प्रकाशन उद्योग को मिलने लगी हैं नई साँसें
पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में किताबों की बढ़ती बिक्री से संकेत मिलता है कि लोग फिर प्रिंट माध्यम की ओर लौट रहे हैं।
संजय कुंदन
पिछले क़रीब एक दशक में पठनीयता और प्रकाशन को लेकर ज़्यादातर विरोधाभासी बातें ही सुनने को मिलती रही हैं। कभी कहा जाता कि पठनीयता बढ़ रही है, कभी कहा जाता कि पठनीयता काफ़ी कम हो गई है, तकनीकी विकास के कारण प्रिंट माध्यम की विदाई तय है। बस अब उसके गिने-चुने दिन ही रह गए हैं। प्रकाशकों का एक वर्ग दावा करता रहा है कि उसकी बिक्री बढ़ी है, वहीं दूसरा तबक़ा कम बिक्री का रोना रोता रहा। लेकिन आमतौर पर किसी प्रकाशक को धंधा बंद कर कहीं किसी और क्षेत्र में जाते नहीं देखा गया। इन तमाम दावों-प्रतिदावों के बीच बीते साल हिंदी के एक लेखक को तीस लाख रॉयल्टी दिए जाने की घटना भी सामने आ गई। जबकि ज़्यादातर लेखक रॉयल्टी न मिलने की शिकायत करते हैं। ऐसे में एक भ्रम की स्थिति बनी रहती है कि आख़िर प्रकाशन जगत की सही तस्वीर क्या है। पुस्तक पढ़ने-बिकने के परिदृश्य को किस रूप में देखा जाए?
दरअसल चीज़ें बदल रही हैं, उतार-चढ़ाव जारी है, लेकिन कोई सही-सही तस्वीर नहीं उभर रही है। इसका एक ठीक-ठीक वस्तुनिष्ठ आकलन अभी भी बाक़ी है। कई अध्ययन और सर्वेक्षण बीच-बीच में आते रहते हैं, जिनसे यह तो लगता है कि हालात उतने ख़राब नहीं है, जितने कुछ समय पहले तक बताए जा रहे थे। बल्कि कुछ स्रोत बता रहे हैं कि स्थितियाँ बेहतर हो रही हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि प्रकाशन उद्योग पर गहरा दबाव है। नई तकनीक ने उसके सामने नई चुनौतियाँ पेश की हैं, लेकिन यह भी सच है कि प्रकाशन उद्योग ने प्रौद्योगिकी से हाथ मिलाकर अपने लिए नया रास्ता भी खोजने की कोशिश की है। मसलन अमेज़न जैसा बड़ा प्रकाशक पेपरबैक और हार्डबाउंड किताबों से कहीं ज़्यादा किंडल ईबुक बेच रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में ऑडियोबुक की बिक्री 2013 से दोगुनी से भी अधिक हो गई है। इसलिए, लोग अब भी अच्छी पुस्तकों को पसंद करते हैं, बस अब वे अलग-अलग प्रारूपों में उपलब्ध हैं। पर उन देशों में एक वर्ग यह मानता है कि मुद्रित किताबों का कोई विकल्प नहीं है। बल्कि कुछ अध्ययन यहाँ तक दावा करते हैं कि अभी भी मुद्रित किताबें ही ज़्यादा बिक रही हैं।
फेरनांड लेगेर (फ़्रांस), पाठक, 1953
भारत में कई प्रकाशक भी यही मानते हैं। उनके मुताबिक बीच में ऐसा ज़रूर लगा कि छपी हुई किताबों का समय जा रहा है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि पिछले कुछ वर्षों में मुद्रित किताबों की माँग बढ़ी ही है। पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों में किताबों की बढ़ती बिक्री से यह धारणा बनी है। इस बात से भी इसका संकेेत मिल रहा है कि प्रकाशन के क्षेत्र में नए-नए लोग लगातार आ रहे हैं। इसके पीछे भी तकनीक ही है। अब डिजिटल प्रिंटिंग के साथ, मात्रा कोई चिंता का विषय नहीं रह गई है। एक ही पुस्तक की अधिक प्रतियाँ छापने की तुलना में विभिन्न पुस्तकों की कम प्रतियाँ छापना अधिक किफ़ायती है। इससे भंडारण लागत में बचत होती है, और डिजिटल प्रिंटिंग से माँग के अनुसार प्रिंट किया जा सकता है। अब शायद ही कोई लेखक हो जो कंप्यूटर पर काम न करता हो, ऐसे में टाइपिंग और प्रूफ रीडिंग का ख़र्च भी बच रहा है। प्रिंटिंग आदि की लागत बढ़ने के बावजूद कई और चीज़ों में बचत से उसकी भरपाई हो जा रही है।
