभग सभी यानी 177 में से 106 देशों ने बांडुंग में एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन की पचासवीं वर्षगाँठ में शिरकत की (इज़राइल को न्यौता नहीं दिया गया था, न ही ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को, लेकिन अधिकांश प्रशांत सागर के द्वीप राष्ट्र और फ़िलिस्तीन इसमें शामिल हुए थे), और साथ ही कई लैटिन अमेरिकी देश प्रेक्षक के रूप में मौजूद रहे। तमाम देशों की सरकारों के मुखिया सवोय होमन होटल से निकले और एशियन-अफ्रीकन स्ट्रीट (पहले सम्मेलन की याद में सड़क का नाम रखा गया था) पर चलते हुए कार्यक्रम के स्थान तक पहुँचे, बिलकुल वैसे ही जैसे पचास साल पहले उनके पूर्ववर्ती नेताओं ने किया था। यह सम्मेलन नॉस्टैल्जिया (बीते समय की स्मृतियों) में डूबा हुआ था, लेकिन इसमें यह भाव भी निहित था कि दुनिया एक संक्रमण काल से गुज़र रही थी – और यह सम्मेलन उस समय हो रहा था जब ‘वॉर ऑन टेरर’ (आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध) का क्रूर दौर जारी था जिसने पहले ही अफ़ग़ानिस्तान और इराक को तबाह कर दिया था और जल्द ही कई अन्य देशों में भी तबाही लाने वाला था (इनमें इंडोनेशिया भी शामिल है जहाँ अक्टूबर 2002 में बाली में हुए बम विस्फोटों ने इस युद्ध को दक्षिणपूर्व एशिया तक पहुँचा दिया)। इस सम्मेलन की घोषणा, एक नई एशियाई-अफ्रीकी रणनीतिक साझेदारी, तुलनात्मक लाभ और विकास के लक्ष्यों जैसी नवउदारवादी अवधारणाओं से ग्रस्त थी और प्रथम घोषणा के साम्राज्यवाद विरोधी तर्क से भटकी हुई थी। बांडुंग भावना बिसराई जा चुकी थी और कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। इसलिए इसके मुर्दा शरीर की चिंता न कर बांडुंग की सच्ची भावना को एक बार फिर खोजने की ज़रूरत थी।
वैश्विक दक्षिण का नया मिज़ाज
जब तक तीसरी महामंदी (2007-2008) नहीं आई तब तक यह अहम समझ नहीं बन पाई थी कि पश्चिम न तो वैश्विक दक्षिण को प्रगति करने देगा और न ही उसे सक्षम बनाएगा। 2009 में, इसी समझ ने ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) की प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसमें 2025 में पाँच अन्य देश (मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात) और तेरह साझीदार देश शामिल हो चुके हैं।23 शुरुआती ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों में दक्षिण-दक्षिण के पारस्परिक सहयोग या वैश्विक दक्षिण में व्यापार और निवेश पर ध्यान केंद्रित किया गया, लेकिन बाद के शिखर सम्मेलनों ने वैश्विक उत्तर से आर्थिक स्वतंत्रता और अमेरिका-प्रेरित एकध्रुवीय दुनिया के बजाय बहुपक्षवाद के विचार को फिर से स्थापित किया। ब्रिक्स प्रोजेक्ट के पूर्ण मूल्यांकन के लिए सोलह साल का समय पर्याप्त नहीं है। इन वर्षों में भी, इसने अपने सदस्य देशों (जैसे चीन और भारत) के बीच राजनीतिक मतभेदों और उनके नेताओं के बदलते स्वरूप को देखा (जैसे ब्राज़ील में दिल्मा रूसेफ़ के उदारवादी-वामपंथी सरकार की जगह जायर बोल्सोनारो की नव-फ़ासिस्ट सरकार आना और फिर लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा के नेतृत्व में मध्यम-वामपंथ की वापसी)। ब्रिक्स प्रक्रिया और अन्य दक्षिण-दक्षिण संरचनाओं के लिए उत्साह तब पैदा हुआ जब एशिया के बड़े देशों (विशेष रूप से चीन, वियतनाम, भारत, बांग्लादेश और इंडोनेशिया) में आर्थिक विकास हुआ। जनवरी 2025 में, बांडुंग सम्मेलन की सत्रहवीं वर्षगांठ के साल में इंडोनेशिया ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बन गया।
विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया की ओर सरक जाने से वैश्विक दक्षिण में एक नया आत्मविश्वास या ‘नया मिज़ाज’ पैदा हुआ, क्योंकि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों को अब वित्तीय सहायता और तकनीकी विकास के लिए वैश्विक उत्तर की संस्थाओं की ज़्यादा ज़रूरत नहीं रह गई थी। 2013 में तीसरी महामंदी के जवाब में चीन ने जो बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) की वह इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण क़दम थी, क्योंकि इसने दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए वे वस्तुपरक परिस्थितियाँ पैदा कीं जो बांडुंग सम्मेलन के समय मौजूद नहीं थीं। पूर्वी अफ्रीका में रेलवे के निर्माण और पेरू में एक नए बंदरगाह के खुलने जैसे क़दमों ने वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच आंतरिक व्यापार के लिए आधार खड़ा किया है। 2023 तक चीन का 46.6% व्यापार BRI नेटवर्क के देशों के साथ होने लगा।24 हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ‘विच्छेदन’ (डीलिंकिंग) जैसा कुछ हो चुका है, लेकिन यह स्पष्ट है कि एक बड़ा बदलाव हो रहा है क्योंकि चीन अब 120 से अधिक देशों का प्रमुख व्यापारिक साझीदार है।25 इस बीच BRI को भी कई उतार-चढ़ाव देखने पड़े हैं और ज़रूरी है कि इसके सदस्य देश अपनी राष्ट्रीय विकास परियोजनाओं को इसकी चर्चाओं में शामिल करें।
ट्राईकॉन्टिनेंटल के कई दस्तावेज़ों में मौजूदा माहौल को परिभाषित करने के लिए ‘नया मिज़ाज’ शब्दों का इस्तेमाल किया है। ‘वैश्विक दक्षिण के नए मिज़ाज’ के प्रमुख उद्देश्य दो अवधारणाओं में निहित हैं – क्षेत्रवाद और बहुपक्षवाद, दोनों आर्थिक और राजनीतिक रूप से विश्व व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाने की इच्छा से प्रेरित हैं। शंघाई सहयोग संगठन से लेकर दक्षिणी आम बाजार (मर्कोसुर) तक, यह क्षेत्रवाद पहले से ही विकसित हो रहा है और स्थानीय मुद्रा-आधारित व्यापार में वृद्धि से मजबूत हुआ है, जिससे ‘आर्थिक आत्मनिर्णय’ और ‘क्षेत्रीय संपूरकता’ को प्राप्त करना भौतिक रूप से संभव हो गया है, जैसा कि क्यूबा के विदेश मंत्रालय की इंदिरा लोपेज़ अर्गुएल्स ने कहा है।26 इस क्षेत्रवाद से जुड़ा है बहुपक्षवाद के विचार का विस्तार, यह विश्वास कि वैश्विक संस्थान (जैसे संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन) वैश्विक उत्तर के हाथ की कठपुतलियाँ नहीं होने चाहिए बल्कि उन्हें वह अजेंडा अपनाना चाहिए जिसे उनके सभी सदस्य देशों ने आकार दिया हो।
आज बांडुंग भावना मौजूद नहीं है
1950 और 1960 के दशक में, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का एक जनाधार था (अक्सर इन आंदोलनों को उनकी अधिकांश आबादी का समर्थन रहा)। अधिकांश मामलों में इनका नेतृत्व छोटे बुर्जुआ और ज़मींदार अभिजात वर्ग के कुछ हिस्सों ने किया लेकिन राष्ट्रीय मुक्ति के प्रति इन आंदोलनों की प्रतिबद्धता ने उन्हें एक समाजवादी रास्ते पर चलते हुए नव-उपनिवेशवाद की संरचनाओं की सीमाओं में ही सरकारें बनाने को मजबूर किया और अपने संगठित जनाधार को जवाब देने के लिए भी। ये ‘समाजवाद’ अलग-अलग विचारों के साथ आए चाहे वह भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961) का ‘समाज का समाजवादी रास्ता’ हो, (तंजानिया के जूलियस न्येरेरे द्वारा 1967 में लिखित) अरुषा घोषणा का अफ्रीकी समाजवाद हो या लैटिन अमेरिका में पोपुलिज़्म के तमाम प्रकारों की राजनीति हो जैसे अर्जेंटीना का पेरोनिज़्म (¡Ni yanquis, ni marxistas!, ¡peronistas!, या ‘यैंकी नहीं, मार्क्सवादी नहीं, पेरोनिस्ट!’)