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हिंदी बुलेटिन

साहेल में संप्रभुता की खोज: पश्चिमी मीडिया और जनता की आकांक्षाएँ

ट्राईकॉन्टिनेंटल इन्स्टिट्यूट का नया डोसियर: साहेल क्षेत्र की संप्रभुता, उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष और जनता की आकांक्षाओं की झलक —पश्चिमी मीडिया से परे एक अलग दृष्टि।

अफ्रीका का साहेल क्षेत्र सहारा मरुस्थल के ठीक दक्षिण में फैला है। यह इलाका माली, नाइजर और बुर्किना फासो जैसे देशों से बना है। भूगोल की दृष्टि से यह क्षेत्र सिर्फ़ रेगिस्तानी पट्टी नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद, संसाधन लूट और सैन्य हस्तक्षेप की लंबी कहानियों का गवाह है। यही कारण है कि जब सितंबर 2023 में इन देशों ने मिलकर साहेल देशों का गठबंधन (AES) बनाया, तो यह केवल एक कूटनीतिक समझौता नहीं रहा, बल्कि जनता के आत्मसम्मान और संप्रभुता की पुकार का प्रतीक बन गया।

पश्चिमी मुख्यधारा मीडिया ने इस घटनाक्रम को जिस तरह पेश किया, उसमें एक खास प्रवृत्ति दिखाई देती है। रिपोर्टों और विश्लेषणों में माली (2020), बुर्किना फासो (2022) और नाइजर (2023) के सैन्य हस्तक्षेपों को सामान्यतः ‘लोकतंत्र से पीछे हटने’  और ‘सत्ता की भूख’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। साथ ही AES को एक “पश्चिम-विरोधी” और “प्रो-रूस” गठबंधन के रूप में चित्रित किया गया। इन खबरों में आतंकवाद और अस्थिरता के बढ़ने का ख़तरा, विदेशी निवेश ख़त्म होने की आशंका और मानवीय संकट के बिगड़ने जैसी बातें केंद्र में रहीं।

ट्राईकॉन्टिनेंटल: इन्स्टिटूट फ़ोर सोशल रीसर्च ने हाल ही में साहेल पर केंद्रित एक डोसियर “The Sahel Seeks Sovereignty” प्रकाशित किया है, जिसका तर्क है कि पश्चिमी मीडिया द्वारा पेश की जा रही यह तस्वीर अधूरी है, क्योंकि इन तख़्तापलटों और AES के गठन के पीछे जनता की व्यापक भागीदारी और आत्मनिर्णय की आकांक्षा है। दशकों से उपनिवेशवादी शोषण और असमान समझौतों ने इस क्षेत्र की जनता को हाशिये पर धकेला। फ्रांस जैसी ताक़तों ने खनिज, मुद्रा और सैन्य अड्डों पर नियंत्रण बनाए रखा। विदेशी कंपनियाँ यूरेनियम और सोना निकालकर ले जाती रहीं, जबकि स्थानीय आबादी ग़रीबी और असुरक्षा से जूझती रही। ऐसे हालात में ये तख़्तापलट केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थे, बल्कि उन असफल ढाँचों के ख़िलाफ़ जनता की आवाज़ थे जिन्हें विदेशी दबाव सहारा देता था।

इन हालिया सैन्य हस्तक्षेपों की प्रकृति पहले की तुलना में अलग रही है। अतीत में अफ्रीकी देशों में कई तख़्तापलट हुए, जिनमें पश्चिमी समर्थन और घरेलू अभिजात वर्ग की भूमिका प्रमुख थी। लेकिन माली, नाइजर और बुर्किना फासो में हाल की घटनाएँ तीन मायनों में भिन्न हैं। पहला, नेतृत्व का वर्गीय और वैचारिक आधार अलग है। ये युवा सैन्य अधिकारी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए हैं और उन वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके पास पहले कोई राजनीतिक मंच नहीं था। वे औपनिवेशिक दौर के प्रतिरोधी नायकों से प्रेरणा लेते हैं और जनता के करीब खड़े दिखाई देते हैं।

