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हिंदी बुलेटिन

आईपीएलः क्रिकेट के मैदान में पूँजी का खेल

यह कारोबारियों के लिए एक आकर्षक धंधे की तरह उभरा है, वहीं मध्यवर्ग इसमें अपने लिए करियर की तलाश करने लगा है।

 

सख़्त धूप का महीना अप्रैल और आँधी-तूफ़ान से जुड़ा मई, दोनों अब आईपीएल को समर्पित हो गए हैं। इस साल तो हद ही हो गई। टी-20 फॉर्मेट का पुरुष वर्ल्ड कप भारत में ही टीम इंडिया की जीत के साथ मार्च के पहले हफ़्ते में संपन्न हुआ और मार्च बीतने से पहले ही लोगबाग़ आईपीएल देखने में जुट गए। ‘ओवरसप्लाई’ जैसी कोई बात अपने यहाँ इस खेल पर लागू नहीं होती। बल्ले से मारी गई गेंद के पीछे खिलाड़ियों को भागते हुए देखने की भूख हमारे देश में कितनी है, इसका अंदाज़ा 2007 से पहले किसी को नहीं था। जिस एक इंसान को सबसे पहले इसका अंदाज़ा हुआ और इसके इर्द-गिर्द जिसने यह धंधा खड़ा किया, वह दो पैसे खींचकर वनुआतू का नागरिक बन गया है। जी हाँ, ललित मोदी, पूर्व उपाध्यक्ष बीसीसीआई, और आईपीएल के पहले चेयरमैन, जो साथ में चीयरलीडरों का सिस्टम लेकर आए थे और जिनके ट्वीट का इंतजार आईपीएल के हर सीजन से पहले कई लोग आज भी करते हैं।

बड़ी पूँजी, स्पोर्ट्स लीग और देसी दिमाग़

लीग का आइडिया बाज़ार में आए बीस साल भी नहीं हुए और इतने ही वक़्त में कितना बड़ा तमाशा खड़ा हो गया है, इसका एक ख़ाका दिमाग़ में बनाने के लिए आईपीएल की तुलना दुनिया की बाकी कमाऊ स्पोर्ट्स लीग्स से की जानी चाहिए। अभी हम चोटी के ऐसे पाँच नाम निकालें तो आईपीएल का मुक़ाम कारोबारी क़द में दूसरे नंबर का निकलता है। दुनिया की सबसे अमीर लीग एनएफएल है- नेशनल फुटबॉल लीग। यह अमेरिकी लीग एक ऐसे खेल का कारोबार करती है जो भारत में खेला ही नहीं जाता। बाकी दुनिया इसको रग्बी कहती है लेकिन ढाँचे में ज़रा से बदलाव के साथ अमेरिकी इसे फुटबॉल ही बोलते हैं, भले दुनिया भर के असल फुटबॉलर इस पर खुन्नस खाते रहें। एनएफएल की सालाना कमाई 21.2 अरब डॉलर है, जबकि आईपीएल साल में 16.4 अरब डॉलर पीट रहा है।

तीसरे और चौथे नंबर की कमाऊ स्पोर्ट्स लीग्स भी अमेरिकी ही हैं। मेजर लीग बेसबॉल (एमएलबी) एक और ठेठ अमेरिकी खेल का धंधा करती है, जिसके दर्शन भारत में नहीं होते। इसकी सालाना कमाई 13.1 अरब डॉलर है। इसके जरा-सा पीछे नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन है जो अभी साल में 13 अरब डॉलर कमा रही है। इस सूची में पाँचवाँ और आख़िरी नाम इंग्लैंड की फुटबॉल लीग ईपीएल (इंग्लिश प्रीमियर लीग) का है। इसका बिजनेस उसी वाली फुटबॉल का है, जो भारत समेत पूरी दुनिया में खेली जाती है। इस सूची को ग़ौर से देखने पर दो बातें उछलकर आती हैं। एक यह कि बाक़ी चार लीग्स विश्व पूँजीवाद का नेतृत्व करने वाले देशों में जन्मी हैं। दूसरी यह कि उनका कारोबार बहुत पहले, कम से कम 80 साल पहले शुरू हो चुका था, जब स्पोर्ट्स टीवी कहीं सीन में ही नहीं था। इनके बरक्स आईपीएल बहुत नया है और विकासशील देश से आने के चलते भी इसकी कामयाबी असाधारण है।

