ईरान पर हमलाः साम्राज्यवाद का घिनौना चेहरा
यूएस-इजराइल के मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए वैश्विक दक्षिण के देशों को बीसवीं सदी के साम्राज्यवाद विरोधी सिद्धांतों के साथ आगे आना होगा।
ईरान पर संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और इज़राइल के साम्राज्यवादी हमले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यूएस अपने वर्चस्व को बचाए रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों और मानवता के सभी सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाने में ज़रा भी नहीं हिचकता। अभी कुछ ही समय पहले तक यूएस और ईरान के बीच आपसी तनाव दूर करने को लेकर बातचीत चल रही थी। लेकिन वार्ता को एकतरफ़ा और मनमाने तरीक़े से ध्वस्त करते हुए यूएस-इज़राइल ने ईरान पर हमला कर दिया। लगातार जारी हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) अयातुल्ला अली खामेनेई सहित सरकारी मीडिया और सेना के कई बड़े अधिकारी मारे गए हैं। ईरान जवाब में इज़राइल सहित पश्चिम एशिया में कई यूएस के सैन्य ठिकानों पर बमबारी कर रहा है।
इज़राइली हमले में दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर में लड़कियों का एक प्राइमरी स्कूल तबाह कर दिया गया जिसमें 165 मौतें हुईं; इनमें ज़्यादातर स्कूल की छात्राएँ थीं। ईरान ने बहरीन, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत आदि में यूएस के सैन्य ठिकानों पर बमबारी की है, साथ ही इज़राइल में भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इस लड़ाई ने न सिर्फ़ पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया को बेहद ख़तरनाक अस्थिरता की स्थिति में धकेल दिया है। और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी यूएस और इज़राइल पर है। वे ऐसा कोई भी बहाना नहीं दे सकते जिससे उनका यह दुस्साहस सही ठहराया जा सके।
हबीब सदीक़ी (ईरान), दिलों का जनाज़ा, 1980
इस हमले के पीछे यूएस और इज़राइल यह दलील दे रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद क़रीब था, जबकि ईरान सालों से दोहराता आ रहा है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम के तहत हथियार नहीं बना रहा है बल्कि इसका इस्तेमाल ग़ैर-सामरिक कार्यों यानी ऊर्जा आदि के लिए कर रहा है। हमले के चंद घंटे पहले ही, यूएस और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता में मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अल बुसैदी ने कहा था कि ‘जल्दी ही शांति समझौता हो सकता है’ और ईरान ने यह भी मान लिया है कि वह कभी भी ‘परमाणु सामग्री जमा नहीं करेगा’। अगले दौर की वार्ता अप्रैल में होने वाली थी और दुनिया की अमनपसंद आबादी इसी उम्मीद में थी कि उन्हें एक और युद्ध नहीं झेलना पड़ेगा। लेकिन यूएस और इजराइल की सम्राज्यवादी लिप्सा हाल के दिनों में तेज़ी से बढ़ी है। इसलिए यूएस और इज़राइल, का यह हमला दुखद होने के बावजूद चौंकाने वाला नहीं कहा जा सकता।
यूएस पिछले कुछ वर्षों से दुनिया के संप्रभु राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और सरकारों को उखाड़ फेंकने का कोई मौका नहीं चूक रहा। इससे पहले, 3 जनवरी 2026 को उसने वेनेजुएला की संप्रभुता को रौंदते हुए वहां के चुने हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण करने का षडयंत्र रचा, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का सीधी-सीधा उल्लंघन था। इसी तरह, क्यूबा पर यूएस ने दशकों से ऐसे कठोर और अमानवीय प्रतिबंध लगा रखे हैं कि पूरी आबादी की मूलभूत ज़रूरतें खतरे में पड़ गई हैं। 29 जनवरी 2026 को डॉनल्ड ट्रम्प ने आदेश जारी कर किसी भी देश को क्यूबा को तेल बेचने से मना कर दिया है। ऐसा कर यूएस सरकार इस छोटे से द्वीप का आर्थिक रूप से गला घोंटने की हर संभव कोशिश कर रही है। वेनेजुएला, क्यूबा या ईरान जैसे किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सरकार को बदलने का अमेरिका को कोई अधिकार नहीं है। यह उसकी मनमानी और दंभ का ही प्रमाण है कि वह दुनिया को अपना ‘प्रभावक्षेत्र’ (Sphere of Influence) समझता है।