दूसरा, इन परिवर्तनों में जनता की संगठित भागीदारी अहम रही है। जब नाइजर में 2023 में तख़्तापलट हुआ, तो मजदूर संगठनों और छात्र संघों से लेकर किसान संगठनों तक ने फ्रांसीसी सैन्य ठिकानों और दूतावासों के सामने प्रदर्शन किए। यह केवल उत्सव नहीं था, बल्कि विदेशी दख़ल के ख़िलाफ़ वर्षों से चल रही मांग का उभार था। इन संगठनों ने साफ़ कहा कि समर्थन तब तक रहेगा जब तक नीतियाँ जनता के पक्ष में हैं। यह चेतावनी भी दी गई कि अगर सरकार जनता से मुंह मोड़ेगी, तो उसे भी वैसा ही प्रतिरोध झेलना होगा जैसा उपनिवेशवादियों को झेलना पड़ा था।

तीसरा, इन सरकारों ने वैचारिक स्तर पर भी नए रास्ते खोजने शुरू किए हैं। माली की राष्ट्रीय रणनीति 2024–2033 इसका उदाहरण है। यह दस्तावेज़ पश्चिमी संस्थाओं के थोपे हुए मॉडल को अस्वीकार करता है और इसमें देश की ऐतिहासिक परंपराओं—जैसे 1236 का मंडेन चार्टर, 19वीं सदी के मसीना साम्राज्य की न्याय प्रणाली और टिंबकटू की पांडुलिपियों—से प्रेरणा लेकर विकास का ढाँचा प्रस्तावित किया गया है। न्याय, सामाजिक एकजुटता और ज्ञान को सार्वजनिक हित में इस्तेमाल करने पर बल दिया गया है। खनन क्षेत्र में भी नई नीतियाँ बनाई जा रही हैं, जिनमें राज्य की हिस्सेदारी बढ़ाने, विदेशी कंपनियों की कर छूट खत्म करने और पुराने अनुबंधों की समीक्षा करने पर ध्यान दिया जा रहा है। यह सब उस ऐतिहासिक लूट को चुनौती देने की दिशा में जरूरी कदम हैं जो वर्षों से इस क्षेत्र को खोखला करती रही।

AES देशों ने व्यावहारिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण पहलें की हैं। फ्रांसीसी सेनाओं को बाहर निकालना एक बड़ा प्रतीकात्मक कदम रहा। इसके अलावा साझा मुद्रा, एकीकृत पासपोर्ट, संयुक्त सेना और संसाधन प्रबंधन पर क्षेत्रीय समन्वय आदि पर विचार किया जा रहा है। इन योजनाओं में दक्षिण-दक्षिण सहयोग और आत्मनिर्भरता पर विशेष ज़ोर दिया गया है। यह सब इस बात का संकेत है कि साहेल की जनता अब पराए मॉडल नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक-ऐतिहासिक धरोहर पर आधारित विकास चाहती है।

लेकिन, ट्राईकॉन्टिनेंटल इन्स्टिटूट से जारी डोसियर इस घटना-विकास को सिर्फ़ रोमांटिक नज़रिए से नहीं देखता। इसमें AES समूक के सामने खड़ी चुनौतियों का भी आकलन किया गया है। जैसे आंतरिक विरोधाभास मौजूद हैं, आर्थिक ढाँचे अभी भी कमजोर हैं और बाहरी दबाव लगातार बढ़ रहा है। डोसियर में ज़ोर देकर कहा गया है कि बदलते वैश्विक समीकरण भी इन देशों की नीतियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया में सत्ता परिवर्तनों ने रूस की आपूर्ति रेखाओं को प्रभावित किया, जिससे साहेल तक उसकी पहुँच सीमित हुई। ऐसी स्थितियाँ अमेरिका और अन्य शक्तियों को नया दबाव बनाने का अवसर देती हैं। इसलिए AES के सामने अपने गठबंधन को टिकाऊ बनाने, मजबूत संस्थाएँ खड़ी करने और जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप स्थिर नीतियाँ बनाने की चुनौती बनी हुई है।

फिर भी, यह डोसियर साहेल में हो रहे बदलावों को AES के तीन देशों की कहानी बढ़कर वैश्विक दक्षिण की उस व्यापक आकांक्षा के रूप में देखता है, जो उपनिवेशवाद और नव-उपनिवेशवाद के बंधनों को तोड़कर आत्मनिर्भर और सम्मानजनक विकास की राह चुनना चाहती है। AES की यात्रा अभी अधूरी और अस्थिर है, लेकिन यह उस दिशा में उठाया गया निर्णायक कदम है जहाँ संप्रभुता केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि व्यवहारिक हक़ीक़त बन सके।