इंग्लिश प्रीमियर लीग की शुरुआत सन 1888 ई. में हुई थी, जब ब्रिटेन के राज में सूरज नहीं डूबता था। उसके 12 साल पहले, सन 1876 में मेजर लीग बेसबॉल अमेरिका में कामकाजी शक्ल ले चुकी थी। नेशनल फुटबॉल लीग वहाँ सन् 1820 में बनी, जबकि नेशनल फुटबॉल लीग ने द्वितीय विश्वयुद्ध ख़त्म होने के तुरंत बाद सन 1946 में अपना धंधा शुरू किया। इनके बरक्स बीस साल से कम उम्र में ही आईपीएल का बिजनेस जितना बढ़ गया है, उसे देखकर इसको खड़ा करने वालों की कुशाग्र बुद्धि से ज़्यादा भारत के आम आदमी की दिमाग़ी हालत का अंदाज़ा मिलता है, जो हर साल दो महीने बिला नागा, हर रोज़ एक ऐसा खेल टीवी पर देखने के लिए अपने तीन से सात घंटे देता है, जिसको न तो उसने कभी ख़ुद खेला है, न ही अपने बच्चों को खुले मन से इसे खेलने का मौक़ा दिया है। उसकी यह दशा टीवी और ओटीटी प्लैटफॉर्म्स पर विज्ञापन के महंगे टाइम स्लॉट बनाती है, जिससे मंदी में भी पैसा बरसता है।

आमदनी के ज़रिये

बीसीसीआई की कुल आमदनी का लगभग साठ फ़ीसदी हिस्सा अभी आईपीएल से ही आता है और उसके पास आय के बहुत सारे ज़रिये हैं। इनमें सबसे बड़ा ज़रिया प्रसारण अधिकार हासिल करने के लिए स्पोर्ट्स टीवी चैनलों द्वारा दी जाने वाली रक़म ही है। इसके अलावा स्टेडियम में लगाए जाने वाले विज्ञापनों से और टिकट बेचने से होने वाली कमाई भी इसके दो प्रकट साधन हैं। फ्रैंचाइजी कंपनियों के पास भी पैसे कमाने के बहुत सारे उपाय हैं। एक तो ऊपर जिन साधनों की बात हमने की है, उनसे होने वाली आमदनी में हिस्से का। दूसरा, एक नया ज़रिया विदेशों में क्लब ख़रीदकर वहाँ भी आईपीएल जैसा ही कुछ धंधा शुरू करने का दिखने लगा है। इससे उनका कारोबार साल में सिर्फ़ दो महीने के बजाय पूरे साल चलता रहता है। दक्षिण अफ्रीका में टी-20 लीग की छह की छह टीमें आईपीएल के फ्रैंचाइजीज ने ख़रीद रखी हैं और यूएई तथा अमेरिकी लीग की ज़्यादातर टीमें भी उन्हीं के पास हैं। वेस्ट इंडीज का कोई खिलाड़ी आपने ख़रीद रखा हो तो वह चारों लीगों में खेलकर आपके लिए पैसे कमाएगा।

ख़ैर, ये तो कमाई के प्रकट, कानूनी और वाज़िब तरीक़े हैं। अपने शुरुआती दस सालों में देश-दुनिया में आईपीएल की चर्चा पर्दे के पीछे चलने वाली गैरकानूनी गतिविधियों के लिए ज़्यादा रही। सबसे पहले, सन् 2010 में इसकी जड़ में मट्ठा डाला उन्हीं ललित मोदी ने, जिन्हें धूमधाम से आईपीएल शुरू कर देने के लिए धंधे का जीनियस कहा जा रहा था। उन्होंने ट्वीट किया कि नई फ्रैंचाइजी कोच्चि टस्कर्स के पीछे शशि थरूर हैं जो अपनी महिला मित्र सुनंदा पुष्कर को पूँजी लगाए बिना ही फ्रैंचाइजी बोर्ड का मेंबर बनाना चाहते हैं। यह विवाद इतना बढ़ा कि कोच्चि टस्कर्स से फ्रैंचाइजी छीन ली गई और बाद में अदालत के हस्तक्षेप से मुआवज़े की एक बड़ी रक़म बीसीसीआई को उसे देनी पड़ी। उसी क्रम में फ्रैंचाइजीज से पैसे उगाहने संबंधी कुछ घपले भी ललित मोदी से जुड़ते गए और गला फँसते देख एक दिन वे चुपके से लंदन खिसक गए। उनके क़िस्से आज भी निकलते हैं। आईपीएल से उनकी छाया हटी नहीं है।