ईरान पर हमले को सही ठहराने के लिए पश्चिमी मीडिया और नेता अक्सर ईरान में महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा भावनात्मक रूप से उछालते हैं। यदि वास्तव में अमेरिका और इज़राइल को महिलाओं के अधिकारों की इतनी ही चिंता है, तो उन्हें ग़ज़ा और पूरे फ़लस्तीन में इज़राइल के जनसंहार में मारी गईं हज़ारों फ़िलिस्तीनी महिलाओं और बच्चियों की आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती? अक्टूबर 2023 से अब तक इज़राइली हमलों में 75,000 से अधिक फ़िलस्तीनियों की मौत हो चुकी है, जिनमें एक बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है। स्कूलों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों को तबाह किया गया। यह पूछना जायज़ है कि क्या उन महिलाओं के अधिकार अमेरिका-इज़राइल के लिए मायने नहीं रखते? या फिर महिलाओं और मानवाधिकारों का यह मुद्दा सिर्फ़ एक दिखावा और अपनी सैन्य-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा का एक औज़ार है?
पश्चिम एशिया पर यूएस हमेशा से ही अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता रहा है और ऐसा करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। पश्चिम एशिया के सभी देशों में यूएस ऐसी ही सरकार या शासन चाहता है जिससे उसके अपने हित सुरक्षित रहें। इज़राइल इस क्षेत्र में यूएस के साम्राज्यवाद का सच्चा और वफ़ादार सिपाही है। इसीलिए इस क्षेत्र की उन सभी सरकारों और ताक़तों को हटाने या कमज़ोर करने में इसने पूरी भूमिका निभाई है। पश्चिम एशिया में अब ईरान की सत्ता वह आख़िरी ताक़त है जो न सिर्फ़ यूएस के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ खड़ी है बल्कि इसने इज़राइल के विस्तारवाद को भी सीमित किया हुआ है। अक्टूबर 2023 के बाद से इज़राइल ने फ़िलिस्तीनियों का जनसंहार का जो नवीनतम दौर चला रखा है उसका जवाब देने के लिए भी ईरान ही इस क्षेत्र में सबसे सशक्त राष्ट्र के रूप में खड़ा रहा है।
इंसानी समाज जितने जटिल हैं, उतनी ही इन समाजों की राजनीतिक संरचनाएँ भीं। ईरान की आंतरिक राजनीति भी इस तथ्य से अछूती नहीं है। लेकिन यूएस और इज़राइल का यह हमला किसी भी लिहाज़ से सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बीसवीं सदी में साम्राज्यवाद को निर्णायक लड़ाई में शिकस्त देकर संप्रभुता का सिद्धांत दुनिया के सभी देशों ने मिलकर स्थापित किया था। और इस सिद्धांत को यूएस ने साल 2026 के पहले दो ही महीनों में तार-तार कर दिया है। इन घटनाओं से साबित होता है कि साम्राज्यवाद अब अपने एक चरम दौर में है जिसे हमारे संस्थान ने हाइपरइम्पीरीयलिज़म के रूप में पहचाना और इसका विश्लेषण किया है। इससे लड़ने के लिए दुनिया के देशों को और ख़ासतौर से वैश्विक दक्षिण को उपनिवेशवाद-विरोधी और जंग-विरोधी उन्हीं विचारों और सिद्धांतों को और पुख़्ता तौर से सामने लाना होगा जिन्होंने बीसवीं सदी में साम्राज्यवाद को शिकस्त दी थी। गौरतलब है कि उस लड़ाई के बाद वैश्विक दक्षिण (एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका) के देशों ने मिलकर एक ऐसी दुनिया की स्थापना का संकल्प लिया था जहाँ कोई देश दूसरे देश पर, कोई समाज दूसरे समाज पर अपना वर्चस्व नहीं स्थापित कर सकता। यूएस ने हिंसा का जो यह नया अध्याय साल 2026 में खोला है उसे बंद करने के लिए इन विचारों की ओर लौटना ज़रूरी है।
सोनाली |