। इन प्रवृत्तियों के नेतृत्व के वर्गीय रुझान और उनके अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के बावजूद सक्रिय जनता ने उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति के व्यापक लक्ष्य से भटकने की अनुमति नहीं दी। इसीलिए हम ज़मीनी स्तर से ऊपर की ओर एक बांडुंग [भावना] की बात कर सकते हैं।
आज जन आंदोलनों की स्थिति बहुत कमज़ोर है। वैश्विक दक्षिण के केवल कुछ ही देशों में वे समाज का नेतृत्व करते हैं। हमारे समय की प्रगतिशील सरकारों में विभिन्न वर्गों के गठबंधन हैं – जिसमें एक छोटा बुर्जुआ और उदार बुर्जुआ भी शामिल है जो नवउदारवाद के अत्याचारों को बर्दाश्त तो नहीं कर पा रहा लेकिन आसानी से उसकी रूढ़ियों से छूटेगा भी नहीं। जबकि, उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका में दूसरी गुलाबी लहर (पिंक टाइड) और सेनेगल और श्रीलंका जैसे देशों में प्रगतिशील सरकारों का उदय नवउदारवाद के पतन की प्रतिक्रिया और दक्षिणपंथी भय का जवाब हैं, वे संगठित जन आंदोलनों की पीठ पर सवार नहीं हैं और न ही वे नवउदारवाद से टूटने के विचार के इर्द-गिर्द एकजुट हैं।27 अफ्रीका के साहेल क्षेत्र – नाइजर, माली और बुर्किना फासो में – साम्राज्यवाद-विरोधी सैन्य तख़्तापलटों को सामाजिक आंदोलनों की एक नई लहर का समर्थन प्राप्त है जो अभी भी संप्रभुता और विकास के लिए एक व्यापक परियोजना तैयार करने की प्रक्रिया में हैं। ये विकास एक नए मिज़ाज को जन्म देने में सक्षम हैं – उदाहरण के लिए, एक ‘ब्रिक्स भावना’ – लेकिन यह अभी तक बांडुंग भावना जैसी नहीं हैं। यह घोषणा कर देना जल्दबाज़ी या फिर आदर्शवादी तक कहा जा सकता है कि हमारे समय में ज़मीन से एक बांडुंग भावना जैसी कोई नई भावना सिर उठा रही है जो इतिहास की वास्तविक गति देने वाली एक सक्षम, एक जन परिघटना है।
इस नए मिज़ाज को आकार देने वाला मूलभूत संदर्भ और बांडुंग भावना को फिर से जगाने की ज़रूरत के पीछे एक बड़ा खतरा है, जिसका नाम है अति-साम्राज्यवाद।28 ट्राईकॉन्टिनेंटल में अपने शोध द्वारा हमने प्रस्तावित किया है कि दुनिया में केवल एक ही राजनीतिक-आर्थिक-सैन्य गुट है: अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो और इज़राइल का गठबंधन। घटती आर्थिक और तकनीकी शक्ति के बावजूद यह गुट अद्वितीय सैन्य शक्ति रखता है और वैश्विक सूचना तंत्र पर ज़बरदस्त नियंत्रण बनाए हुए है। छद्म युद्ध रणनीतियों का उपयोग और यहाँ तक कि मामूली संप्रभुता चाहने वाले राष्ट्रों के खिलाफ हिंसा की धमकी या उपयोग का जवाब वैश्विक दक्षिण मिलकर देना होगा जिसका स्वरूप शायद बांडुंग भावना का फिर से उभरना हो सकता है।
हालाँकि, कुछ ऐसे कारक हैं जो वैश्विक दक्षिण में एक नए बांडुंग युग के उदय में रुकावट पैदा करते हैं:
- पश्चिमी देशों के नेतृत्व की कई विफलताओं, पतन और ख़तरे के बावजूद इससे डर और इसकी लालसा दोनों बरकरार हैं। यह तर्कसंगत है कि वैश्विक दक्षिण के देश हर तरह के युद्ध की आशंका से डरते हैं (इनमें एकतरफ़ा बलपूर्वक उपाय से लेकर हवाई बमबारी तक सब शामिल है), क्योंकि यह सिर्फ़ एक सैद्धांतिक धारणा नहीं बल्कि एक वास्तविक तथ्य है।29 इसके साथ ही पश्चिमी वर्चस्व वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अवशेषों की वजह से उनके नेतृत्व की अनिवार्यता का मनमोहक भाव भी बना हुआ है।
