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हिंदी बुलेटिन

भारत का अमेरिकी सपना चकनाचूर

एच-1 बी वीज़ा को लेकर ट्रम्प के फ़ैसले का न सिर्फ़ तात्कालिक आर्थिक असर होगा, बल्कि भारत की दीर्घकालीन रणनीतिक योजनाओं को भी नुक़सान होगा।

-सृजना

भारत तीन दशकों से लगातार संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के साथ रिश्ता मज़बूत करने की दिशा में काम कर रहा है। प्रॉपगैंडा मशीन ने इसे बराबरी का और पुख़्ता रिश्ता दिखाया। लेकिन पिछले कुछ महीनों ने यह अपमानजनक सचाई सामने ला दी है कि इस रिश्ते में भारत का दर्जा असल में क्या है।

भारत को यूएस की ओर से एक के बाद एक झटके मिल रहे हैं। यूएस ने भारतीय निर्यात पर 50% शुल्क लगाने का ऐलान किया गया है और यूरोपीय संघ से भारत पर 100% शुल्क लगाने की अपील की है। उसने चाबहार बंदरगाह के प्रतिबंध पर भारत को मिली छूट को रद्द कर दिया है, जबकि यह बंदरगाह भारत सरकार के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा रूसी तेल का व्यापार करने वाली भारतीय कंपनियों व व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाए जाने का ऐलान हुआ है। और अब सबसे ताज़ा हमले में यूएस ने एच-1बी वीज़ा का आवेदन शुल्क बढ़ाकर 1,000 डॉलर कर दिया है।

कैरेन हेडॉक (भारत), द्वंद्ववाद

भारत को ‘टैरिफ किंग’ कहते हुए ट्रम्प ने भारतीय वस्तुओं पर 25% शुल्क लगा दिया। असल कारण यह था कि भारत ने अपने किसानों (जो औसतन 2.5 एकड़ ज़मीन के मालिक हैं) को अमेरिका के किसानों (जिन्हें काफ़ी सब्सिडी मिलती है तथा जो औसतन 466 एकड़ ज़मीन पर खेती करते हैं) के साथ प्रतिस्पर्धा में उतारने की अमेरिकी मंशा को टाल दिया था। इसके बाद ट्रम्प ने यह आरोप लगाया कि भारत यूक्रेन में रूस द्वारा किए जा रहे हमलों में रूस का साथ दे रहा है, और इसलिए 25% का अतिरिक्त शुल्क जोड़ दिया। और यदि आप यह मानते हैं कि यूक्रेन की तबाही के लिए रूस के ख़िलाफ़ नाटो (जिसका नेतृत्व यूएस करता है) द्वारा किए जा रहे परोक्ष युद्ध नहीं बल्कि भारत और चीन ज़िम्मेदार हैं, तो यह आपकी गलतफ़हमी है।

भारत के वस्त्र, चमड़ा, रत्न और आभूषण उद्योग, जो मुख्यतः श्रम प्रधान व छोटे या मझोले उद्योग हैं, इन शुल्कों से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग अभी तक बचा हुआ है। पिछले हफ़्ते कुछ औषधीय उत्पादों पर 100% शुल्क लगाने की घोषणा ने भारत के दवा उद्योग को हिला दिया है। भारत का फ़ार्मा उद्योग यूएस को उसकी 40% जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराता है। इन शुल्कों का पूरा प्रभाव अभी तक पूरी तरह ज्ञात नहीं है।

इसी बीच भारत को एक और झटका मिला। ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत की सबसे अहम विदेशी परियोजना है, जो भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है, पाकिस्तान को बायपास करते हुए, जिसके साथ भारत के संबंध लंबे समय से ख़राब रहे हैं। यह बंदरगाह भारत, ईरान और रूस की साझेदारी में यूरोप और यूरेशिया से जुड़ने की भारत की व्यापार रणनीति का केंद्र है, जिससे बहु-आयामी परिवहन के माध्यम से भारत से उत्तरी यूरोप तक माल परिवहन की लागत काफ़ी घट सकती है। जब ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों से यह परियोजना ख़तरे में पड़ी, तो भारत ने ट्रम्प के पहले कार्यकाल में चाबहार बंदरगाह के लिए छूट प्राप्त की थी। अब वह छूट रद्द कर दी गई है, क्योंकि ट्रम्प प्रशासन ने फिर से बंदरगाह पर प्रतिबंध लागू कर दिए हैं, जिसे एक भारतीय सरकारी कंपनी संचालित करती है।