हालाँकि वे दिन अब चले गए, जब किसी बेस्टसेलर किताब की 100,000 प्रतियाँ बिकती थीं। भारत में अब बेस्टसेलर का मतलब 3,000 से 5,000 प्रतियाँ बिकना होता है। ऑनलाइन तकनीक ने किताबों के प्रचार में मदद की है। अब सोशल मीडिया पर किताबों की जानकारी व्यापक रूप में उपलब्ध रहती है। पाठक को किताबों के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर जानकारी मिलती रहती है। ऑनलाइन बिक्री की सुविधा के कारण वह आसानी से घर बैठे किताबें ख़रीद लेता है। इसका बिक्री पर सकारात्मक असर हुआ है। शायद किताबों की सहज उपलब्धता ने एक बार फिर पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ाई है।
कुछ साल पहले आई एक विस्तृत बाज़ार रिपोर्ट के अनुसार भारतीय पहले से कहीं अधिक फिक्शन पढ़ रहे हैं और फिक्शन के बाजार में साल दर साल 20% की वृद्धि हुई है। लेकिन नॉन-फिक्शन की माँग सबसे ज़्यादा है। एक अनुमान है कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग और फिजिकल रिटेल शॉपिंग अब 50:50 के अनुपात में है। इंडिया बुक मार्केट रिपोर्ट-2022 की मानें तो 2024-25 में मुद्रित पुस्तकों का बाजार 98,920 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। दस साल पहले यह आँकड़ा 30,660 करोड़ रुपये था।
मुद्रित किताबों के प्रति रुचि जगाने में पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों का बड़ा योगदान है। कोलकाता के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में लाखों की संख्या में लोगों ने शिरकत की है। इसी तरह, दिल्ली का अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला भी हर साल लाखों पाठकों को अपनी ओर खींचता है। नेशनल बुक ट्रस्ट की तरफ से लखनऊ में आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव में पिछले साल किताबों की बिक्री में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इन मेलों की अभूतपूर्व सफलता यह कहती है कि पढ़ने की संस्कृति एक नए सिरे से तैयार हो रही है। लिटरेचर फेस्टिवलों की कई कारणों से आलोचना की जाती है। कहा जाता है कि यह साहित्य को ग्लैमर या तमाशे में बदल देता है। जो भी हो लेकिन उसकी वजह से लोगों की एक भारी भीड़ वहाँ जुटती है और उसका एक छोटा हिस्सा भी पुस्तकों की ओर आकर्षित होता है तो इससे पाठकों की संख्या में इज़ाफ़ा ही होता है।
विन्सेंट वान गो (नीदरलैंड्ज़), फ़्रेंच उपन्यासों का ढेर, 1887