- वैश्विक दक्षिण में एशिया में हुई प्रगति के बारे में अभी इतना प्रचार नहीं हुआ है विशेष रूप से चीन द्वारा की गई प्रगति के बारे में। गुणात्मक रूप से नई उत्पादक शक्तियों के संदर्भ में ख़ासतौर से अन्य देश इस तमाम विकास को आसानी से दोहराने योग्य नहीं मान रहे हैं, जिससे वैश्विक दक्षिण की सामूहिक शक्ति की संभावना को कम आंका जाता है। इसके अलावा और वास्तविक हालात को झुठलाते हुए वैश्विक उत्तर द्वारा यह धारणा फैलाई जा रही है कि वैश्विक दक्षिण में विकास को गति दे रहे देशों की प्रगति ग़रीब देशों के लिए ख़तरनाक होगी। यह बताया जा रहा है कि सैकड़ों वर्षों से वैश्विक उत्तर का जो ख़तरा दुनिया ने देखा है उसके मुकाबले ख़ासतौर से एशियाई देशों की प्रगति ज़्यादा ख़तरनाक है।
- डिजिटल, मीडिया और वित्तीय क्षेत्रों में पश्चिम के नियंत्रण की वास्तविकता के आगे घुटने टेक दिए गए हैं, जिसे अजेय मान लिया गया है।
- वैश्विक दक्षिण के सत्तारूढ़ आर्थिक अभिजात वर्ग का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक वित्तीय पूंजी के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यह विशेष रूप से निवेश के लिए एक सुरक्षित आश्रय के तौर पर अमेरिकी डॉलर पर उसकी निर्भरता और वैश्विक उत्तर के रियल एस्टेट और वित्तीय बाजारों में निवेश करने के लिए अपने ही देशों से धन निकालने में उसकी भागीदारी में प्रकट होता है। इन वर्गीय हितों को बौद्धिकों और नीति निर्माताओं द्वारा आसानी से समर्थन दिया जाता है जो नवक्लासिकल अर्थशास्त्र और वाशिंगटन कंसेंसस के सिद्धांतों से आगे नहीं देख सकते।30 इसीलिए हम ट्राईकॉन्टिनेंटल में वैश्विक दक्षिण के लिए विकास के एक नए सिद्धांत की वकालत करते हैं।31
- हमारे कई सामाजिक आंदोलन मानकर चलते हैं कि वाम को वर्ग राजनीति की वास्तविकताओं का स्थायी रूप से विरोध करना चाहिए, हम इन परिस्थितियों में सत्ता नहीं जीत सकते। सत्ता लेने और अपने अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए वास्तविकता के साथ किसी भी तरह का समझौता हमारे अंतिम लक्ष्यों से भटकाव के रूप में देखा जाता है। जीत पाने में विफलता की लुभावनी भावना राष्ट्रीय मुक्ति के दौर में मौजूद नहीं थी, जब राज्यसत्ता हासिल करना ही तात्कालिक और अटल लक्ष्य था। एक ऐसा दृष्टिकोण भी है जो कहता है कि वाम आंदोलनों को दक्षिणपंथ से लड़ना चाहिए, नवउदारवाद के ख़िलाफ़ सक्रिय होना चाहिए और राज्य की सत्ता की माँग या उस पर क़ाबिज़ होने की बजाय मध्यम-वामपंथ को सत्ता हासिल करने में मदद देनी चाहिए। और सबसे ख़राब नज़रिया है राज्य सत्ता हासिल करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए।
जब तक वैश्विक दक्षिण की जनता इनमें से कुछ (और इनसे भी ज़्यादा) चुनौतियों पर काबू नहीं कर पाती तब तक बांडुंग भावना के इतिहास की मुख्यधारा का हिस्सा बनने की संभावना नहीं है। हम इतिहास के एक समाप्त युग, साम्राज्यवाद के युग से धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं। लेकिन हम अभी तक एक नए युग में प्रवेश नहीं कर पाए हैं, जो साम्राज्यवाद से परे हो – वह ढांचा जिससे बाहर निकलना सबसे कठिन है।
Notes
1 Sukarno, ‘Opening address given by Sukarno (Bandung, 18 April 1955)’, Asia-Africa Speak from Bandung (Djakarta: Ministry of Foreign Affairs, Republic of Indonesia, 1955), 19–29.