एच-1बी वीज़ा की फीस को बढ़ाकर, ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर और दबाव बढ़ाया है। हाल के वर्षों में एच-1बी वीज़ा पाने वालों में लगभग 70% भारतीय रहे हैं। अमेरिका अब भारत के लिए विदेशों से आने वाले पैसों (रेमिटेंस) का एक बहुत बड़ा स्रोत बन गया है। लगभग 28% रेमिटेंस भारतीय कामगारों की ओर से अमेरिका से आते हैं। लेकिन वहाँ की ऊँची वीज़ा फीस ज़्यादातर कामगारों के लिए बहुत महँगी है। इससे अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय कामगारों को रखना मुश्किल होता है और भारत को मिलने वाला पैसा कम हो सकता है। ये रेमिटेंस भारत के भुगतान संतुलन के लिए आवश्यक हैं, क्योंकि भारत का व्यापार घाटा बहुत बड़ा है।

गुलमोहम्मद शेख़ (भारत), एच्चे होमो-2, 2021

इन सभी कार्रवाइयों से भारत सरकार को गहरा धक्का लगा है। ट्रम्प के कृत्यों की वजह से भारत सरकार अमेरिका के साथ अपने संबंध पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो गई है। चीन को नियंत्रित करने के लिए ओबामा की एशिया केंद्रित नीति (पिवट टू एशिया) के बाद से, भारत की सरकारें लगातार यह मानती आई हैं कि भारत-अमेरिका संबंध 21वीं सदी के सबसे महत्त्वपूर्ण संबंधों में शुमार होगा। इसी विश्वास पर भारत इन दशकों में अपनी आर्थिक और विदेश नीति को यूएस के भू-राजनीतिक दृष्टिकोण के अनुसार गढ़ता चला गया।

आलम यह है कि भारत सरकार अब असमंजस में है कि ट्रम्प की घोषणाओं पर क्या प्रतिक्रिया करे, जिनका न केवल भारत पर तात्कालिक आर्थिक असर होगा, बल्कि दीर्घकालीन रणनीतिक योजनाओं को भी नुक़सान होगा।

सरकार की प्रतिक्रियाएँ अब तक नरम रही हैं। ब्राज़ील और चीन के राष्ट्रपतियों ने ट्रम्प की धमकियों का खुलेआम और सख़्त विरोध किया। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री अब तक चुप रहे हैं और शुल्क या अन्य मुद्दों पर किसी भी प्रकार की चर्चा को टाल रहे हैं।

हालाँकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने तिआनजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की पुतिन और शी जिनपिंग से मुलाक़ात को बहुत महत्व दिया था, परंतु इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि भारत भू-राजनीतिक नीति में बदलाव पर विचार कर रहा है। यहाँ तक कि सम्मेलन के तुरंत बाद जर्मनी के विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में प्रधानमंत्री ने ‘नियम-आधारित विश्व व्यवस्था’ और ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री व्यापार मार्गों की स्वतंत्रता’ के प्रति भारत-जर्मनी की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को दोनों देशों के लिए चिंता का विषय बताया, जिस पर विदेश मंत्रालय ने मौन रहकर अपनी सहमति जता दी। जाहिर है कि भारतीय सरकार अब भी पश्चिम के साथ निकटता पर दांव लगा रही है।

यूएस के चीन-नियंत्रण मिशन में भारत की अहमियत के प्रति आश्वस्त भारत सरकार को लगता रहा है कि यूएस के साथ रिश्ते मज़बूत करते हुए भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को भी क़ायम रखा जा सकता है। यानी भारत अपनी आर्थिक और रणनीतिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए ईरान और रूस (जिन्हें यूएस अपने दुश्मनों की तरह देखता है) के साथ रिश्ता बनाए रख सकता है और यूएस इस पर आपत्ति भी नहीं करेगा।

लेकिन ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका से निकटता बढ़ाने की क़ीमत भारत को भारी पड़ेगी। भारत केवल एक दोयम दर्जे का सहयोगी बनकर रह सकता है, जिसके राष्ट्रीय हित और संप्रभुता अमेरिकी प्राथमिकताओं और प्रभुत्व के अधीन होंगे। भारत सरकार इन सच्चाइयों को मानने से बच रही है और सोचती है कि यह मुश्किल समय सिर्फ अस्थायी है, ज़्यादातर ट्रम्प के स्वभाव की वजह से। लेकिन इस बीच, भारत अपनी अर्थव्यवस्था और राजनीति पर नियंत्रण रखने, लोगों के हितों की रक्षा करने और अपनी संप्रभुता बनाए रखने की क्षमता धीरे-धीरे खो रहा है।