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हिंदी बुलेटिन

विश्वशांति के लिए ख़तरा है यूएस का वर्चस्ववाद

संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में अपना दबदबा बढ़ाने के लिए अपनी सैन्य शक्ति और हथियारों के विस्तृत कारोबार का इस्तेमाल करता है।

सोनाली

इतिहास से सिर्फ़ वे सबक़ लेते हैं, जो चाहते हैं कि वह दोहराया न जाए। साल 2025 में दुनिया की अमनपरस्त जनता ने 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) द्वारा अब तक के सबसे जघन्य हमले – हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने – को याद किया और सामूहिक बर्बादी के ऐसे भयानक हथियारों के ख़िलाफ़ अपना संघर्ष जारी रखने का संकल्प भी लिया। इसके साथ ही चीन ने फासीवाद के विरुद्ध और जापान के साम्राज्यवादी हमले के ख़िलाफ़ चीनी जनता की सफल लड़ाई के अस्सी साल पूरे होने का जश्न भी मनाया।

इस सबके बीच यूएस के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प मौक़े-बेमौक़े अपने लिए नोबेल शांति पुरस्कार की माँग करते रहे। हालाँकि यह पुरस्कार अंतत: गया वेनेजुएला की मारिया कोरिना मचाडो की झोली में, जो वहाँ की समाजवादी क्रांति की प्रक्रिया से निकली और जनता की चुनी हुई निकोलस मादुरो की सरकार को अपदस्थ करने और तेल के भंडार सहित देश की संपदा को मुनाफ़ाखोर निजी क्षेत्र के हाथों में सौंप देने का अभियान चलाए हुए हैं। उन्होंने अपना यह पुरस्कार यूएस राष्ट्रपति को समर्पित करके इस बात का प्रमाण ख़ुद दे दिया कि वे यूएस तथा इसकी वर्चस्ववादी सोच की पक्षधर हैं। इस वर्चस्व को स्थापित करने के लिए यूएस अपनी सैन्य शक्ति और हथियारों के विस्तृत कारोबार का इस्तेमाल करता है।

अस्सी साल पहले हिरोशिमा और नागासाकी पर हमला करके ‘द्वितीय विश्वयुद्ध को ख़त्म करने’ का दंभ भरने वाला यूएस आज दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक है। बल्कि दोनों विश्वयुद्धों के दौरान भी यूएस हथियारों का प्रमुख निर्यातक था। युद्ध और हथियार वैश्विक अर्थव्यवस्था का वह बड़ा हिस्सा हैं, जो बीसवीं सदी में तमाम उपनिवेशों के आज़ाद हो जाने के बाद भी उपनिवेशवादी व्यवस्था को जारी रखने में बड़ी भूमिका निभाते आ रहे हैं।

युद्ध और शांति की बहस का बहुत ज़रूरी पहलू यह समझना है कि युद्ध लड़े जाने से पहले ख़रीदे और बेचे जाते हैं।

दुनिया का सबसे ख़तरनाक संगठन नाटो

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) के अनुसार साल 2024 में वैश्विक सैन्य खर्च  बढ़कर 2.7 खरब डॉलर हो गया। इसमें से 55% हिस्सा सिर्फ़ उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो देशों का था। नाटो के सभी 32 सदस्य देशों ने 2024 में अपना सैन्य ख़र्च बढ़ाया और 2014 में तय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2% तक ले आए। आने वाले समय में दुनिया का सैन्य ख़र्च और भी बढ़ेगा और इसकी सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी होगी नाटो पर। 25 जून 2025 को हेग में हुए नाटो के शिखर सम्मेलन में इसके सदस्य राष्ट्रों ने स्वीकार कर लिया कि वे साल 2035 तक अपना सैन्य ख़र्च बढ़ाकर जीडीपी का 5% कर देंगे।

यह हुआ है यूएस के दबाव में। यूएस राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प पिछले कुछ समय से नाटो राष्ट्रों पर सैन्य ख़र्च बढ़ाने का दबाव बना रहे थे और ऐसा न किए जाने पर यूएस को नाटो से अलग कर लेने की धमकी दे रहे थे। इस घटना ने इस संगठन का वास्तविक स्वरूप एक बार फिर सबके सामने ला दिया कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ दुनिया में यूएस साम्राज्यवाद को फैलाने के लिए बनाया गया था। ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने अपने जून के डोसियर, NATO: The Most Dangerous Organisation on Earth [नाटो: दुनिया का सबसे ख़तरनाक संगठन] में बताया है कि कैसे 1949 में अपने गठन से ही यह दुनिया को शांति की ओर ले जाने की जगह मुसलसल टकराव और संघर्ष की ओर धकेलता रहा है।

नाटो के गठन के दो प्रमुख कारण थे: एक, साम्यवाद को बाक़ी दुनिया में फैलने से रोकना और दूसरा, यूएस के हितों को सर्वोपरि और सुरक्षित रखना, जिसके लिए पश्चिमी यूरोप के देशों का इस्तेमाल किया गया ताकि सोवियत संघ के आस-पास  हमेशा यूएस की सैन्य मौजूदगी रहे। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह ख़तरा ख़त्म हो जाना चाहिए था। लेकिन यूएस के नेतृत्व में नाटो न सिर्फ़ बरकरार रहा बल्कि और शक्तिशाली बनता गया। इसने अपना वादा तोड़ते हुए पूर्व की ओर लगातार विस्तार किया। 1999 में हंगरी, चेक रिपब्लिक और पोलैंड को नाटो सदस्य बनाया गया, फिर 2004 में बाल्टिक देशों जैसे एस्टोनिया, लिथुआनिया आदि इसके सदस्य बने। 2008 में घोषणा हुई कि भविष्य में यूक्रेन को भी इस संगठन में शामिल किया जाएगा। यह रूस के लिए खुली चुनौती थी और 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले का यह एक प्रमुख कारण है। क्योंकि 1990 जर्मनी के एकीकरण के दौरान नाटो ने पूर्व की ओर न बढ़ने का आश्वासन दिया था जो यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने के प्रस्ताव से झूठा साबित हो गया।