2 Roeslan Abdulgani, Bandung Spirit: Moving on the Tide of History (Djakarta: Prapantja, 1964) and The Bandung Connection: The Asia-Africa Conference in Bandung in 1955 (Singapore: Gunung Aguna, 1981), 89.
3 The poetic resolution was formally placed before the UN General Assembly by the Soviet diplomat Vasily Kuznetsov. See United Nations General Assembly, Declaration on the Granting of Independence to Colonial Countries and Peoples (A/RES/1514), December 14, 1960. The president of the General Assembly at that time was the Irish diplomat Frederick Boland. Boland’s daughter Eavan became a famous poet and in 1998 published ‘Witness’, which contains these lines:
What is a colony
if not the brutal truth
that when we speak
the graves open.
And the dead walk?
4 Abdulgani, The Bandung Connection, 11.
5 The overall narrative in this dossier draws heavily from Vijay Prashad, The Darker Nations: A People’s History of the Third World (New York: The New Press, 2007) and The Poorer Nations: A Possible History of the Global South (New Delhi: LeftWord, 2013). It will form part of the basis for The Brighter Nations (2026).
6 Richard Nixon, RN: The Memoirs of Richard Nixon (New York: Grosset and Dunlap, 1978), 136. Also see Richard Nixon, ‘Asia After Viet Nam’, Foreign Affairs, 1 October 1967, https://www.foreignaffairs.com/articles/united-states/1967-10-01/asia-after-viet-nam.
7 For more on the San Francisco Treaty, see Tricontinental: Institute for Social Research, The New Cold War Is Sending Tremors through Northeast Asia, dossier no. 76, 21 May 2024, https://thetricontinental.org/dossier-76-new-cold-war-northeast-asia/.
8 For a full sense of the argument, see John Foster Dulles, Policy for the Far East (Washington: US Government Publishing Office, 1958).
9 ‘Memorandum of a Conversation Between the Counsellor of the Department of State (MacArthur) and the British Ambassador (Makins), Department of State, Washington, February 29, 1956’, US Department of State, Conference Files: Lot 62 D 181, CF 656, Secret; John P. Glennon, Edward C. Keefer, and David W. Mabon, eds., Foreign Relations of the United States, 1955–1957, East Asian Security; Cambodia; Laos, Volume XXI, (Washington: United States Government Printing Office, 1990), 180–181.
10 Su-kyoung Hwang, Korea’s Grievous War (Philadelphia: University of Pennsylvania Press, 2016).
11 I. F. Stone, The Hidden History of the Korean War, 1950–1951 (New York: Little Brown, 1969), 312.
12 At a press conference on 15 March 1955, John Foster Dulles explained the doctrine of ‘less-than-massive retaliation’. If China crossed into Formosa, Dulles said, the US would use tactical nuclear weapons against the Chinese forces. See Elie Abel, ‘Dulles Says US Pins Retaliation on Small A-Bomb’, New York Times, 16 March 1955, https://www.nytimes.com/1955/03/16/archives/dulles-says-us-pins-retaliation-on-small-abomb-lessthanmassive.html.
When Eisenhower was asked to confirm Dulles’ statement the next day, he said that tactical nuclear weapons should not be used ‘just exactly as you would use a bullet or anything else. I believe that the great question about these things comes when you begin to get into those areas where you cannot make sure that you are operating merely against military targets. But with that one qualification, I would say, yes, of course they would be used’. See William Klingaman, David S. Patterson, and Ilana Stern, eds., Foreign Relations of the United States, 1955–1957, National Security Policy, Volume XIX (Washington: United States Government Printing Office, 1990), 61. For Churchill’s diary notes, see John Colville, The Fringes of Power: Downing Street Diaries, 1939–1955 (London: Hodder and Stoughton, 1985), 687. On the broader question of nuclear retaliation, see Matthew Jones, ‘Targeting China: US Nuclear Planning the “Massive Retaliation” in East Asia, 1953–1955’, Journal of Cold War Studies 10, no. 4 (Fall 2008): 37–65.
13 Asia-Africa Speak from Bandung, 161–169.
14 Abdulgani, Bandung Spirit, 72.
15 For example, L. C. N. Obi of Nigeria was a key, but now forgotten, figure in the debate around the 1968 Nuclear Non-Proliferation Treaty while Ismael Moreno Pino of Mexico was the central negotiator for the 1967 Treaty for the Prohibition of Nuclear Weapons in Latin America and the Caribbean, known as the Tlatelolco Treaty, the first to establish a nuclear weapons free zone.
