बजट 2026–27: स्वास्थ्य के बुनियादी मुद्दों की अनदेखी
बजट 2026–27 के प्रावधान गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा को आम लोगों की पहुँच से दूर करने वाली नीतियों को ही मज़बूत करते दिखते हैं।
निलीमा शेख (भारत), सलाम चेची, 2018
पिछले साल के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने ‘विकसित भारत’ की अपनी अवधारणा को प्रारंभ में ही स्पष्ट करने का प्रयास किया था। उन्होंने तेलुगु कवि और नाटककार गुरजाडा अप्पा राव को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘… देश उसके लोगों से बनता है’। आगे उन्होंने बताया कि सरकार के अनुसार विकसित भारत की संकल्पना में ग़रीबी का खात्मा और सभी के लिए सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच भी शामिल है। लेकिन स्वास्थ्य के लिए बजट के प्रावधानों में यह संकल्पना पिछले सालों की तरह इस साल भी नहीं दिखती है। बजट के प्रावधान गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा को आम लोगों की पहुँच से दूर करने वाली नीतियों को ही मज़बूत करते दिखते हैं।
अभाव और खराब गुणवत्ता भारतीय स्वास्थ्य सेक्टर की पुरानी पहचान है। स्वास्थ्य क्षेत्र में अतिनिम्न सार्वजनिक निवेश भी एक पुरानी परिपाटी है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में भारत का स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च न केवल विकासशील देशों में सबसे निचले स्तरों में से एक है, बल्कि पिछले ढाई दशकों में इसमें गिरावट भी आई है। प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय भी बहुत कम है और ब्राज़ील तथा चीन जैसे देशों की तुलना में लगातार पीछे जाता दिखता है।
![]()
स्वास्थ्य सेक्टर की उपेक्षा नवउदारवादी सरकारों के दौर में और गंभीर रूप अख़्तियार कर चुकी है। ये सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य में पर्याप्त निवेश नहीं करती हैं। परिणामत: स्वास्थ्य सेक्टर का बुनियादी ढाँचा लचर होता चला गया है और स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। सामान्यतः किसी कल्याणकारी राज्य में आर्थिक विकास से लोगों को बेहतर बुनियादी सुविधाएँ मिलती हैं, लेकिन भारत में तेज़ आर्थिक वृद्धि के साथ स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति और बिगड़ी है। चीन के साथ तुलना इस स्थिति को और स्पष्ट करती है। वर्ष 2001 में भारत में प्रति 1000 आबादी पर 2.1 अस्पताल के बिस्तर थे, जबकि चीन में यह संख्या 1.7 थी। 2023 तक चीन ने इस संख्या को बढ़ाकर 5.6 कर लिया, जबकि भारत में यह घटकर 1.6 हो गई। चिकित्सकों की संख्या के मामले में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। जहाँ आर्थिक विकास की मदद से अन्य देश बुनियादी सुविधाओं में निवेश बढ़ाकर जनता को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं भारत में बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता ऊँचे आर्थिक विकास दर से मेल नहीं खाती है।
इन समस्याओं से निपटने के लिए केंद्र सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व स्तर पर निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। लेकिन केंद्रीय बजट 2026–27 में स्वास्थ्य पर केवल 1,04,599 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि है। कुल केंद्रीय व्यय में स्वास्थ्य का हिस्सा पिछले कुछ वर्षों से लगातार घट रहा है और अब यह दो प्रतिशत से भी कम है। इस स्तर का बजट आवंटन सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र के गिरते हालात को रोकने के लिए भी अपर्याप्त है, सुधार की बात तो दूर है।
![]()
कोविड-19 महामारी के बाद सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे को मज़बूत करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन (PM-ABHIM) की घोषणा की गई थी। इस योजना के अंतर्गत 2021–26 के दौरान 64,180 करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे। लेकिन अब तक इसका लगभग 20 प्रतिशत ही खर्च हो पाया है। उपरोक्त ग्राफ़ PM-ABHIM पर बजट में प्रदत्त सालाना व्यय प्रदर्शित करता है। प्रारंभिक आवंटित राशि का एक छोटा सा ही हिस्सा खर्च होने के साथ–साथ हर साल बजट में प्रस्तावित व्यय और वास्तविक व्यय में भी भारी फ़ासला मौजूद है। अगर 2025–26 और 2026–27 में भी यह फ़ासला कायम रहा तो असल में व्यय हुई राशि प्रारंभिक ऐलान के बीस प्रतिशत से भी कम रहेगी।
सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त निवेश न होने के कारण निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इससे निजी क्षेत्र को अत्यधिक लाभ कमाने का अवसर मिलता है, जबकि लचर सार्वजनिक क्षेत्र इस पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पाता। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का विस्तार बढ़ती असमानता और धन के केंद्रीकरण की व्यापक प्रवृत्ति का ही एक हिस्सा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूदा संकट ने संपन्न वर्ग के लिए भारी मुनाफ़ा कमाने के अवसर पैदा किए हैं। सरकार, जो इस संकट के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार है, इसे दूर करने के बजाय ऐसी नीतियाँ अपना रही है जो निजी क्षेत्र को और लाभ पहुँचाती हैं। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) भी असल में इसी दिशा में काम करती है। सरकार सबको गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य तंत्र तैयार करने की अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रही, और जो बेहद कम खर्च कर भी रही है, उसका एक ठीक–ठाक हिस्सा निजी अस्पतालों की जेब में डाल रही है।
‘विकसित भारत’ जैसे अर्थहीन नारों के शोर–शराबे के बावजूद सच्चाई यह है कि भारत आज भी अपने नागरिकों की ज़रूरतों के अनुरूप मज़बूत स्वास्थ्य ढाँचा खड़ा करने में असफल रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति विकास और प्रगति के दावों से मेल नहीं खाती और यह एक ऐसी विकास नीति के नतीजों को उजागर करती है जो मूल रूप से असमान है और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विपरीत है। बजट 2026–27 भी पिछले बजटों की तरह स्वास्थ्य क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं को पहचानने में असफल रहा है और जन–विरोधी स्वास्थ्य एजेंडे की पैरोकारी करता है।
आदित्य पुथुर (भारत), थैंक गुडनेस, 2025
उमेश यादव |