इसके साथ ही नाटो ख़ासकर यूएस, हमेशा दुनिया के अन्य देशों में राजनीतिक दख़ल देने के बहाने खोजता रहा है। ये कोशिशें शीतयुद्ध के बाद के दौर में काफ़ी हुई हैं: 1999 में नाटो ने 78 दिनों तक यूगोस्लाविया पर बमबारी की जिसमें सैंकड़ों नागरिक मार दिए गए, 2001 में यूएस के नेतृत्व में नाटो ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया ताकि वहाँ की सत्ता से तालिबान का शासन हटाकर आम जनता को ‘मुक्ति’ दिलाई जाए, लेकिन 2021 में जब यूएस अंतत: इस देश को तबाह करने के बाद यहाँ से निकला तो शासन एक बार फिर तालिबान के हाथों में था। यह केवल कुछ उदाहरण हैं कि कैसे यूएस नेतृत्व में नाटो ने दुनिया पर एक के बाद दूसरा युद्ध और टकराव थोपे हैं।

जंगी कारोबार

नाटो के निरंतर विस्तृत और ताकतवर होने के पीछे केवल भूराजनीतिक कारण नहीं हैं बल्कि इसका एक बड़ा व्यापारिक पहलू भी है। यूएस दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। शीत युद्ध के दौरान हथियारों का कारोबार बहुत फूला-फला। सोवियत संघ के विघटन के बाद हथियार बनाने वाली बड़ी कंपनियों को अंदेशा हुआ कि शायद उनके मुनाफ़े में सेंध लगने वाली है। इसलिए उन्होंने यूएस राजनीति में अपनी पैरवी करने के प्रयास बहुत ज़्यादा बढ़ा दिए, इसे राजनीतिक भाषा में लॉबीइंग कहा जाता है। 1996 में नाटो के विस्तार के लिए बनाए गए क़ानून को यूएस कांग्रेस में पारित करवाने में लॉकहीड मार्टिन जैसी हथियार बनाने वाली बड़ी यूएस कंपनियों की पूरी भूमिका थी। इसी क़ानून के बाद मध्य यूरोप के देशों को चिह्नित करके नाटो में शामिल किया गया।

SIPRI के मुताबिक़ 2015-19 और 2020-24 के बीच नाटो के यूरोपीय सदस्य राष्ट्रों का हथियार आयात दोगुना हो गया, इनमें से 64% हथियार इन देशों ने यूएस से आयात किए थे। यूएस दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक है। 2020-24 के दौरान 107 देशों ने मुख्यतः यूएस से हथियार आयात किए। यूक्रेन युद्ध और अक्टूबर 2023 से इज़राइल-यूएस द्वारा फ़िलिस्तीनियों के जनसंहार ने दुनिया में हथियारों की बिक्री और भी बढ़ा दी। और इस सबमें से सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया यूएस और इज़राइल की कंपनियों ने।

ग़ज़ा को बमबारी से पूरी तरह बर्बाद कर देने के साथ-साथ इज़राएल ने फिलिस्तिनियों तक राहत और खाद्य सामग्री पहुँचने के सब रास्ते बंद करके उन्हें भुखमरी और अन्य ज़रूरतों से महरूम रखा है। अमानवीयता का जो अध्याय यूएस ने हिरोशिमा से शुरू किया था उसमें इज़राइल ने बर्बरता के नए उदाहरण जोड़ दिए। इसमें यूएस ने उसका पूरा साथ दिया। अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के बावजूद इज़राइल ग़ज़ा में बमबारी कर रहा है, और यूएस तथा नाटो देश ख़ामोशी से देख रहे हैं। इसलिए इज़राइली प्रधानमंत्री और युद्ध अपराधों के आरोपी बेंजामिन नेतन्याहू का यूएस राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करना कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी।

वहीं वैश्विक दक्षिण में आपसी सहयोग और विकास के लिए ब्रिक्स+, अलाइयन्स ऑफ़ साहेल स्टेट्स (एईएस) आदि जैसे संगठन बन रहे हैं ताकि वे वैश्विक उत्तर द्वारा थोपे गए उस नवउदारवादी ढाँचे से आज़ाद हो पाएँ, जो पुरानी साम्राज्यवादी ताक़तों के वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए ही बनाया गया है। ये कितने सफल होंगे यह देखना अभी बाक़ी है लेकिन इन्होंने वैश्विक उत्तर में एक डर की छाया तो ज़रूर फैला दी है। इसलिए वैश्विक दक्षिण और ख़ासतौर से इसकी विकास यात्रा के इंजन के रूप में उभरे चीन को यूएस, नाटो सहित अपने तमाम अन्य सैन्य सगठनों द्वारा, घेरने की कवाइत में लगा है।

दो युद्धों के अंतराल में अगले युद्ध की तैयारी को किसी भी लिहाज़ से शांति नहीं कहा जा सकता। शांति युद्ध विराम में नहीं बल्कि युद्ध को हमेशा के लिए अप्रासंगिक बना देने में है। यही नाटो जैसे संगठन नहीं चाहते। शांति प्रक्रिया का एक बड़ा हिस्सा है समानता की स्थापना, समानता तमाम देशों के बीच, दुनिया के तमाम समाजों के बीच। इसलिए यूएस साम्राज्यवाद, नाटो जिसका प्रतिनिधित्व करता है, के लिए सबसे बड़ा ख़तरा वह सोच है जो समानता की पैरवी करती है।