सट्टेबाजी और फिक्सिंग

फिर स्पॉट फिक्सिंग के क़िस्से निकले तो उसमें ललित मोदी की छत्रछाया वाली टीम राजस्थान रॉयल्स के प्रबंधकों में एक राज कुंद्रा और मोदी के प्रतिद्वंद्वी श्रीनिवासन की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के एक प्रमुख व्यक्ति मय्यप्पन, दोनों को साल भर जेल की सज़ा मिली और उन्हें आजीवन आईपीएल से प्रतिबंधित किया गया। कुछ उभरते हुए क्रिकेटर्स का करियर बर्बाद हुआ सो अलग। बड़ी बात यह कि यह फिक्सिंग सट्टेबाज गिरोहों के लिए की जा रही थी, जिनका जाल एक समय देश में गली-गली फैल गया था। जैसे नब्बे के दशक में एक नंबर की लॉटरी बड़े पैमाने पर लोगों का घर बर्बाद करने लगी थी, वैसा ही कुछ क़िस्सा आईपीएल के साथ भी चल पड़ा। ऋषि कपूर और नीतू सिंह की मुख्य भूमिकाओं के साथ बनी वर्ष 2010 की फिल्म ‘दो दूनी चार’ की कहानी में एक पहलू इस तल्ख़ हक़ीक़त का भी था।

बाद में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर. एम. लोढ़ा के नेतृत्व में गठित आयोग ने मैच फिक्सिंग, स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के मामलों में बड़ी गहराई तक जाते हुए आईपीएल के लिए जो व्यवस्थाएँ दीं और नियम-कानून बनाए, उन्हीं का नतीजा है कि पाताल में जाती हुई इस लीग की साख कुछ सँभल गई। इसके बावजूद पता नहीं किस सरकारी छेद का इस्तेमाल करते हुए बीच में ‘ड्रीम इलेवन’ जैसी गतिविधियाँ शुरू हो गईं। बड़े-बड़े क्रिकेट सितारे उनका विज्ञापन करने लगे, हालाँकि अपनी अंतर्वस्तु में वे अलग मुहावरे के साथ की जाने वाली सट्टेबाजी ही थीं। काफ़ी विरोध के बाद उन पर रोक लगी और 2025 में आईपीएल को 1500 करोड़ का नुक़सान झेलना पड़ा है। इससे सट्टेबाजी नहीं रुकी है। पुलिस जहाँ भी सख़्त होती है, सट्टेबाज गिरोह पकड़े जाते हैं।

विश्व क्रिकेट पर प्रभाव

आमदनी और ख़र्चे वाली बात पर आगे बढ़ें तो आईपीएल के लिए ख़रीदे गए विदेशी खिलाड़ियों को इस साल के लिए 800 करोड़ रुपये के आसपास रक़म जानी है। विदेशी क्रिकेट बोर्डों के नुक़सान की भरपाई वहाँ से आने वाले खिलाड़ियों की देय राशि के 20 प्रतिशत हिस्से से की जाती है। सबसे महँगे खिलाड़ी लगभग हर साल ही ऑस्ट्रेलिया से ख़रीदे जाते हैं और सबसे ज़्यादा रक़म भी उन्हें ही जाती है लेकिन संख्या में सबसे ज़्यादा खिलाड़ी शुरू से ही वेस्ट इंडीज से आते रहे हैं। तीसरे नंबर पर दक्षिण अफ्रीका और फिर इंग्लैंड-न्यूजीलैंड के खिलाड़ी आते हैं। मैदान में चार विदेशी खिलाड़ी रखने की छूट है लेकिन प्रोफेशनलिज्म को ध्यान में रखते हुए हर टीम आठ-दस विदेशी खिलाड़ियों को अपने रोल पर रखना ही चाहती है। शुरू में पड़ोसी मुल्कों, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से खिलाड़ियों की बड़ी खेप आती थी लेकिन कूटनीतिक माहौल बिगड़ा तो फ्रैंचाइजीज ने पहले पाकिस्तानी क्रिकेटरों से पीछा छुड़ाया और अभी बांग्लादेश का भी कोई खिलाड़ी आईपीएल में नहीं खेल रहा है।