पूरी दुनिया में पढ़ने की आदत को फिर से जीवित करने और प्रोत्साहित करने के लिए कई अद्भुत पहलकदमियाँ चल रही हैं। भारत के कई शहरों, जैसे मुंबई, पुणे और बेंगलुरू में, ‘बुक्सीज़’ जैसे अनोखे सामुदायिक कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। इन कार्यक्रमों में हर उम्र के लोग सार्वजनिक पार्कों या अन्य शांत स्थानों पर एक साथ बैठकर घंटों चुपचाप अपनी-अपनी किताबें पढ़ते हैं। ज़ाहिर है इससे पढ़ना एक निजी गतिविधि तक सीमित नहीं रह जाता। यह एक सुखद सामाजिक अनुभव में बदल जाता है।
इन वैश्विक प्रयासों के साथ-साथ, भारत में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर स्कूलों में पुस्तकालयों को मजबूत किया जा रहा है और बच्चों में छोटी उम्र से ही पढ़ने की आदत डालने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह बात अब व्यापक स्तर पर महसूस किया जा रहा है कि मुद्रित किताबों की जगह डिजिटल किताबें नहीं ले सकतीं। दुनिया भर में जो लोग डिजिटल माध्यम पर गए उन्होंने भी महसूस किया कि छपी हुई किताबों का अपना ही एक सुख है, और उसके साथ जो सुविधाएँ हैं, उन्हें डिजिटल माध्यम से हासिल नहीं किया जा सकता। डिजिटल माध्यम भी ज़रूरी हैं, लेकिन मुद्रित किताबों को जीवन से बाहर नहीं किया जा सकता। यानी दोनों चाहिए। इसी बात को अभिनेता स्टीफन फ्राई ने कुछ साल पहले इन शब्दों में व्यक्त किया था ,‘एक तकनीक दूसरी तकनीक की जगह नहीं लेती, बल्कि उसकी पूरक होती है। किताबों को किंडल से उतना ही खतरा है जितना सीढ़ियों को लिफ्ट से।’
हाँ, अख़बारों की बिक्री में लगातार गिरावट आई है क्योंकि अधिक से अधिक लोग समाचारों के लिए ऑनलाइन माध्यम पर जा रहे हैं। पत्रिकाएँ लगभग हर दिन बंद होती जा रही हैं। प्रिंट मीडिया और पत्रिकाओं का विज्ञापन राजस्व लगातार कम हो रहा है। अखबार उद्योग को प्रभावित करने वाली एक प्रमुख समस्या तकनीकी से ज़्यादा ऑनलाइन से जुड़ी है। टैब्लॉइड अखबार इससे विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा पाठक मनोरंजन जगत की खबरें पाने के लिए सोशल मीडिया का रुख कर रहे हैं। जब आप इंस्टाग्राम पर मशहूर हस्तियों को फॉलो कर सकते हैं और उनसे सीधे बातचीत भी कर सकते हैं, तो अख़बार ख़रीदकर उनके बारे में पढ़ने की क्या ज़रूरत है? इस बीच, कई लोग दुनिया भर की ख़बरें जानने के लिए 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों या वेबसाइटों का सहारा लेते हैं। ऐसे में, समाचार पत्र उद्योग को प्रिंट मीडिया में गिरावट और उसके परिणामस्वरूप विज्ञापन राजस्व में आई कमी से निपटने के लिए नए-नए उपाय अपनाने पड़ रहे हैं।
भविष्य को देखते हुए, यह संभावना है कि सबसे सफल प्रकाशक वे होंगे जो बहुस्तरीय प्रकाशन को अपनाएंगे – वास्तविक और डिजिटल दुनिया के बीच की खाई को पाटेंगे। मुद्रित प्रकाशन पढ़ना एक ऐसा ‘आरामदायक अनुभव’ है जो उपभोक्ता को डिजिटल दुनिया की भागदौड़ से कुछ पल का विराम देता है। और जैसे-जैसे जीवन की जटिलता बढ़ी है, भागदौड़ बढ़ी है, दूरियाँ बढ़ी है, सूचनाओं-तथ्यों और आभासी दुनिया की चकाचौंध बढ़ी है, हमें वास्तविक दुनिया में मौजूद रहने के इन छोटे-छोटे पलों की आवश्यकता पड़ने लगी है। और ऐसे पलों का साथी बनती है-छपी हुई किताबें।