16 Gilbert Rist, The History of Development: From Western Origins to Global Faith (London: Zed Books, 2008).
17 Pedro Manuel Moreno, 60 years of UNCTAD: Charting a New Development Course in a Changing World, UN Trade and Development, 14 May 2024, https://unctad.org/osgstatement/60-years-unctad-charting-new-development-course-changing-world-session-1.
18 John P., Harriet D. Schwar, and Louis J. Smith, eds., ‘Memorandum of a Conversation, Department of State, Washington, April 7, 1955’, in Foreign Relations of the United States, 1955–1957, China, Volume II (Washington: United States Government Printing Office, 1986), 454.
19 Alan Burns, the governor of the Gold Coast and Nigeria from 1941 to 1947, was appointed to be the United Kingdom’s permanent representative at the UN Trusteeship Council from 1947 to 1956. Soon after leaving the UN, Burns published a book that went after Bandung and argued that it represented ‘the resentment of the darker peoples against the past domination of the world by European nations’. See Alan Burns, In Defence of Colonies (London: George Allen and Unwin, 1957), 5. For more on the coup in Indonesia, see Tricontinental: Institute for Social Research, The Legacy of Lekra: Organising Revolutionary Culture in Indonesia, dossier no. 35, December 2020, https://thetricontinental.org/wp-content/uploads/2020/12/20210127_Dossier-35_EN_Web.pdf.
20 Bela Balassa, Trends in Developing Country Exports, 1963–88, Policy, Research, and External Affairs working papers no. WPS 634, World Bank World Development Report, 31 March 1991, http://documents.worldbank.org/curated/en/561401468766799448/Trends-in-developing-country-exports-1963-88.
21 Aijaz Ahmad, In Theory: Classes, Nations, Literatures (London: Verso, 1992), 16.
22 S. B. D. de Silva, The Political Economy of Underdevelopment (London: Routledge, 1982), 506.
23 For more on the Third Great Depression, see Tricontinental: Institute for Social Research, The World in Economic Depression: A Marxist Analysis of Crisis, notebook no. 4, 10 October 2023, https://thetricontinental.org/dossier-notebook-4-economic-crisis/.
24 The State Council Information Office, ‘China’s Trade with BRI Countries Booms in 2023’, press release, 12 January 2024, http://english.scio.gov.cn/m/pressroom/2024-01/12/content_116937407.htm#:~:text=China’s%20trade%20with%20countries%20participating,2022%2C%20customs%20data%20showed%20Friday.
25 Alessandro Nicita and Carlos Razo, ‘China: The Rise of a Trade Titan’, UN Conference on Trade and Development, 27 April 2021, https://unctad.org/news/china-rise-trade-titan. For more on delinking, see Tricontinental: Institute for Social Research, Globalisation and Its Alternative: An Interview with Samir Amin, notebook no. 1, 29 October 2018, https://thetricontinental.org/globalisation-and-its-alternative/.
26 For more on regionalism, see Tricontinental: Institute for Social Research, Sovereignty, Dignity, and Regionalism in the New International Order, dossier no. 62, 14 March 2023, https://thetricontinental.org/dossier-regionalism-new-international-order/.
27 For more on the second pink tide in Latin America, see Tricontinental: Institute for Social Research, To Confront Rising Neofascism, the Latin American Left Must Rediscover Itself, dossier no. 79, 13 August 2024, https://thetricontinental.org/dossier-neofascism-latin-america/.
28 Tricontinental: Institute for Social Research, Hyper-Imperialism: A Dangerous Decadent New Stage, Contemporary Dilemmas no. 4, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/studies-on-contemporary-dilemmas-4-hyper-imperialism/; Tricontinental: Institute for Social Research, The Churning of the Global Order, dossier no. 72, 23 January 2024, https://thetricontinental.org/dossier-72-the-churning-of-the-global-order/.
29 For more on unilateral coercive measures, see Tricontinental: Institute for Social Research, Imperialist War and Feminist Resistance in the Global South, dossier no. 86, 5 March 2025 https://thetricontinental.org/dossier-imperialism-feminist-resistance.
30 For more on the role of intellectuals on both sides of the class struggle, see Tricontinental: Institute for Social Research, The New Intellectual, dossier no. 12, 11 February 2019, https://thetricontinental.org/the-new-intellectual/.
31 Tricontinental: Institute for Social Research, Towards a New Development Theory for the Global South, dossier no. 84, 14 January 2025, https://thetricontinental.org/towards-a-new-development-theory-for-the-global-south/.