जिन स्पोर्ट्स लीग्स का ज़िक्र ऊपर आया है, उनमें ऐसा कोई मामला याद नहीं पड़ता, जब किसी देश से कूटनीतिक टकराव होने पर उसके खिलाड़ियों को लीग में न खेलने दिया गया हो। हालाँकि इतालवी फुटबॉल लीग ‘सीरी ए’ में एक बार ऐसा ज़रूर हुआ था कि इटली की टीम एक वर्ल्ड कप के नॉकआउट मैच में ब्राजील से हार गई तो जिस खिलाड़ी ने खेल के आखिरी क्षणों में गोल मारकर इटली को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था, उसको उस साल सीरी ए के किसी भी फ्रैंचाइजी ने नहीं ख़रीदा। पाकिस्तानी क्रिकेटरों का कई साल से और यहाँ से आगे उसी तर्ज़ पर बांग्लादेशी खिलाड़ियों का भी आईपीएल से बाहर रहना यही बताता है कि भारत में खेल का मुहावरा बाक़ी दुनिया जैसा कभी शायद ही हो पाए। खिलाड़ियों से ज़्यादा यहाँ भावना खेलती है और वह अक्सर आहत होती रहती है।

कमज़ोर क्रिकेट बोर्ड

आईपीएल से सबसे बड़ा नुक़सान दुनिया के कमज़ोर क्रिकेट बोर्डों का हुआ है। मसलन, जिंबाब्वे में क्रिकेट नहीं उठ पा रहा है और वेस्ट इंडीज का क्रिकेट बोर्ड आईपीएल की मेहरबानी से बिल्कुल प्रतीकात्मक स्थिति में आ चुका है। क्रिस गेल जैसा आईपीएल का बादशाह समझा जाने वाला खिलाड़ी अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए किसी काम का नहीं साबित हुआ। वेस्ट इंडीज के खिलाड़ी अपने बोर्ड से पैसे कम मिलने के कारण आम तौर पर उसको कोई भाव ही नहीं देते। और मान-मनौवल के बाद किसी तरह अपने देश की ओर से खेलने को राज़ी भी हो गए तो न उनमें टीम स्पिरिट दिखती है, न ही उनका थका हुआ या चोट खाया हुआ शरीर मैच में जान लड़ाने की स्थिति में होता है।

आयरलैंड, नीदरलैंड और स्कॉटलैंड जैसी यूरोप की संभावनाशील टीमों वाले क्रिकेट बोर्ड इस हालत में नहीं आ पा रहे हैं कि आईसीसी टूर्नामेंट्स में अपने लिए जगह बना लेने के बाद अपने खिलाड़ियों को नियमित काम-धंधे से छुट्टी दिलाकर टूर्नामेंट से पहले उन्हें महीने-दो महीने की न सही, कम से कम पंद्रह दिन की मैच प्रैक्टिस करा सकें। यह सही है कि आईपीएल का कुछ न कुछ फ़ायदा हर क्रिकेट बोर्ड को मिल रहा है- चाहे यह उसके खिलाड़ियों की फीस के हिस्से में मिले या आईसीसी से मिल रही सहायता के रूप में। लेकिन इससे बोर्डों के ख़र्चे चल जा रहे हैं, ढाँचे की मज़बूती के क्रम में सेहत नहीं सुधर रही। खेल का विस्तार करने की जिम्मेदारी आईसीसी की है लेकिन आईपीएल की विशाल पूँजी के सामने जब सौ साल के इतिहास वाले क्रिकेट बोर्ड भी बेचारगी दिखाने को मजबूर हैं, तो फिर दस-बीस साल से क्रिकेट की दुनिया में आने की कोशिश कर रहे इटली या नेपाल की क्या बिसात!

करियर की मृगमरीचिका

साल में दो महीने की इस गहमागहमी के पीछे बहुत धीरे-धीरे ज़मीनी तौर पर एक रासायनिक बदलाव भारतीय समाज में घटित हो रहा है। इसका स्वरूप कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा करोड़ रुपये की एक लॉटरी की जगह पाँच-दस हज़ार की कई हज़ार लॉटरियाँ निकलने से नब्बे के दशक में पैदा हुआ था। जब तक क्रिकेट की रोशनी गिनती के दस-बीस खिलाड़ियों पर सिमटी हुई थी तब तक भारत का मध्यवर्ग उन्हें देवताओं की तरह देखता था और उनकी दुनिया को अपनी दुनिया से अलग मानता था। अभी जब डेढ़ सौ क्रिकेटर एक साथ रोशनी में हैं तो लोग इसे अपने बच्चों के लिए एक करियर ऑप्शन की तरह देखने लगे हैं। धंधे के लोग छोटे स्तरों की प्रीमियर लीग शुरू करके उनकी उत्कंठा का फ़ायदा उठा रहे हैं। लेकिन भारत जैसे देश में बच्चों के करियर के लिए यह बहुत बड़ा जोख़िम है और अभी कहीं-कहीं से निराशा की ख़बरें भी आनी शुरू हो गई हैं।

– चंद्रभूषण (कवि-विचारक)